Author : Gurjit Singh

Published on Jan 29, 2022 Updated 0 Hours ago

कंबोडिया द्वारा आसियान की अध्यक्षता करने से सदस्य देशों में चिंता है, ख़ास कर कई चुनौतियों के संदर्भ में.

ASEAN: कंबोडिया को तीसरी बार मिला आसियान की अध्यक्षता का मौका

कंबोडिया ने 2022 के लिए आसियान (ASEAN) की अध्यक्षता की.  साल 2021 हलचल भरा साल रहा क्योंकि आसियान को इस दौरान कई मोर्चों पर चुनौती का सामना करना पड़ा. कोरोना वायरस महामारी और इसके परिणामस्वरूप आर्थिक मंदी के दौर से इतर, आसियान को म्यांमार में लोकतंत्र को उखाड़ फेंकने जैसे हालात का सामना करना पड़ा तो दक्षिण चीन सागर (एससीएस) में चीन के कोड ऑफ़ कन्डक्ट या फिर आचार संहिता (सीओसी) को लेकर अड़ियल रूख़ अपनाने की चुनौतियों से लेकर क्वाड और ऑकस के बढ़ते प्रभाव के चलते इसकी केंद्रीयता के लिए पैदा हुई चुनौतियों का सामना करना पड़ा.

2021 में अध्यक्ष के रूप में ब्रुनेई के लिए कठिन समय था और अब कंबोडिया को यह विरासत में मिला है.  30 अप्रैल 1999 को आसियान में शामिल होने के बाद से कंबोडिया तीसरी बार आसियान की अध्यक्षता कर रहा है.  

2021 में अध्यक्ष के रूप में ब्रुनेई के लिए कठिन समय था और अब कंबोडिया को यह विरासत में मिला है.  30 अप्रैल 1999 को आसियान में शामिल होने के बाद से कंबोडिया तीसरी बार आसियान की अध्यक्षता कर रहा है.  यह आसियान में शामिल होने वाले 10 आसियान देशों में आख़िरी था और हर दशक में संगठन की अध्यक्षता करने में इसने अपनी नियमित बारी का पालन किया है, 2002 और 2012 में संगठन की अध्यक्षता की. केवल दो देश हैं – कंबोडिया और ब्रुनेई – जिनके नेताओं ने आसियान में वर्षों तक अपना कार्यकाल जारी रखा, उनमें एक प्रधानमंत्री हुन सेन थे और दूसरे ब्रुनेई के सुल्तान थे.

सामान्य तौर पर आसियान की अध्यक्षता अपेक्षाओं या विवादों से कभी भी भरी नहीं होती है लेकिन ऊपर बताए गई पांच चुनौतियां और 2012 में कंबोडिया के अध्यक्ष के रूप में जो प्रदर्शन रहा है, उसे लेकर आसियान के कुछ सदस्य देशों में इस बात की चिंता है कि आने वाले साल में चीजें कैसे आगे बढ़ेंगी.

कंबोडिया की अध्यक्षता चीन के साथ करीबी की वजह से एक समस्या बन गई. आसियान सदस्य देशों को म्यांमार के मुद्दे पर आशंकाएं पैदा होने लगीं जो आसियान की मौजूदा चुनौतियों का ही हिस्सा है. 

आसियान चार्टर का अनुच्छेद 31अध्यक्ष को आसियान और संबंधित शिखर सम्मेलनों, आसियान समन्वय परिषद, आसियान समुदाय परिषदों और संबंधित क्षेत्रीय मंत्रिस्तरीय निकायों की अध्यक्षता करने का अधिकार देता है. अध्यक्षता करने वाला देश पूर्वी एशिया शिखर सम्मेलन की भी अध्यक्षता करता है,  एशिया के सबसे प्रतिष्ठित माने जाने वाले कार्यक्रम में अपने संवाद भागीदारों (डीपी) को भी शामिल करता है. आसियान क्षेत्रीय मंच, एडीएमएम+ और आसियान मैरीटाइम फोरम के ऊपर अध्यक्ष के नेतृत्व को देखने की ज़िम्मेदारी होती है.

साउथ चाइना सी पर दबाव

21वीं सदी में साउथ चाइना सी(एससीएस) पर चीनी आक्रामकता के चलते दबाव बढ़ा है और उन्होंने “नाइन-डैश लाइन” की अवधारणा पर जोर देने और आसियान देशों से संबंधित द्वीप इलाकों पर नियंत्रण कर लिया है. कंबोडियाई अध्यक्षता के दौरान 2012 में दरअसल सबसे पहले समस्या सामने आई. ज़्यादातर आसियान के सदस्य देश इस बात की आलोचना करना चाहते थे जो चीन ने किया है लेकिन कंबोडिया दृढ़ रहा  और आसियान के भीतर ही वह चीन के सबसे करीबी सहयोगी के रूप में ख़ुद की प्रतिबद्धता दोहराता रहा. इसके कारण, कंबोडिया 2012 में बतौर अध्यक्ष आसियान के इतिहास में पहली बार विदेश मंत्रियों की संयुक्त विज्ञप्ति तैयार नहीं कर सका.

शिखर सम्‍मेलन तो आयोजित हो गया लेकिन साझा विज्ञप्ति जारी करने के लिए एक सफल कूटनीति चलाने की ज़िम्‍मेदारी तत्‍कालीन इंडोनेशियाई विदेश मंत्री मार्टी नतालेगावा पर छोड़ दी गई, जिसे शिखर सम्मेलन के बाद  आख़िरकार स्वीकार किया गया लेकिन निश्चित तौर पर आसियान ऐसे विवादों से दूर रहना चाहता है जो इसकी अंदरूनी कलह को दिखाता है.

इस प्रकार, कंबोडिया की अध्यक्षता चीन के साथ करीबी की वजह से एक समस्या बन गई. आसियान सदस्य देशों को म्यांमार के मुद्दे पर आशंकाएं पैदा होने लगीं जो आसियान की मौजूदा चुनौतियों का ही हिस्सा है. जब फरवरी 2021 में म्यांमार में सैन्य तख़्तापलट हुआ था, तब आसियान शायद इसके साथ रह सकता था.  हालांकि प्रदर्शनकारियों की हत्या ने पूरी दुनिया का ध्यान इस घटना की ओर खींचा था. वैसे तो किसी मुल्क के आंतरिक मामलों में गैर-हस्तक्षेप का सिद्धांत चलन में है लेकिन उनके नागरिकों की हत्या कुछ ऐसा मामला था जिससे कई आसियान देश भीतर से परेशान थे.  डायलॉग पार्टनर (डीपी), ख़ास तौर पर संयुक्त राज्य अमेरिका, यूरोपीय संघ और ऑस्ट्रेलिया की ओर से तब बेहद दबाव था. इसके कारण इंडोनेशिया, मलेशिया और सिंगापुर ने पहल की और अप्रैल 2021 में जकार्ता में आसियान नेताओं की बैठक (एएलएम) बुलाई गई.

कंबोडिया में लोकतांत्रिक व्यवस्थाएं ख़ुद कमजोर हैं और यह बताता है कि कंबोडिया का लोकतांत्रिक प्रभाव म्यांमार पर कम होगा. कंबोडियाई दृष्टिकोण यह है कि म्यांमार आसियान के नियमों के तहत पिछले साल की तुलना में बेहतर स्थिति में है.

इस सम्मेलन की अध्यक्षता ब्रुनेई ने की और इसने म्यांमार के सैन्य नेता को सम्मेलन में बुलाया और पांच सूत्री सहमति (एफपीसी) को आगे बढ़ाया जिसमें म्यांमार द्वारा यह माना जाना भी शामिल था कि आसियान के विशेष दूत सभी दलों से मुलाक़ात कर सकेंगे. एफपीसी ने आसियान को एक बार फिर केंद्र में लाने का काम किया.  आसियान के सहयोगियों ने भी राहत महसूस की कि आख़िर एक सदस्य देश की समस्याओं को लेकर उन्होंने एक स्टैंड लिया.  संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ने अब आसियान से म्यांमार के मामले में नेतृत्व करने को कहा है.

हालांकि, म्यांमार ने आसियान के दूत की भूमिका को नाकाम कर दिया और जकार्ता में हुई बैठक के दौरान किए गए प्रतिबद्धताओं से साफ मुकर गया.  यही वजह रही कि आसियान संगठन ने नवंबर 2021 में आसियान शिखर सम्मेलन में म्यांमार की हिस्सेदारी को रोक दिया और म्यांमार से एक गैर-राजनीतिक मुल्क के रूप में भागीदारी करने को कहा जिसे म्यांमार ने स्वीकार नहीं किया.

इस हालात में अब कंबोडिया ने आसियान की अध्यक्षता संभाली है.  म्यांमार पर एक पुनर्विचार शुरू किया गया था. प्रधानमंत्री हुन सेन ने म्यांमार का दौरा किया (6-8 जनवरी 2022).  आसियान अध्यक्ष के लिए नए विशेष दूत, प्राक सोखोन, जो कंबो़डिया के उप-प्रधान मंत्री और विदेश मंत्री हैं, उनके नाम की घोषणा की गई.  उन्हें कंबोडियाई शांति प्रक्रिया को लेकर एक अनुभवी शख़्स चाम प्रसिद्ध उनकी मदद करेंगे जो उद्योग मंत्री भी हैं. यह आसियान अध्यक्ष का निर्णय है, हालांकि यह देखना अभी बाकी है कि यह अप्रैल 2021 के एएलएम के निर्णय के साथ कैसे सम्मिलित हो पाता है. हालांकि आसियान इस पर टालमटोल करता दिख रहा है क्योंकि आसियान के कुछ वार्ताकार इस बात को लेकर चिंतित हैं कि म्यांमार के सैन्य जनरलों को सीधे तौर पर शामिल करके, हुन सेन आसियान अध्यक्ष के रूप में एएलएम के कार्यक्षेत्र से आगे निकल चुके हैं.

कंबोडिया यह समझ रहा है कि उसे एक कामयाबी की तलाश है और वह एफपीसी की शर्तों को आगे बढ़ाने के लिए म्यांमार के सैन्य नेतृत्व को शामिल करने में अब तक सफल रहा है.  कंबोडिया में लोकतांत्रिक व्यवस्थाएं ख़ुद कमजोर हैं और यह बताता है कि कंबोडिया का लोकतांत्रिक प्रभाव म्यांमार पर कम होगा. कंबोडियाई दृष्टिकोण यह है कि म्यांमार आसियान के नियमों के तहत पिछले साल की तुलना में बेहतर स्थिति में है. कंबोडिया की 19 जनवरी को होने वाली आसियान की पहली मंत्रिस्तरीय बैठक को कई समयबद्ध शेड्यूलिंग मुद्दों के रूप में स्थगित कर दिया गया था. आसियान देश जो एफपीसी का समर्थन कर रहे हैं वो फिर से निशाना साध रहे हैं, उन्होंने बिना परामर्श के म्यांमार के जुंटा के विदेश मंत्री वुन्ना मौंग लिव्न  को आमंत्रित किया. दूसरा प्रमुख मुद्दा जिससे कंबोडिया को निपटना चाहिए और जो अन्य आसियान देशों को चिंतित करता है, वह चीन के साथ सीओसी का मामला है. आसियान की अध्यक्षता के लिए अपनी प्राथमिकताओं में कंबोडिया ने इसे शामिल किया. इसमें आचार संहिता (2002) पर घोषणा की 20 वीं वर्षगांठ का उल्लेख है. यह आसियान को याद दिलाता है कि चीन द्वारा विभिन्न प्रकार की संवाद शैलियों के जरिए इसे कितने समय के लिए दूर रखा गया.

सीओसी की संभावना दूर की कौड़ी

2021 तक उम्मीद थी कि जब से प्रस्तावना पर सहमति बनी है, वो शायद इसे लेकर आगे बढ़ सकते हैं. आसियान अध्यक्ष के रूप में कंबोडिया (इस मुद्दे पर प्रारंभिक ट्रिपवायर) के साथ, 2022 में आसियान की आम सहमति के साथ सीओसी की संभावना दूर की कौड़ी लगती है. हालांकि एक अनसुलझा मुद्दा यूएनसीएलओएस के लिए आसियान की पसंद है, जिसे लेकर हस्ताक्षर करने के बाद भी चीन इसे एससीएस में लागू नहीं करना चाहता है. इसके अलावा, एससीएस और उसके संसाधनों पर मुख्य रूप से चीन और आसियान के सदस्य देशों की ज़िम्मेदारी होने को, अन्य भागीदारों को आगे बढ़ने से रोकने के तौर पर देखा जाता है.

कुछ विश्लेषकों का मानना ​​​​है कि चीन ने बहुत लंबे समय तक इसे उलझा कर रखा है और कई आसियान देशों को उनकी संप्रभुता, द्वीपों, क्षेत्रीय जल और मछली पकड़ने के संसाधनों  पर कब्ज़ा कर उन्हें नाराज़ किया है. ऐसे में सवाल उठता है कि क्या यह कुछ आसियान देशों द्वारा गैर-चीनी भागीदारों की ओर एक रणनीतिक बदलाव का कारण बन सकता है? हिंद-प्रशांत पर आसियान का दृष्टिकोण(एओआईपी 2019) इस दिशा में एक कदम था क्योंकि एक अवधारणा के रूप में हिंद-प्रशांत चीन के लिए अभिशाप है.  फिर भी आसियान एओआईपी पर सहमत हो गया जिसे आसियान सीओसी के प्रतिकार के रूप में  इस्तेमाल करता है. क्या कंबोडिया चीन से अपनी नज़दीकी का इस्तेमाल स्वीकार्य सीओसी हासिल करने के लिए कर सकता है ? या उसका व्यवहार आसियान को अलग कर देगा ताकि सदस्य देश अधिक स्वतंत्र रणनीतिक रुख़ अपना सकें ?

तीसरा मुद्दा आसियान की केंद्रीयता बनाए रखना है. ऐसी संभावना बहुत कम है कि  क्वॉड या ऑकस कंबोडियाई समस्या के लिए कोई पहल करेगा. कंबोडिया का चीन के प्रति समर्थन वाला रुख़ इसे वार्ताकार की भूमिका में सही नहीं ठहराता है. क्वाड  शिखर सम्मेलन का निर्णय आसियान के साथ बेहतर जुड़ाव की उम्मीद के साथ है.

भारत जो क्वाड का सदस्य है और जिसका चीन के साथ अंतर्विरोध है, उस भारत के साथ कंबोडिया की लंबे समय से मित्रता रही है. हालांकि जिस तरह से दोनों देशों के बीच रिश्ते होने चाहिए थे वैसा दोनों देशों में संबंध नहीं हो पाया है, ख़ास कर आर्थिक क्षेत्र में तो यह और भी उदासीन है. 

क्षेत्रीय भागीदारी को कंबोडिया और कितने समय तक जारी रख सकता है यह बात इस पर निर्भर करेगी कि इस पूरी प्रक्रिया में वह रुकावट है या सुविधा देने वाला है. इसी के आधार पर यह पता लगाया जा सकता है कि क्या वो आसियान की केंद्रीयता बनाए रख सकते हैं, जिसके लिए चीन और क्वॉड के बीच एक मध्यस्थ की ज़रूरत होती है. कंबोडिया ऑकस के साथ सीधा सामना करेगा क्योंकि अब ब्रिटेन भी इसका डायलॉग पार्टनर है और वह कंबोडियाई अध्यक्षता के दौरान अपना पहला आसियान+1 शिखर सम्मेलन आयोजित करने जा रहा है. ऑस्ट्रेलिया और अमेरिका में भी भविष्य में इसी तरह के शिखर सम्मेलन होने वाले हैं.

भारत जो क्वाड का सदस्य है और जिसका चीन के साथ अंतर्विरोध है, उस भारत के साथ कंबोडिया की लंबे समय से मित्रता रही है. हालांकि जिस तरह से दोनों देशों के बीच रिश्ते होने चाहिए थे वैसा दोनों देशों में संबंध नहीं हो पाया है, ख़ास कर आर्थिक क्षेत्र में तो यह और भी उदासीन है. अगले तीन वर्षों के लिए भारत के लिए समन्वयक की भूमिका में सिंगापुर है, जो हर साल बदलने वाले भारत और आसियान के अध्यक्ष के बीच एक मध्यस्थ के रूप में है.

हालांकि 2022 भारत आसियान डायलॉग साझेदारी की 30 वीं वर्षगांठ है और इसे भारत-आसियान दोस्ती का वर्ष घोषित किया गया है. आम तौर पर इस तरह के मौके पर सम्मेलन से इतर अन्य गतिविधियों का आयोजन होता है. हालांकि इसका समन्वय सिंगापुर के साथ होगा, लेकिन भारत-आसियान शिखर सम्मेलन की सह-अध्यक्षता कंबोडिया के साथ होगी  और यहीं भारत और कंबोडिया के लिए एक साथ और अधिक हासिल करने का महत्व  छिपा हुआ है.

आसियान की अध्यक्षता तीसरी बार हुन सेन के पास है. यह मौका उनके लिए अपनी विरासत के निर्माण करने का है. निश्चित तौर पर वो भी 2012 की तरह नाकामी इस बार पसंद नहीं करेंगे, जब कंबोडिया आसियान साझा विज्ञप्ति का भी प्रबंधन नहीं कर पाया था. आसियान के एक वरिष्ठ नेता के रूप में हुन सेन आसियान की प्रगति पर एक स्पष्ट और विशिष्ट छाप छोड़ने की स्थिति में हैं.  बजाए इसके कि यह चीन के लिए किसी फांस की तरह है, म्यांमार को लेकर उनकी यह पहल शायद इस रूप में देखा जाना चाहिए . इसी प्रकार, वो शायद आसियान को चीन-क्वाड प्रतिद्वंद्विता से दूर रखने और आसियान को रणनीतिक स्वायत्तता देने के लिए अधिक कुशलता के साथ काम कर पाएंगे जिसकी इच्छा उन्हें है. वो सामुदायिक निर्माण, कोरोना महामारी से निपटने और आर्थिक प्रबंधन के संबंध में आसियान के फैसलों के असरदार प्रबंधन से एक विरासत का निर्माण कर सकते हैं. यह कंबोडिया के लिए नकारात्मक धारणाओं को नज़रअंदाज़ करने और आसियान के लिए ज़िम्मेदारी के साथ अपनी केंद्रीयता को मज़बूत करने का वक़्त है.  इस वर्ष का थीम “एक साथ चुनौतियों का समाधान” मौजूदा समय में मार्गदर्शन करने के लिए बेहतर विषय है.

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