दिल्ली की नाकेबंदी का कारण किसानों का आंदोलन है. वो सरकार के बनाए उन तीन कृषि क़ानूनों का विरोध कर रहे हैं, जो किसानों को चुनाव के विकल्प की आज़ादी देते हैं
8 दिसंबर को दुनिया की पांचवीं बड़ी अर्थव्यवस्था भारत की राजधानी दिल्ली में दाख़िल होने के सभी रास्ते बंद रह रहें हैं. दिल्ली की नाकेबंदी का कारण किसानों का आंदोलन है. वो सरकार के बनाए उन तीन कृषि क़ानूनों का विरोध कर रहे हैं, जो किसानों को चुनाव के विकल्प की आज़ादी देते हैं. दुनिया के किसी भी अन्य हिस्से में इसे किसानों की भलाई वाला क़दम माना जाता है. कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी और DMK के अध्यक्ष एम.के. स्टालिन से लेकर, NCP नेता शरद पवार और समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव तक 11 राजनीतिक दलों के नेताओं ने ‘भारत बंद’ के समर्थन का ऐलान किया था. बंद के दौरान दिल्ली के निवासियों को अपना कारोबार करने की इजाज़त नहीं रहेगी. क्योंकि, नए क़ानूनों के चलते कुछ बिचौलिये और उनके राजनीतिक संरक्षक किसानों की उपज ख़रीदने का अपना एकाधिकार गंवा देंगे. सही जानकारी न रखने वाले लोग किसानों के आंदोलन को एक वैश्विक संघर्ष का रूप देने की कोशिश कर रहे हैं. भारत के नेताओं की देखा-देखी कनाडा के प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रुडो ने भी इस विषय का राजनीतिकरण करने की कोशिश की.
जो दल आज नए कृषि क़ानूनों के ख़िलाफ़ किसानों का समर्थन कर रहे हैं, उनके ही नेता घरेलू स्तर पर इन सुधारों की ज़मीन तैयार करते आए हैं. वहीं, आज भारत के किसानों के हक़ में बयान देने वाले जस्टिन ट्रुडो, उस कनाडा के प्रधानमंत्री हैं, जो विश्व व्यापार संगठन (WTO) में भारतीय किसानों के हितों के विरुद्ध संघर्ष करता आया है.
विरोधाभास देखिए कि जो दल आज नए कृषि क़ानूनों के ख़िलाफ़ किसानों का समर्थन कर रहे हैं, उनके ही नेता घरेलू स्तर पर इन सुधारों की ज़मीन तैयार करते आए हैं. वहीं, आज भारत के किसानों के हक़ में बयान देने वाले जस्टिन ट्रुडो, उस कनाडा के प्रधानमंत्री हैं, जो विश्व व्यापार संगठन (WTO) में भारतीय किसानों के हितों के विरुद्ध संघर्ष करता आया है. किसानों के आंदोलन में शामिल जो एक तबक़ा है, जिसे इन क़ानूनों से थोड़ा-बहुत नुक़सान होगा, वो मौजूदा व्यवस्था में जड़ें जमाए बैठे बिचौलियों और मज़दूर संगठनों का है, जिन्हें किसान आंदोलन की शक्ल में सरकार के ख़िलाफ़ मोर्चेबंदी का मौक़ा मिल गया है. इन दोनों तबक़ों ने ही विपक्षी दलों को एक मंच उपलब्ध कराया है, जिसके ज़रिए वो अपने राजनीतिक हित साधने की कोशिश कर रहे हैं. आज देश में लोकतंत्र का मतलब, सैद्धांतिक और जनता के लाभ पर आधारित परिचर्चा और विरोध से हटकर मौक़ापरस्ती पर केंद्रित हो गया है. राजनीति ही आज अर्थव्यवस्था से अपने लिए मलाई निकालने का काम कर रही है. अगर इन तीनों कृषि क़ानूनों को वापस लिया जाता है, जैसी कि आंदोलनकारी मांग कर रहे हैं, तो किसानों को तिहरा नुक़सान होगा.
पहला नुक़सान तो ये होगा कि किसानों के हाथ से अपनी उपज तयशुदा मंडियों से बाहर कहीं भी बेचने का विकल्प छिन जाएगा. कृषक उत्पाद व्यापार एवं वाणिज्य (प्रोत्साहन एवं सरलीकरण) एक्ट, 2020 से किसानों की उपज ख़रीदने का कृषि उत्पादन विपणन समितियों का एकाधिकार ख़त्म हो जाता है. मंडी समितियां वो संस्थाएं हैं, जिनकी स्थापना देश की अर्थव्यवस्था में किल्लत के दौर में की गई थी, जिससे किसानों को अपनी उपज मंडी समितियों (APMC) में ही बेचने को बाध्य कर दिया गया था. वो मंडी से बाहर अपनी फ़सल बेचने को आज़ाद नहीं थे. पिछले कुछ दशकों के दौरान मंडी समितियों की अर्थव्यवस्था ने काफ़ी राजनीतिक शक्ति हासिल कर ली है. ये ऐसी संस्था बन गई है, जो अपनी भूमिका निभा चुकी है और अब 21वीं सदी में इसके ख़ात्मे का समय आ गया है. सरल शब्दों में कहें तो: नए क़ानून से किसानों को ये हक़ हासिल हो जाता है कि वो अपनी उपज कृषि मंडियों के बाहर और किसी भी राज्य में बेच सकते हैं (अध्याय 2, भाग 3 और 4). ये किसानों के फ़ायदे की ही बात है. मगर, इस व्यवस्था से उनके हाथ से मंडियों में फ़सल बेचने का विकल्प भी निकलता नहीं है. लेकिन, इस क़ानून के लागू होने के बाद-मंडी समितियां अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर होने वाली कृषि उपज की ख़रीद फ़रोख़्त पर किसी तरह का कर, शुल्क या चुंगी नहीं लगा सकती हैं, जो कि बिल्कुल सही क़दम है.
पिछले कुछ दशकों के दौरान मंडी समितियों की अर्थव्यवस्था ने काफ़ी राजनीतिक शक्ति हासिल कर ली है. ये ऐसी संस्था बन गई है, जो अपनी भूमिका निभा चुकी है और अब 21वीं सदी में इसके ख़ात्मे का समय आ गया है.
इसके अलावा-नया क़ानून राज्य सरकारों को किसी किसान, व्यापारी, इलेक्ट्रॉनिक ट्रेडिंग करने वाले और लेन-देन के मंच पर किसी तरह का टैक्स, शुल्क या चुंगी लगाने से प्रतिबंधित करता है (अध्याय 2 भाग 6). ये भी बिल्कुल उचित बात है. इस क़ानून में विवाद के निपटारे के लिए उचित व्यवस्था होने (अध्याय 3 भाग 8, 9 और 10) के कारण, इस क़ानून से किसानों के शोषण की कोई भी आशंका अपने आप ख़ारिज हो जाती है. चूंकि संविधान के अनुसार खेती, राज्य का विषय है, लेकिन खाद्य पदार्थ एक राष्ट्रीय बाज़ार के अंतर्गत आते हैं, तो इस क़ानून से किसानों को देश भर के बाज़ार तक पहुंच बनाने का मौक़ा मिलता है. जबकि इस क़ानून से केंद्र और राज्य के संबंध भी संवैधानिक दायरे में रहते हैं. कोई भी तर्कपूर्ण किसान या उनके हित की सोचने वाला राजनेता इस क़ानून का विरोध नहीं कर सकता.
अगर ये क़ानून वापस लिए जाते हैं, तो हम वापस मूल्य नियंत्रण वाले युग की ओर लौट जाएंगे. इससे किसानों को दूसरी क्षति होगी कि वो अपनी फ़सल रखने के लिए गोदाम और कोल्ड स्टोरेज के बुनियादी ढांचे के विकास की सुविधा से वंचित हो जाएंगे. आवश्यक वस्तु (संशोधन) अधिनियम 2020, बीसवीं सदी के प्राचीन-कालीन क़ानून को इक्कीसवीं सदी की हक़ीक़तों, लचीलेपन और आकांक्षाओं के हिसाब से रूपांतरित करता है. इस क़ानून का मक़सद कृषि उत्पादों के उत्पादन और वितरण पर अत्यधिक सरकारी नियंत्रण को कम करना है. इस क़ानून के ज़रिए अनाजों, दालों, आलू, प्याज़, खाद्य तेल और तेल के बीजों (धारा 2) को सरकारी नियंत्रण से बाहर करने का प्रयास किया गया है. सरकार इन वस्तुओं पर तभी अपना नियंत्रण लागू करेगी, ‘जब देश में असाधारण परिस्थितियां जैसे कि युद्ध, अकाल, दाम में बेतहाशा वृद्धि और भयंकर प्राकृतिक आपदा जैसी परिस्थितियां उत्पन्न होंगी’.
आवश्यक वस्तु (संशोधन) अधिनियम 2020, बीसवीं सदी के प्राचीन-कालीन क़ानून को इक्कीसवीं सदी की हक़ीक़तों, लचीलेपन और आकांक्षाओं के हिसाब से रूपांतरित करता है. इस क़ानून का मक़सद कृषि उत्पादों के उत्पादन और वितरण पर अत्यधिक सरकारी नियंत्रण को कम करना है.
नए क़ानून में इन बातों का भी स्पष्ट उल्लेख है कि- बाग़बानी के उत्पादों की ख़ुदरा क़ीमत में 100 प्रतिशत का उछाल, या जल्दी ख़राब न होने वाले खाद्य पदार्थों के दाम में 50 प्रतिशत की वृद्धि. इसके लिए समय सीमा का भी निर्धारण किया गया है- पिछले बारह महीनों के दौरान उस वस्तु की जो औसत क़ीमत रही हो या पिछले पांच वर्षों के दौरान संबंधित वस्तु की जो औसत ख़ुदरा मूल्य रहा हो. सबसे अहम बात ये है कि भारतीय खाद्य निगम द्वारा हर साल जितनी बड़ी मात्रा में खाद्य पदार्थों की बर्बादी का अपराध होता है, उसे देखते हुए आवश्यक वस्तु क़ानून में ये बदलाव देश में कोल्ड स्टोरेज जैसी भंडारण की सुविधाएं विकसित होने का रास्ता खोलता है, जिससे सीज़नल कृषि उत्पादों को सुरक्षित रखकर बर्बाद होने से बचाया जा सकेगा. मोटे तौर पर कहें, तो इस क़ानून से ख़राब होने वाले खाद्य पदार्थों को कोल्ड स्टोरेज में रखा जा सकेगा. फिर उन्हें फ़सल का सीज़न ख़त्म होने के बाद भी बेचा जा सकेगा. इससे फलों और सब्ज़ियों के भंडारण में मदद मिलेगी-और गेहूं व चावल पर कोई असर नहीं पड़ेगा. इस क़ानून को वापस लेने पर भारतीय किसान को वापस बीसवीं सदी में धकेल दिया जाएगा. फिर वो वस्तुओं और क़ीमतों के सीमित समय के दायरे में रहकर काम करने को मजबूर होगा. जबकि बाक़ी देश, जिनमें अमीर किसान और आंदोलनकारी बिचौलिये शामिल हैं, वो अपनी SUV में सवार होकर 21वीं सदी की रफ़्तार का लुत्फ़ लेंगे.
भारतीय खाद्य निगम द्वारा हर साल जितनी बड़ी मात्रा में खाद्य पदार्थों की बर्बादी का अपराध होता है, उसे देखते हुए आवश्यक वस्तु क़ानून में ये बदलाव देश में कोल्ड स्टोरेज जैसी भंडारण की सुविधाएं विकसित होने का रास्ता खोलता है, जिससे सीज़नल कृषि उत्पादों को सुरक्षित रखकर बर्बाद होने से बचाया जा सकेगा.
आख़िर में, सरकार द्वारा बनाए गए तीसरे क़ानून को वापस लेने के बाद किसान अगर मंडी समितियों के बाहर किसी ख़रीदार को अपनी उपज बेचते हैं, जैसे कि कृषि कारोबार से जुड़ी कंपनियां, प्रॉसेसिंग कंपनियां, थोक विक्रेता, निर्यातक या बड़ी रिटेल कंपनियां, तो उन्हें मिलने वाला क़ानूनी संरक्षण ख़त्म हो जाएगा. कृषक (सशक्तिकरण एवं संरक्षण) मूल्य आश्वासन और कृषि सेवाएं एक्ट 2020, उपरोक्त दो क़ानूनों का समापन क़ानून है. इससे समझौतों के लिए एक ऐसा क़ानूनी ढांचा तैयार होता है, जिसके तहत किसान बड़ी कंपनियों और थोक ख़रीदारों के साथ क्रय-विक्रय कर सकेंगे. ‘कृषि समझौते’ को परिभाषित करने (अध्याय 1 धारा 2 (g)) से लेकर, इनकी विस्तार से व्याख्या (अध्याय 2, धारा 3 से 12 तक) करने और आख़िर में विवाद के निपटारे की व्यवस्था (अध्याय 3, धारा 13 से 15 तक) करने तक, ये क़ानून कृषि से जुड़े सभी लेन-देन यानी क़ीमत, पारदर्शिता, भुगतान की व्यवस्था और डिलीवरी की व्यवस्था को क़ानूनी जामा पहनाता है. मंडी समितियों में किसानों की उपज की गुणवत्ता और मानक तय करने का अधिकार बिचौलियों के पास है. छोटे किसानों के पास इस पर सवाल उठाने या चुनौती देने का कोई अधिकार नहीं है. जबकि कृषि उपज की ख़रीद-फ़रोख़्त में उपज की क्वालिटी, जैसे कि जलवायु, कीटनाशकों के अवशेष और खाद्य व सुरक्षा के मानक का निर्धारण बेहद महत्वपूर्ण पहलू होता है. इस क़ानून से गुणवत्ता और मानक के पालन की ज़िम्मेदारी (अध्याय 2 धारा 4) भी तय की गई है. फ़सल की उपज कितनी भी हो, किसान व ख़रीदार के बीच कैसा भी समझौता या विवाद हो, मगर इस क़ानून से प्रायोजकों (कंपनियों, प्रॉसेसिंग इकाइयों, थोक ख़रीदारों) को किसानों की ज़मीन पर अपना अधिकार जमाने या किसान के खेतों में स्थायी रूप से बदलाव करने (अध्याय 2, धारा 8) से प्रतिबंधित किया गया है. इससे किसानों का संरक्षण होता है. इस क़ानून से किसानों को आधुनिक वित्तीय व्यवस्थाओं जैसे कि बीमा एवं क़र्ज़ (अध्याय 2 धारा 9) संबंधी समझौते करने का अधिकार भी मिलता है.
इस भारत बंद की राजनीतिक अर्थव्यवस्था, असल में किसानों के हितों की आड़ में हो रही निहित स्वार्थों की राजनीति है. हर सुधार को या तो कुछ निहित स्वार्थों को हाशिए पर धकेलने या फिर उन्हें भी सुधारों में साझीदार बनाने की प्रक्रिया से गुज़रना पड़ता है. निहित स्वार्थ यानी वो तत्व जिन्होंने 1991 में भारतीय अर्थव्यवस्था में विदेशी संस्थाओं के प्रवेश का विरोध किया था, वो दलाल जिन्होंने 1994 में शेयर बाज़ार में इलेक्ट्रॉनिक ट्रेडिंग की मुख़ालफ़त की थी, वो मज़दूर संगठन जिन्होंने निजी बैंक खोलने का विरोध किया था (और अभी भी करते हैं), वो व्यापारी जिन्होंने रिटेल सेक्टर में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) पर ऐतराज़ जताया था, वो कंपनियां जिन्हें इनसॉल्वेंसी ऐंड बैंकरप्सी कोड (IBC) में कमियां ही कमियां दिखाई देती थीं और जिसे कई बार संशोधित करना पड़ा, वो भ्रष्ट कर अधिकारी जिन्होंने GST को सुविधाजनक व्यवस्था के विकास के बजाय, व्यापारियों के लिए दु:स्वप्न बना दिया. आर्थिक सुधारों की राह में आने वाले निहित स्वार्थी तबक़ों की ये फ़ेहरिस्त बहुत लंबी है.
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (INC) ने वर्ष 2019 के आम चुनाव के लिए अपना जो घोषणापत्र जारी किया था, उसके सातवें अध्याय के आइटम नंबर 21 में लिखा है कि अगर कांग्रेस सत्ता में आई, तो वो आवश्यक वस्तु अधिनियम की जगह नया क़ानून ले आएगी, क्योंकि ये एक्ट, ‘सरकारी नियंत्रण के दौर का है’
आज जो लोग किसानों के साथ इन क़ानूनों का विरोध कर रहे हैं, उनमें से कई ऐसे हैं जो इन्हीं सुधारों के समर्थक हुआ करते थे. 12 राज्यों के 200 से ज़्यादा नागरिकों, जिनमें पंजाब के लोग भी हैं, ने ‘किसानों की आज़ादी के घोषणापत्र’ पर हस्ताक्षर किए हैं. इस घोषणापत्र में APMC और आवश्यक वस्तु अधिनियम जैसी उन बाधाओं का ज़िक्र है, जिन्हें किसानों की स्वतंत्रता की राह में बाधा बताया गया है. भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (INC) ने वर्ष 2019 के आम चुनाव के लिए अपना जो घोषणापत्र जारी किया था, उसके सातवें अध्याय के आइटम नंबर 21 में लिखा है कि अगर कांग्रेस सत्ता में आई, तो वो आवश्यक वस्तु अधिनियम की जगह नया क़ानून ले आएगी, क्योंकि ये एक्ट, ‘सरकारी नियंत्रण के दौर का है’; इसी अध्याय के आइटम नंबर 11 में लिखा है कि कांग्रेस, सत्ता में आने पर APMC एक्ट को ख़त्म करेगी और कृषि क्षेत्र में व्यापार-जिसमें निर्यात एवं अंतरराज्यीय व्यापार शामिल है- को सभी तरह की पाबंदियों से आज़ाद करेगी. आवश्यक वस्तु (संशोधन) क़ानून 2020 और कृषि उत्पाद व्यापार एवं वाणिज्य (संवर्धन और सरलीकरण) एक्ट 2020 के तहत यही तो किया गया है. अगस्त 2010 में तत्कालीन कृषि मंत्री शरद पवार ने दिल्ली की मुख्य़मंत्री शीला दीक्षित को चिट्ठी लिखी थी, जिसमें पवार ने APMC एक्ट में बदलाव की ज़रूरत ये कहकर बताई थी कि, ‘इससे निजी क्षेत्र को वैकल्पिक प्रतिद्वंदी ख़रीद-फ़रोख़्त के माध्यम उपलब्ध कराने का अवसर मिलेगा.’
ये सभी तीन पक्ष यानी किसान संगठन, कांग्रेस और पवार अपने विचार बदल सकते हैं. एक लोकतंत्र में लोग बदलती हुई परिस्थितियों और अपने हितों के हिसाब से अपने रुख़ में परिवर्तन करने का अधिकार रखते हैं. इसके अलावा, किसी भी लोकतंत्र में सबकी आवाज़ सुनी जानी चाहिए. विरोध प्रदर्शन करना एक वाजिब और मूल्यवान माध्यम है. किसानों के प्रतिनिधियों से वार्ता करके, सरकार उनका पक्ष सुन रही है. अगर, इन क़ानूनों के ख़िलाफ़ कोई नया तर्क सामने आता है, तो सरकार को चाहिए कि उसे संशोधनों के ज़रिए क़ानून में शामिल करे. आख़िर इसी सरकार ने IBC एक्ट में संशोधन किए ही हैं. लेकिन, अगर ये धरने, विरोध प्रदर्शन और नागरिकों को हो रही असुविधाएं, महज़ एक छोटे से तबक़े के निहित स्वार्थ और राजनीतिक लाभ के लिए एक महत्वपूर्ण और ज़रूरी सुधार का रास्ता रोकने के लिए हो रहे हैं, तो सरकार को इस आंदोलन के आगे नहीं झुकना चाहिए. कृषि क्षेत्र आर्थिक सुधारों की राह पर डटे रहने के साथ ही साथ, सरकार को चाहिए कि वो इससे वास्तविक लाभ प्राप्त करने वाले किसानों से भी संवाद करे. अगर इन कृषि सुधारों के संभावित लाभ को राजनीतिक संवाद के ज़रिए उन लोगों तक नहीं पहुंचाया जाता, जिन्हें इससे फ़ायदा होगा, तो पूरी परिचर्चा पर वो कुलीन वर्ग क़ाबिज़ हो जाएगा, जो इन सुधारों को किसी भी क़ीमत पर रोकना चाहता है. हर तरह के विमर्श में किसानों की बेहतरी को शामिल किया जाना ज़रूरी है- मगर इस राजनीतिक प्रहसन में यही संवाद गुम है.
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Gautam Chikermane is Vice President at Observer Research Foundation, New Delhi. His areas of research are grand strategy, economics, and foreign policy. He speaks to ...
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