Author : Prithvi Gupta

Expert Speak Raisina Debates
Published on Jul 05, 2023 Updated 0 Hours ago

नई करेंसियों के उभार और अमेरिकी डॉलर की बढ़ती आलोचना के बीच एक अधिक बहुपक्षीय वैश्विक मुद्रा व्यवस्था की ज़रूरत पर ज़ोर दिया जा रहा है.

क्या डॉलर दुनिया में उभर रही वित्तीय आधिपत्य से खुद को बचा सकता है?

अंतरराष्ट्रीय वित्तीय व्यवस्था पर अमेरिका का दबदबा दूसरे विश्व युद्ध के दौर से ही चला रहा है. अमेरिका केंद्रित वित्तीय व्यवस्था और अमेरिका कीआर्थिक ताक़त का दबदबा, उसकी सॉफ्ट पावर के अहम पहलू रहे हैं. हालांकि, यूक्रेन में संघर्ष और अभी हाल ही में अमेरिका के बैंकिंग सेक्टर के संकटने दुनिया को डॉलर के दबदबे के आर्थिक और सामरिक नुक़सानों का एहसास कराया है. चीन, संयुक्त अरब अमीरात (UAE), रूस और भारत ने डॉलरपर निर्भरता कम करने के लिए वैकल्पिक रिज़र्व और डिजिटल करेंसी के विकल्प तलाशने में बढ़ती दिलचस्पी दिखाई है, ताकि डॉलर पर पूरी तरहनिर्भरता को कम कर सकें. बिटकॉइन और केंद्रीय बैंकों की डिजिटल मुद्रा (CBDCs) जैसी डिजिटल करेंसी के उभार ने उनके वैश्विक रिज़र्व मुद्रा बनने कीसंभावित भूमिका को लेकर परिचर्चा को जन्म दिया है. हालांकि, सबसे स्वीकार्य मुद्रा के रूप में डॉलर के पतन की बातें करना अभी जल्दबाज़ी होगी.

डॉलर के दबदबे से अमेरिका को पूंजी तक अधिक पहुंच हासिल होती है और उसके लिए उधार लेने की लागत कम हो जाती है. अमेरिका को मिलने वाली इन आर्थिक सुविधाओं की जड़ें कई आर्थिक नीतियों, भू-राजनीतिक घटनाओं और अमेरिकी दबदबे के तत्वों से जुड़ी हुई हैं.

अमेरिकी डॉलर के दबदबे को मिल रही चुनौती एक बहुआयामी प्रक्रिया है, जिसमें आर्थिक, वित्तीय, राजनीतिक और भू-राजनीतिक कारण भी शामिलहैं. डॉलर की प्रमुखता से अमेरिका को बहुत आर्थिक बढ़त मिल जाती है. डॉलर की उपलब्धता, इसकी मांग और गहराई, अमेरिकी फेडरल रिज़र्व कोदुनिया के वित्तीय प्रवाह और आर्थिक गतिविधियों को नियंत्रित करने का काफ़ी मौक़ा देते हैं. डॉलर के दबदबे से अमेरिका को पूंजी तक अधिक पहुंचहासिल होती है और उसके लिए उधार लेने की लागत कम हो जाती है. अमेरिका को मिलने वाली इन आर्थिक सुविधाओं की जड़ें कई आर्थिक नीतियों, भू-राजनीतिक घटनाओं और अमेरिकी दबदबे के तत्वों से जुड़ी हुई हैं.

भू-राजनीतिक घटनाएं: दो विश्व युद्धों और उसके बाद शीत युद्ध के दौरान अमेरिका ने ख़ूब मुनाफ़ा कमाया. दुनिया पर ब्रिटेन के दबदबे के तेज़ी से पतनके कारण  डॉलर की अहमियत तेज़ी से बढ़ी. अपने सहयोगी देशों को हथियारों और सामान के निर्यात करके अमेरिका ने अपने व्यापार और अर्थव्यवस्थामें बहुत इज़ाफ़ा कर लिया था. युद्ध के बाद जो देश वित्तीय चुनौतियों का सामना कर रहे थे, उन्होंने अमेरिकी बॉन्ड ख़रीदने शुरू कर दिए और अपना सोनाअमेरिका के पास जमा करने लगे. ब्रेटन वुड्स व्यवस्था ने भी 1944 में अमेरिकी डॉलर को दुनिया की रिज़र्व करेंसी के रूप में क़ुबूल किया. इस व्यवस्थाके तहत तमाम देशों ने अपनी मुद्रा की क़ीमत अमेरिकी डॉलर के आधार पर तय करने का फ़ैसला किया, जबकि डॉलर की क़ीमत सोने से एक तयशुदाएक्सचेंज रेट के आधार पर तय की गई, जिससे अमेरिकी डॉलर की विश्वसनीयता स्थापित हो गई.

अमेरिका का दबदबा: 1945 के बाद अमेरिका एक आर्थिक महाशक्ति के रूप में उभरा, जिसमें उसकी औद्योगिक क्षमता ने काफ़ी योगदान दिया था. विश्व व्यापार और निवेश में अमेरिकी डॉलर का इस्तेमाल बड़े पैमाने पर किया जाने लगा. अमेरिका की स्थिरता में विश्वास रखने वाले देशों ने अपने यहांडॉलर को रिज़र्व मुद्रा के रूप में रखना शुरू कर दिया. अमेरिका की वित्तीय व्यवस्था के अंतरराष्ट्रीयकरण और अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में डॉलर की प्रमुखता नेअमेरिका को सबसे बड़ा और सबसे ज़्यादा पूंजी उपलब्धता वाला वित्तीय बाज़ार बना दिया. इन बाज़ारों के विशाल आकार और गहराई ने निवेश, पूंजीकी उपलब्धता और ज़मानत देने लेने के कई विकल्प मुहैया कराए, जो अंतरराष्ट्रीय निवेशकों को आकर्षित करते हैं, जिससे वैश्विक लेन-देन में अमेरिकीडॉलर के इस्तेमाल को और बढ़ावा मिला.

आर्थिक नीतियां: अमेरिका का केंद्रीय बैंक फेडरल रिज़र्व हमेशा क़र्ज़ को टिकाऊ बनाए रखने का अनुपात बरक़रार रखता है और इस तरह खुले बाज़ारके कामकाज के साथ तालमेल बिठाते हुए विदेशी मुद्रा के लेन-देन की दर और ब्याज दर के ज़रिए दख़लंदाज़ी करते हुए एक वैश्विक मुद्रा के तौर परडॉलर के दबदबे को सुरक्षित बनाए रखता है. जैसे जैसे और अधिक देश और संस्थाएं अमेरिकी डॉलर को वैश्विक रिज़र्व करेंसी के तौर पर अपनाते हैं, वैसेवैसे इस नेटवर्क का असर उन पर होने लगता है. डॉलर के व्यापक उपयोग ने उसे ताक़तवर बनाए रखने के एक चक्र को जन्म दिया है. क्योंकि जितनेज़्यादा देश और संस्थाएं डॉलर में लेनदेन करने और उसका भंडार रखने के इच्छुक होते हैं, उतना ही वैश्विक मुद्रा के तौर पर डॉलर का दबदबा मज़बूत होताजाता है. इससे वैश्विक वित्तीय व्यवस्था में उच्च स्तर की अक्रियता पैदा हो गई है, जिससे वैकल्पिक मुद्राओं को अपने प्रसार में दिक़्क़त होती है.

जितने ज़्यादा देश और संस्थाएं डॉलर में लेनदेन करने और उसका भंडार रखने के इच्छुक होते हैं, उतना ही वैश्विक मुद्रा के तौर पर डॉलर का दबदबा मज़बूत होता जाता है. इससे वैश्विक वित्तीय व्यवस्था में उच्च स्तर की अक्रियता पैदा हो गई है, जिससे वैकल्पिक मुद्राओं को अपने प्रसार में दिक़्क़त होती है.

आज दुनिया का 90 प्रतिशत व्यापार डॉलर में होता है; अमेरिकी डॉलर दुनिया भर के विदेशी मुद्रा भंडार पर अपना दबदबा बनाए हुए है. दुनिया के 60 फ़ीसद विदेशी मुद्रा भंडार डॉलर में ही हैं. 1963 में फ्रांस के तत्कालीन वित्त मंत्री वैलेरी गिसकार्ड डे एस्टेन ने इसेअसाधारण विशेषाधिकारक़रार दियाथा. इससे अमेरिका को दूसरे देशों में बहुत कम लागत में निवेश करने का मौक़ा मिलता है. क्योंकि ख़ुद अमेरिका में डॉलर का मूल्य विश्व अर्थव्यवस्था मेंउसकी भारी मांग से बनी रहती है. ऐसी मांग से अमेरिका को कम लागत में बॉन्ड जारी करने में मदद मिलती है. क्योंकि सरकारी बॉन्डों की भारी मांग कामतलब है कि अमेरिका को बॉन्ड के ख़रीदारों को लुभाने के लिए ज़्यादा ब्याज दर का लालच नहीं देना पड़ता है. इससे अमेरिका को अपने बाहरी क़र्ज़ केमौजूदा भारी बोझ की लागत भी काफ़ी कम करने में मदद मिल जाती है.

हालांकि यूरो, युआन और येन जैसी मुद्राओं के उभार ने डॉलर के दबदबे को चुनौती दी है. चीन तो ख़ास तौर से अपनी आर्थिक ताक़त का लाभ उठाकरयुआन को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पसंदीदा मुद्रा बनाने की कोशिश कर रहा है. इस मक़सद से चीन अपने बैंकों को तमाम मुद्राओं में भुगतान की व्यवस्थाबनाने को कह रहा है जिससे युआन के दबदबे वाली BRI परियोजनाओं और विदेशी क़र्ज़ का लेन-देन युआन में हो सके. इसके अलावा युआन कोराष्ट्रीय व्यवस्थाओं जैसे कि विशेष आर्थिक क्षेत्रों (SEZ) (हैनान मुक्त व्यापार बंदरगाह, गुआंगडोंग- हॉन्गकॉन्ग मकाओ ग्रेट बे एरिया और शंघाईइंटरनेशनल फाइनेंशियल सेंटर) के ज़रिए भी प्रोत्साहित किया जा सके.

वैसे तो इन रिज़र्व मुद्राओं- युआन, यूरो और येन में अमेरिकी डॉलर के दबदबे को चुनौती देने की संभावनाएं हैं. लेकिन, इस मंज़िल तक पहुंचने वालीइनकी राह में कई मुश्किलें भी हैं.

चीन बहुत सक्रियता से युआन के अंतरराष्ट्रीयकरण को बढ़ावा दे रहा है, ताकि वैश्विक व्यापार और निवेश में युआन का इस्तेमाल बढ़े. इसके लिए चीन नेसऊदी अरब और रूस जैसे सामरिक साझीदारों के साथ करेंसी के आदान-प्रदान की व्यवस्था स्थापित की है और युआन को डॉलर के विकल्प के तौर परपेश कर रहा है. फिर भी, युआन के उभार में पीपुल्स बैंक ऑफ चाइना की नीतियों से बाधा रही है. इसके अलावा, विदेशी मुद्रा के लेन-देन कीतयशुदा दर और अंतरराष्ट्रीय करेंसी बाज़ार में युआन को आंशिक रूप से कन्वर्टिबल बनाने जैसे क़दम भी इसमें बाधा बन रहे हैं. इसके साथ साथ, पीपुल्सबैंक ऑफ चाइना (PBOC) के बैंकिंग और वित्तीय रिकॉर्ड में पारदर्शिता को लेकर भी चिंताएं जताई जा रही हैं.

इसके साथ साथ, चीन के शैडो बैंकिंग सेक्टर ने उसकी अर्थव्यवस्था में लोगों के भरोसे को तहस-नहस कर डाला है, क्योंकि इस सेक्टर में चीन की कुलपूंजी का 33 प्रतिशत हिस्सा जमा है. चीन की दूसरों के लिए नुक़सानदेह शैडो बैंकिंग व्यवस्था में क़र्ज़ की ब्याज दरें बहुत अधिक हैं और उन्हें वापस करनेकी समय सीमा बहुत कम है. चीन की वित्तीय व्यवस्था में शैडो बैंकिंग की बड़ी हिस्सेदारी से चीन के बाज़ारों में काफ़ी उथल-पुथल बनी रहती है औरइससे क़र्ज़ के भारी बोझ का जोखिम पैदा होता है. ये मसले युआन में भरोसा जगाने के बजाय उसे कमज़ोर करते हैं.

इसी तरह, यूरो भी अमेरिकी डॉलर के दबदबे को चुनौती देने वाला बड़ा प्रतिद्वंदी है. हालांकि, स्थिरता और यूरोपीय आर्थिक समुदाय में आपसी तालमेलजैसे मसलों को लेकर यूरो के सामने भी कई तरह की चुनौतियां हैं. क्योंकि यूरोपीय संघ के देशों की अलग अलग आर्थिक मौद्रिक और वित्तीय नीतियांहैं. उनकी सरकारों पर क़र्ज़ के बोझ में भी अंतर है और EU के सदस्य देशों में राजनीतिक अस्थिरता भी यूरो की राह में एक बाधा है.

सरकार द्वारा ज़रूरत से ज़्यादा ख़र्च और भारी टैक्स लगाकर मौद्रिक स्रोत बढ़ाने पर अधिक निर्भरता से भी जापान में अंतरराष्ट्रीय कारोबारी निवेश की संभावनाएं कम हो जाती हैं. जिससे वैश्विक वित्तीय व्यवस्था में येन का प्रवाह कम हो जाता है.

जापान की करेंसी येन ऐतिहासिक रूप से एक प्रमुख वैश्विक मुद्रा रही है, जिसे अंतरराष्ट्रीय व्यापार और निवेश में व्यापक स्तर पर इस्तेमाल किया जातारहा है. लेकिन, हाल के वर्षों में जापान की अर्थव्यवस्था कई चुनौतियों से जूझती रही है. इसमें लंबे समय से महंगाई दर का बहुत कम होना, उम्रदराज़होती आबादी और सीमित आर्थिक विकास जैसी समस्याएं शामिल हैं. ये तल्ख़ सच्चाइयां येन के वैश्विक स्तर पर डॉलर को चुनौती देने की क्षमता कोकमज़ोर कर सकती हैं. सरकार द्वारा ज़रूरत से ज़्यादा ख़र्च और भारी टैक्स लगाकर मौद्रिक स्रोत बढ़ाने पर अधिक निर्भरता से भी जापान में अंतरराष्ट्रीयकारोबारी निवेश की संभावनाएं कम हो जाती हैं. जिससे वैश्विक वित्तीय व्यवस्था में येन का प्रवाह कम हो जाता है.

निष्कर्ष

वैश्विक व्यापार और वित्त व्यवस्था में अमेरिकी डॉलर का दबदबा, अमेरिकी अर्थव्यवस्था और वित्त व्यवस्था की ताक़त और स्थिरता से नज़दीकी तौर परजुड़ा हुआ है. इसके साथ साथ, अमेरिकी डॉलर पर दुनिया की निर्भरता ने अंतरराष्ट्रीय वित्त व्यवस्था में कई कमज़ोरियों को भी जन्म दिया है, जिससे तमामदेशों के अमेरिका की मौद्रिक नीति और आर्थिक उतार-चढ़ाव से जुड़े जोखिमों के शिकार होने का डर पैदा होता है.

वैसे तो डॉलर का दबदबा अभी भी बना हुआ है. लेकिन, अब ये अजेय नहीं रहा है. अमेरिका की आर्थिक चुनौतियां जैसे कि क़र्ज़ की बढ़ती मात्रा, व्यापारघाटे और भू-राजनीतिक तनाव, डॉलर के दबदबे को कमज़ोर कर सकते हैं और वैश्विक रिज़र्व करेंसी के तौर पर डॉलर की हैसियत घटा सकते हैं. नईमुद्राओं का उभार, अन्य प्रमुख देशों की प्रगति और अमेरिकी डॉलर के विशेषाधिकार की बढ़ती आलोचनाएं वाजिब चिंताएं उठाने वाले हैं और इनसेअधिक बहुध्रुवीय वैश्विक मौद्रिक व्यवस्था की ज़रूरत उजागर होती है, जो दुनिया की अर्थव्यवस्था के नए उभरते आयामों के साथ तालमेल बिठाने वालीहो.

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