• Jun 05 2018

स्वच्छता उद्यमिता: ‘सभी को समान अवसर’ देना फायदेमंद

स्वच्छता उद्यमिता: ‘सभी को समान अवसर’ देना फायदेमंद क्यों है?

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मुंबई की धारावी झोपड़ी में पानी पाइप

छवि: मीना क़ादरी/फ़्लिकर

गत अप्रैल माह में नीति आयोग ने ‘अटल न्यू इंडिया चैलेंजेज’ नामक कार्यक्रम की घोषणा की जो विभिन्‍न सेक्‍टरों एवं फोकस क्षेत्रों में प्रौद्योगिकी स्टार्टअप्‍स और अन्‍वेषकों को आकर्षित करने के लिए आयोजित की गई एक प्रतियोगिता थी। उल्‍लेखनीय है कि इसके 17 फोकस क्षेत्रों में से सात क्षेत्रों का वास्‍ता स्वच्छता और साफ-सफाई से है जो भारत के प्रमुख कार्यक्रम ‘स्वच्छ भारत मिशन (एसबीएम)’ से जुड़ी हुई है। यह आयोग भारत की 3,962 अरब रुपये की असंगठित स्वच्छता अर्थव्यवस्था का समुचित उपयोग करने के मामले में अत्यावश्यक प्रोत्साहक साबित हुआ है।

इस आइडिया प्रतियोगिता के जरिए सरकार का थिंक-टैंक अर्थात नीति आयोग 50 सर्वश्रेष्ठ आइडिया का वित्‍त पोषण करेगा और इनमें से प्रत्‍येक आइडिया को आवश्यक मार्गदर्शन के साथ 10 मिलियन रुपये देगा। इसका उद्देश्य विश्वस्तरीय नवाचार केंद्रों, स्टार्ट-अप व्यवसायों और विशेषकर प्रौद्योगिकी संचालित क्षेत्रों में अन्य स्वरोजगार गतिविधियों को बढ़ावा देने के लिए एक प्‍लेटफॉर्म के रूप में कार्य करना है, ताकि स्वच्छता एवं साफ-सफाई के मोर्चों पर भारत के समक्ष मौजूद कठिन चुनौतियों से निपटा जा सके।

इसने कचरा प्रबंधन, रीसाइक्लिंग/पुन: उपयोग, कचरा संयोजन उपकरणों, खाद (कंपोस्‍ट) की गुणवत्ता, विकेन्द्रीकृत खाद सम्मिश्रण, खाद के लिए पत्तियों का मिश्रण करने, सार्वजनिक स्थानों पर मौजूद अपशिष्ट और सार्वजनिक स्थानों पर गंदगी फैलाने से रोकने के कार्यों में जुटे अन्‍वेषकों और एमएसएमई को इस कार्यक्रम में भाग लेने के लिए आमंत्रित किया है।

भारत में असंगठित क्षेत्र के कई सफल ग्रामीण उद्यमी संभवत: निर्धारित मानदंडों को पूरा करने में सक्षम नहीं होंगे और इस तरीके से धन प्राप्‍ति‍ (फंडिंग) से संबंधित आवश्‍यक अर्हता को पूरा नहीं कर पाएंगे और ऐसे में वे समान अवसर पाने से वंचित रह जाएंगे।

उदाहरण के लिए, नीति आयोग ने प्रविष्टियों के लिए अपने आमंत्रण में यह निर्दिष्ट किया है कि यह कार्यक्रम एमएसएमईडी अधिनियम में परिभाषित सूक्ष्‍म, लघु और मझोले उद्यमों (एमएसएमई), औद्योगिक नीति एवं संवर्धन विभाग (डीआईपीपी) द्वारा परिभाषित स्टार्ट-अप्‍स, सरकारी या निजी अनुसंधान एवं विकास संगठनों (रेलवे के एक आरएंडडी संगठन को छोड़ कर), शैक्षणिक संस्थानों और शिक्षाविदों के लिए खुला होगा। यहां तक कि व्यक्तिगत अन्‍वेषकों को भी आवेदन करने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है, बशर्ते कि वे उपयुक्त विनिर्माण क्षमताओं वाले निकायों के साथ साझेदारी करें। ये मानक आवश्यकताएं हैं जिनकी मांग इस तरह की कई प्रतियोगिताओं में की जाती है।

इसमें अब भी संशय है कि क्‍या राजस्थान के सिंगला गांव की उन ग्रामीण महिलाओं को इसमें भाग लेने की अनुमति होगी जो एक स्वदेशी या देशज प्रौद्योगिकी के जरिए गोबर, पोल्ट्री और अपशिष्ट खाद्य पदार्थों से प्रति दिन 1,000 घन मीटर बायोगैस तैयार करती हैं? जाहिरा तौर पर नहीं।

इसके लिए यह जरूरी है कि पेयजल एवं स्वच्छता मंत्रालय (एमडीडब्‍ल्‍यूएस) इन उद्यमियों को मान्यता दिलाने, शिक्षाविदों एवं अन्‍वेषकों के साथ नेटवर्क बनाने, एक समर्पित खिड़की या चैनल के माध्यम से या अन्य वित्तीय प्रपत्रों के जरिए उनका कॉरपोरेट वित्त पोषण करने और स्वच्छता से जुड़े अभिनव उत्पादों एवं सेवाओं के लिए एक ऐसा मानक बाजार उपलब्‍ध कराने में उनकी मदद करे जिसका उपयोग सरकारी और निजी एजेंसियों दोनों ही द्वारा किया जा सकता है। 1.88 मिलियन व्यक्तिगत शौचालयों के लक्ष्य को पूरा करते समय एमडीडब्‍ल्‍यूएस को यह सुनिश्चित करना है कि उनसे जुड़ी सेवाओं एवं उत्पादों की पूरी श्रृंखला भी समान संख्‍या में सृजित हो जाए और इसके साथ ही इन सभी उत्‍पादों को उपलब्ध कराने के लिए नए उद्यमियों को भी तैयार या विकसित करने की जरूरत है।


दरअसल, वित्‍त वर्ष 2018-19 के एसबीएम बजट आवंटन में 7.3 प्रतिशत की कटौती को मौजूदा अनौपचारिक स्वच्छता अर्थव्यवस्था को और आगे बढ़ाने एवं इसे मुख्यधारा में लाने के अवसर के रूप में देखा जाना चाहिए।


 ग्रामीण भारत के लिए सरकार द्वारा लगाए गए संकुचित अनुमानों के मुताबिक, वर्तमान स्वच्छता अर्थव्यवस्था में कुशल और अकुशल दोनों ही क्षेत्रों में 2.5 मिलियन नौकरियां सृजित करने की क्षमता है।

अकेले महाराष्ट्र में अनुमानित 7,395 शौचालयों के साथ 493 सह-शिक्षा आश्रम शाला (जनजातीय विद्यालय) छात्रावास बनाए गए हैं, जिनका रखरखाव राज्य सरकार द्वारा किया जाता है। डिटर्जेंट, सैनिटरी नैपकिन, झाड़ू और शौचालयों की देखभाल करने वालों के वेतन पर आने वाले खर्च के अलावा अकेले फर्श की सफाई में इस्‍तेमाल होने वाले फिनाइल पर वार्षिक खर्च 5.4 मिलियन रुपये का होता है। एक संकुचित अनुमान यह लगाया गया है कि इन सभी पर सालाना 34.8 मिलियन रुपये खर्च होते हैं जिसे मानकीकृत किया जा सकता है और जिसे महिलाओं के स्वयं सहायता समूहों (एसएचजी) या यहां तक कि उन स्थानीय उद्यमियों या एसएमई के लिए भी खोला जा सकता है जो मजबूत झाड़ू, डिटर्जेंट और फिनाइल बनाते हैं।

यह कर्नाटक के बाजागोली गांव जैसी परियोजनाओं के लिए दरवाजे खोल देगा, जो मणिपाल संस्थान के परिसर को बायोगैस ऊर्जा मुहैया कराता है या यह उस कनिष्ठ अभियंता के लिए दरवाजे खोल देगा जिन्‍होंने अरुणाचल प्रदेश के युपिया जिले के असमतल पहाड़ी इलाकों में बांस के शौचालय का निर्माण किया और जिसका निर्माण अब इस क्षेत्र में हर जगह किया जा रहा है। इन तरह की शानदार सफलता से जुड़ी गाथाओं में विस्तार, औपचारिक स्‍वरूप प्रदान करने और इनकी प्रतिकृति तैयार करने की अपार संभावनाएं हैं।

सिंगला और बाजागोली की ही भांति इन क्षेत्रों (सेक्‍टर) में कई महिला स्वयं सहायता समूह (एसएचजी), गैर-लाभकारी निकाय, गांव समूह और छोटे एवं बड़े उद्यमी कार्यरत हैं। लेकिन यहां वास्‍तविक समस्या सुलभ या सुगम्‍य, किफायती और बढि़या स्वच्छता उत्पादों एवं सेवाओं की उपलब्‍धता की भारी कमी को लेकर है। यदि ये उपलब्‍ध भी हैं तो भी इस बारे में लोगों को समुचित जानकारी नहीं है अथवा कुछ गिने-चुने बड़े ब्रांडों के एकाधिकार के कारण ये किफायती उत्‍पाद एवं सेवाएं बाजार में अपनी पैठ नहीं बना पाती हैं। इस अनौपचारिक प्रणाली में छोटे उद्यमियों या एसएचजी को समान अवसर नहीं मिल पाते हैं। अत: इस अर्थव्यवस्था के विकास के लिए एक मानक बाजार स्थापित करना और स्वच्छता कामगारों के एक प्रशिक्षित वर्ग को एक साथ रखना अत्‍यंत जरूरी है।

एक केंद्रीकृत सरकारी बाजार वित्‍त वर्ष 2017-18 के बजट में वित्त मंत्री अरुण जेटली द्वारा घोषित ‘गोबर-धन’ योजना को शामिल कर सकता है, जिसके तहत भारत के सभी गांवों एवं शहरों में ठोस अपशिष्ट तथा गोबर का समुचित प्रबंधन करना और इसे रूपांतरित करके खाद (कम्पोस्‍ट), उर्वरक एवं जैव-सीएनजी का उत्पादन करना आवश्यक है। इस योजना में उल्लिखित ठोस अपशिष्ट एवं गोबर प्रबंधन के अलावा मल कीचड़ प्रबंधन (एफएसएम), साफ-सफाई, तरल अपशिष्ट और स्वच्छता के लिए ई-प्रौद्योगिकी में नवाचार दरअसल स्वच्छता प्रबंधन के अन्य पहलू हैं जिनका दोहन इस तरह के बाजार के लिए किया जा सकता है।

एक मानकीकृत बाजार को संजो कर रखना कोई आसान काम नहीं है। इसके तहत नियामक ढांचों को सृजित करना, ई-मार्केट स्थापित करना, उद्यमियों की पहचान करना एवं उन्हें पंजीकृत तथा सूचीबद्ध करना, प्रौद्योगिकी एवं उत्पादों की मानकीकरण प्रक्रियाओं को आपस में जोड़कर रखना, इत्‍यादि आवश्‍यक है। यह प्‍लेटफॉर्म शुरू करने के लिए वित्त मंत्रालय और औद्योगिक नीति और संवर्धन विभाग (डीआईपीपी) सहित कई विभागों को एमडीडब्ल्यूएस के साथ मिलकर काम करना होगा।


सरकार का ‘एसबीएम’ वर्ष 2019 तक भारत को स्‍वच्‍छ बनाने के अपने लक्ष्य की प्राप्ति के लिए तत्‍पर है। कुल मिलाकर यह चुनौती बहुत बड़ी एवं कठिन है। यदि इस तरह के अभिनव कदम तत्काल नहीं उठाए गए, तो भारत यह बढि़या अवसर गंवा बैठेगा।


स्वच्छता का गहरा वास्‍ता वास्‍तव में लोगों, उनकी आदतों और आचार-व्यवहार से है। यह स्वास्थ्य की देखभाल के साथ भी काफी गहराई से जुड़ी हुई है। वर्ष 2014 में संयुक्त राष्ट्र के विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने इस ओर ध्यान दिलाया था कि कैसे जल एवं स्वच्छता में निवेश किए जाने वाले प्रत्येक डॉलर पर दुनिया भर में लोगों और समाज की स्वास्थ्य देखभाल लागत में उल्‍लेखनीय कमी के रूप में बतौर रिटर्न 4.3 डॉलर मिलते हैं।

‘एसबीएम’ के तहत इन सभी फायदों पर समग्रता के साथ गौर करना होगा। हालांकि, जब भी ये सारे फायदे मिलने लगेंगे तब भारत तेजी से बढ़ती रोजगार क्षमता एवं उद्यमिता की व्‍यापक संभावनाओं के साथ-साथ देश में 3,962 अरब रुपये की असंगठित स्वच्छता अर्थव्यवस्था के एक हिस्‍से से भी समुचित लाभ उठाने लगेगा।


लेखिका ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन में एक वरिष्ठ फेलो हैं। उन्होंने स्वच्छता उद्यमि‍ता मॉडल पर एमडीडब्‍ल्‍यूएस की मसौदा रूपरेखा के बारे में नीतिगत जानकारियां एवं डेटा देने के लिए टाटा ट्रस्ट के साथ साझेदारी की। 

ये लेखक के निजी विचार हैं।

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