मोंगला बंदरगाह का विकास बांग्लादेश को इस क्षेत्र में चल रहे भू-राजनीतिक ताक़त हासिल करने के खेल में एक रणनीतिक लाभ प्रदान करने वाला साबित हो सकता है.
बांग्लादेश बंगाल की खाड़ी में स्थित एक ऐसा देश है, जिसके विकास की कहानी में बंदरगाहों की एक महत्त्वपूर्ण भूमिका रही है. देखा जाए तो लंबे समय से बांग्लादेश के समुद्री व्यापार को सुगम और सुविधाजनक बनाने की ज़िम्मेदारी अकेले चटगांव बंदरगाह पर रही है. हालांकि, चीन द्वारा बांग्लादेश के मोंगला पोर्ट के आधुनिकीकरण में निवेश करने के अपने फ़ैसले की घोषणा के साथ ही अब यह स्थिति बदलती हुई सी नज़र आती है. वर्षों तक चले विचार मंथन और इस परियोजना की व्यावहारिकता को लेकर विस्तृत अध्ययन के पश्चात यह पाया गया कि ये परियोजना "बांग्लादेश के विकास के लिए महत्त्वपूर्ण" है. इसके बाद आख़िरकार बीजिंग ने इस वर्ष चार जनवरी को ढाका को एक पत्र भेजा, जिसमें 400 मिलियन अमेरिकी डॉलर के सरकारी रियायती ऋण के साथ 'मोंगला पोर्ट के अधुनिकीकरण और सुविधाओं के विस्तार' के लिए वित्तपोषण के उसके वर्ष 2019 के अनुरोध को स्वीकार कर लिया. इस ऋण का जो फ्रेमवर्क है, वो यह निर्धारित करता है कि इस प्रोजेक्ट को एक चीनी उद्यम या फिर चीनी कंपनियों के एक संगठन द्वारा पूरा किया जाएगा. ज़ाहिर है कि इस परियोजना को लेकर चल रही बातचीत की शुरुआत में ही चीन ने इसे लागू करने, संचालित करने, रखरखाव करने और इसके प्रबंधन का पूरा दायित्व संभालने की मांग की थी.
चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग की वर्ष 2016 की ढाका यात्रा के दौरान चीन और बांग्लादेश बीच जिन 27 परियोजनाओं पर सहयोग करने पर सहमति बनी थी, मोंगला पोर्ट को विकसित करने की योजना उन्हीं में से एक है.
चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग की वर्ष 2016 की ढाका यात्रा के दौरान चीन और बांग्लादेश बीच जिन 27 परियोजनाओं पर सहयोग करने पर सहमति बनी थी, मोंगला पोर्ट को विकसित करने की योजना उन्हीं में से एक है. वर्ष 2016 में ही मोंगला पोर्ट अथॉरिटी ने चाइना नेशनल कंपलीट इंजीनियरिंग कॉर्पोरेशन के साथ अपने मेंमोरेंडम ऑफ़ अंडरस्टैंडिंग को एक समझौते के रूप में बदला था. हालांकि, कंपनी की ओर से कोई संपर्क नहीं किए जाने की वजह से इस समझौते को वर्ष 2019 में रद्द कर दिया गया था. इसके बाद मोंगला पोर्ट अथॉरिटी ने जुलाई 2021 में एक अन्य चीनी उद्यम चाइना सिविल इंजीनियरिंग कंस्ट्रक्शन कंपनी के साथ एक समझौता किया. हालांकि, इस तथ्य को ध्यान में रखना बेहद दिलचस्प है कि इन शुरुआती समझौतों के बावज़ूद चीन से बांग्लादेश को तब तक कोई पैसा नहीं मिल रहा था, जब तक कि मोंगला पोर्ट अथॉरिटी ने पिछले साल 26 दिसंबर को एगिस इंडिया कंसल्टिंग इंजीनियर्स प्राइवेट लिमिटेड को 6,014 करोड़ टका की क्षमता-निर्माण वाली इस परियोजना के लिए सलाहकार के रूप में नियुक्त नहीं किया. मोंगला बंदरगाह के विकास में भारत की भागीदारी की ख़बर के बाद परियोजना को अंतिम रूप देने के लिए चीन ने अपना निर्णय लेने में तत्परता दिखाई. इससे यह स्पष्ट है कि बंगाल की खाड़ी क्षेत्र में भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा कितनी तेज़ है. इस होड़ को समझने के लिए, यह जानना बेहद ज़रुरी है कि चीन और भारत मोंगला बंदरगाह में निवेश से किस प्रकार लाभान्वित होंगे.
मोंगला पोर्ट भारत में कोलकाता बंदरगाह के निकट स्थित है और इसलिए लगभग 18 घंटे के यात्रा समय के साथ व्यापार के लिए एक वैकल्पिक समुद्री मार्ग उपलब्ध कराता है.
दक्षिण-पश्चिमी बांग्लादेश में मोंगला और प्रसूर नदी के मिलने के स्थान पर स्थित यह बंदरगाह वर्तमान में बांग्लादेश का दूसरा सबसे व्यस्त पोर्ट है, हालांकि इसकी यातायात और कार्गो संभालने की क्षमता अभी भी चंटगांव पोर्ट की तुलना में बहुत कम है. इसके बावज़ूद मोंगला बंदरगाह को अंतर्राष्ट्रीय शिपिंग हब के रूप में सेवा देने मुताबिक़ विकसित किया गया है, जिसकी वजह से यह चीन और भारत दोनों के लिए एक आकर्षक संभावना बन गया है.
मोंगला पोर्ट चीन को समुद्र में एक प्रवेश द्वार उपलब्ध कराता है, जिसके द्वारा चीन बंगाल की खाड़ी और व्यापक हिंद महासागर क्षेत्र में अपने पैर जमा सकता है और अपनी ज़्यादा मौज़ूदगी सुनिश्चित कर सकता है. बांग्लादेश खाड़ी के शीर्ष पर स्थित है, जहां से संचार की कई महत्वपूर्ण समुद्री लेन (SLOCs) दिखाई देती हैं, जो इन समुद्री क्षेत्रों को पार करती हैं. ये समुद्री मार्ग ऊर्जा संसाधनों और अन्य महत्त्वपूर्ण वस्तुओं के व्यापार के लिए बेहद अहम हैं. हिंद महासागर के एक हिस्से के रूप में, जिसमें दुनिया के तेल और गैस भंडार का 40 प्रतिशत शामिल है, बंगाल की खाड़ी हाइड्रोकार्बन की एक विशाल और अपेक्षाकृत ऐसे संपत्ति का भंडार है, जिसके बारे में अभी पूरी तरह से पता नहीं लगाया गया है. उल्लेखनीय है कि ऊर्जा संसाधनों को लेकर प्रतिस्पर्धा से भरे भविष्य में बांग्लादेश और इसके बंदरगाह, ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित में संलग्न चीन जैसी अतिरिक्त प्रमुख क्षेत्रीय ताक़तों के लिए एक आकर्षक निवेश स्थल हैं.
चीन द्वारा मोंगला बंदरगाह के आधुनिकीकरण में दिलचस्पी लेने का एक अन्य कारण बांग्लादेश का बढ़ता कपड़ा उद्योग भी है. ऐसा बताया गया है कि चीन के कुछ रेडीमेड वस्त्र निर्माता घरेलू स्तर पर उत्पादन की बढ़ती लागत की वजह से अपनी उत्पादन इकाइयों को बांग्लादेश में स्थानांतरित करना चाहते हैं. इसके साथ ही कई ब्रांड ऐसे हैं, जो अमेरिका-चीन व्यापार युद्ध के चलते गार्मेंट समेत विभिन्न सेक्टरों में गैर-चीनी आपूर्तिकर्ताओं को तलाश रहे हैं. इस दौरान, सस्ते श्रम की उपलब्धता, कम विकसित देश के रूप में बिना किसी प्रतिबंध के निर्यात करने की क्षमता और अमेरिकी बाज़ार में मल्टी-फाइबर समझौते के अंतर्गत इसके निर्धारित कोटा के साथ बांग्लादेश में रेडीमेड गार्मेंट उद्योग तेज़ी से फलफूल रहा है. चटगांव और मोंगला के बंदरगाह बांग्लादेश के रेडीमेड गार्मेंट उद्योग की रीढ़ हैं, जो दक्षिण पूर्व एशिया से कच्चे माल के आयात और तैयार उत्पादों के निर्यात की बेहतर सुविधा प्रदान कर रहे हैं. हालांकि, चटगांव पोर्ट पर भारी ट्रैफिक के कारण व्यापारियों को अक्सर अपने सामान को लोड और अनलोड करने में दिक़्क़तों का सामना करना पड़ता है. जबकि देखा जाए तो मोंगला बंदरगाह पर अभी इस तरह के यातायात का कोई दबाव नहीं है. ऐसा इसलिए है, क्योंकि मोंगला पोर्ट को पहले से ही कपड़ा व्यापारियों एवं निर्माताओं द्वारा अपनी वस्तुओं के निर्यात के लिए सुविधाएं उपलब्ध कराने के लिहाज़ से ही विकसित किया जा रहा है. पिछले साल जुलाई में मोंगला बंदरगाह से पोलैंड के लिए एक जहाज रवाना किया गया था, जिसमें कुल 27 गार्मेंट फैक्ट्रियों द्वारा निर्यात के लिए बनाए गए कपड़े लोड किए गए थे. इस तरह की खेपों में ख़ास तौर पर वृद्धि होने की संभावना है क्योंकि मोंगला पोर्ट राजधानी ढाका के बहुत नज़दीक है, जहां इनमें से कई परिधान उद्योगों के दफ़्तर मौज़ूद हैं. पद्मा रोड और पिछले साल रेल ब्रिज के निर्माण ने ढाका और मोंगला पोर्ट के बीच के सफर को और सुगम कर दिया है. ऐसे में स्पष्ट है कि मोंगला बंदरगाह में निवेश और उसके संचालन का अधिकार (कुछ सीमा तक) हासिल करने से चीन को अपने वस्त्र उद्योग को बढ़ाने में सहायता मिलेगी.
मोंगला पोर्ट का विकास भारत के लिए भी बेहद अहम है क्योंकि यह दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय व्यापार को बढ़ाने में मददगार होगा. इसकी वजह यह है कि मोंगला पोर्ट भारत में कोलकाता बंदरगाह के निकट स्थित है और इसलिए लगभग 18 घंटे के यात्रा समय के साथ व्यापार के लिए एक वैकल्पिक समुद्री मार्ग उपलब्ध कराता है. इस समुद्री मार्ग का उपयोग भारत-बांग्लादेश सीमा पर स्थित बेनापोल और पेट्रापोल के अंतर्देशीय कंटेनर डिपो में भीड़भाड़ को बाईपास करने के लिए किया जा सकता है, जहां कंसाइनमेंट यानी जहाज पर लदे सामान की खेप में 15 दिनों तक की देरी हो सकती है. कोलकाता और मोंगला पोर्ट के बीच समुद्री संपर्क का उपयोग दोनों देशों के बीच मौजूद कोस्टल शिपिंग एग्रीमेंट अर्थात तटीय नौवहन समझौते का अधिक से अधिक लाभ उठाने में भी सहायक सिद्ध होगा.
अगर मोंगला बंदरगाह का विस्तार किया जाता है और इसका आधुनिकीकरण किया जाता है, तो यह एक क्षेत्रीय व्यापारिक हब बन सकता है. इतना ही नहीं यह बांग्लादेश, चीन, भारत और म्यांमार आर्थिक (BCIM) कॉरिडोर को उप-क्षेत्रीय स्तर पर भी मज़बूत करने में योगदान देगा.
भारत द्वारा अपने लैंडलॉक पूर्वोत्तर राज्यों को बेहतर व्यापार और कनेक्टिविटी की सुविधा उपलब्ध कराने के लिए समुद्र तक पहुंच प्रदान करने हेतु भी मोंगला पोर्ट का उपयोग किया जा सकता है. इस लिहाज़ से देखा जाए, तो भारत द्वारा भी तंग सिलीगुड़ी कॉरिडोर या 'चिकन नेक', जैसा कि इसे कहा जाता है, को बाईपास करते हुए, इन राज्यों को देश के बाकी हिस्सों से बेहतर ढंग से जोड़ने के लिए इस बंदरगाह का उपयोग किया जा सकता है. इस प्रकार से बांग्लादेश के बंदरगाहों के माध्यम से भारत के पूर्वोत्तर क्षेत्र को जोड़ने के लिए आठ मार्गों की पहचान की गई है. ये मार्ग हैं - अखौरा (बांग्लादेश) से होते हुए चटगांव या मोंगला पोर्ट से अगरतला (भारत), सिलहट सिटी (बांग्लादेश) में तामाबिल से होते हुए चटगांव या मोंगला बंदरगाह से मेघालय (भारत) में डॉकी, शिओला (भारत) से होते हुए चटगांव या मोंगला पोर्ट से असम (भारत) में सुतरकांडी और बीबीर बाज़ार (भारत) से होते हुए चटगांव या मोंगला बंदरगाह से त्रिपुरा (भारत) में श्रीमंतपुर का मार्ग.
आख़िर में, नेपाल और भूटान जैसे बांग्लादेश के लैंडलॉक्ड हिमालयी पड़ोसी देशों के ट्रांज़िट ट्रेड को सुविधाजनक बनाने के लिए भी मोंगला पोर्ट को विकसित किया जा सकता है. भौगोलिक रूप से भारत इस तरह के ट्रांज़िट के लिए मार्ग उपलब्ध कराता है और यदि मोंगला बंदरगाह एवं हिमालयी देशों के बीच व्यापार विकसित होता है, तो यह उनके लिए आर्थिक रूप से फायदेमंद साबित होगा. अगर मोंगला बंदरगाह का विस्तार किया जाता है और इसका आधुनिकीकरण किया जाता है, तो यह एक क्षेत्रीय व्यापारिक हब बन सकता है. इतना ही नहीं यह बांग्लादेश, चीन, भारत और म्यांमार आर्थिक (BCIM) कॉरिडोर को उप-क्षेत्रीय स्तर पर भी मज़बूत करने में योगदान देगा.
इस प्रकार से देखा जाए, तो मोंगला पोर्ट क्षेत्र में चल रहे भू-राजनीतिक ताक़त के खेल के माध्यम से कहीं न कहीं बांग्लादेश को एक रणनीतिक लाभ प्रदान करता है. जैसा कि दोनों पड़ोसी दिग्गज़ यानी चीन और भारत, बांग्लादेश में निवेश के लिए आतुर हैं, ऐसे में इसमें कोई संदेह नहीं है कि बांग्लादेश के लिए अपने आधारभूत ढांचागत विकास को मज़बूती प्रदान करने के साथ ही बंगाल की खाड़ी में स्थिरता बनाए रखने के लिए, दोनों देशों के बीच मची इस होड़ के प्रभावों को कूटनीतिक रूप से अपने हित में संतुलित करने का यह सबसे माकूल वक़्त है.
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Sohini Bose is an Associate Fellow at Observer Research Foundation (ORF), Kolkata with the Strategic Studies Programme. Her area of research is India’s eastern maritime ...
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