विमुद्रीकरण (नोटबंदी) को मिली सफलता के बाद प्रधानमंत्री को अब 'गरीब किसानों' को ढाल बनाने वाली लफ्फाजी पर विराम लगाकर अमीर किसानों पर टैक्स लगाने की ओर बढ़ना चाहिए।
विमुद्रीकरण (नोटबंदी) के दांव को अपेक्षित सियासी कामयाबी मिल जाने के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को अब अमीर किसानों पर टैक्स लगाने की दिशा में आरंभिक कदम उठाने का सिलसिला शुरू कर देना चाहिए। आखिरकार, ऐसी कौन सी पुण्यमय सोच है जो सरकार को उन पर टैक्स लगाने से रोक रही है? बेशक गरीब ग्रामीण किसानों पर टैक्स लगाने की बात तो बिल्कुल भी नहीं सोची जानी चाहिए क्योंकि ये भी शहरी क्षेत्रों में रहने वाले गरीब प्लंबरों, नाइयों, दूसरे राज्यों से आए मजदूरों, इत्यादि की भांति सबसे कम आयकर स्लैब के दायरे में नहीं आते हैं। हम यहां अमीर किसानों के बारे में बात कर रहे हैं। हम उन गैर-किसानों के बारे में भी बात कर रहे हैं जो कृषि आय पर हासिल कर छूट का इस्तेमाल अन्य स्रोतों से अर्जित आमदनी पर टैक्स अदायगी से बचने के लिए करते हैं। हालांकि, इसके बावजूद जब भी धनी किसानों पर टैक्स लगाने को लेकर बहस छिड़ती है तो इससे किनारा कर लिया जाता है। अब इस तरह की सोच से पीछा छुड़ाने का समय आ गया है।
नीति आयोग द्वारा पिछले सप्ताह जारी किए गए तीन साल के कार्य एजेंडे 2017-18 से लेकर 2019-20 तक में कहा गया है, ‘कृषि से चाहे कितनी भी आमदनी क्यों न होती हो उस पर वर्तमान में कोई आयकर नहीं देना पड़ता है।’ रिपोर्ट में कहा गया है, ‘वैसे तो यह प्रावधान किसानों के हितों की रक्षा के लिए किया गया है, लेकिन गैर-कृषि संस्थाएं कभी-कभी इसका उपयोग अपनी आय के स्रोत के रूप में कृषि को घोषित करके कर अदायगी से बचने के लिए भी करती हैं। काले धन के सृजन को कम करने के लिए इस तरह की खामियों को दूर करने की जरूरत है।’ 208 पृष्ठों की रिपोर्ट के इस छोटे से पैराग्राफ में यहां तक कि कोई निश्चित सिफारिश भी नहीं की गई है। इसने सिर्फ इस मुद्दे को विचारार्थ पेश कर दिया है।
यही नहीं, ‘वित्तीय ईश–निंदा’ वाली इस खबर पर सरकार की ओर से तुरंत एवं ठोस प्रतिक्रिया भी आ गई। वित्त मंत्री अरुण जेटली ने कहा, ‘इस विषय पर किसी भी भ्रम को दूर करने के लिए मैं स्पष्ट रूप से यह कहता हूं कि केंद्र सरकार की कृषि आय पर कुछ भी टैक्स लगाने की कोई योजना नहीं है।’ इससे साफ जाहिर है कि भारत के किसान चाहे कितने भी अमीर क्यों न हों, वे टैक्स अधिकारियों की पहुंच से बाहर हैं। वित्त मंत्री ने इस निष्क्रियता के लिए नैतिकता या तर्क के बजाय इस तकनीकी बारीकी का उल्लेख किया: ‘अधिकारों के संवैधानिक आवंटन के अनुसार कृषि आय पर टैक्स लगाने के लिए केंद्र सरकार के पास कोई क्षेत्राधिकार नहीं है।’
बेशक, श्री जेटली को कानून के बारे में पता है। अपने सभी रूपों में कृषि सातवीं अनुसूची की सूची II के अंतर्गत आती है, जो राज्य सरकारों का विशिष्ट डोमेन (अधिकार क्षेत्र) है। केंद्र सरकार इसके तहत कानून नहीं बना सकती है। इसमें कृषि शिक्षा, भूमि एवं भूमि का पट्टा, किराये का संग्रह, धन उधार देना और ऋण संबंधी राहत शामिल हैं। वहीं, वर्तमान चर्चा में जो सबसे महत्वपूर्ण है वह है कृषि आय पर टैक्स। नीति आयोग के सदस्य बिबेक देबरॉय ने 2 मई को अपने शानदार कॉलम में इनमें से कुछ का उल्लेख किया है: बिहार (1938), असम (1939), बंगाल (1944), उड़ीसा (1948), उत्तर प्रदेश (1948), हैदराबाद (1950), त्रावणकोर एवं कोचीन (1951) और मद्रास एवं पुराने मैसूर राज्य (1955) में कृषि आयकर अधिनियम।
राज कृष्ण ने अगस्त 1972 में जारी अपने पेपर में लिखा था कि वर्ष 1960-61 में भारतीय किसान अपनी आय का 5.6 फीसदी टैक्स के रूप में अदा किया करते थे, जबकि शहरों में रहने वाले निवासियों द्वारा अपनी आय के 13 फीसदी का भुगतान टैक्स के रूप में किया जाता था। विभिन्न क्षेत्रों (सेक्टर) की कर योग्य क्षमता को मापने के लिए ‘कुल आमदनी में से प्रति व्यक्ति निर्वाह को घटा देने’ नामक एक और लोकप्रिय मीट्रिक का उपयोग करने पर राज कृष्ण ने यह पाया कि किसान को करों के रूप में 13.4 फीसदी और उसके शहरी समकक्षों को 26.6 फीसदी का भुगतान करना पड़ रहा था। हालांकि, यह कर राशि कोई खास नहीं होती थी क्योंकि यह प्रथम पंचवर्षीय योजना (1952-1956) में कुल केंद्रीय एवं राज्य राजस्व का 9 फीसदी, दूसरी पंचवर्षीय योजना (1956-1961) में 8 फीसदी और तीसरी पंचवर्षीय योजना (1961-1966) में 5 फीसदी ही थी। यह उर्वरक, सिंचित जल, बिजली एवं संस्थागत ऋण जैसे इनपुट पर सब्सिडी के साथ-साथ प्रमुख फसलों जैसे कि गेहूं, चावल, बाजरा, कपास और गन्ने पर न्यूनतम मूल्य गारंटी देने के बावजूद आंकी गई थी, जो कुल फसल क्षेत्र के 80 फीसदी से भी अधिक क्षेत्र में उगाई जाती थीं।
हम और ज्यादा अतीत में जाने पर पाते हैं कि भारत के कुल केंद्रीय एवं राज्य राजस्व में भू-राजस्व की हिस्सेदारी 1793-94 में 69.0%, 1818-19 में 73.1%, 1901-02 में 33.9% और 1938-39 में 16.1% थी। औपनिवेशिक युग के दौरान शुरू हुआ गिरावट का यह दौर स्वतंत्र भारत में भी जारी रहा। यह हिस्सेदारी घटते-घटते अब शून्य पर आ गई है (अर्थशास्त्र नहीं, बल्कि राजनीति के कारण ऐसा हुआ है)। एक और बात। यह आंकड़ा जापान से बहुत अलग नहीं है। जापान में कुल राजस्व में भूमि कर की हिस्सेदारी 1888-89 के 85.6% से गिरकर 1933-37 में गिरकर महज 10.7% के स्तर पर आ गई। एकमात्र अंतर यह था कि जापान में कृषि कर से प्राप्त राजस्व का उपयोग देश के मैन्युफैक्चरिंग क्षेत्र का निर्माण करने में किया गया, जिसमें किसानों को स्थानांतरित कर दिया गया था।
आजादी के बाद भारत के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में विनिर्माण क्षेत्र की हिस्सेदारी कृषि की कीमत पर बढ़ने लगी। वर्ष 1954-55 में 51.7 फीसदी दर्ज होने के दस साल बाद भारत के सकल घरेलू उत्पाद में कृषि क्षेत्र की हिस्सेदारी घटकर 43.9 फीसदी और फिर वर्ष 1974-75 में 38.5 फीसदी रह गई। इसी स्तर पर अगले दशक के दौरान विराजमान रहने के बाद यह वर्ष 1994-95 में और घटकर 27.8 फीसदी के स्तर पर आ गई। हालांकि, यह भारतीय अर्थव्यवस्था के उदारीकरण का दौर था जिस दौरान यह हिस्सेदारी आखिरकार धराशायी होकर वर्ष 2004-05 में 19.0 फीसदी और आज 14 फीसदी से भी कम रह गई है। चूंकि इस क्षेत्र में भारत के कुल श्रमबल का लगभग 50 फीसदी हिस्सा संलग्न है, इसलिए यह निष्कर्ष निकालना कठिन नहीं है कि कृषि क्षेत्र पर निर्भर लोग करों का भुगतान करने लायक पर्याप्त कमाई नहीं कर रहे हैं। हालांकि, यह बात तो निश्चित रूप से सही है कि वे पचास और साठ के दशकों के मुकाबले बदतर स्थिति में नहीं हैं।
इसके अलावा, यह निष्कर्ष निकालना कि कृषि क्षेत्र में संलग्न सभी लोग गरीब और सीमांत किसान हैं, वह संबंधित डेटा से मेल नहीं खाएगा। भारत में कृषि से जुड़े परिवारों की हालत के प्रमुख संकेतकों के अनुसार 3,706 कृषक परिवारों के पास 10 हेक्टेयर या उससे अधिक जमीन है। इसी तरह 33,019 अन्य कृषक परिवार 4 हेक्टेयर से लेकर 10 हेक्टेयर तक जमीन के मालिक हैं। जो भी यह मानते हैं कि ये 36,725 कृषक परिवार या सभी कृषक परिवारों में से 4.1 फीसदी परिवार गरीब हैं और करों का भुगतान नहीं कर सकते हैं, उन्हें इन आंकड़ों का ज्यादा विस्तार से अध्ययन करना चाहिए। देबरॉय ने विजय शर्मा के एक आरटीआई आवेदन का हवाला देते हुए लिखा है कि वर्ष 2012 में 8,12,426 व्यक्तिगत करदाताओं ने अपनी कृषि आय का खुलासा किया था, जिसमें प्रति करदाता औसत आय 83 करोड़ रुपये थी। आकलन वर्ष 2015-16 में 307 व्यक्तियों ने एक करोड़ रुपये से अधिक की कृषि आय होने की सूचना दी थी और उनमें से किसी ने भी कुछ भी कर का भुगतान नहीं किया था।
विमुद्रीकरण (नोटबंदी) के कदम को आगे बढ़ाने के लिए सरकार द्वारा उद्धृत किए गए कई कारणों में से एक कारण यह था कि राजकोषीय न्याय से जुड़ाव दरअसल चोरी का मुद्दा है। कई अर्थशास्त्रियों ने यह बताया है कि काले धन को सफेद करने वाले अनेक स्थानों में कृषि भी शामिल है। ओ.पी. चोपड़ा ने मई 1982 में जारी एक पेपर में लिखा था, ‘कृषि से होने वाली आय को प्राथमिकता देने की वजह से बेहिसाब आय को कृषि के खाते में दर्शा दिया जाता है, ताकि कर रियायतों का लाभ उठाया जा सके और कर अदायगी से बचने के लिए बेहिसाब आय को उसमें तब्दील किया जा सके।’ इस पेपर में यह भी लिखा गया है, ‘बेहिसाब आय को सफेद धन में तब्दील करने के लिए धनराशि को कृषि आय के खाते में डाल दिया जाता है।’
एक के बाद एक कई अध्ययन किए गए, लेकिन यह मुद्दा अब भी अनसुलझा ही है। मई 2012 में जारी काले धन पर श्वेत पत्र में कहा गया है, ‘दावे के सत्यापन के बिना ही आयकर के उद्देश्यों से कृषि आय पर भरोसा कर लेने से काले धन को वित्तीय प्रणाली में कृषि आय के रूप में लाने का अवसर मिल जाता है।’ इसमें यह भी कहा गया है, ‘राज्य सरकारें कंप्यूटरीकृत प्रोसेसिंग और चयनात्मक सत्यापन की सुविधा के साथ कृषि आय पर टैक्स लगाने पर विचार कर सकती हैं। इससे जहां एक तरफ राज्य सरकारों के राजस्व में वृद्धि होगी, वहीं दूसरी तरफ कृषि आय की आड़ में काले धन की लांड्रिंग की रोकथाम की जा सकेगी।’
कृषि आय पर कर लगाने का अधिकार राज्य सरकारों के हाथ में होने की समस्या के कारण वित्तीय असंतुलन की स्थिति उत्पन्न हुई है। कठोर राजनीतिक निर्णय लेने के लिए तैयार न होने के कारण प्रत्यक्ष करों का बोझ केंद्र द्वारा एकत्र की जाने वाली गैर-कृषि आय को अर्जित करने वालों पर स्थानांतरित हो गया है। अत: स्थिति यह है कि राज्यों के पास टैक्स लगाने का अधिकार है, लेकिन इसके लिए वे तैयार नहीं हैं। वहीं, दूसरी ओर केंद्र के पास कोई अधिकार नहीं है, लेकिन उसके द्वारा टैक्स लगाए जाने की जरूरत है। इससे साफ जाहिर है कि यह संवैधानिक व्यवस्था काम नहीं कर रही है और पिछले 15 वर्षों से इस समस्या के समाधान का इंतजार किया जा रहा है।
प्रत्यक्ष करों पर गठित विजय केलकर कार्यदल ने वर्ष 2002 में यह सिफारिश की थी, ‘एक टैक्स किराया व्यवस्था तैयार की जानी चाहिए जिसके तहत राज्य संविधान के अनुच्छेद 252 के तहत एक प्रस्ताव पारित करके केंद्र सरकार को कृषि आमदनी पर आयकर लगाने के लिए अधिकृत कर सकते हैं। केंद्र द्वारा संग्रहित सभी कर (संग्रह की लागत को छोड़कर) राज्यों को सौंप दिया जाएगा।’ हालांकि, इसमें भी बड़ी सावधानी के साथ देश की राजनीति का बचाव किया गया। कार्यदल ने कहा था, ‘छूट सीमा को बढ़ाकर प्रति व्यक्ति 1 लाख रुपये करने संबंधी हमारी सिफारिश को देखते हुए ज्यादातर (असली) किसान कर दायरे से बाहर ही बने रहेंगे।’
समस्त संवैधानिक एवं आर्थिक दलीलों को एक तरफ रखते हुए अमीर किसानों पर टैक्स लगाना अच्छा राजनीति है, जैसा कि विमुद्रीकरण (नोटबंदी) की हालिया सफलता ने कर दिखाया है। हमें यह नहीं पता कि विमुद्रीकरण (नोटबंदी) आर्थिक दृष्टि से कारगर साबित हुआ है या नहीं। इसकी सफलता या विफलता के बारे में जानने के लिए ठोस आंकड़ों की प्रतीक्षा की जा रही है। हालांकि, इस दिशा में बतौर उदाहरण कुछ-कुछ साक्ष्य मिलने लगे हैं, जैसे कि टैक्स रिटर्न भरने वाले लोगों की संख्या में 9.5 मिलियन का इजाफा हुआ है। यह जानकारी द इकोनॉमिक टाइम्स ने दी है। हम यही जानते हैं कि विमुद्रीकरण (नोटबंदी) ने राजनैतिक रूप से काम किया है। दरअसल, जिन लोगों ने भी यह कहा था कि यूपी चुनाव विमुद्रीकरण (नोटबंदी) पर एक जनमत संग्रह होगा, वे सही साबित हुए हैं। 36,725 अमीर किसानों पर टैक्स लगाना भी ठीक इसी तरीके से काम करेगा। कहने का मतलब यह है कि जब आम जनता अर्थात गरीब लोग यह देखेंगे कि हकदार यानी अमीर टैक्स लगाए जाने से काफी परेशान हैं तो एक संभावित वोटबैंक बन जाएगा। भाजपा शासित राज्य, जहां भारत की 60 फीसदी से भी अधिक आबादी रहती है, इस दिशा में शुरुआत कर सकते हैं। विजय केलकर कार्यदल के अनुमान के अनुरूप जब इस राजस्व से इन राज्यों का खजाना भरने लगेगा तो अन्य राज्य भी उनका अनुसरण करने लगेंगे।
केंद्र में सत्तारूढ़ भाजपा सरकार के लिए केवल दो अल्पकालिक चुनौतियां होंगी। पहली चुनौती यह है कि भाजपा को राज्यों में अपने बड़े किसान-नेताओं को इस विचार को आगे ले जाने के लिए मनाना होगा, भले ही इस वजह से उन्हें अपनी व्यक्तिगत दौलत में थोड़ा नुकसान ही क्यों न उठाना पड़ जाए। दूसरी चुनौती यह है कि गरीब किसानों के लिए एक मजबूत संचार रणनीति तैयार करनी होगी जिससे कि उन्हें यह बताया जा सके कि सभी किसानों पर नहीं, बल्कि केवल अमीर किसानों पर ही कर लगाया जा रहा है। इसी तरह राष्ट्रीय स्तर पर सैनिकों के अनुकरणीय कार्यों से सभी को अवगत कराएं। उदाहरण के लिए, सैनिकों ने अपनी जिंदगी को दांव पर लगा रखा है और फिर भी वे करों का भुगतान करते हैं। विमुद्रीकरण (नोटबंदी) की भांति ही यह न केवल अच्छा अर्थशास्त्र होगा, बल्कि अच्छी राजनीति भी होगी। दरअसल, किसी भी तरह से अब अमीर किसानों के हितों की रक्षा के लिए ‘गरीब किसानों’ को ढाल बनाने वाली लफ्फाजी या बयानबाजी पर विराम लगाने का समय अब आ गया है।
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Gautam Chikermane is Vice President at Observer Research Foundation, New Delhi. His areas of research are grand strategy, economics, and foreign policy. He speaks to ...
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