Author : Swati Prabhu

Expert Speak Raisina Debates
Published on Feb 10, 2026 Updated 4 Hours ago

भारत का ये बजट सिर्फ टैक्स और खर्च का हिसाब नहीं है बल्कि लोगों की भागीदारी और सबको साथ लेकर चलने पर भी केंद्रित है. इसमें विदेशी मदद में ‘नेबरहुड फर्स्ट’ नीति के तहत पड़ोसियों को प्राथमिकता दी गई है. बांग्लादेश, अफगानिस्तान और चाबहार पोर्ट पर भारत की रणनीति समझने के लिए पूरा लेख पढ़ें.

संभला भारत: पड़ोसी-केंद्रित बजट 2026

1 फरवरी, 2026 को वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने लगातार नौवीं बार देश का आम बजट पेश किया. स्वाभाविक तौर पर सबकी नजर नए ऐलानों पर थी. टैक्स से जुड़े नियम. पढ़ाई और नौकरी पर खर्च. सरकार के बड़े इन्फ्रास्ट्रक्चर प्लान. वित्त मंत्री ने कहा कि यह बजट तीन बड़े ‘कर्तव्यों’ पर टिका है-

पहला - देश की आर्थिक रफ्तार तेज करना और उसे टिकाऊ बनाए रखना. इसके लिए उत्पादन बढ़ाना, मुकाबले की ताकत मजबूत करना और बदलते वैश्विक हालात से निपटने की तैयारी.

दूसरा - लोगों की उम्मीदें पूरी करना. उनकी काबिलियत बढ़ाना ताकि वे देश की तरक्की में बराबर के हिस्सेदार बन सकें.

तीसरा - ‘सबका साथ, सबका विकास’ की सोच ताकि हर परिवार, हर इलाका और हर तबका संसाधनों और मौकों तक पहुंच पा सके.

लेकिन देश के अंदर तरक्की के सपने, बाहर की दुनिया में भारत की भूमिका से जुड़े हुए हैं. भारत खुद को एक भरोसेमंद विकास साझेदार के तौर पर पेश करना चाहता है. इसकी वजह भी भारत की अपनी विकास कहानी है.

‘विकसित भारत’ के विजन के जरिए भारत ग्लोबल साउथ के देशों के साथ विकास साझेदारी मजबूत करने की स्थिति में है. विदेश मंत्रालय के बजट स्टेटमेंट के डिमांड नंबर 29 के मुताबिक, मंत्रालय का कुल बजट पिछले साल के 21,742.74 करोड़ रुपये से बढ़कर 2026-27 में 22,118.97 करोड़ रुपये हो गया है.

हालांकि, जब दुनिया की अर्थव्यवस्था खुद अनिश्चित दौर से गुजर रही है, तब भारत की विकास कूटनीति - खासकर विदेशी मदद के जरिए - इस बजट में भी लगभग जस की तस रही है. जैसे पिछले साल थी. यह एक संभली हुई रणनीति मानी जा रही है, क्योंकि दुनिया में भू-आर्थिक और राजनीतिक तनाव बढ़ते जा रहे हैं.

सीमित संसाधन लेकिन बड़ा इरादा

विदेश मंत्रालय को हर साल सबसे कम बजट पाने वाले मंत्रालयों में गिना जाता है. फिर भी, ‘विकसित भारत’ के विजन के जरिए भारत ग्लोबल साउथ के देशों के साथ विकास साझेदारी मजबूत करने की स्थिति में है. विदेश मंत्रालय के बजट स्टेटमेंट के डिमांड नंबर 29 के मुताबिक, मंत्रालय का कुल बजट पिछले साल के 21,742.74 करोड़ रुपये से बढ़कर 2026-27 में 22,118.97 करोड़ रुपये हो गया है. यानी हल्की सी बढ़ोतरी.

अगर मदद के आंकड़ों को देखें, तो साफ दिखता है कि सरकार अब भी ‘नेबरहुड फर्स्ट’ नीति पर जोर दे रही है. चीन के बढ़ते असर और चारों तरफ के भू-राजनीतिक तनाव के बीच भारत की कूटनीतिक ताकत बढ़ाना वक्त की जरूरत माना जा रहा है.

भूटान से म्यांमार तक- मजबूत होते रिश्ते

भूटान को सबसे ज्यादा मदद मिली है - 2,288.56 करोड़ रुपये. फिर नेपाल को 800 करोड़, श्रीलंका को 400 करोड़ तो म्यांमार को 300 करोड़ मिले हैं. इन देशों के लिए मदद का स्तर पिछले साल जैसा ही रखा गया है.

पड़ोसी देशों में कनेक्टिविटी बढ़ाने की भारत की नीति के मुताबिक, इन मददों को ऐसे औजार की तरह देखा जा रहा है जिनसे आपसी विकास और तरक्की को बढ़ावा दिया जा सके. इससे पूरे क्षेत्र और दुनिया के लिए भी फायदे पैदा हो सकते हैं.

भारत अफगान तालिबान सरकार के साथ रिश्तों को धीरे-धीरे सामान्य करता दिख रहा है. इसका संकेत अक्टूबर 2025 में अफगान विदेश मंत्री आमिर खान मुत्तकी की भारत यात्रा से मिला. बजट में अफगानिस्तान के लिए 150 करोड़ रुपये की मदद रखी गई है.

ये मदद सिर्फ सड़क-पुल तक सीमित नहीं है. इसमें मानवीय सहायता, रक्षा सहयोग, समुद्री साझेदारी और स्थानीय स्तर के प्रॉजेक्ट भी शामिल हैं. उदाहरण के लिए, हाइड्रोपावर, स्वास्थ्य, वैक्सीन सप्लाई और लोगों से लोगों के रिश्ते मजबूत करना.

बांग्लादेश : ठंडा होता भरोसा

लेकिन बांग्लादेश के मामले में तस्वीर बदली हुई है. 2025-26 में जहां मदद 120 करोड़ रुपये थी, इस साल उसे घटाकर 60 करोड़ कर दिया गया है. यानी सीधे-सीधे इसे आधा कर दिया गया है. यह भारत की बांग्लादेश नीति में बड़ा बदलाव माना जा रहा है. दरअसल, पूर्वी सीमा पर राजनीतिक उथल-पुथल, पाकिस्तान से रिश्तों में लगातार तनाव और ढाका-इस्लामाबाद की बढ़ती नजदीकी आदि ने मिलकर भारत की चिंता बढ़ाई है. इसके अलावा, भारत सरकार बार-बार बांग्लादेश में हिंदू अल्पसंख्यकों पर हो रही ज्यादतियों का मुद्दा उठाती रही है.

दूसरी तरफ, भारत अफगान तालिबान सरकार के साथ रिश्तों को धीरे-धीरे सामान्य करता दिख रहा है. इसका संकेत अक्टूबर 2025 में अफगान विदेश मंत्री आमिर खान मुत्तकी की भारत यात्रा से मिला. बजट में अफगानिस्तान के लिए 150 करोड़ रुपये की मदद रखी गई है. इसे अफगानिस्तान के प्रति भारत की रणनीति में संतुलित बदलाव माना जा रहा है.

चाबहार पोर्ट और भू-राजनीति

वहीं भू-राजनीति और भू-अर्थशास्त्र अब भी विकास परियोजनाओं को तय कर रहे हैं. इसकी सबसे साफ मिसाल चाबहार पोर्ट है. भारत और ईरान के बीच 10 साल का समझौता होने के बावजूद, इस साल चाबहार पोर्ट के लिए बजट में एक भी रुपया नहीं रखा गया. इसकी वजह अमेरिका और ईरान के बीच फिर से बढ़ता तनाव बताया जा रहा है. ऐसे में भारत बहुत संभलकर आगे बढ़ना चाहता है. खासतौर पर तब, जब ट्रंप प्रशासन ईरान पर व्यापार और प्रतिबंधों का दबाव बनाए हुए है.

टेबल: बजट 2026 में भारत की विदेशी मदद

देश / क्षेत्र

बजट 2025-26 (₹ करोड़)

संशोधित 2025-26 (₹ करोड़)

बजट 2026-27 (₹ करोड़)

भूटान

2150

1950

2288.56

अफगानिस्तान

100

100

150

बांग्लादेश

120

34.48

60

नेपाल

700

830

800

श्रीलंका

300

300

400

मालदीव

600

625

550

म्यांमार

350

200

300

मंगोलिया

5

25

25

अफ्रीकी देश

225

211.92

225

यूरेशियन देश

40

13.32

38

लैटिन अमेरिकी देश

60

96.68

120

अन्य विकासशील देश

150

80

80

आपदा राहत

64

80

80

चाबहार पोर्ट

  • 100

400

मॉरीशस

500

824

550

सेशेल्स

19

15

19

कुल विदेशी मदद

5483

5785.40

5685.56

स्रोत : भारत बजट 2026

आसान नहीं है राह

जैसे-जैसे दुनिया में विकास से जुड़ी चुनौतियां बढ़ रही हैं, भारत और ग्लोबल साउथ के बाकी देशों के सामने बड़ी परीक्षा यह है कि वे सुरक्षा के खतरे और विकास के लक्ष्य के बीच संतुलन कैसे साधते हैं. साल की शुरुआत विदेशी मदद के बजट से करना सही कदम माना जा सकता है.

लेकिन असली सवाल यह है कि भारत इस मदद की कूटनीति को कितनी असरदार तरीके से लागू कर पाता है. खासतौर पर तब, जब दुनिया की राजनीति और अर्थव्यवस्था दोनों ही अनिश्चित दौर से गुजर रही हैं.


स्वाति प्रभु ऑब्ज़र्वर रिसर्च फाउंडेशन में सेंटर फॉर न्यू इकोनॉमिक डिप्लोमेसी (CNED) में फेलो हैं.

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