ये तीनों राज्य राजकोषीय दबाव के तहत विकास का खाका विकसित कर सकते है और दूसरे राज्यों के लिए पथप्रदर्शक बन सकते हैं.
राजकोषीय एवं आर्थिक दबाव के आने वाले महीनों में राज्य सरकार का प्रदर्शन मायने रखने वाला है. आने वाले समय में देश का प्रदर्शन महत्वपूर्ण रूप से इस बात पर निर्भर करेगा कि कैसे अच्छा प्रदर्शन करने वाले राज्य अपनी ताक़त लगाते हैं.
राज्य के प्रदर्शन की एक कसौटी 1 अप्रैल से शुरू वित्तीय वर्ष 2023-24 के लिए बजट के आवंटन और राजकोषीय ईमानदारी पर दृष्टिकोण है. उपभोक्ता मूल्य की महंगाई सरकार के द्वारा भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) के लिए निर्धारित 6 प्रतिशत के बर्दाश्त करने के स्तर से आगे बनी हुई है. वोट खींचने वाली सामाजिक कल्याण की योजनाओं से समझौता किए बिना राज्य के स्तर पर राजकोषीय समझदारी विकास को कम करने वाले मौद्रिक नीति के साधनों जैसे कि ब्याज दर में बढ़ोतरी के आवश्यकता से ज़्यादा उपयोग को धीमा कर सकती है.
भारत के द्वारा रेपो रेट को अमेरिकी फेडरल रिज़र्व के बढ़ते ब्याज़ दर के साथ जोड़ने से परहेज करने में सक्षम होने का दृष्टिकोण आशावादी नहीं है. केंद्र सरकार ने वित्तीय वर्ष 2023-24 के लिए GDP के 5.9 प्रतिशत पर अपने राजकोषीय घाटे को सीमित करके पहले ही लाभकारी भूमिका अदा कर दी है.
भारत के द्वारा रेपो रेट को अमेरिकी फेडरल रिज़र्व के बढ़ते ब्याज़ दर के साथ जोड़ने से परहेज करने में सक्षम होने का दृष्टिकोण आशावादी नहीं है. केंद्र सरकार ने वित्तीय वर्ष 2023-24 के लिए GDP के 5.9 प्रतिशत पर अपने राजकोषीय घाटे (कुल खर्च और राजस्व की प्राप्ति के बीच का अंतर) को सीमित करके पहले ही लाभकारी भूमिका अदा कर दी है. राजकोषीय घाटे में कोविड-19 महामारी (2020-21) के दौरान GDP के 9.2 प्रतिशत के उच्चतम दर से तीन वित्तीय वर्षों के दौरान कमी आई है. हालांकि, ये 2025-26 के लिए लक्ष्य किए गए 4.5 प्रतिशत के राजकोषीय घाटे से काफ़ी ज़्यादा है और मई 2024 में आम चुनाव के बाद नई सरकार को दबाव में लाएगा. इस दौरान राजस्व घाटे (राजस्व प्राप्ति और राजस्व खर्च के बीच अंतर) में GDP के 7.1 से 2.9 प्रतिशत तक कमी अधिक प्रशंसा के योग्य है. ये राज्य सरकारों के लिए एक मिसाल है कि आय में समर्थन के लिए सीधे हस्तांतरण के अलावा पूंजीगत खर्च को अधिकतम और राजस्व खर्च में कटौती करें.
राज्य सरकारें लगभग दो-तिहाई सार्वजनिक निवेश का प्रबंधन करती हैं. नगरपालिका या स्थानीय सरकार के द्वारा वितरण की प्रणाली अप्रभावशाली और अपर्याप्त रूप से वित्त पोषित हैं. ये दुखद है क्योंकि स्थानीय सरकार नागरिकों के सबसे ज़्यादा क़रीब है. ये राज्य सरकारें हैं जो राष्ट्रीय बुनियादी ढांचे के विकास की योजना के खाके के भीतर “अंतर को भरने वाले” निवेश को लागू करती हैं ताकि केंद्र सरकार के विशाल निवेश की सार्थकता ख़राब आख़िरी मील के संपर्क या अपर्याप्त उपयोगिता सेवा के समर्थन की वजह से बेकार न हो जाए. राज्य सरकारों के पास ये अवसर भी है कि वो स्थानीय प्राथमिकताओं के अनुसार निवेश को किसी ख़ास समुदाय के लिए बुनियादी ढांचे की ज़रूरत या पिछड़े क्षेत्रों (क़ीमती वोट पर नज़र और समानता पर विचार के साथ) के साथ जोड़ सकें. ये सरकार की प्रतिक्रिया को लेकर नागरिकों की संतुष्टि का एक महत्वपूर्ण पहलू है.
इस लेख में उस सीमा की समीक्षा की गई है जहां तीन राज्य सरकारों- महाराष्ट्र, तमिलनाडु और गुजरात- ने राष्ट्रीय खर्च की प्राथमिकताओं से जुड़ी स्थानीय आवश्यकताओं और सावधानीपूर्वक राजकोषीय शिष्टाचार को बनाए रखते हुए 2023-24 के लिए बजट बनाने में इन शासनादेशों का जवाब दिया है.
हम संस्थागत परिपक्वता और लचीलापन के लिए प्रतिनिधि के रूप में राज्यों के अपने संसाधनों (SOR) के मुक़ाबले कुल राजस्व प्राप्ति (TR), जिसमें केंद्र से मिली रक़म भी शामिल है, के अनुपात का उपयोग करते हैं. वित्तीय वर्ष 2020-21 (आख़िरी साल जिसके लिए सार्वजनिक रूप से अंतिम खाता उपलब्ध है) के लिए सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों (UT) का औसत अनुपात 53 प्रतिशत था. हम न्यूनतम 60 प्रतिशत के मानक का उपयोग करते हैं. 16 बड़े राज्यों में से सिर्फ़ पांच ने ही इस न्यूनतम मानक को पूरा किया. 2020-21 में हरियाणा का OSR/TR अनुपात 78 प्रतिशत, तेलंगाना का 72 प्रतिशत, महाराष्ट्र एवं तमिलनाडु दोनों का 67 प्रतिशत और गुजरात का 63 प्रतिशत था. इनमें से महाराष्ट्र, तमिलनाडु और गुजरात नीचे बताए गए पैमाने, सामाजिक-आर्थिक उपलब्धि और राजकोषीय स्थिरता की व्यापक रूप-रेखा में फिट बैठते हैं.
आर्थिक मूल्य में बढ़ोतरी: ये तीनों राज्य मिलाकर राष्ट्रीय GDP में लगभग पांचवें हिस्से का योगदान करते हैं. शुद्ध राज्य घरेलू उत्पाद (वर्तमान क़ीमत पर) में ये चार बड़े राज्यों में से हैं. कर्नाटक, जो हमारी सूची में नहीं है, दूसरा सबसे बड़ा राज्य है.
जनसंख्या: 2011-12 की जनगणना के अनुसार इन तीनों राज्यों की जनसंख्या देश की कुल आबादी का पांचवां हिस्सा है. हमारी सूची में सबसे बड़े राज्य महाराष्ट्र (11.2 करोड़) की जनसंख्या सबसे ज़्यादा आबादी वाले राज्य उत्तर प्रदेश से कम थी. महाराष्ट्र के बाद दूसरे सबसे बड़े राज्य तमिलनाडु (7.2 करोड़) से चार राज्य- बिहार, पश्चिम बंगाल, आंध्र प्रदेश और मध्य प्रदेश- आबादी के मामले में बड़े थे. सबसे छोटे राज्य गुजरात (6 करोड़) से दो राज्य- राजस्थान और कर्नाटक- आबादी के मामले में बड़े थे. इसके परिणामस्वरूप चुने गए तीन राज्य निष्पक्ष रूप से बड़े राज्यों में जनसंख्या की विस्तृत श्रेणी का प्रतिनिधित्व करते हैं.
अधिक प्रति व्यक्ति आमदनी: प्रति व्यक्ति शुद्ध राज्य घरेलू उत्पाद के मामले में तमिलनाडु पांचवें पायदान पर (सिक्किम, गोवा, कर्नाटक और हरियाणा ज़्यादा समृद्ध हैं) है. तमिलनाडु के बाद गुजरात है जबकि महाराष्ट्र आठवां सबसे समृद्ध है. गुजरात और महाराष्ट्र के बीच केरल है जो हमारी सूची में नही है. चुने गए राज्य प्रति व्यक्ति आमदनी के मामले में बड़े राज्यों के बीच ऊपरी राज्यों में से हैं. कुछ छोटे राज्य (सिक्किम, अरुणाचल प्रदेश) ज़्यादा प्रति व्यक्ति आमदनी के मामले में इन बड़े राज्यों का मुक़ाबला करते हैं. औसत प्रति व्यक्ति आमदनी 1,50,005 रुपया (वर्ष 2021-22) है.
तालिका 1 तीन मानकों- ग़रीबी का स्तर (2011-12), 1,000 पैदा बच्चों में पांच वर्ष से कम उम्र की बालिकाओं की मृत्यु दर (2020) और 2019-20 के लिए नीति आयोग के स्वास्थ्य सूचकांक- का उपयोग कर चयनित तीन राज्यों में सामाजिक एवं मानवीय विकास के मामले में ऐतिहासिक उपलब्धियों का मूल्यांकन करती है.
सभी तीनों राज्य 21.9 प्रतिशत ग़रीबी के स्तर के राष्ट्रीय आंकड़े के मुक़ाबले अच्छा प्रदर्शन कर रहे हैं लेकिन सबसे आगे रहने वाले राज्यों की तरह नहीं. पांच राज्यों- 7.1 प्रतिशत के साथ केरल, 8.1 प्रतिशत के साथ हिमाचल प्रदेश, 8.3 प्रतिशत के साथ पंजाब, 9.2 प्रतिशत के साथ आंध्र प्रदेश और 10.4 प्रतिशत के साथ जम्मू-कश्मीर- के बेहतर आंकड़े हैं जबकि 11.3 प्रतिशत के साथ उत्तराखंड और 14.7 प्रतिशत के साथ राजस्थान के आंकड़े भी तुलना के योग्य हैं. ये दिखाता है कि समानता के लिए अधिक प्रति व्यक्ति आमदनी कुंद प्रतिनिधि है. ग़रीबी में सतत कमी या तो विरासत में मिली ज़्यादा आमदनी एवं संपत्ति के वितरण, जैसा कि पंजाब और हिमाचल प्रदेश में है, से बेहतर ढंग से जुड़ी है या केरल की तरह प्रभावशाली, लक्षित आमदनी वितरण की पहल से.
13 के स्कोर के साथ तमिलनाडु दूसरा सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करने वाला राज्य है जबकि 4 के स्कोर के साथ केरल स्पष्ट रूप से विजेता है. 19 के स्कोर के साथ जम्मू-कश्मीर एवं हिमाचल प्रदेश महाराष्ट्र का मुक़ाबला करते हैं जबकि 22 के स्कोर वाला पश्चिम बंगाल 23 के स्कोर वाले गुजरात से बेहतर स्थिति में है.
पांच वर्ष से कम उम्र की बालिकाओं की मृत्यु दर में कमी करना ऐसा मानक है जो नज़दीकी रूप से सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं की मज़बूती और लैंगिक समानता को लेकर सामाजिक सोच में व्यवहारवादी बदलाव के लिए प्रेरित करने को लेकर प्रभावी प्रोत्साहन से जुड़ा है. 13 के स्कोर के साथ तमिलनाडु दूसरा सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करने वाला राज्य है जबकि 4 के स्कोर के साथ केरल स्पष्ट रूप से विजेता है. 19 के स्कोर के साथ जम्मू-कश्मीर एवं हिमाचल प्रदेश महाराष्ट्र का मुक़ाबला करते हैं जबकि 22 के स्कोर वाला पश्चिम बंगाल 23 के स्कोर वाले गुजरात से बेहतर स्थिति में है. ग़रीबी में कमी से ज़्यादा स्वास्थ्य एवं लैंगिक परिणामों को बेहतर करने का संबंध काफ़ी हद तक सांस्कृतिक बदलाव और सामाजिक संरक्षण सेवाओं की गहरी, मददगार रूप-रेखा से है.
तीनों चयनित राज्य व्यापक स्वास्थ्य सूचकांक (2019-20) में मज़बूत स्थिति में हैं. हालांकि केरल 82.2 के स्कोर के साथ पूरे देश में सबसे आगे हैं. केरल के बाद 72.42 के स्कोर के साथ तमिलनाडु, 69.95 के स्कोर के साथ आंध्र प्रदेश, 69.14 के स्कोर के साथ महाराष्ट्र और उसके बाद 63.59 के स्कोर के साथ गुजरात है.
तालिका 2 चयनित तीन राज्यों के राजकोषीय मानकों को प्रदान करती है. कोविड-19 महामारी से पहले आख़िरी सामान्य वित्तीय वर्ष 2019-20 में राज्य सरकार का औसत राजस्व घाटा GDP का 0.6 प्रतिशत था जो 2021-22 में बढ़कर 1.9 प्रतिशत और 2022-23 में घटकर 0.3 प्रतिशत हो गया. गुजरात राजस्व की अधिकता के साथ पूरे देश में सबसे आगे है. महाराष्ट्र 2022-23 में 0.57 के साथ राष्ट्रीय औसत से आगे है जबकि 2023-24 में ये घटकर 0.4 प्रतिशत होने का अनुमान है. तमिलनाडु का राजस्व घाटा ज़्यादा बना हुआ है. हालांकि 2021-22 के 2.1 प्रतिशत के राजस्व घाटे के मुक़ाबले सुधार आया है. सामाजिक क्षेत्र के खर्च और इंफ्रास्ट्रक्चर खर्च की गुणवत्ता के बीच संतुलन हासिल करना राजस्व घाटे पर नियंत्रण के लिए महत्वपूर्ण है. इस संतुलन को हासिल करने में गुजरात का प्रदर्शन शानदार है और तमिलनाडु को इसका अनुकरण करना चाहिए.
राज्य सरकार का औसत राजकोषीय घाटा 2019-20 में GDP का 2.6 प्रतिशत था जो 2021-22 में बढ़कर 4.1 प्रतिशत और 2022-23 में घटकर 3.4 प्रतिशत हो गया. हालांकि GDP के अधिकतम 3 प्रतिशत की सीमा के मुक़ाबले ये ज़्यादा था. गुजरात ने राजकोषीय घाटे को 1.75 प्रतिशत पर लाकर काफ़ी कम कर दिया है और महाराष्ट्र भी और कमी लाने की उम्मीद कर रहा है. तमिलनाडु में राजकोषीय घाटा अधिक बना हुआ है. हालांकि ये 2023-24 के लिए संशोधित बाहरी सीमा के बराबर है.
राजस्व की अधिकता के बिना ज़्यादा राजकोषीय घाटे के साथ दिक़्क़त ये है कि बढ़ते कर्ज़ का बोझ चुकाने की वजह से उत्पादक सामाजिक क्षेत्र के लिए आवंटन की गुंजाइश धीरे-धीरे कम होती जाती है. कर्ज़ का ज़्यादा बोझ और उसे चुकाने के कारण तमिलनाडु जिस उदार ढंग से सामाजिक संरक्षण सेवाओं पर खर्च के लिए जाना जाता है, उसमें उसे दिक़्क़त होगी.
वित्तीय निरंतरता के महत्वपूर्ण मानक सक्रिय कर्ज़ अनुकूलन के कारण राजस्व की अधिकता, कम राजकोषीय घाटे, सकल राज्य घरेलू उत्पाद (GSDP) के मुक़ाबले बकाया कर्ज़ के कम अनुपात और राजस्व प्राप्ति की तुलना में ब्याज के कम अनुपात के साथ गुजरात वित्तीय सादगी के मामले में स्पष्ट रूप से विजेता है. GSDP के निचले पक्ष 7.65 प्रतिशत पर राजस्व प्राप्ति के होने और सामान्य रूप से कम उत्पादन क्षमता वाले प्राथमिक क्षेत्र (कृषि एवं खनन) के अपेक्षाकृत ज़्यादा भाग के बावजूद शुद्ध मूल्य वर्धन में 21 प्रतिशत का योगदान करना प्रशंसनीय है. गुजरात की तुलना में महाराष्ट्र के लिए ये आंकड़ा 17 प्रतिशत और तमिलनाडु के लिए 13.4 प्रतिशत है. महाराष्ट्र और तमिलनाडु- दोनों परंपरागत रूप से उत्पादन के मामले में बड़े राज्य हैं और यहां अपेक्षाकृत अच्छी तरह से विकसित बुनियादी ढांचा और मानव संसाधन क्षमता हैं. तीनों चयनित राज्य आंतरिक रूप से मज़दूरों और पेशेवर लोगों को प्रवासन के लिए आकर्षित करते हैं जो इन राज्यों की आर्थिक मज़बूती को बढ़ाता है. वहीं दूर-दराज़ के राज्यों में पैसा आने से उनको भी फ़ायदा मिलता है.
तीनों चयनित राज्य आंतरिक रूप से मज़दूरों और पेशेवर लोगों को प्रवासन के लिए आकर्षित करते हैं जो इन राज्यों की आर्थिक मज़बूती को बढ़ाता है. वहीं दूर-दराज़ के राज्यों में पैसा आने से उनको भी फ़ायदा मिलता है.
तेज़ी से आगे बढ़ते इन तीनों राज्यों के पास राजकोषीय दबाव के तहत विकास के लिए प्रयोग करने और खाका विकसित करने की संस्थागत परिपक्वता और बड़े पैमाने की अर्थव्यवस्था का फ़ायदा है जो दूसरे राज्यों को भी ग़रीबी में कमी करने, सामाजिक सुरक्षा और सतत विकास में शामिल होने के लिए रास्ता दिखा सकता है.
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Sanjeev S. Ahluwalia has core skills in institutional analysis, energy and economic regulation and public financial management backed by eight years of project management experience ...
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