• Apr 06 2017

उम्मीदें जगाता व बढ़ाता नया स्वास्थ्य सर्वेक्षण

भारत में सरकारें स्वास्थ्य पर सकल घरेलू उत्पादन (जीडीपी) का महज 1.4 फीसदी ही खर्च करती हैं। यूके में यह 8 प्रतिशत है और चीन में 3।

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स्रोत: डी एफ आई डी/CC BY-SA 2.0

एक मार्च 2017 को केंद्रीय स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय ने चौथा राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (एनएफएचएस-4, 2015-16) जारी किया है। इसके तहत 601,500 घरों में 699,686 महिलाओं और 103,525 पुरुषों का सर्वेक्षण किया गया। यह परिवार स्वास्थ्य के कुछ अहम पैमानों पर बेहतर तस्वीर पेश करता दिखता है। साथ ही पिछले दस साल के दौरान घरों में उपलब्ध सुविधाओं के लिहाज से भी काफी तरक्की हुई है। पिछला सर्वेक्षण जहां 2005-06 में हुआ था, ताजा सर्वेक्षण 2015-16 में हुआ है।

उदाहरण के तौर पर घरों में पानी की आपूर्ति और स्वच्छता संबंधी सुविधाएं पिछले दस साल के दौरान बेहतर हुई हैं। दस साल पहले जहां 29.1 प्रतिशत घरों में स्वच्छता सुविधा उपलब्ध थी, अब यह बढ़ कर 48.4 प्रतिशत पर पहुंच गई है। लेकिन सवाल है कि इसके बावजूद डायरिया (उल्टी-दस्त) की समस्या क्यों बढ़ी है? अच्छी बात है कि अब डायरिया के इलाज के लिए 50.6 प्रतिशत मामलों में ओआरएस के घोल का उपयोग किया जा रहा है, जबकि दस साल पहले सिर्फ 26 फीसदी मामलों में ही यह हो रहा था।

हम सभी जानते हैं कि देश में लोक स्वास्थ्य सुविधाएं कितनी अहम हैं, खास कर जब सार्वजनिक स्वास्थ्य सुविधाओं और डॉक्टरों की हमारे देश में इतनी कमी है। भारत में सरकारें स्वास्थ्य पर सकल घरेलू उत्पादन (जीडीपी) का महज 1.4 फीसदी ही खर्च करती हैं, जबकि युनाइटेड किंगडम में यह आठ प्रतिशत है और चीन में तीन प्रतिशत। स्वास्थ्य पर जीडीपी के खर्च का वैश्विक औसत 5.99 प्रतिशत है। गरीबों को अगर निजी अस्पतालों में इलाज करवाना हो तो उन्हें ज्यादा पैसे खर्च करने होते हैं। सरकारी अस्पतालों में अक्सर इतनी ज्यादा भीड़ होती है कि गरीबों को निजी अस्पतालों में इलाज करवाने के लिए कर्ज लेना होता है। निजी अस्पतालों की दर बहुत अधिक है और इस संबंध में कोई नियम-कानून नहीं है।

यह सुखद है कि एनएफएचएस 3 के मुकाबले एनएफएचएस 4 में स्वास्थ्य बीमा के लिहाज से काफी प्रगति हुई है।

अब किसी स्वास्थ्य योजना या बीमा के तहत आने वाले लोगों की संख्या पहले के 4.8 फीसदी से बढ़ कर 28.7 फीसदी हो गई है।

शिशु मृत्यु दर (आईएमआर) 57 से घट कर 41 पर पहुंच गई है (बजट में दिया गया आंकड़ा प्रति हजार जीवित प्रसव में 37 है)। लेकिन पांच साल तक के अत्यंत दुर्बल बच्चों का प्रतिशत 6.4 से बढ़ कर 7.5 हो गया है। हालांकि छह महीने से 59 महीने के बीच के बच्चों में एनीमिया के मामलों में कमी आई है। पिछले दस साल के दौरान पुरुषों और महिलाओं में बढ़े मोटापे के लिहाज से देखें तो ये आंकड़े विरोधाभासी दिखाई देते हैं।

बहुत सी महिलाओं की मौत इसलिए हो जाती है क्योंकि पिछड़े और ग्रामीण इलाकों में प्रसव के दौरान महिलाओं को होने वाली समस्याओं का तत्काल प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में इलाज नहीं हो पाता। इस वजह से अब तक मातृत्व मृत्यु दर बहुत अधिक है। एनएफएचएस इसका कोई संकेत नहीं देता। अब पहले के मुकाबले सांस्थानिक प्रसव का अनुपात बढ़ा है। महिलाएं अब घरों में ही प्रसव करवाने की बजाय सार्वजनिक स्वास्थ्य सुविधाओं में ज्यादा जा रही हैं। ऑपरेशन से होने वाले प्रसव (सिजेरियन सेक्शन) में भी बढ़ोतरी हुई है और महिलाएं सिजेरियन के लिए निजी अस्पतालों में जा रही हैं। अक्सर यह आरोप लगता रहा है कि निजी अस्पताल पैसों के लालच में जरूरत से ज्यादा सिजेरियन ऑपरेशन करते हैं। स्तनपान करवाने वाली महिलाओं का औसत भी पहले के मुकाबले बढ़ा है।

महिलाओं के सशक्तिकरण के लिहाज से, शिक्षा सबसे अहम पैमाना है और एनएफएचएस 4 बताता है कि महिला साक्षरता में बढ़ोतरी हुई है। पहले जहां यह 55.1 फीसदी थी, अब बढ़ कर 68.4 फीसदी हो गई है। हालांकि महिलाओं में साक्षरता का मतलब अक्सर सिर्फ दस्तखत करने की क्षमता भर मान लिया जाता है। यह देखना भी हैरानी भरा है कि महिलाएं घरों के फैसलों के लिहाज से ज्यादा सशक्त हुई हैं। पहले यह औसत 76.5 फीसदी था, अब बढ़ कर 84 फीसदी हो गया है। महिलाओं पर उनके पतियों की ओर से होने वाली हिंसा में 2015-16 के दौरान आई कमी भी एक अच्छी खबर है। अब महिलाओं का अकेले या साझा रूप से घर या जमीन पर स्वामित्व भी बढ़ा है। अब यह 38.4 प्रतिशत हो गया है। यह निश्चित तौर पर एक अच्छा लक्षण है, क्योंकि संपत्ति पर स्वामित्व से महिलाओं को बेहतर रुतबा भी मिलता है। ज्यादा महिलाओं का बैंक खाता है और उनके पास मोबाइल फोन है। ऐसी महिलाओं का औसत 15.1 से बढ़ कर 53 हो गया है जिनका अपना बचत खाता है और जो उसे खुद ही संचालित भी करती हैं।

यह देखना भी हैरानी भरा है कि महिलाएं घरों के फैसलों के लिहाज से ज्यादा सशक्त हुई हैं। पहले यह औसत 76.5 फीसदी था, अब बढ़ कर 84 फीसदी हो गया है।

दस साल के दौरान लैंगिक अनुपात भी बेहतर हुआ है, जो एक स्वागत योग्य कदम है। लेकिन समग्र रूप से अब भी महिलाओं को समानता नहीं मिल रही है और शहरी इलाकों में महिलाओं के खिलाफ हिंसा जारी है। श्रमिकों में महिलाओं की हिस्सेदारी भी कम हुई है और अब श्रमिकों में महिलाओं का अनुपात 23 प्रतिशत है। लेकिन सर्वे में ना ही इसे शामिल किया गया है और ना ही पारिश्रमिक में महिलाओं के साथ होने वाले भेद-भाव को।

राष्ट्रीय स्तर पर कुल प्रजनन दर भी कम हुई है, लेकिन हैरान करने वाली बात है कि परिवार नियोजन के उपायों को अपनाने में भी कमी आई है। पुरुष और महिला दोनों ही की नसबंदी में कमी आई है। सिर्फ गर्भनिरोधक गोलियों का उपयोग 3.1 प्रतिशत से बढ़ कर 4.1 प्रतिशत हो गया है और कंडोम का उपयोग 5.2 प्रतिशत से बढ़ कर 5.6 प्रतिशत हो गया है। ऐसा प्रतीत होता है कि लोग अपने परिवार नियोजन के तरीकों के बारे में सर्वे करने वालों को नहीं बताना चाहते। इसलिए कुल प्रजनन दर और परिवार नियोजन के साधनों के उपयोग संबंधी आंकड़ों में साम्य नहीं दिखाई दे रहा।

समग्र तौर पर देखें तो स्वास्थ्य देश का सबसे उपेक्षित क्षेत्र है। देश में अब भी पांच लाख डॉक्टरों की कमी है, क्योंकि हर साल बड़ी संख्या में डॉक्टर देश छोड़ कर बाहर चले जाते हैं। भारत में 472 मेडिकल कॉलेज हैं और लगभग दस लाख डॉक्टर हैं। इसके बावजूद हम विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्लूएचओ) के प्रत्येक हजार आबादी पर एक डॉक्टर के पैमाने को पूरा नहीं कर पा रहे हैं। ग्रामीण इलाकों में डॉक्टरों की भारी कमी है। 2017 के बजट में वादा किया गया है कि केंद्र सरकार हर वर्ष मेडिकल पीजी की पांच हजार सीटें बढ़ाएगी और साथ ही स्वास्थ्य क्षेत्र का बजट भी 28 फीसदी बढ़ा दिया गया है। दो नए एम्स स्थापित किए जाएंगे, जिनमें से एक गुजरात में और एक झारखंड में होगा।

दुनिया की कुल आबादी का 17 प्रतिशत भारत में है और स्वास्थ्य क्षेत्र की प्रतिष्ठित पत्रिका लैंसेट (11 जनवरी 2017) के मुताबिक यह बीमारियों के वैश्विक बोझ में सबसे ज्यादा बढ़ोतरी कर रहा है। पांच साल से कम उम्र के बच्चों की सबसे ज्यादा मृत्यु यहीं होती है। दुनिया भर में टीबी के एक चौथाई मरीज यहीं हैं, कम उम्र में हृदय संबंधी बीमारियों के सबसे ज्यादा मामले यहीं से आ रहे हैं और यह ‘डायबिटीज की महामारी’ की ओर बढ़ रहा है। संयुक्त राष्ट्र के सतत विकास लक्ष्यों (एसडीजी) के स्वास्थ्य संबंधी पैमानों में 184 देशों में यह 143वें पायदान पर है। ऐसा लगता है कि सबको स्वास्थ्य सुविधाएं (यूनिवर्सल हेल्थकेयर) मुहैया करवाने और लोगों के स्वास्थ्य में व्यापक सुधार लाने के लिहाज से अभी भारत को काफी कुछ करना बाकी है।

यह भी नहीं भूलना चाहिए कि सांख्यिकीय सर्वेक्षण सामान्य रुझान को समझने के लिए तो बहुत उपयोगी हैं, लेकिन जहां वे दिलचस्प तथ्य सामने लाते हैं, यह भी सही है कि वे पूरी तस्वीप पेश नहीं कर पाते।

ये लेखक के निजी विचार हैं।

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