• Jun 05 2018

बेहतर स्वास्थ्य सुविधाओं के रास्ते में चुनौतियां

भारत में अपर्याप्त स्वास्थ्य सुविधाओं का एक बड़ा कारण ये है कि यहां स्वास्थ्य सुविधाओं पर सरकारी खर्च सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का दो फीसदी से भी कम है यानि करीब 1.4 फीसदी।

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स्त्रोत: पीटीआई

प्राइवेट अस्पतालों में दवाओं, उपभोक्ता सामग्रियों और उपकरणों की बिक्री में मुनाफे की उच्चतम सीमा तय करने के दिल्ली सरकार के प्रस्ताव को एक अच्छा कदम माना जा रहा है खासकर ऐसे हालात में जब हाल ही में एक ऐसा दिल दहलाने वाला वाकिया सामने आया है जिसमें एक प्राइवेट अस्पताल ने डेंगू से पीड़ित बच्ची की मौत के बाद उसके माता-पिता को चिकित्सा खर्च के नाम पर 16 लाख रूपये का बिल थमा दिया। ये घटना लोगों के दिलो-दिमाग में अभी भी ताजा है। प्राइवेट अस्पताल कई प्रकार की अनियमितताओं के लिए कुख्यात हैं जैसे सीरिंज, दस्तानों और दवाओं की ज्यादा कीमत वसूलना और मरीजों को ज्यादा कीमत पर अस्पताल की दुकानों से दवाएं खरीदने के लिए मजबूर करना। मरीज और उसके परिवार वालों को उस समय ये समझ नहीं आता कि वो आखिर करें तो क्या करें जब उन्हें अस्पताल भारी भरकम बिल थमा देता है।

अन्य राज्य भी दिल्ली के कदम का अनुकरण कर सकते हैं लेकिन प्राइवेट अस्पतालों के मुनाफा कमाने की उच्चतम सीमा तय करने से भारत में सस्ती स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी की समस्या का समाधान नहीं हो सकता है।

जब तक सरकारी अस्पतालों की सुविधायें बढ़ाई नहीं जायेंगी और उनमें सुधार नहीं किया जायेगा तब तक प्राइवेट अस्पताल लोगों से वास्तविक इलाज खर्च की तुलना में ज्यादा पैसे वसूलना जारी रखेंगे क्योंकि लोग इन अस्पतालों की शरण में जाने को मजबूर हैं। इसी के परिणामस्वरूप भारत ऐसा देश बन गया है जहां मरीजों का ‘जेब से ज्यादा खर्च’ का अनुपात 62 फीसदी है और भारत इस मामले में विश्व के सर्वाधिक प्रभावित देशों में से एक है। इस वजह से स्वास्थ्य सुविधाओं के बोझ के कारण हर वर्ष सात करोड़ लोग हर साल गरीबी के दलदल में धंस जाते हैं। प्राइवेट अस्पतालों के मुनाफे की निगरानी भी आसान नहीं है खासकर ऐसी हालत में जब नियामक प्राधिकारों की छान बीन से बचने के कई रास्ते मौजूद हैं।

हमें मालूम है कि बड़े शहरों के कई सरकारी अस्पतालों में उत्कृष्ट डॉक्टर और सर्जन मौजूद हैं लेकिन उनसे संपर्क करने में हम सक्षम नहीं हैं। आखिर क्यों? ऐसा इसलिए क्योंकि दूर दराज के गांवों और शहरों में बमुश्किल अच्छी स्वास्थ्य सुविधाएं मौजूद हैं। अगर प्राथमिक और जिला स्तर की स्वास्थ्य सुविधाएं अच्छी होतीं और वहां डॉक्टर और दवाएं उपलब्ध होतीं तो कई मरीजों को जांच और इलाज के लिए बड़े शहरों में आने की जरूरत नहीं होती। अगर मरीजों को घर के नजदीक इलाज मिल पाता तो सरकारी स्वास्थ्य सुविधाओं का खर्च भी कम हो जाता क्योंकि समय पर इलाज होने से स्थिति नहीं बिगड़ती और दूसरी जगह इलाज के लिए जाने की जरूरत कम हो जाती है।

भारत में अपर्याप्त स्वास्थ्य सुविधाओं का एक बड़ा कारण ये है कि यहां स्वास्थ्य सुविधाओं पर सरकारी खर्च सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का दो फीसदी से भी कम है यानि करीब 1.4 फीसदी। स्वास्थ्य सुविधाएं राज्यों के चुनावों के दौरान बड़ा चुनावी मुद्दा होती हैं क्योंकि स्वास्थ्य राज्य का विषय है लेकिन चुनाव के बाद ज्यादा कुछ नहीं किया जाता।

युनिवर्सल हेल्थ कवरेज (UHC) जिसमें देश के सभी नागरिकों को मुफ्त स्वास्थ्य सुविधाएं मुहैया कराना शामिल है, की बात काफी दिनों से की जाती रही है। ये सुविधा ब्रिटेन, यूरोपीय संघ, कनाडा और कई देशों में उपलब्ध है। यूपीए सरकार के कार्यकाल के दौरान डॉ. श्रीनाथ रेड्डी की अध्यक्षता वाले उच्च स्तरीय विशेषज्ञ दल ने यूएचसी संबंधी अपनी रिपोर्ट में विस्तृत कार्ययोजना पेश की थी। रेड्डी रिपोर्ट में स्पष्ट तौर पर ये बात रेखांकित की गयी थी कि स्वास्थ्य पर सरकारी खर्च को बढ़ाकर जीडीपी का 2.5 फीसदी करने की जरूरत है। इस रिपोर्ट में बचाव उपायों और प्राथमिक स्वास्थ्य सुविधाओं पर जोर दिया गया था जिसे आम तौर पर नजरअंदाज कर दिया जाता है या नकार दिया जाता है और यहां तक कि स्वास्थ्य बीमा का पारंपरिक सिस्टम भी इसपर ध्यान नहीं देता। रिपोर्ट के मुताबिक सरकार को यूएचसी का गारंटर होना चाहिए क्योंकि ये स्वास्थ्य के अधिकार से जुड़ा मसला है।

यूएचसी धन के लिए आम राजस्व पर ज्यादा निर्भर करता बनिस्पत अनियमित अंशदायी स्वास्थ्य बीमा के, जिसमें ज्यादातर मामलों में कवरेज पूरी नहीं होती और सेवाएं भी सीमीत होती हैं। यूएचसी के विचार को हांलाकि मोदी सरकार ने त्याग दिया था और इसके बदले ये सरकार अंशुमान भारत राष्ट्रीय स्वास्थ्य संरक्षण मिशन (एबी-एनएचपीएम) लेकर आई है जिसका प्रस्ताव 2018 के आम बजट में किया गया था। यह एक भव्य योजना है जिसके तहत स्वास्थ्य बीमा के प्रीमियम के भुगतान के एवज में 50 करोड़ लोगों को इलाज के लिए पांच लाख रूपये तक के भुगतान की गारंटी दी गयी है। ये योजना भारत में स्वास्थ्य सुविधाओं के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण पड़ाव है लेकिन अस्पतालों में पर्याप्त बेड, डॉक्टर और नर्स की उपलब्धता के बगैर इतने बड़े पैमाने पर किसी स्वास्थ्य योजना का साकार हो पाना दूर की कौड़ी नजर आता है।

दस करोड़ परिवारों को स्वास्थ्य सुविधा मुहैया कराने वाली योजना एनएचपीएम को सही तरीके से लागू करा पाने में कई प्रकार की दिक्कतें आ सकती हैं। इस योजना से देश की 40 फीसदी आबादी को लाभ होगा और इस आबादी में वर्ष 2011 की सामाजिक आर्थिक जाति जनगणना के मुताबिक समाज के सबसे निचले और गरीब तबके शामिल हैं। इस योजना में आरएसबीवाई और वरिष्ठ नागरिक स्वास्थ्य बीमा योजना जैसी मौजूदा योजनाओं को भी समाहित कर दिया गया है। इस योजना के लाभार्थियों को देश भर के किसी भी सरकारी और पंजीकृत (empanelled) सरकारी अस्पताल में कैशलेस इलाज की सुविधा हासिल होगी।

बीमा प्रीमियम की अदायगी में आने वाले खर्च को केन्द्र सरकार और संबंधित राज्य सरकारें मिल कर वहन करेंगी। इस योजना के तहत अगले दो वर्षों के दौरान होने वाले व्यय में केन्द्र सरकार का हिस्सा 10,498 करोड़ रूपये और राज्यों का हिस्सा 6,219 करोड़ रूपये होगा। विभिन्न राज्यों के लिए व्यय का ढांचा अलग अलग होगा और इस वजह से हर राज्य में प्रति परिवार भुगतान की जाने वाली प्रीमियम की राशि भी अलग अलग होगी।

भारतीय वाणिज्य एवं उद्योग महासंघ (फिक्की) के एक अध्ययन के मुताबिक इस योजना की कामयाबी तभी संभव है जब भारत के सरकारी स्वास्थ्य खर्च को बढ़ाकर जीडीपी के 3.7 फीसदी से लेकर 4.5 फीसदी तक पहुंचा दिया जाये। विश्व स्तर पर इसका औसत 5.9 फीसदी है। अस्पतालों में बिस्तरों की संख्या बढ़ानी होगी जो इस समय प्रति 1,000 व्यक्ति 0.9 बिस्तर है। इसके अलावा प्राथमिक स्वास्थ्य सुविधा मुहैया कराने के लिए नौ लाख अतिरिक्त डॉक्टरों की जरूरत होगी और दूसरे और तीसरे स्तर की स्वास्थ्य सुविधाएं मुहैया कराने के लिए 1.2 लाख विशेषज्ञ डॉक्टरों की जरूरत होगी। वर्ष 2017 में देश में सिर्फ 10,22,859 डॉक्टर थे जो प्रति 1,000 व्यक्ति के लिए औसतन एक फीसदी से भी कम है यानि करीब 0.59 फीसदी, जबकि विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने प्रति 1,000 की आबादी पर एक डॉक्टर की न्यूनतम सीमा तय की है।

ये भी अभी देखा जाना है कि बीमा कंपनियां कितनी कुशलता के साथ प्रीमियम संग्रह का काम कर पाती हैं और फर्जी दावों से निपटने में किस तरह कामयाब होती हैं। स्वास्थ्य मंत्री ने ये भी प्रस्ताव किया है कि अगर योजना के अंतर्गत चिकित्सा दावों का अनुपात 85 फीसदी से कम हुआ तो बीमा कंपनियों को अतिरिक्त प्रीमियम अनिवार्य रूप से वापस करना होगा ताकि ये सुनिश्चित हो सके कि बीमा कंपनियां अनुचित लाभ नहीं अर्जित कर सकें।

कुल मिला जुलाकर देखें तो बीमा कंपनियों द्वारा चिकित्सा दावों का सफल प्रबंधन और अस्पतालों को सही समय पर दावों का भुगतान भविष्य की एक बड़ी चुनौती है। सभी अस्पतालों में इलाज संबंधी विवरणों को दस्तावेजों में संभाल कर रखने की व्यवस्था करना भी एक बड़ी जिम्मेदारी होगी। बीमा कंपनियों को चिकित्सा दावों के प्रबंधन के लिए विशिष्ट योग्यता वाले अनुभवी कर्मियों की भी बड़े पैमाने पर जरूरत होगी। इस मामले में गड़बड़ियों को रोकने में लाभार्थियों की बायोमैट्रिक पहचान कारगर सिद्ध हो सकती है।

जब योजना लागू होगी उस समय में कई और समस्याएं भी सामने आयेंगी लेकिन सरकार को इसे कामयाब बनाना है क्योंकि इसने करीब आधी आबादी को सस्ती स्वास्थ्य सुविधाएं मुहैया कराने का वादा किया है और ये वादा सरकार को किसी भी हालत में पूरा करना है।

ये लेखक के निजी विचार हैं।

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