सिविल सर्विसेज में सीधे प्रवेश कराने का विचार दशक भर पुराना है, क्या इस तरह की भर्ती से प्रशासनिक अधिकारियों की कमी पूरी हो सकेगी
भारत सरकार ने सिविल सर्विसेज़ (लोक सेवाओं) में संयुक्त सचिव स्तर पर सीधे भर्ती के इच्छुक पेशेवरों से आवेदन मांगने वाला विज्ञापन प्रकाशित करवा कर तर्कपसंद भारतीयों के सामने चर्चा का नया मुद्दा परोस दिया है।राजस्व, वित्तीय सेवाएं, आर्थिक मामले, कृषि, सड़क परिवहन एवं राजमार्ग, शिपिंग, पर्यावरण एवं वन, नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा, नागर विमानन और वाणिज्य क्षेत्रों में 10 ऐसे पदों को भरा जाना है। इन क्षेत्रों में महारत रखने वाले ऐसे भारतीय नागरिक ही इन पदों के लिए इलैक्ट्रानिकली आवेदन कर सकते हैं, जिन्होंने किसी मान्यता प्राप्त यूनिवर्सिटी से स्नातक की डिग्री हासिल की हो, जिनकी आयु 40 साल हो, जिन्हें 15 वर्ष का अनुभव हो और जो तीन साल की अवधि तक सेवाएं देने के इच्छुक हों — इस अवधि को पांच साल तक बढ़ाया भी जा सकता है। असाधारण योग्यता वाले पेशेवर, चाहे उनका नाता निजी क्षेत्र से हों या सार्वजनिक क्षेत्र से, चाहे अंतर्राष्ट्रीय संगठनों से हों या बहुराष्ट्रीय संगठनों से, शैक्षणिक जगत से हो या अनुसंधान निकायों से, राज्य सरकारों से हो या केंद्र शासित प्रदेशों से, पीएसयू, संवैधानिक संगठनों से हो या स्वायत्त निकायों से, इन पदों पर आवेदन करने के पात्र होंगे।
प्रधानमंत्री कार्यालय में राज्य मंत्री जितेंद्र सिंह ने इस मामले पर अपने विचार प्रकट करते हुए कहा कि सरकार का मामना है कि सरकार में ऐसा प्रवेश प्रत्येक भारतीय को प्रगति करने का अवसर देगा। यह उपलब्ध स्रोतों में से बेहतरीन को हासिल करने का प्रयास है। उन्होंने कहा कि यह विचार हर एक भारतीय को उसकी क्षमता के अनुसार प्रगति करने का अवसर देने पर गौर करने की भावना से प्रेरित है।
संयुक्त सचिव भारत सरकार के किसी विभाग के प्रकोष्ठ का प्रशासनिक प्रमुख होता है और उसे अपने कामकाज और उत्तरदायित्व में काफी हद तक स्वतंत्रता होती है। संयुक्त सचिवों को सरकार में अग्रणी माना जाता है, जो नीति और कार्यक्रम बनाने के साथ ही साथ उन्हें लागू करने में भी सहायता देते हैं। भारत सरकार में संयुक्त सचिव स्तर के लगभग 350 पद हैं।
यह अनूठा विचार केवल मौजूदा सरकार के जहन में आया हो, ऐसा नहीं है। सिविल सर्विसेज में सीधे प्रवेश कराने का विचार कम से कम एक दशक पुराना है, जिसका अनुमोदन दूसरे प्रशासनिक आयोग की रिपोर्ट तथा पांचवें वेतन आयोग द्वारा किया गया है।
इसके अतीत में भी सीधे तौर पर भर्तियां की जा चुकी हैं और इस तरह प्रवेश पाने वालों में डॉ. मनमोहन सिंह, डॉ. एम एस अहलुवालिया, डॉ. विजय केलकर, श्री नंदन नीलेकणी और डॉ. रघुराम राजन शामिल हैं। इस अवधारणा को ब्रिटेन, अमेरिका, आस्ट्रेलिया, बेल्जियम और न्यूजीलैंड जैसे देशों द्वारा व्यवहार में लाया गया है। हालांकि इस प्रस्तावित भर्ती में अनूठापन उसके विज्ञापन, संयुक्त सचिव स्तर तथा चयन की प्रक्रिया में है।
इस तरह की सीधी भर्ती से किस तरह का लाभ हासिल करने की उम्मीद की गई है? पहला, इस फैसले के अनेक आयाम होंगे। ऐसी रिपोर्ट है कि भारतीय प्रशासनिक सेवा में लगभग 1,500 अधिकारियों की कमी है, इसलिए, सीधे भर्ती से काफी हद तक इस कमी को दूर करने में मदद मिलेगी। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इससे एक स्वस्थ संगठनात्मक दरार के जरिए नौकरशाही में आमूलचूल बदलाव आ सकता है। यह दरार ‘नौकरशाही में यथा स्थिति बहाल रखने के पक्षधर मोनोकल्चर’ तथा अलग किस्म की प्रबंधन शैली के बीच होगी, जो किसी अन्य धरती पर फली-फूली है और नए दृष्टिकोण अपनाने में माहिर है। ऐसा पहली बार होगा, जब सरकार के भीतर से कोई सरकारी मामलों पर लगातार नजर रखेगा। इससे एक नया नजरिया शामिल होने संभावना है जिसमें कई बरसों से समान पद वाले लोगों के बीच लगातार सम्पर्क के कारण उपजे आंशिक अंधेरे का अभाव होगा। इतना ही नहीं, अपने क्षेत्र में माहिर इन विशेषज्ञों के कौशल का मेल जब स्थायी सिविल सर्विस के बहुक्षेत्रीय विवेक से होगा, तो उन दोनों के मिश्रण से बेहतर नतीजे हासिल हो सकते हैं। सिविल सर्विसेज़ से जुड़े पेशेवरों और नए भर्ती होने वालों के बीच स्वस्थ प्रतिद्वंद्विता से दोनों ही तरह के अधिकारियों के लिए सकारात्मक परिणाम सामने आएंगे।बाहरी व्यवस्था में सरकारी कामकाज तथा सरकारी हलकों में गैर सरकारी कामकाज के बारे में मौजूद संदेह, शंकाएं और पूर्वाग्रह कमजोर पड़ सकते हैं और उनके बीच आपस में एक-दूसरे के प्रति प्रशंसा और समझ उत्पन्न हो सकती है, जो राष्ट्र के हित में अच्छी साबित हो सकती है। अंत में, इससे शायद कुछ नौकरशाहों और राजनीतिज्ञों के बीच में कथित तौर पर मौजूद सांठगांठ को समाप्त करने में मदद मिल सकती है।
इस तरह की सीधी भर्ती से नुकसान भी इतने ही जबरदस्त हो सकते हैं। जहां एक ओर संयुक्त सचिव का ओहदा सिविल सर्विसेज के वयीयता क्रम में ऊंचा माना जाता है, लेकिन निदेशात्मक बदलावों का आदेश केवल विभाग के शीर्ष अधिकारी की ओर से ही आ सकता है।
सीधी भर्ती के सिलसिले में ऊपर जिन नामों का जिक्र किया गया है, वे सभी ऐसी हस्तियां थीं, जिन्होंने शीर्ष पर रहकर विभागों का नेतृत्व संभाला। इसलिए, संयुक्त सचिव जहां संचालन संबंधी दक्षता ला सकते हैं और नीति में कुछ सहायता कर सकते हैं, वहीं इस बात पर संदेह है कि वे अपने बूते पर मौलिक नीति किसी तरह का संचालन कर सकेंगे या नहीं। ऐसा मानने का आधार है कि तीन साल की छोटी अवधि में शायद वह प्रतिबद्धता नहीं उत्पन्न हो सकती, जिसकी राष्ट्र को तलाश है। न ही इतने छोटे कार्यकाल जवाबदेही के संदर्भ में उपयुक्त हैं। बहुत कम अवधि के लिए प्रवेश पाने वाला व्यक्ति इस अवधि का इस्तेमाल बड़ी मशक्कत के साथ लॉबिंग करने या अपने या अपने मूल संगठन की ओर से लोगों को तैयार करने में कर सकता है। वैसे तो 10 अधिकारियों को शामिल किया जाना पूरे तंत्र का महज 3 तीन प्रतिशत है, लेकिन ऐसी संभावना है कि सरकारी तंत्र में ‘अंदरूनी’ और ‘बाहरी’ लोगों में वर्चस्व की जंग छिड़ सकती है, जो नए आने वालों को निगल सकती है और उन्हें साथ जोड़ने के उद्देश्य को नाकाम कर सकती है। सत्तारूढ़ राजनीतिक दल भी इस अवसर का लाभ उठाने की कोशिश कर सकते हैं और भर्ती की इस प्रक्रिया का इस्तेमाल वैचारिक घुसपैठ के लिए कर सकते हैं, जिससे राजनीतिक तटस्थता की उस इमारत की नींव तक हिल सकती है, जिस पर सिविल सर्विसेज का निर्माण किया गया था। इस नौकरी के लिए अपेक्षाकृत कम वेतन की पेशकश को देखते हुए, हो सकता है कि अच्छे मैनेजर्स प्राइवेट सैक्टर की मोटी तनख्वाहों का त्याग करने को राजी न हों। वे तीन से पांच साल की इस अवधि को अपने प्रवासन के खतरे के तौर पर भी देख सकते हैं। लम्बे अर्से तक अपने ‘क्षेत्र से कटे रहने’ से उनके रिजूमे को नुकसान पहुंच सकता है। इससे वह बेहद गतिशील और प्रतिस्पर्धा वाले अपने मूलभूत क्षेत्र में मात खा सकते हैं।
इसमें कोई संदेह नहीं कि सिविल सर्विसेज जिन्हें हाल में हुए एक अध्ययन में ‘दमघोटू’ और ‘धीमा और कष्टकारी’ करार दिया गया था, पिछले कुछ समय से सुधारों के लिए तैयार है। इसलिए उस प्रक्रिया को शुरू करने की कोशिश को सराहा जाना चाहिए। हालांकि राजनीतिक अनुशासन लाए बगैर सिविल सर्विसेज में सुधार का प्रयोग महज ऊपरी दिखावा साबित हो सकता है।
जाहिर तौर पर राज्यों में हमारे संविधान की संघीय प्रकृति को देखते हुए ढेर सारा काम होता है। नौकरशाहों की उदासीनता, फैसले लेने में अरुचि और क्षेत्र के बारे में विशेषज्ञता के अभाव के प्रमुख कारणों में बार-बार होने वाले तबादले, निरर्थक नियुक्तियां, कई बार अधिकारी की विशेषज्ञता के बिल्कुल विपरीत तैनाती और अपनी बात मनवाने के लिए या किसी सच्चाई की अनदेखी करने के लिए दबाव डालना शामिल है। दशकों से, हालात बिगड़ते गए और कुछ राज्यों में ऐसी परिस्थितियां बनती चली गईं जहां उनके कार्यकाल की अवधि छह महीने या उससे भी कम होती गई।
व्यक्तियों पर इस तरह के राजनीतिक माहौल का असर अलग-अलग रहा। कुछ लोग हाशिए पर चले गए, कुछ लोग खुशी-खुशी उसके साझेदार बन गए और कुछ लोगों ने आत्मरक्षा के लिए शरण स्वीकार कर ली।
अब आम धारणा यही है कि पिछले डेढ़ दशक के दौरान राज्य की बीमारियां भारत सरकार तक पहुंच चुकी हैं। जब राजनीतिक वर्ग द्वारा कामकाजी वातावरण की शुद्धता को बढ़ावा दिया जाता है, तब कौशल, व्यावसायिकता और प्रतिबद्धता के उद्देश्य पूरे होते हैं। राजनीतिक वातावरण जिसने शिक्षा और व्यावसायिकता को हतोत्साहित किया है और सुशासन को लगातार नुकसान पहुंचाता आया है, वहां इस तरह के प्रयोगों का विफल होना निश्चित है। माननीय सरदार पटेल ने अखिल भारतीय सेवाओं को जारी रखने के संबंध में दलील देते हुए कहा था, “वे उतने ही अच्छे हैं, जितने हम।” आज, नौकरशाही, राजनीति जितनी ही बुरी है। यदि हम सिविल सर्विसेज में सुधार लाना चाहते हैं, तो हमें राजनीति में सुधारों से शुरूआत करनी होगी।
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Dr. Ramanath Jha is Distinguished Fellow at Observer Research Foundation, Mumbai. He works on urbanisation — urban sustainability, urban governance and urban planning. Dr. Jha belongs ...
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