नरेंद्र मोदी पहले प्रधानमंत्री हैं जिन्होंने सार्वजनिक स्वास्थ्य के मुद्दे में माहवारी का ज़िक्र किया. क्या इससे सार्वजनिक स्वास्थ्य का एक पहलू, जिसे लंबे समय से नज़रअंदाज़ और कलंकित किया गया.
बिहार का नवादा ज़िला आम तौर पर नक्सली हिंसा को लेकर सुर्खियां बटोरता है. हाल में यहां की 19 साल की एक महिला का सम्मान इसलिए किया गया क्योंकि उन्होंने मार्च में लॉकडाउन की शुरुआत के वक़्त से चल रहे एक संकट का समाधान तलाशा. ये समाधान है ग्रामीण भारत में सैनिटरी पैड तक पहुंच का. मौसम कुमारी ने चार साल पहले एक सैनिटरी पैड बैंक की शुरुआत की. इस बैंक की बुनियाद माइक्रोफाइनेंस बचत के आइडिया पर रखी गई और युवा लड़कियों और महिलाओं ने स्वेच्छा से इसके लिए 1 रुपये का योगदान दिया. लॉकडाउन के दौरान मौसम पूरे ज़िले के गांवों में मुफ़्त सैनिटरी पैड बांटने में सक्षम रहीं. इस साल मई में बिहार, उत्तर प्रदेश और राजस्थान में पॉपुलेशन फाउंडेशन ऑफ इंडिया नाम के एक NGO द्वारा किए गए अध्ययन में पाया गया कि सर्वे में शामिल महिलाओं में से आधी से ज़्यादा को लॉकडाउन के दौरान सैनिटरी पैड नहीं मिली.
मौसम कुमारी ने चार साल पहले एक सैनिटरी पैड बैंक की शुरुआत की. इस बैंक की बुनियाद माइक्रोफाइनेंस बचत के आइडिया पर रखी गई और युवा लड़कियों और महिलाओं ने स्वेच्छा से इसके लिए 1 रुपये का योगदान दिया.
इस साल स्वतंत्रता दिवस पर अपने भाषण में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा, “हमारी सरकार ग़रीब बहनों और बेटियों के लिए बेहतर स्वास्थ्य सुविधा को लेकर लगातार चिंतित रही है. हमने जनऔषधि केंद्र के ज़रिए 1 रुपये की क़ीमत पर सैनिटरी पैड मुहैया करा कर बड़ा काम किया है. एक छोटे से समय में 6,000 जनऔषधि केंद्रों के ज़रिए इन महिलाओं को 5 करोड़ से ज़्यादा सैनिटरी पैड उपलब्ध कराई गई है.” नरेंद्र मोदी पहले प्रधानमंत्री हैं जिन्होंने सार्वजनिक स्वास्थ्य के मुद्दे में माहवारी का ज़िक्र किया. क्या इससे सार्वजनिक स्वास्थ्य का एक पहलू, जिसे लंबे समय से नज़रअंदाज़ और कलंकित किया गया है, फिर से मुद्दा बनेगा?
मोदी के एलान के कुछ ही हफ़्तों के बाद ये ख़बर आई कि सरकार हर किसी तक सैनिटरी पैड पहुंचाने पर 12,000 करोड़ रुपये खर्च करने की योजना बना रही है और इस काम में कॉरपोरेट घरानों को उनकी CSR (कॉरपोरेट सोशल रेस्पॉन्सबिलिटी) गतिविधियों के ज़रिए जोड़ा जाएगा. सुविधा ब्रांड के तहत सरकार बायोडिग्रेडेबल और किफ़ायती सैनिटरी पैड महिलाओं को बेच रही है. कम दाम पर दवाई मुहैया कराने वाले जनऔषधि केंद्रों पर सुविधा पैड बेची जा रही हैं. 2019 में इन बायोडिग्रेडेबल पैड पर और ज़्यादा सब्सिडी देकर इनकी क़ीमत 2.50 रुपये प्रति पीस से घटाकर 1 रुपये कर दी गई. हालांकि ये योजना अच्छी नीयत से बनाई गई है लेकिन वितरण में दिक़्क़तों, अनियमित सप्लाई और जागरुकता की कमी की वजह से इसकी पहुंच सीमित है. ख़बरों के मुताबिक़ ज़्यादातर महिलाओं को इस योजना के बारे में पता ही नहीं है.
2019 में इन बायोडिग्रेडेबल पैड पर और ज़्यादा सब्सिडी देकर इनकी क़ीमत 2.50 रुपये प्रति पीस से घटाकर 1 रुपये कर दी गई. हालांकि ये योजना अच्छी नीयत से बनाई गई है लेकिन वितरण में दिक़्क़तों, अनियमित सप्लाई और जागरुकता की कमी की वजह से इसकी पहुंच सीमित है.
पिछले दशक के दौरान भारत में माहवारी स्वास्थ्य पर नीति निर्माण में ज़्यादा ध्यान दिया गया है. 20 राज्यों के 152 ज़िलों में 10 से 19 साल की किशोर लड़कियों के बीच माहवारी स्वास्थ्य के प्रोत्साहन के लिए राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के तहत 2011 में माहवारी स्वास्थ्य योजना शुरू की गई. 2014 में राष्ट्रीय किशोर स्वास्थ्य कार्यक्रम (RKSK) की शुरुआत की गई जिसका मक़सद ग्रामीण क्षेत्रों में किशोर लड़कियों के बीच सैनिटरी पैड को लेकर जागरुकता और पहुंच को बढ़ाना था.
केंद्र सरकार की योजनाओं के अलावा उत्तर प्रदेश, राजस्थान, महाराष्ट्र, ओडिशा, छत्तीसगढ़, आंध्र प्रदेश और केरल में राज्य सरकारें स्कूल में सैनिटरी पैड बांटती हैं. जो राज्य सरकारें स्कूलों में सैनिटरी पैड नहीं बांटतीं, वो दूसरे प्रावधान करती हैं जैसे बिहार सरकार किशोरी स्वास्थ्य योजना के तहत किशोर लड़कियों को सैनिटरी पैड ख़रीदने के लिए 300 रुपये देती है. ये कार्यक्रम असरदार हैं और माहवारी की वजह से लड़कियों को स्कूल नहीं छोड़ने के लिए प्रोत्साहित करने के हिसाब से ज़रूरी हैं लेकिन इनमें वो लड़कियां छूट जाती हैं जो स्कूल नहीं जातीं.
विशेषज्ञों को डर है कि महामारी के साथ स्कूलों के लगातार बंद होने की वजह से माहवारी स्वास्थ्य के मामले में जो बढ़त दर्ज की गई है, उस पर असर पड़ेगा. इसका कारण ये है कि महामारी ने जहां शुरुआत के महीनों में सैनिटरी पैड की सप्लाई चेन पर असर डाला वहीं स्कूलों के बंद होने से ज़्यादातर किशोर लड़कियों को सैनिटरी पैड नहीं मिल पा रही है. इसका नतीजा ये हुआ कि ज़्यादा लड़कियों और महिलाओं के पास कपड़ों के इस्तेमाल के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा.
देश भर में VHSD (ग्रामीण स्वास्थ्य और सफाई दिवस), जो गांवों में महीने में एक बार आयोजित होता है, के ज़रिए महिलाओं तक पहुंचने का काम महामारी की वजह से रुक गया है. देश की ज़्यादातर लड़कियों और महिलाओं के लिए माहवारी स्वास्थ्य की सलाह में VHSD अहम भूमिका निभाता है. VHSD के ज़रिए उन्हें सैनिटरी पैड के इस्तेमाल और सुरक्षित तरीक़े से उसके निपटारे की जानकारी भी दी जाती है. वैसे तो VHSD के नहीं होने से जो दिक़्क़त हुई उसको पाटने के लिए कई NGO आगे आए और सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवा अब शुरू हो रही है लेकिन हालात सामान्य होने में वक़्त लगेगा.
बिहार में, जहां मौसम कुमारी ने अपना सैनिटरी पैड बैंक शुरू किया था, 82 प्रतिशत महिलाएं कपड़ों पर निर्भर हैं. उत्तर प्रदेश में 81 प्रतिशत महिलाएं घर में बनीं वैकल्पिक चीज़ें इस्तेमाल करती हैं जैसे पुराने कपड़े, कपड़ों के टुकड़े, सूखी घास, रेत या राख.
महामारी से पहले भी कई मुख्य़ मुद्दे बने हुए थे. नीति निर्माण और योजनाओं का एक दशक पूरा होने के बाद भी भारत में माहवारी स्वास्थ्य को अपनाने का रिकॉर्ड ख़राब रहा है. इसकी एक बड़ी वजह जागरुकता में कमी है. राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (2015-16) में पता चला कि पैड के इस्तेमाल में काफ़ी बढ़ोतरी हुई है. देश में 60 प्रतिशत महिलाएं कपड़े का इस्तेमाल करती हैं जबकि 40 प्रतिशत सैनिटरी पैड इस्तेमाल करती हैं. लेकिन राज्यों के स्तर पर इसमें काफ़ी अंतर था. बिहार में, जहां मौसम कुमारी ने अपना सैनिटरी पैड बैंक शुरू किया था, 82 प्रतिशत महिलाएं कपड़ों पर निर्भर हैं. उत्तर प्रदेश में 81 प्रतिशत महिलाएं घर में बनीं वैकल्पिक चीज़ें इस्तेमाल करती हैं जैसे पुराने कपड़े, कपड़ों के टुकड़े, सूखी घास, रेत या राख. हैरानी की बात नहीं है कि सर्वेक्षण में पता चला कि ज़्यादा पढ़ने वाली महिलाओं या ज़्यादा पैसे वाली महिलाओं के साफ़-सुथरे तरीक़े का इस्तेमाल करने की संभावना ज़्यादा है.
कम लागत वाली पैड की पहुंच और उसकी क्वॉलिटी को बेहतर करना माहवारी स्वास्थ्य सुधारने का महत्वपूर्ण हिस्सा है क्योंकि भारत में अभी भी पैड के इस्तेमाल को लेकर क़ीमत मुख्य़ बाधा है. अगर सुविधा पैड की सप्लाई को सुव्यवस्थित कर दिया जाए तो इसका असर होगा. लेकिन इसके बावजूद आधा मक़सद ही पूरा हो पाएगा. कई मोर्चों पर बेहतर जानकारी की काफ़ी ज़रूरत है.
भारत में माहवारी स्वास्थ्य अभी भी काफ़ी हद तक पाबंदियों और जानकारी की कमी के अधीन है. इसका सामाजिक और व्यवहारगत परिवर्तन के कार्यक्रमों से हल करने की ज़रूरत है. माहवारी के दौरान गंदे तरीक़े अपनाने से सेहत पर पड़ने वाले नतीजे को लेकर कम जानकारी है. कपड़े का इस्तेमाल, जो एक परंपरागत तरीक़ा है, गंदा नहीं है और ये एक टिकाऊ विकल्प भी है लेकिन इसमें कपड़े को धोने और धूप में सुखाने की ज़रूरत होती है. भारत में ज़्यादातर महिलाएं कपड़े को धोने और सुखाने में ठीक महसूस नहीं करतीं क्योंकि इसको लेकर कई पाबंदियां हैं. साथ ही पानी की कमी भी एक समस्या है.
माहवारी को लेकर किशोर लड़कियों की जागरुकता 2007 के 29.4 प्रतिशत के मुक़ाबले 2012 में 72.6 प्रतिशत हो गई. वहीं कपड़े को धोने और फिर से इस्तेमाल करने को लेकर जानकारी 57.6 से बढ़कर 82.5 प्रतिशत हो गई.
वैसे जागरुकता के मामले में काफ़ी बढ़ोतरी हुई है. राष्ट्रीय जन सहयोग और बाल विकास संस्थान ने ICMR की मदद से एक रिपोर्ट तैयार की थी. इसके मुताबिक़ माहवारी को लेकर किशोर लड़कियों की जागरुकता 2007 के 29.4 प्रतिशत के मुक़ाबले 2012 में 72.6 प्रतिशत हो गई. वहीं कपड़े को धोने और फिर से इस्तेमाल करने को लेकर जानकारी 57.6 से बढ़कर 82.5 प्रतिशत हो गई. इस मामले में ताज़ा आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं. ICMR फिलहाल स्कूल जाने वाली लड़कियों के लिए किफ़ायती माहवारी स्वास्थ्य समाधान पर अध्ययन कर रही है जैसे बायोडिग्रेडेबल सैनिटरी नैपकिन का इस्तेमाल या फिर से इस्तेमाल होने वाला माहवारी कप.
भारत में माहवारी के इर्द-गिर्द चुप्पी की संस्कृति महामारी के दौरान और बढ़ गई है जैसा कि भारत में यूनिसेफ की प्रतिनिधि यास्मीन अली हक़ ने मई में माहवारी स्वास्थ्य दिवस के मौक़े पर एक बयान में कहा. महिलाओं के मुद्दे के बदले सार्वजनिक स्वास्थ्य के हिस्से के रूप में माहवारी स्वास्थ्य को दिखने के लिए इसमें बदलाव की ज़रूरत है.
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Sunaina Kumar is Director - CNED and Senior Fellow at the Observer Research Foundation. She previously served as Executive Director at Think20 India Secretariat under ...
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