अवैध रेत-उत्खनन के कारण गंभीर नतीजे सामने आये हैं. शहरी और ग्रामीण दोनों ही क्षेत्रों में मकान बनाना आम इंसान के लिए बहुत महंगा हो चला है और आवासों के निर्माण-कार्य में लगे फर्म और घरों के छोटे विक्रेताओं को रेत की ऊंची चढ़ती कीमतों के कारण भारी नुकसान उठाना पड़ा है.
भारत के तमाम राज्यों में रेत का अवैध उत्खनन किसी अभिशाप से कम नहीं है. कुछ साल पहले उत्तर प्रदेश के गौतमबुद्धनगर में एक अनुमंडलाधिकारी (एसडीएम) को रेत के अवैध उत्खनन को लेकर जारी विवाद में निलंबित कर दिया गया था. इससे पता चलता है कि रेत सरीखे “नदी-धन” को लेकर मची लूटमार के बीच हालात किस दुर्दशा तक पहुंच चुके हैं.
लाखों साल की अवधि में चट्टानें स्वाभाविक रीति से अपक्षरित होती रहती हैं और उनका यही अपक्षरण नदियों में रेत के रूप में इकट्ठा होता है. नदी की पेटी से इस रेत का उत्खनन किया जाता है. नदी का रेत अब एक दुर्लभ वस्तु बनाता जा रहा है. निर्माण के लिए उपयोग की जाने वाली किसी भी अन्य रेत की तुलना में नदी (ताजे पानी) का रेत निर्माण-कार्य के उद्देश्य से बहुत बेहतर होता है और पानी के बाद दुनिया में दूसरा सबसे ज़्यादा इस्तेमाल किया जाने वाला संसाधन है: परिमाण के लिहाज से देखें तो धरती के नीचे से खनन करके निकाली जाने वाली तमाम चीजों में रेत का हिस्सा दो तिहाई से कुछ ज्यादा है और ध्यान देने की एक बात ये भी है कि रेत एक संसाधन के रुप में असीमित मात्रा में उपलब्ध नहीं है. दरअसल, संयुक्त राष्ट्रसंघ का कहना है कि जल्दी ही हमें रेत के अभाव का सामना करना पड़ सकता है.
लोग हर साल 40 बिलियन टन से अधिक रेत और बजरी का उपयोग करते हैं. मांग इतनी ज्य़ादा है कि दुनिया भर में नदी-तल और समुद्र तट खाली होते जा रहे हैं. (रेगिस्तानी रेत आम तौर पर निर्माण-कार्य के लिए उपयोगी नहीं; पानी के बजाय हवा की चोट से आकार ग्रहण करने के कारण रेगिस्तानी रेत इतना ज़्यादा गोल होता है कि इसके दो कण आपस में मज़बूती से बंध ही नहीं पाते) और खनन किये जा रहे रेत की मात्रा तेज़ी से बढ़ रही है. विकासशील देशों में रेत के महत्व की अनदेखी नहीं की जा सकती. जिन घऱों में हम रहते हैं उनके निर्माण के लिए हमें रेत की ज़रुरत होती है और जिस शीशे की ग्लास से हम पानी पीते है और जिन कंप्यूटरों के ज़रिये हम काम करते हैं उनके भी निर्माण के लिए हमें रेत की ज़रुरत पड़ती है. इसके बावजूद रेत को उस तेज़ी से निकाला जा रहा है कि शोधकर्ताओं के मुताबिक़ उसकी भरपायी नहीं की जा सकती.
झारखंड बड़े पैमाने पर रेत-संकट का सामना कर रहा है. झारखंड राज्य के रांची शहर को अब केवल कांची नदी से रेत हासिल होता है. पहले निर्माण-कार्य के लिए दो और नदियों के रेत का भी उपयोग किया जाता था.
प्राकृतिक संसाधनो में रेत सबसे ज्य़ादा अनदेखी का शिकार हुआ है. जर्नल ‘नेचर’ में प्रकाशित एक शोध अध्ययन में वैज्ञानिकों के एक समूह ने लिखा है कि रेत के लिए एक वैश्विक एजेंडा तैयार करने की तत्काल ज़रुरत है. शहरीकरण और वैश्विक स्तर पर जनसंख्या के बढ़ते विस्तार के कारण रेत और बजरी की मांग में दिनों-दिन बढोत्तरी हुई है और और पूरी दुनिया से रेत को 32 बिलियन से 50 बिलियन टन प्रतिवर्ष निकाला जा रहा है. नेचर पत्रिका में प्रकाशित शोध-अध्ययन के लेखकों में से एक मेट बेनडिक्सन का कहना है कि ‘अनुमानों के मुताबिक़ साल 2000-2100 के बीच रेत की मांग में 300 प्रतिशत की और इसके मूल्य में 400 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी होगी.’
ये बात निस्संदेह कही जा सकती है कि रेत नदी के पारिस्थितिकी तंत्र का अनिवार्य हिस्सा है. नदी के जल-प्रवाह और मछलियों की ही तरह यह नदियों को सेहतमंद रहने में मदद करता है. यह भू-जल के पुनर्भरण के लिहाज से अत्यंत महत्वपूर्ण है और प्रवाही जल में पोषक-तत्वों की आपूर्ति करता है. नदियों में जल-प्रवाह की कमी के दिनों में रेत जल-प्रवाह को बनाये रखने में मदद करता है. विभिन्न प्रकार के जलीय जीव-जंतुओं के प्राकृतिक वास के लिहाज से भी रेत महत्वूर्ण है. पर्यावरणविदों का मानना है कि भारत नें पिछले पांच सालों में हुए अवैध रेत-उत्खनन के कारण गंभीर नतीजे उभरकर सामने आये हैं. शहरी और ग्रामीण दोनों ही क्षेत्रों में मकान बनाना आम इंसान के लिए बहुत महंगा हो चला है और आवासों के निर्माण-कार्य में लगे फर्म तथा आवासों के छोटे विक्रेताओं को रेत की तेजी से बढ़ती हुई कीमतों के कारण भारी नुक़सान उठाना पड़ा है.
वैश्विक स्तर पर शहरीकरण की प्रक्रिया बड़ी तेजी से उभार पर है और इस कारण रेत की ख़पत भारी मात्रा में हो रही है क्योंकि रेत कंक्रीट बनाने और पक्की सड़कों को बनाने में इस्तेमाल होने वाले कोलतार का मुख्य़ अवयव है. साल 2000 से लेकर अबतक भारत में निर्माण-कार्यों में इस्तेमाल होने वाले रेत में तिगुने से ज्य़ादा की वृद्धि हुई है और यह मांग लगातार बढ़ती ही जा रही है.
दुर्भाग्य की बात है कि झारखंड राज्य रेत के संकट का सामना कर रहा है और 3,000 करोड़ रुपये से अधिक की परियोजनाओं पर इसका असर पड़ा है. यह संकट राज्य सरकार की देन है. लाइसेंस और पर्यावरण संबंधी मंजूरी की सुविधा देना राज्य सरकार का कर्तव्य है. राज्य में निर्माण कार्य बुरी तरह प्रभावित हुआ है. फिलहाल झारखंड बड़े पैमाने पर रेत-संकट का सामना कर रहा है. झारखंड राज्य के रांची शहर को अब केवल कांची नदी से रेत हासिल होता है. पहले निर्माण-कार्य के लिए दो और नदियों के रेत का भी उपयोग किया जाता था. अब इन दोनों नदियों में पाया जाने वाला रेत अत्यधिक उत्खनन के कारण बहुत कम पड़ गया है. ये बात रांची शहर के उत्तरी हिस्से में बहने वाली जूमर नदी के रेत-भंडार के बारे में विशेष रुप से कही जा सकती है. झारखंड में रेत के खदानों की निलामी की नीति कभी शुरु होती है तो कभी बंद हो जाती है. इस कारण पैदा रेत-संकट की वजह से हज़ारों करोड़ की निर्माण-कार्य की परियोजनाओं का काम प्रभावित हुआ है. मौजूदा संकट के कारण नदी से निकाले जाने वाले रेत की कीमतों में 3,000 रु. प्रति ट्रक से बढ़कर 7,000 रुपये प्रति ट्रक तक हो गई है.
विनिर्मित रेत या एम-सैंड नदी से निकाले जाने वाले रेत का एक सबसे प्रचलित विकल्प है और इस रेत के इस्तेमाल पर दक्षिण के राज्यों में पर्याप्त जोर दिया जा रहा है. ये रेत चट्टानों और खदान के पत्थरों को चूर्ण करके बनाया जाता है.
राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में भी अवैध रेत-उत्खनन से यमुना नदी की बदहाली और ज्य़ादा बढ़ रही है. इससे ना सिर्फ नदी की धारा-प्रवाह में बदलाव आया है बल्कि नदी-तल भी अस्थिर हो उठा है, जिससे इलाके की जैव-विविधता पर बुरा असर पड़ रहा है. नदी के आस-पास के गांवों के किसानों का कहना है कि रेत के अवैध खनन में शामिल लोग जान-बूझकर पानी के स्वाभाविक प्रवाह को रोकते हैं ताकि किसी एक स्थान से ज्यादा रेत निकाल सकें जबकि विशेषज्ञों का दावा है कि ऐसा करने से नदी के प्रवाह-क्रम में बदलाव आता है.
रेत इमारतों के निर्माण-कार्य और नदियों को जीवंत बनाये रखने के लिए भी ज़रूरी है. परस्पर विरोधी इन दोनों जरुरतों के बीच संतुलन साधने का एक विलक्षण काम कर्नाटक की सरकार ने किया है. पर्यावरण और विकास-कार्य के आपसी हितों के विरोध के बीच संतुलन साधने के लिए कर्नाटक की सरकार ने लोक-निर्माण विभाग (पी.डब्ल्यू.डी) को 6 सितंबर 2013 को एक आदेश जारी किया. इसमें कहा गया कि सभी शासकीय निकाय अपने निर्माण-कार्य संबंधी कामों के लिए नदी के रेत का नहीं बल्कि सिर्फ विनिर्मित रेत (एम-सैंड — मैन्युफैक्चर्ड सैंड) का इस्तेमाल करेंगे.
विनिर्मित रेत या एम-सैंड नदी से निकाले जाने वाले रेत का एक सबसे प्रचलित विकल्प है और इस रेत के इस्तेमाल पर दक्षिण के राज्यों में पर्याप्त जोर दिया जा रहा है. ये रेत चट्टानों और खदान के पत्थरों को चूर्ण करके बनाया जाता है. इस विधि से निर्मित रेत के कण आकार 150 माइक्रॉन का होता है. रेत के कण को वांछित आकार में प्राप्त करने के लिए मौजूदा मोटे कठोर चट्टानी भंडार को विभिन्न आकारों में चूर्ण किया जाता है और निर्माण-कार्य की अलग-अलग ज़रूरतों के हिसाब से उन्हें छांट लिया जाता है. इस तरीके से हासिल रेत से अशुद्धियों और अत्यंत महीन कणों को हटाने के लिए धोवन और झारन जैसे तरीकों का इस्तेमाल किया जाता है,ताकि रेत परिष्कृत हो सके.
प्राकृतिक रेत की आपूर्ति में कमी के कारण कर्नाटक ने एम-सैंड के उत्पादन के प्रयास तेज़ कर दिये हैं. इस राज्य में एम-सैंड के उत्पादन की 164 इकाइयां हैं. इन इकाइयों से प्रतिवर्ष 20 मिलियन एम-सैंड का उत्पादन हो रहा है. राज्य के माइनर मिनरल कंसेशन रूल्स में एम-सैंड के लिए अलग से प्रावधान किये गये हैं. राज्य की सरकार ने इसे पर्याप्त बढ़ावा दिया है जिससे सूबे में एम-सैंड के इस्तेमाल में व्यापक बढोत्तरी हुई है. कर्नाटक के अतिरिक्त एम-सैंड को बढ़ावा देने की दिशा में अग्रसर अन्य राज्यों के नाम हैं- आंध्रप्रदेश, गुजरात, तमिलनाडु तथा तेलंगाना.
अवैध रूप से खनन किये गये रेत की मात्रा को लेकर कोई आधिकारिक आंकड़ा नहीं मिलता, लेकिन साल 2015-16 में खनन मामलों के पूर्व केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल ने लोकसभा में एक सवाल का जवाब देते हुए कहा था कि देश में लघु खनिज के अवैध खनन के 19,000 से अधिक मामले सामने आये हैं जिनमें रेत के अवैध खनन के मामले भी शामिल हैं. इनमें से कितने मामले रेत के अवैध खनन से जुड़े हैं,इसे आंकड़ों में दर्ज नहीं किया गया है लेकिन इंडियन ब्यूरो ऑफ माइंस का कहना है कि लघु खनिजों के उत्खनन के लिहाज़ से देखें तो रेत सबसे ज्यादा उत्खनित खनिजों में चौथे स्थान पर है.
तेज़ गति से शहरीकरण की ओर दौड़ते भारत में रेत की मांग को आगे और बढ़ते ही जाना है क्योंकि रेत कंक्रीट तथा सीमेंट के निर्माण में इस्तेमाल किया जाने वाला मुख्य अवयव है. हालांकि, इस साल निर्माण-क्षेत्र में सिर्फ 1.7 प्रतिशत की वृद्धि देखने में आयी है लेकिन स्वच्छ भारत मिशन तथा साल 2022 तक सबके लिए आवास सरीखी सरकारी योजनाओं के कारण निर्माण-क्षेत्र में गतिविधियां बढ़वार पर रहेंगी.
मनुष्य के रूप में हम एक ऐसी प्रजाति हैं जो सब कुछ गारंटीशुदा मानकर चलता है और हमने जिस लापरवाही के साथ प्राकृतिक संसाधनों का दोहन किया है उससे ये बात एकदम स्पष्ट है कि हमने विकास के नाम पर किसी चीज को बख्श़ा नहीं है. बात चाहे कोयला की हो या प्राकृतिक गैस अथवा खनिज-तेल की. लेकिन क्या हमें ये बात पता है कि रेत भी ऐसे ही विरल होते जा रहे प्राकृतिक संसाधनों में एक है? यह सीमेंट, कंक्रीट, काँच, कंप्यूटर के कल-पुर्जे, स्मार्ट फोन, टूथपेस्ट, सौंदर्य प्रसाधन, कागज़, पेंट, टायर और ऐसी बहुत सी चीजों में उपयोग किया जाने वाला प्राकृतिक संसाधन है. लेकिन, याद रहे कि रेत असीमित मात्रा में उपलब्ध संसाधन नहीं है. दरअसल, रेत दुनिया में सर्वाधिक उपभोग किये जाने वाले संसाधनों में से एक है, लेकिन इसकी महत्ता को कम करके आंका जाता है. रेत के उपभोग के कारण दुनिया के 70 प्रतिशत समुद्र तट रेत-विहीन हो चले हैं और ऐसे में हमें इस बात का अंदाज़ा भी नहीं हो पा रहा है कि आगे चलकर इसके क्या नतीजे भुगतने पड़ सकते हैं.
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Nitish Priyadarshi is assistant professor of geology at the Ranchi University.
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