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Published on Jun 22, 2023 Updated 0 Hours ago

इस विश्लेषण में हमने दोध्रुवीय दुनिया से लेकर बहुध्रुवीय विश्व तक भारत और अमेरिका के कूटनीतिक रिश्तों के इतिहास की पड़ताल की है.

भारत और अमेरिका के रिश्तों का संक्षिप्त इतिहास: नेहरू से मोदी और ट्रूमैन से बाइडेन तक

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का छठवां अमेरिका दौरा, दुनिया के दो सबसे बड़े लोकतंत्रों के बीच रक्षा, रणनीति और व्यापार के क्षेत्र में सहयोग के सिलसिले को आगे बढ़ाने वाला है. इन संबंधों का भू-राजनीतिक और आर्थिक प्रबाव बाक़ी दुनिया पर भी पड़ेगा. भू-राजनीतिक प्रतिक्रिया तो चीन और पाकिस्तान से देखने को मिलेगी. क्योंकि ये दोनों देश भारत के प्रति नफ़रत की डोर से जुड़े हुए हैं. वहीं, इस रिश्ते के आर्थिक प्रभाव हमें यूरोपीय संघ (EU), जापान और तेल उत्पादक देशों जैसे कि सऊदी अरब और रूस पर देखने को मिलेंगे, क्योंकि भारत की अर्थव्यवस्था इसी दशक के भीतर दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन जाएगी. 21, 22 और 23 जून की तारीख़ें, एक स्थापित महाशक्ति और एक उभरती क्षेत्रीय ताक़त के बीच रिश्तों को और बेहतर बनाने की प्रक्रिया को आगे बढ़ाने का काम करेंगी.

जब आज़ाद भारत और अमेरिका के कूटनीतिक संबंधों की शुरुआत हुई थी, तो ये दुनिया दो ध्रुवों यानी सोवियत संघ और अमेरिका के बीच बंटी थी. लेकिन, आज की दुनिया बहुध्रुवीय है, जहां बहुत सी संप्रभु शक्तियां अपनी ताक़त दिखा रही हैं.

भारत के किसी प्रधानमंत्री की ये 31वीं अमेरिका यात्रा है. इन यात्राओं का बुनियादी भू-राजनीतिक मंज़र उथल-पुथल के कारण लगातार बदलता रहा है. जब आज़ाद भारत और अमेरिका के कूटनीतिक संबंधों की शुरुआत हुई थी, तो ये दुनिया दो ध्रुवों यानी सोवियत संघ और अमेरिका के बीच बंटी थी. लेकिन, आज की दुनिया बहुध्रुवीय है, जहां बहुत सी संप्रभु शक्तियां अपनी ताक़त दिखा रही हैं. जब अक्टूबर 1949 में भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू, उस वक़्त के अमेरिकी राष्ट्रपति हैरी एस. ट्रूमन से मिले थे, तो दुनिया दूसरे विश्व युद्ध के दौर से उबरते हुए शीत युद्ध के लंबे युग में दाख़िल हो रही थी. उस वक़्त अमेरिका चाहता था कि भारत उसके ख़ेमे में आ जाए; नेहरू ने इसका विरोध किया और गुटनिरपेक्ष आंदोलन के नाम से एक तीसरी ताक़त खड़ी करने की कोशिश की. इसके बाद भारत और अमेरिका के रिश्ते बिगड़ गए. फिर अमेरिका ने इस अवसर का लाभ उठाते हुए पाकिस्तान को एक हथियारबंद भौगोलिक क्षेत्र में तब्दील कर दिया. 

इसका नतीजा ये हुआ कि पाकिस्तान के इस्लामिक गणराज्य ने सत्ता तंत्र के समर्थन से कट्टरपंथी इस्लाम को सामूहिक आतंकवाद का हथियार बना लिया. इसके नतीजे हमें 9/11 और 26/11 के हमलों समेत अनगिनत आतंकवादी घटनाओं के रूप में देखने को मिले. पहले अमेरिका की मदद से, और अब चीन के सहयोग से पाकिस्तान को भारत के ख़िलाफ़ जो ‘भौगोलिक बढ़त’ हासिल थी, वो पिछले एक दशक से एक ऐसे विचार के तौर पर बिगड़ती चली गई है, जिसकी उपयोगिता समाप्त हो चुकी है. अमेरिका ख़ुद को चीन से डी-रिस्क (एक नया शब्द जिसने डिकपलिंग की जगह ली है) कर रहा है; चीन ख़ुद को पाकिस्तान से और नज़दीकी से जोड़ रहा है; और पाकिस्तान ख़ुद को चीन के उपनिवेश के तौर पर बदल रहा है और धीरे-धीरे एक अंदरूनी संवैधानिक-आर्थिक और फौजी विस्फोट की तरफ़ बढ़ रहा है (पाकिस्तान के हालात की जानकारी आप यहां से देख सकते हैं). भूगोल को इस्लामिक आतंकवाद के मोर्चे के रूप में इस्तेमाल करने का एक बड़ा अध्याय अब समाप्त हो रहा है.

नेहरू-इंदिरा का दौर

अगर हम भारत और अमेरिका के रिश्तों की ओर लौटें, तो नेहरू के बाद उनकी बेटी इंदिरा गांधी के दौर में भी दोनों के संबंध तनावपूर्ण बने रहे. इंदिरा गांधी ने अपने पिता से मिली समाजवाद की विरासत को न सिर्फ़ और आगे बढ़ाया, बल्कि सख़्ती से लागू भी किया, और देश में उद्यमिता का गला घोंट दिया. इंदिरा गांधी ने मार्च 1966, नवंबर 1971 और जुलाई 1982 में अमेरिका के तीन दौरे किए. इस दौरान दोनों देशों के रिश्ते ख़राब बने रहे. 1971 में पाकिस्तान के साथ युद्ध, जिससे बांग्लादेश का उदय हुआ, उसमें अमेरिका ने बांग्लादेश का समर्थन किया था.

दोनों देशों के पहले से ख़राब संबंध और भी बिगड़ गए, जब 1974 में भारत ने परमाणु परीक्षण करके ख़ुद को एटमी ताक़त घोषित किया. भारत द्वारा अपने राष्ट्रीय हितों की अभिव्यक्ति करना, भू-राजनीतिक चौपड़ पर अमेरिका के हितों से टकराने वाला था.

दोनों देशों के पहले से ख़राब संबंध और भी बिगड़ गए, जब 1974 में भारत ने परमाणु परीक्षण करके ख़ुद को एटमी ताक़त घोषित किया. भारत द्वारा अपने राष्ट्रीय हितों की अभिव्यक्ति करना, भू-राजनीतिक चौपड़ पर अमेरिका के हितों से टकराने वाला था. इंदिरा गांधी के बाद मोरारजी देसाई देश के प्रधानमंत्री बने, जिन्होंने दो साल तक सरकार चलाई. उन्होंने अपनी नीतियों से सुनिश्चित किया कि अमेरिका के साथ संवाद और भी कम होता गया. अमेरिकी कंपनियों कोका कोला और IBM को भारत से बाहर निकालने और उसका जश्न मनाने के बाद, मोरारजी देसाई जून 1978 में अमेरिका के दौरे पर क्यों गए थे, ये बात आज भी रहस्य है.

इंदिरा गांधी के बेटे, प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने तीन बार अमेरिका का दौरा किया. जून 1985 में, अक्टूबर 1985 में और अक्टूबर 1987 में. राजीव के इन दौरों ने अमेरिका के साथ रिश्तों को जीवित तो रखा, मगर उसमें ठहराव भी बना रहा. घरेलू स्तर पर राजीव गांधी ने आर्थिक नीतियों में सुधार की कोशिशें ज़रूर कीं, लेकिन कुछ ख़ास कर नहीं पाए; कूटनीतिक तौर पर भारत, अमेरिका की विदेश नीति के हाशिए पर ही रहा.

ख़राब आर्थिक स्थितियों के कारण 1991 में प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव ने सबसे बड़े आर्थिक सुधार किए और उसके बाद वो जनवरी 1992 और सितंबर 1997 में  दो बार अमेरिका के दौरे पर गए, जिससे दोनों देशों के बीच आर्थिक संवाद के दरवाज़े खुले. उनके बाद प्रधानमंत्री बने अटल बिहारी वाजपेयी ने सितंबर 2000, नवंबर 2001, सितंबर 2002 और सितंबर 2003 में अमेरिका के चार दौरे किए. इन दौरों से आर्थिक संबंधों की रफ़्तार में जो तेज़ी आई, वो आज तक बनी हुई है. 1998 में पोखरण II के तहत वाजपेयी ने पांच एटम बमों का परीक्षण किया. इससे अमेरिका नाराज़ हुआ और दोनों देशों के संबंध में थोड़े समय के लिए बाधा पड़ी. लेकिन, संबंधों में गहराई आने की शुरुआत हो चुकी थी. सकारात्मक आर्थिक रिश्तों ने सामरिक आज़ादी की नकारत्मकता के साथ संतुलन बनाने का काम किया. इसका नतीजा ये हुआ कि परमाणु परीक्षणों के बावजूद, वर्ष 2000 से भारत में अमेरिकी निवेशों में वृद्धि होने लगी थी.

मनमोहन सिंह ने अमेरिका के राष्ट्रपति जॉर्ज बुश के साथ बातचीत करके, असैनिक परमाणु सहयोग का समझौता किया, जो सामरिक रूप से मील का पत्थर साबित हुई. ये एक ऐसा सौदा था, जिसने आर्थिक संबंधों को और ताक़त देने के साथ साथ दोनों लोकतंत्रों के बीच संबंध को मज़बूत बनाने का काम किया.

लेकिन, जब तक मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री नहीं बने, तब तक भारत और अमेरिका के रिश्ते प्रौढ़ और गहरे होने नहीं शुरु हुए. 2004 तक भारत एक तेज़ी से बढ़ती हुई बड़ी अर्थव्यवस्था के तौर पर दिखने लगा था- 2007 में भारत की अर्थव्यवस्था एक ट्रिलियन डॉलर की और 2014 में 2 ट्रिलियन डॉलर की हो गई थी. लेकिन, अर्थव्यवस्था और भारत में बढ़ते अमेरिकी निवेशों से बढ़कर मनमोहन सिंह ने अमेरिका के राष्ट्रपति जॉर्ज बुश के साथ बातचीत करके, असैनिक परमाणु सहयोग का समझौता किया, जो सामरिक रूप से मील का पत्थर साबित हुई. ये एक ऐसा सौदा था, जिसने आर्थिक संबंधों को और ताक़त देने के साथ साथ दोनों लोकतंत्रों के बीच संबंध को मज़बूत बनाने का काम किया. 

अपने दो कार्यकालों के दौरान मनमोहन सिंह,  सितंबर 2004, जुलाई 2005, सितंबर 2008, नवंबर 2008, सितंबर 2009, नवंबर 2009, अप्रैल 2010 और सितंबर 2013 में आठ बार अमेरिका के दौरे पर गए. इनमें से दो (नवंबर 2008 और सितंबर 2009) बैठकें G20 की थीं, जब उत्तर अटलांटिक वित्तीय संकट से इस संगठन को प्रोत्साहन मिला था.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को अमेरिका के साथ संबंध की ये जलती हुई मशाल मिली थी. अब तक के उनके पांच अमेरिका दौरों- सितंबर 2014, मार्च-अप्रैल 2016, जून 2016, जून 2017 और सितंबर 2019- ने रिश्तों को मज़बूत किया है. मोदी को 2 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था और परमाणु सहयोग के रूप में सामरिक सद्भावना विरासत में मिली थी. उन्होंने इन दोनों का इस्तेमाल रिश्तों को मज़बूती देने और अपनी ओर से इसमें और बहुत कुछ जोड़ने में किया है. आकार, रणनीति और नीति का ये तालमेल अमेरिका के लिहाज़ से बिल्कुल सही समय पर हुआ है. क्योंकि वो इस क्षेत्र में भरोसेमंद साझेदारी तलाश रहा है, पाकिस्तान से दूर हो रहा है और चीन से जोख़िम कम कर रहा है. जापान और ऑस्ट्रेलिया के साथ बना क्वॉड अपने बढ़ते हुए प्रभाव को दिखा रहा है.

इसके नतीजे में दोस्त देशों और हिंद प्रशांत क्षेत्र में भारत की हैसियत ज़्यादा बड़ी आर्थिक, सामरिक और तकनीकी ताक़त के रूप में बढ़ी है और इससे निवेश, व्यापार, रक्षा संबंधों और रिसर्च केंद्रों में बढ़ोत्तरी हो रही है. आज जब तेल की जगह डेटा ने ले ली है, तो भारत ने 5G के मामले में हुआवेई और अन्य सेवाओं जैसे कि टिक टॉक के ख़िलाफ़ कड़ा रुख़ अपनाया है (अधिक जानने के लिए चाइना टेक यहां पढ़ें). इसका असर न केवल अमेरिका पर पड़ा है, बल्कि इसकी गूंज यूरोपीय संघ (EU) के भीतर भी सुनाई दी है. ये सिलसिला जारी रहेगा.

आपसी तालमेल और साझा सोच

आपसी आर्थिक सामरिक तालमेल और साझा सोच अब ताक़तवर होती जा रही है. विडंबना ये है कि इसका सबसे बड़ा कारण, बात-बात पर झगड़ा करने वाले सनकी शी जिनपिंग बने हैं, जो चीन में लगभग हर मामले के चेयरमैन हैं. वो ज़मीन से लेकर समुद्र और बाज़ार तक क़ब्ज़ा करने की मुहिम चला रहे हैं. शी जिनपिंग ने चीन देश पर भरोसे को कम किया है, जिसे चीन की कम्युनिस्ट पार्टी चला रही है. इस प्रक्रिया में जिनपिंग ने चीन के उद्यमियों को ही कमज़ोर किया है. आज जब वो हॉन्ग कॉन्ग के लोकतंत्र का गला घोंट रहे हैं और ताइवान को निगलने की कोशिश कर रहे हैं, तो नए तनाव पैदा ही होंगे.

प्रधानमंत्री के इस दौरे का फौरी तौर पर ध्यान समझौतों की उस बाढ़ पर होगा, जो होने वाले हैं. लेकिन, नीति से लेकर रक्षा और निवेश तक, जो बात एकदम साफ़ है, वो ये है कि ये दौरा अमेरिका और भारत के रिश्तों को और मज़बूती देने के सिलसिले की ही एक और कड़ी है.

ऐसे मोड़ पर भारत का लोकतंत्र, इसकी बढ़ती आर्थिक शक्ति और सामरिक भूगोल, अचानक से अमेरिका के लिए ज़्यादा आकर्षक बन गए हैं. वहीं दूसरी तरफ़, रक्षा सौदों, उच्च तकनीक में सहयोग और वैकल्पिक आपूर्ति श्रृंखलाओं जैसे सामरिक समीकरणों कारण, भारत के लिहाज़ से ये रिश्ता भविष्य में भी महत्वपूर्ण रहने वाला है. जहां एक तरफ़ चीन की ‘विन-विन’ की परिभाषा का मतलब चीन का दोहरा फ़ायदा, जबकि अमेरिका और यूरोपीय संघ जैसे दूसरे पक्षों का नुक़सान है. वहीं, भारत और अमेरिका के रिश्तों में ‘विन-विन’ का मतलब, पूरी दुनिया में शांति, प्रगति और विकास है.

प्रधानमंत्री मोदी के अमेरिका दौरे की शुरुआत संयुक्त राष्ट्र में अंतरराष्ट्रीय योग दिवस से हुई. इसके बाद व्हाइट हाउस में उनकी मुलाक़ात जो बाइडेन से होगी. एक राजकीय भोज होगा. अमेरिकी संसद के दोनों सदनों की संयुक्त बैठक को संबोधन होगा और प्रधानमंत्री मोदी, अमेरिका की उप-राष्ट्रपति और विदेश मंत्री एंटनी ब्लिंकेन के साथ लंच भी करेंगे. इसके अलावा, प्रधानमंत्री कई बड़ी कंपनियों के CEO से भी मिलेंगे.

वैसे तो, प्रधानमंत्री के इस दौरे का फौरी तौर पर ध्यान समझौतों की उस बाढ़ पर होगा, जो होने वाले हैं. लेकिन, नीति से लेकर रक्षा और निवेश तक, जो बात एकदम साफ़ है, वो ये है कि ये दौरा अमेरिका और भारत के रिश्तों को और मज़बूती देने के सिलसिले की ही एक और कड़ी है. यूरोपीय संघ से लेकर पश्चिमी एशिया तक दुनिया इस संबंध पर बारीक़ी से नज़र बनाए हुए होगी और इसी के हिसाब से अपने आर्थिक, सामरिक और धार्मिक हितों को साधने की कोशिश करेगी. आर्थिक हितों की बात करें तो यूरोपीय संघ, जापान और ऑस्ट्रेलिया, धार्मिक मामले में सऊदी अरब और क़तर और सामरिक क्षेत्र में रूस, जापान और ऑस्ट्रेलिया, भारत और अमेरिका के रिश्ते के हिसाब से अपने हितों का तालमेल बिठाने की कोशिश करेंगे. आज जब उभरते हुए भारत और अपने आपको मज़बूत बनाते अमेरिका के नेता मिलकर आपसी संबंधों में एक नया स्थायित्व लाने की कोशिश कर रहे हैं, तो इनका इतिहास इनके भविष्य को अब बिल्कुल ख़राब नहीं करेगा. इतिहास मोदी और बाइडेन पर इस तरह से नज़र डालेगा, जिससे ये पता चल सके कि 21वीं सदी में दुनिया कैसी दिखेगी.

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