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भारतीय उच्च शिक्षा लंबे समय से नियमों और निरीक्षणों के बोझ में जकड़ी रही है जबकि एनईपी 2020 ने एक सरल और भरोसेमंद नियामक व्यवस्था का वादा किया था. संसद में वीबीएसए विधेयक 2025 के पेश होने के साथ यह लेख उसी वादे की वास्तविक परीक्षा और उसके निहितार्थों को समझने का प्रयास कर रहा है.
भारतीय उच्च शिक्षा को नियंत्रित करने वाली नियामक व्यवस्था दशकों से निर्देश देने तक सीमित रही है. इसमें एक तय संख्या में फैकल्टी-स्टूडेंट अनुपात, निरीक्षण-आधारित अनुमोदन और व्यापक कागजी कार्रवाई शामिल हैं. इसका नतीजा ये हुआ कि संस्थागत नवाचार और वास्तविक स्वायत्तता कमजोर हुई है.
राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी) 2020 ने एक वैकल्पिक हल्के लेकिन प्रभावी नियामक दृष्टिकोण पर ज़ोर दिया जो मुख्य रूप से सत्यनिष्ठा और पारदर्शिता के सिद्धांतों द्वारा संचालित है. ये स्वायत्तता और सुशासन के माध्यम से नवाचार को बढ़ावा देती है.
विनियामक समायोजन अब विधायी चरण में प्रवेश कर चुका है. संसद के शीतकालीन सत्र के दौरान 15 दिसंबर 2025 को विकसित भारत शिक्षा अधिष्ठान (वीबीएसए) विधेयक, 2025 पेश किया गया है.
वीबीएसए विधेयक विकसित भारत शिक्षा अधिष्ठान की स्थापना करता है जिसे तीन परिषदों का समर्थन प्राप्त है: नियामक परिषद, जो एक सामान्य नियामक के रूप में कार्य करती है; एक्रिडटेशन काउंसिल, जो मंजरी प्रक्रियाओं की देखरेख के लिए जिम्मेदार है और मानक परिषद, जिसे शैक्षणिक मानकों को बनाए रखने का काम सौंपा गया है.
दूसरा, यह विधेयक उच्च शिक्षा संस्थानों को अनुदान देने के दायित्व के बिना रणनीतिक दिशा प्रदान करता है. वीबीएसए केंद्र और राज्य दोनों पर यह सुनिश्चित करने का दायित्व डालता है कि फंड का आवंटन इस प्रकार हो जिससे गुणवत्तापूर्ण परिणाम मिलें.
तीसरा, यह विधेयक नियमों के उल्लंघन पर विशेष दंड को तय कर प्रवर्तन को मज़बूत करता है. इसमें दंड निर्धारण के लिए एक न्यायिक तंत्र की बात कही गई है.
एकल नियामक प्रणाली के पक्ष में सबसे मज़बूत तर्क ये है कि भारत को सभी राज्यों में एकसमान शैक्षणिक मानकों और विश्वसनीय गुणवत्ता वाली शिक्षा की ज़रूरत है. वर्तमान में, कई नियामक संस्थाएं हैं. ऐसे में नियमों के पालन का बोझ एक बड़ी समस्या बन गया है. वीबीएसए-2025 का उद्देश्य तीन पुराने नियामक निकायों की जगह लेना है. ये तीन निकाय हैं; यूजीसी (1956), एआईसीटीई (1987) और एनसीटीई (1993). इसमें कानूनी और चिकित्सा शिक्षा शामिल नहीं है.
यह महज नीतिगत प्राथमिकता का मामला नहीं बल्कि एक महत्वपूर्ण मुद्दा है. राज्यों के अलग-अलग एजेंडे के कारण भारतीय उच्च शिक्षा व्यवस्था खंडित बनी हुई है. नई शिक्षा नीति 2020 में अकादमिक क्रेडिट बैंक (एबीसी) और राष्ट्रीय उच्च शिक्षा योग्यता ढांचा (एनएचईक्यूएफ) जैसे साधनों के माध्यम से पोर्टेबल क्रेडिट और योग्यताओं को शामिल किया गया है.
इस मामले का दूसरा पहलू भी उतना ही ठोस है. देश के ज़्यादातर छात्र राज्यों के विश्वविद्यालयों में पढ़ते हैं. इनका संचालन राज्य के बजट से होता है और ये शिक्षक प्रशिक्षण, सार्वजनिक स्वास्थ्य, स्थानीय शासन और भाषा संरक्षण सहित स्थानीय विकास की आवश्यकताओं से जुड़े हुए हैं. ऐसे में केंद्र सरकार के अधीन आने वाला नियामक ढांचा राज्य स्तर पर लोकतांत्रिक जवाबदेही को कमज़ोर कर सकता है.
ऐसी स्थिति में वीबीएसए की संरचना महत्वपूर्ण होगी क्योंकि ये विनियमन, एक्रिडटेशन और मानकों को कवर करने वाले एक आयोग और तीन परिषदों पर आधारित है. इसकी सफलता काफ़ी हद तक इस बात पर निर्भर करेगी कि राज्य प्रणालियां सुधार के विषय के बजाए सह-निर्माता की भूमिका महसूस करती हैं या नहीं?
वीबीएसए में ऐसे तत्व हैं, जिन्हें दो दिशाओं में समझा जा सकता है. सहयोगी संघवाद की ओर या केंद्रीकृत कमान की तरफ. यह विधेयक प्रमुख परिषदों में बारी-बारी से नियुक्त सदस्यों के माध्यम से राज्यों की भागीदारी का प्रावधान करता है जो इस बात की सार्थक स्वीकृति है कि राज्यों के बिना उच्च शिक्षा सुधार लागू नहीं किया जा सकता.
इसके अलावा, वीबीएसए में अपील का प्रावधान है जिसके तहत कुछ फैसलों के विरुद्ध केंद्र सरकार के समक्ष अपील की जा सकती है. संघीय संदर्भ में यह प्रावधान राजनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है लेकिन अंतिम निर्णय का अधिकार केंद्र के पास ही है. इससे नियामक प्रणाली पर भरोसा कम हो सकता है.
वीबीएसए दंड और न्यायिक प्रावधानों के माध्यम से प्रवर्तन को मज़बूत करता है. हालांकि राजनीतिक अर्थव्यवस्था का ज़ोखिम यह है कि इससे केंद्रीय शक्ति तो बढ़ती है लेकिन राज्य के वित्त पोषण में वृद्धि नहीं होती है.
वीबीएसए का दृष्टिकोण उस पूर्व धारणा से अलग है जिसमें नियामक को अनुदान का प्रमुख माध्यम माना जाता था. हालांकि इससे हितों के टकराव कम हो सकते हैं लेकिन केंद्र-राज्य समन्वय की आवश्यकता बढ़ जाती है.
अगर वीबीएसए को केंद्रीकरण का प्रतीक बनाने से बचाना है तो इसके कार्यान्वयन में स्पष्ट रूप से एक सहयोगात्मक संघीय समझौते का निर्माण किया जाना चाहिए. निम्नलिखित पांच कदम ऐसे हैं, जो बदलाव लाने में मदद कर सकते हैं.
हर एक राज्य प्रणाली के लिए एक वार्ता-आधारित रोडमैप की ज़रूरत है. इसमें पुरानी स्वीकृतियों को बदलने, राज्य विश्वविद्यालय अधिनियमों के साथ एकीकरण की समयसीमा शामिल होनी चाहिए.
प्रमुख विनियमों को लागू करने से पहले राज्यों के साथ विस्तृत और व्यवस्थित परामर्श किया जाना चाहिए. स्पष्ट रूप से यह प्रकाशित किया जाना चाहिए कि विभिन्न राज्यों के संदर्भों पर कैसे विचार किया गया.
अगर वीबीएसए प्रकटीकरण, मान्यता और परिणामों पर अपेक्षाएं बढ़ाता है तो इसे क्षमता निर्माण के साथ जोड़ा जाना चाहिए, विशेष रूप से राज्य विश्वविद्यालयों के लिए.
भले ही वीबीएसए उच्च शिक्षा संस्थानों को सीधे तौर पर वित्त पोषित न करे लेकिन राज्य और केंद्र सरकार के वित्त पोषण प्रवाह को मान्यता परिणामों और प्रदर्शन संबंधी खुलासों के हिसाब से ढालने के लिए एक समानांतर तंत्र की आवश्यकता है.
संघीय व्यवस्था पर विश्वास बनाए रखने के लिए, प्रवर्तन पूर्वानुमानित और आनुपातिक होना चाहिए. इसमें स्पष्ट मानक, पारदर्शिता और मनमाने निर्णय लेने के खिलाफ सुरक्षा उपाय शामिल हों..
वीबीएसए विधेयक या तो एनईपी के भरोसे पर आधारित वादे की संस्थागत रीढ़ बन सकता है या फिर इसे एक नए नाम के तहत सत्ता को मजबूत करने वाले निकाय के रूप में देखा जा सकता है. केंद्रीकरण-संघवाद की बहस संस्थागत ढांचों से हल नहीं होगी. ये इस बात पर निर्भर करेगी कि विधेयक को कैसे लागू किया जाता है, विशेषकर राज्य विश्वविद्यालयों के लिए.
अगर वीबीएसए एक सहयोगात्मक संघीय समझौता तैयार करता तो भारत वास्तव में एक ऐसी प्रणाली की ओर बढ़ सकता है जो हल्की लेकिन प्रभावी हो. ऐसा ना होने पर ये व्यवस्था नई बोतल में पुरानी शराब बनकर रह जाएगी.
प्रोफेसर (डॉ.) चेतन सिंगाई चाणक्य यूनिवर्सिटी, बैंगलुरू में स्कूल ऑफ लॉ, गवर्नेंस और पब्लिक पॉलिसी के डीन और प्रोफेसर हैं.
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Chetan Singai is Professor and Dean, School of Law, Governance and Public Policy, Chanakya University, Bengaluru. ...
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