पिछले चार बरसों में पहली बार, मोदी सरकार ने हुर्रियत के साथ वार्ता करने की इच्छा जाहिर की है। मोदी सरकार द्वारा अलगाववादियों को हितधारक स्वीकार किया जाना, अपने आप में एक बड़ी घटना है।
कश्मीर के अलगाववादी नेता एक बार फिर से वार्ता की प्रक्रिया शुरु करने के भारत सरकार की कोशिशों को नाकाम कर रहे हैं। केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह की ओर से की गई वार्ता की पेशकश के बाद से तीनों हुर्रियत नेताओं बुजुर्ग अली शाह गिलानी, मीरवाइज उमर फारुक और यासीन मलिक की ओर से विरोधाभासी और अलग-अलग बयान आ रहे हैं। इस पेशकश ने शायद उन्हें हैरत में डाल दिया है।
इंडियन एक्सप्रेस अखबार को दिए इंटरव्यू में केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने कहा था कि सरकार उन लोगों से वार्ता करने को तैयार है “जो वार्ता करना चाहते हैं।” उनके इस स्पष्ट बयान से श्रीनगर में उत्साह की नई लहर दौड़ गई। भारत द्वारा एकपक्षीय संघर्षविराम की पहल किए जाने के फौरन बाद आई यह पेशकश भारत सरकार की कश्मीर नीति में व्यापक बदलाव का संकेत है।
पिछले चार बरसों में पहली बार, मोदी सरकार ने हुर्रियत के साथ वार्ता करने की इच्छा जाहिर की है। मोदी सरकार द्वारा अलगाववादियों को हितधारक स्वीकार किया जाना, अपने आप में एक बड़ी घटना है। अतीत में, सरकार के विरोध से भरपूर और समझौता न करने वाले दृष्टिकोण के पीछे का संदेश स्पष्ट था: हम हुर्रियत के साथ कोई वास्ता नहीं रखना चाहते। यहां तक कि अक्टूबर 2017 में दिनेश्वर शर्मा को वार्ताकार नियुक्त किए जाने के बाद भी भारत सरकार ने हुर्रियत के साथ वार्ता के बारे में स्पष्ट रूप से कुछ नहीं कहा।
हुर्रियत के बारे में अपने पिछले रुख से पीछे हटना भाजपा के लिए बड़ा दाव है। नीति में बदलाव के कारण राज्य में आगामी विधानसभा चुनावों और 2019 में होने वाले आम चुनावों में पार्टी को गंभीर नुकसान हो सकता है। इसके बावजूद, ऐसा लगता है कि सरकार वार्ता की शुरुआत करना चाहती है।
राजनाथ सिंह की ओर से की गई वार्ता की पेशकश की प्रतिक्रिया में हठी गिलानी ने अपने पिटारे में से एक पुराना नुस्खा 2010 का घिसा-पिटा पांच सूत्री प्रस्ताव खोज निकाला। 2010 के अशांति के दौर के बाद, गिलानी ने वार्ता के लिए पांच कड़ी शर्ते रखी थीं, जिनमें कश्मीर मामले को अंतर्राष्ट्रीय विवाद घोषित करना, जम्मू-कश्मीर से सेना वापस बुलाना, एएफएसपीए कानून और अन्य कानूनों को रद्द करना, राजनीतिक बंदियों की रिहाई और 2010 के अशांति के दौर में नागरिकों की मौतों की जांच करना शामिल था।
कोई साधारण सा पर्यवेक्षक भी कश्मीर के हालात में आए जबरदस्त बदलाव को महसूस कर सकता है, हालांकि गिलानी अभी तक अपने पुराने छल-कपट पर ही अड़े हुए हैं। कश्मीर की हिंसा में हाल की वृद्धि और आतंकवाद की नई लहर के कारण आम कश्मीरी पर दबाव बहुत ज्यादा बढ़ गया है। कश्मीर और नई दिल्ली दोनों जगह इस बात पर मोटे तौर पर आम सहमति है कि हिंसा को समाप्त करने के लिए शांति प्रक्रिया की आवश्यकता है। कड़े रुख अख्तियार करने से सिर्फ मामले और भी उलझ जाएंगे। गिलानी के पांच सूत्री प्रस्ताव ने न सिर्फ 2010 के बाद वार्ता की प्रक्रिया को विफल किया, बल्कि मौजूदा अव्यवस्था की बुनियाद भी रखी। 2010 के पुराने बिंदुओं को उठाना यह दिखाता है कि गिलानी सिर्फ अपनी धारणाओं के कारण नई हकीकत को कबूल नहीं करना चाहते अपने आपको पहले से कहीं ज्यादा मजबूत और कट्टर दिखाना चाहते हैं। उनका पांच सूत्री एजेंडा 2010 के बाद से लगातार वार्ता को नामंजूर करने का आधार रहा है।
कोई साधारण सा पर्यवेक्षक भी कश्मीर के हालात में आए जबरदस्त बदलाव को महसूस कर सकता है, हालांकि गिलानी अभी तक अपने पुराने छल-कपट पर ही अड़े हुए हैं। कश्मीर की हिंसा में हाल की वृद्धि और आतंकवाद की नई लहर के कारण आम कश्मीरी पर दबाव बहुत ज्यादा बढ़ गया है।
गिलानी के विपरीत, केंद्र सरकार के रुख में एक अन्य महत्वपूर्ण बदलाव यह आया है कि “संविधान के प्रारूप के दायरे में वार्ता करने” की शर्त को ज्यादा तरजीह नहीं दी गई है। अब तक, सरकार ने वार्ता के लिए कोई शर्त नहीं रखी है। लेकिन यहां तक कि इकतरफा रमजान संघर्षविराम के बारे में भी इन तीनों अलगाववादियों नेताओं की प्रतिक्रिया कश्मीर में सिविल सोसायटी से बिल्कुल उलट रही है। हुर्रियत ने इसे “क्रूर मजाक” करार देते हुए खारिज कर दिया है। जबकि सरकार की घोषणा के बाद हुर्रियत आतंकवादी गुटों को सरकार के फैसले का पालन करने के लिए राजी करने में भूमिका निभा सकती थी। यहां तक कि इस बारे में कोई सांकेतिक बयान तक नहीं जारी किया गया।
सघर्षविराम के बाद, आतंकवादी गुटों में नए स्थानीय लड़कों के भर्ती, राइफल छीनने के प्रयास, सुरक्षा बलों और नागरिकों पर हमलों के बावजूद, अब तक उनका मुकाबला करने के लिए कोई अभियान नहीं चलाया गया।
यहां एक गंभीर सवाल यह उठता है: क्या हुर्रियत कश्मीर में शांति प्रक्रिया के लिए तैयार है?
सैयद अली शाह गिलानी ने वार्ता की प्रक्रिया के बारे में हमेशा से बेतुका प्रतिकूल रुख अपनाया है। पाकिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति जनरल परवेज मुशर्रफ के उत्कर्ष के दौर में, दरअसल वार्ता की प्रक्रिया कश्मीर मामले के समाधान के बहुत करीब पहुंच गई थी। मुशर्रफ के कार्यकाल के दौरान भारत, पाकिस्तान और जम्मू-कश्मीर में वार्ता की प्रक्रिया को लेकर बनी सर्वसम्मति की इतिहास में कोई दूसरी मिसाल नहीं मिलती, लेकिन गिलानी ने इसमें भी अड़चनें पैदा की थीं। गिलानी द्वारा वार्ता में अड़चनें पैदा करने पर जनरल मुशर्रफ ने उन्हें फटकार लगाते हुए कहा था, “रास्ते से हट जाओ, बुजुर्ग इंसान।”
वार्ता की पेशकश पर इन तीनों अलगाववादी नेताओं के व्यक्तिगत और सामूहिक दृष्टिकोणों में अंतर साफ-तौर पर जाहिर है। जहां गिलानी ने पहल करते हुए, वार्ता के लिए 5 सूत्री शर्तें लगा दी हैं। वहीं दूसरी ओर, मीरवाइज, गिलानी और यासीन मलिक ने केंद्र सरकार से यह ‘दुविधा’ दूर करने को कहा कि आखिर वह किस बारे में चर्चा करना चाहती है। हालांकि इस वक्तव्य में गिलानी की पांच सूत्री शर्तों का कोई जिक्र नहीं किया गया है।
हुर्रियत के तीनों नेताओं की ओर से जारी साझा बयान के अनुसार, अलगाववादियों के जहन में यह ‘दुविधा’ वार्ता के बारे में अलग-अलग बयानों की वजह से उपजी है। बयान में कहा गया: “एक ओर श्री राजनाथ सिंह ने कहा है कि कश्मीर और पाकिस्तान दोनों के साथ वार्ता होनी चाहिए।” विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने शर्त रखते हुए कहा है, “जब तक आतंकवाद को लगाम नहीं लगती, तब तक पाकिस्तान के साथ कोई वार्ता नहीं होगी। उसके बाद, भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने संघर्षविराम को परिभाषित करते हुए कहा कि यह (संघर्षविराम) आतंकवादियों के लिए नहीं बल्कि जनता के लिए है, जबकि राज्य के महानिदेशक ने बयान जारी कर कहा कि यह आतंकवादियों की घर वापसी के लिए है। इस सारी अस्पष्टता ने वार्ता की पेशकश के बारे में उद्देश्यपूर्ण ढंग से चर्चा करने या जवाब देने पर गंभीरता से विचार करने की बहुत कम गुंजाइश छोड़ी है।” [इस प्रकार से]
पहला, सुषमा स्वराज के बयान पर पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय की प्रतिक्रिया आनी चाहिए थी। दूसरा, अलगाववादी सुषमा स्वराज के पूरे बयान को समझने या आत्मसात करने में नाकाम रहे, क्योंकि उन्होंने जोर देकर कहा कि एनएसए स्तर की वार्ता और दो-तरफा संवाद जारी रहेगा।दोनों देशों के डीजीएमओ द्वारा नियंत्रण रेखा पर 2003 के संघर्षविराम को दोहराया जाना, एनएसए स्तरीय वार्ता का अच्छा निष्कर्ष हो सकता है, जो भारत और पाकिस्तान के बीच मूवमेंट को आगे बढ़ाने का स्पष्ट संकेत है। तीसरा, अमित शाह के राजनीतिक बयान को पूरी तरह गलत समझना, क्योंकि भारत का सरकार का रुख और उनकी “परिभाषा” किसी भी तरह संघर्षविराम की पहल का उल्लंघन नहीं करती। चौथा, जम्मू कश्मीर के पुलिस महानिदेशक के बयान की तुलना और उसकी बराबरी केंद्र सरकार की स्थिति से करना, एक अन्य गलत व्याख्या है, क्योंकि डीजीपी राज्य पुलिस के प्रमुख होते हैं तथा राज्य के मुख्यमंत्री को रिपोर्ट करते हैं।
हुर्रियत से उठ रही आवाजों को देखते हुए ऐसा लगता है कि सरकार की ओर से की गई इस पहल ने उन्हें हैरत में डाल दिया है और वे वार्ता के लिए तैयार नहीं हैं तथा पिछले कुछ वर्षों से कश्मीर में आए व्यापक बदलाव को देखना नहीं चाहते। आश्वासन मांगना सही हो सकता है, लेकिन वार्ता शुरु करने से पहले कड़ी शर्तें लगाना अपने आप में इस प्रक्रिया को विफल कर देगा। गिलानी के शुरूआती बयान (अकेले के बयान) के संदर्भ में तीनों नेताओं के साझा बयान और यासीन मलिक की स्पष्ट चुप्पी पर गौर करें, तो उनके मतभेद उजागर हो जाते हैं। इन अंदरूनी मतभेदों को नजरंदाज करते हुए, अलगाववादी नेता इस बात का हौव्वा खड़ा कर रहे हैं कि केंद्र सरकार वार्ता को लेकर “अस्पष्ट और संदिग्ध” है।
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Khalid Shah was an Associate Fellow at ORF. His research focuses on Kashmir conflict Pakistan and terrorism. ...
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