स्वायत्तता बनाम एकीकरण: कश्मीर पर अनंत बहस

मौजूदा हालातों में कश्मीर समस्या के कुछ अनछुए पहलुओं पर एक नज़र

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Srinagar, Shikhara, Shalimar Bagh, Nishat Bagh

पिछले कुछ दिनों से कश्मीर फिर उबल रहा है तो ऐसे में राज्य पर नियंत्रण घटा कर उसे और ‘स्वायत्तता’ देने की बहस भी तेज है। स्वायत्तता की इच्छा सिर्फ घाटी में ही नहीं है, जम्मू और लद्दाख भी क्षेत्रीय स्वायत्तता तलाश रहे हैं। लेकिन सुन्नी बहुल घाटी ने पूरे राज्य को बंधक बनाया हुआ है तो यह कहना और जरूरी हो गया है कि राज्य के दूसरे क्षेत्रों को भी बंधन से मुक्त होना है। आखिर भारतीय संविधान के दायरे में ही यह ‘तथाकथित स्वायत्तता’ और इसी संविधान के तहत किए गए धारा 370 के प्रावधान के मायने क्या हैं? भारतीय प्रधानमंत्री ने इसी संविधान के दायरे में समाधान तलाशने की बात कही है। इस लिहाज से मौजूदा प्रधानमंत्री को कितनी छूट हासिल है? विश्लेषकों का मानना है कि भारत और कश्मीर के रिश्तों के लिहाज से दिल्ली संधि निर्णायक लम्हा था। शेख अब्दुल्ला के दिमाग में शक के बीज बो दिए गए कि इसने वास्तव में कश्मीर के भारत में पूर्ण विलय का रास्ता खोल दिया है और यह धारा 370 के अनुरूप स्वायत्तता दिलाने वाली नहीं है। यहां कश्मीर के 70 साल पुराने मुद्दे पर लेखक मंथन कर रहे हैं। इस विवेचना में वे अपने दादा की ओर से विरासत में सौंपे गए कागजात का इस्तेमाल भी कर रहे हैं। उनके दादा ने शेख अब्दुल्ला और जवाहर लाल नेहरू दोनों के ही निकट सहयोगी के तौर पर काम किया है।

परिचय

पिछले दशकों के दौरान सत्ता में रहे भारतीय प्रधानमंत्री कश्मीर मुद्दे के समाधान के तरह-तरह के प्रयासों में शरीक रहे हैं। सच कहा जाए तो इनमें से कुछ राज्य को ले कर वास्तव में चिंतित थे। इनमें जवाहर लाल नेहरू का नाम खास है, जिनको लगता था कि भारतीय सेकुलरिज्म के उनके ब्रांड के लिए जम्मू-कश्मीर शोकेस का काम करेगा। वादे तो कई और ने भी किए लेकिन कुछ कर नहीं पाए। जम्मू-कश्मीर पर होने वाली बहस के मूल में स्वायत्तता और इसके बहुरंगी आयाम हैं और साथ ही यह बात है कि केंद्र और राज्य के बीच संधि पर आधारित रिश्तों के संदर्भ में इन आयाम को संघीय ढांचे में कैसे समाहित किया जाए। आखिरकार भारत राज्यों का संघ है और जम्मू-कश्मीर पर विवादित चढ़ाई और इसके बाद महराज हरि सिंह की ओर से भारतीय प्रभुत्व को स्वीकार करने के कानूनी कागजात (इंस्ट्रूमेंट ऑफ एक्सेशन) पर किए गए दस्तखत से जुड़ा है जिसकी वजह से भारतीय संविधान में धारा 370 का विशेष प्रावधान करना पड़ा था। इस दौरान विभिन्न प्रधानमंत्रियों ने समाधान की कोशिशें कीं लेकिन ये परवान नहीं चढ़ सकीं। इनमें दिल्ली संधि और शेख अब्दुल्ला व इंदिरा गांधी के बीच का समझौता भी शामिल है।

कश्मीर के हालात एक बार सामान्य होते ही इस मुद्दे का स्थायी हल ढूंढ़ने की हर कोशिश ठप हो गई। हाल का इतिहास दिखाता है कि 1995 में तब के प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव ने संसद में कहा, जहां तक जम्मू-कश्मीर को स्वायत्तता देने का सवाल है, इसकी कोई सीमा नहीं है। इस संदर्भ में हमारे संविधान में बहुत संभावना है और हम आजादी छोड़ कर कुछ भी देने को तैयार हैं। अब सीधा चलिए 2016 में, जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी कह रहे हैं कि वे भारतीय संविधान के दायरे में स्थायी समाधान तैयार करने के लिए तत्पर हैं।

हाल में कश्मीर के लिए जब फिर से सर्वदलीय प्रतिनिधि मंडल रवाना हुआ तो जैसे बीते दिनों की बरबस याद आ गई। वह सितंबर, 2010 की बात है जब महीनों के प्रदर्शनों के बाद ऐसा ही एक प्रतिनिधि मंडल कश्मीर पहुंचा था। शहर में कर्फ्यू लगा था और इस बीच ही माकपा के सीताराम येचुरी और मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुसलमीन के असदुद्दीन ओवैसी ने अलगाववादी नेता सैयद अली शाह गिलानी से उनके घर जा कर मुलाकात की थी। डीएमके के टीआर बालू, शिरोमणि अकाली दल के रतन सिंह अजनाला और टीडीपी के एन राव भी बैठक में मौजूद थे। बताते हैं कि तब गिलानी ने कहा, ”हम सब कुछ सहेंगे लेकिन हार नहीं मानेंगे। हमने तय किया है कि भारत के अंधे साम्राज्यवाद के सामने हम हथियार नहीं डालेंगे। बातचीत तब तक कामयाब नहीं होंगी, जब तक कि भारत यह मान नहीं ले कि कश्मीर एक अंतरराष्ट्रीय विवाद है।‘’ एक और छोटे समूह ने ऑल जम्मू एंड कश्मीर आवामी एक्शन कमेटी के प्रमुख मीरवाइज फारुक से मुलाकात की। इस समूह में भाकपा के गुरुदास दासगुप्ता भी शामिल थे। यहां मीरवाइज ने कहा, “यह महज राजनीतिक विवाद नहीं है। … भारत को इसे मानवीय मुद्दे की तरह देखना चाहिए। घाटी में जनभावना आजादी के पक्ष में है और भारत को इसका सम्मान करना होगा। कश्मीर में बैठ कर हम इस नतीजे पर पहुंचते हैं कि भारत के लोग कश्मीर के बारे में इतनी गलत जानकारी रखते हैं… कश्मीर के विवाद को अंतरराष्ट्रीय रूप से मान्यता हासिल है। समय आ गया है जब हकीकत को मान लेना चाहिए।” दोनों कश्मीरी नेताओं की बातें लगभग एक सी थीं।

कश्मीर का विलय (इंस्ट्रूमेंट ऑफ एक्सेशन): स्वायत्तता की रक्षा और केंद्र (संघ) से सहयोग

कश्मीर में एक बार फिर इस्लामी हिंसा जारी है और फिर से भारतीय राजनेता कश्मीर की यात्रा कर रहे हैं। छह साल पहले इस इलाके में हुए सर्वदलीय प्रतिनिधि मंडल के पिछले दौरे से ले कर अब तक दिल्ली और श्रीनगर के बीच की खाई बढ़ी ही है। अगर 2010 की तरह कट्टरपंथियों से मुलाकात हुई होती और उनकी बातें सुनी गई होंतीं तो इससे लोगों की चिंता थोड़े समय के लिए ही सही ठंडी हुई होती। भले ही अगले उफान तक सही, शांति कायम हुई होती। अगर प्रधानमंत्री मोदी अहम बदलाव लाना चाहते हैं तो उन्हें ऐसा समाधान ढूंढ़ने की कोशिश करनी होगी जिसमें सिर्फ जुबानी वादे नहीं हों, बल्कि स्वायत्तता के प्रावधान भी हों।

अक्तूबर 1947 में महराज हरि सिंह ने जिस दस्तावेज (इंस्ट्रूमेंट ऑफ एक्सेशन) पर दस्तखत कर कश्मीर को भारत को सौंपा था उसके तीन खास प्रावधान आज भी अहम हैं।

प्रावधान 3- सूची में दर्ज विषयों को मैं उन विषयों के रूप में स्वीकार करता हूं जिन पर स्वतंत्र उपनिवेश (डोमीनियन) की विधायिका अपने राज्य के लिए कानून बना सकती है।

प्रावधान 5- कानून या भारतीय स्वतंत्रता कानून, 1947 में किसी संशोधन की वजह से इसमें दर्ज की गई शर्तों में बदलाव नहीं किया जा सकेगा, जब तक कि उसे इस समझौते के पूरक समझौते में मंजूरी नहीं दी गई हो।

प्रावधान 7- इसमें दर्ज किसी भी प्रावधान को किसी भी रूप में भारत के भविष्य के संविधान की मंजूरी नहीं माना जाएगा और ना ही भविष्य के किसी संविधान को ले कर भारत सरकार के साथ समझौते को मेरे विशेषाधिकार की समाप्ति मानी जाएगी।
(यह स्पष्ट हो जाना चाहिए कि हम यह रुख अपना रहे हैं कि हमारी स्वायत्तता इस दस्तावेज के साथ जुड़ी होगी यानी स्वायत्तता इंस्ट्रूमेंट ऑफ एक्सेशन के साथ संबद्ध होगी।)

यहां याद दिलाना जरूरी है कि अक्तूबर 1947 में मसौदा समिति के सदस्य गोपालस्वामी अयंगर ने संविधान सभा के सामने कहा था, ‘हम इस बात के लिए भी सहमत हुए हैं कि इंस्ट्रूमेंट ऑफ कंस्टीच्यूशनल एसेंबली के जरिए जनता की भावना से ही राज्य का संविधान तय होगा और साथ ही संघ के अधिकार का भी निर्धारण होगा। आप याद ऱखें कि इनमें से कई प्रावधानों में जम्मू-कश्मीर राज्य की सहमति जरूरी होगी। ये खास तौर पर उन मुद्दों से जुड़े हैं जिनकी चर्चा इंस्ट्रूमेंट ऑफ एक्सेशन में नहीं है और यह कश्मीर के लोगों और वहां की सरकार को हमारे वादों में शामिल है कि ऐसा कोई प्रावधान राज्य में संविधान बनाने के लिए बनाई गई समिति की मंजूरी के बिना जोड़ा नहीं जाएगा। दूसरे शब्दों में ये ऐसे विषय हैं जिनका फैसला राज्य की संविधान सभा को करना है।’

1951 में जब राज्य की संविधान सभा गठित हुई तो शेख मोहम्मद अबदुल्ला ने इसे संबोधित करते हुए कहा, ”मुझे इस बात में कोई संदेह नहीं है कि आप लोगों को भारत के साथ हमारे संवैधानिक प्रावधानों की जानकारी होगी। हमें भारत के साथ रिश्तों पर गर्व है, जिसके लोगों और सरकार की सदिच्छा असीमित रूप से हमारे साथ है। भारत के संविधान ने एक संघीय ढांचे को मंजूरी दी है और स्वायत्त शक्तियों के वितरण में हमें रक्षा, विदेश और संचार के अपवादों को छोड़ कर दूसरी संवैधानिक इकाइयों से अलग माना गया है। हमें अपना संविधान पूरी तरह अपनी इच्छा के मुताबिक बनाने की छूट है। एक अच्छे साझेदार के तौर पर रहने और समृद्ध होने के अपने लक्ष्य को हासिल करने में जहां मैं अपनी स्वायत्तता की अधिकतम सुरक्षा करने पर जोर दूंगा, वहीं इस बात को भी जरूरी बताऊंगा कि हम संवैधानिक प्रावधानों के जरिए संघ से संघीय सहयोग मांगे और इसके लिए मजबूर करें साथ ही संघ को अपना अधिकतम सहयोग और सहायता प्रदान करें ताकि हम अपने देश को हमारी सर्वश्रेष्ठ परंपरा और लोगों की क्षमता के अनुरूप विकसित कर सकें।’’

जुलाई, 1952 में हुई दिल्ली संधि को नेहरू और शेख अब्दुला के रूप में दो व्यक्तियों के बीच समझौते के रूप में देखा गया था। दस्तखत किए जाने के बाद 24 जुलाई, 1952 को लोकसभा में बहस के दौरान नेहरू ने इसके बारे में जानकारी दी। फिर इसे स्वीकार कर लिया गया। इसके बाद पांच अगस्त को राज्य सभा में इस पर चर्चा हुई और मंजूरी मिली। इसी वर्ष 11 अगस्त को शेर-ए-कश्मीर ने इसे राज्य की संविधान सभा के सामने पेश किया और उसने भी इसे मंजूरी दे दी। साफ तौर पर इस पर भारत और कश्मीर दोनों की विधायिका की मंजूरी थी। इसलिए दिल्ली संधि के अहम बिंदुओं को दुबारा बताना जरूरी है –

डोगरा वंश के सत्ता पर दावे को समाप्त करने के फैसले को नई दिल्ली स्वीकार करता है।

भारतीय नागरिकता कानून राज्य पर लागू होगा लेकिन राज्य की विधायिका को स्थायी निवासियों के अधिकार और सुविधाओं के बारे में फैसला करने का पूरा हक होगा, खास तौर पर अचल संपत्ति और सरकारी नौकरी हासिल करने के मामले में।

1947 या उससे पहले पाकिस्तान या पाक अधिकृत कश्मीर चले गए राज्य के नागरिकों को वापस अपने घर लौटने का अधिकार होगा।

बाहरी खतरे की स्थिति में भारत के राष्ट्रपति को आपातकाल घोषित करने का अधिकार होगा। लेकिन अंदरुनी अस्थिरता के मामले में इस शक्ति का इस्तेमाल राज्य सरकार के अनुरोध या स्वीकृति से ही किया जा सकेगा।

भारत के राष्ट्रपति को फांसी की सजा माफ करने या जारी रखने का अधिकार होगा।

बिना किसी मुआवजे के जागीर को जब्त करने पर भारत की सहमति स्थायी होगी।

राज्य को अपना अलग झंडा रखने की इजाजत दी गई जो नेशनल कांफ्रेंस पार्टी का झंडा था।

सुप्रीम कोर्ट का क्षेत्राधिकार कुछ मामलों में होगा।

इस बात पर सहमति बनी कि जम्मू और लद्दाख को सांस्कृतिक और क्षेत्रीय स्वायत्तता होनी चाहिए।

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स्वायत्तता की मांग का तेज होना

दिल्ली संधि के तहत पूर्ण एकीकरण की अवधारणा के फायदे नुकसान को ले कर माथापच्ची करने के बाद अब्दुल्ला को यह लगने लगा था कि सीमित स्वायत्तता का उसका सपना नष्ट हो रहा है। इसके बाद उसके क्रिया-कलापों ने उसकी राष्ट्रवादी शख्सियत को पूरी तरह झुठला दिया। जल्दी ही एक बेहद नाटकीय घटनाक्रम में इंटेलिजेंस ब्यूरो (आईबी) के निदेशक बीएन मलिक के एक ऑपरेशन के तहत उन्हें गुलमर्ग में गिरफ्तार कर लिया गया। 1990 के मध्य तक स्वायत्तता की मांग तेज होने लगी और ज्यादातर लोग इस बात पर सहमत थे कि अगर इस समस्या का समाधान निकालना है तो स्वायत्तता की पुनर्स्थापना करनी होगी। 1994 के अपने प्रस्ताव में नेशनल कांफ्रेंस ने साफ तौर पर कहा, “इस संवेदनशील मौके पर हम भारत सरकार को याद दिलाना चाहते हैं कि राज्य के लोगों ने भारतीय संघ में शामिल होने का फैसला कुछ साझा सिद्धांतों के आधार पर लिया था। संविधान को तब स्थायित्व मिला जब 1952 में जम्मू-कश्मीर राज्य और भारतीय संघ के बीच एक समझौता हुआ जिसे दिल्ली संधि के नाम से जाना जाता है। उसके बाद रिश्ते खराब हुए, क्योंकि भारतीय संघ ने अपने वादे को पूरा नहीं किया जिसका नतीजा यह हुआ कि स्वायत्तता कमजोर होती गई।

जम्मू-कश्मीर विधानसभा में लंबी और गर्मागरम बहस के बाद तैयार हुई राज्य स्वायत्तता समिति की वर्ष 2000 की रिपोर्ट अपने आप में ही अस्पष्ट है। यह 1954 से 1986 के बीच केंद्रीय विधायिका की ओर से राज्य पर लागू किए गए 42 संवैधानिक प्रावधानों की ओर यह कहते हुए इशारा तो करती है कि यह ‘स्वायत्तता के क्षरण’ का प्रमाण है। लेकिन साथ ही यह भी कहती है कि हालांकि इनमें से ‘सभी पर एतराज नहीं किया जा सकता’। लेकिन यह सिद्धांतों का सवाल है। सिद्धांतों के इस सवाल पर केंद्र सरकार के लिए यह मानना मुश्किल हो सकता था कि 1953 में शेख अब्दुल्ला को वजीर-ए-आजम के पद से हटा दिए जाने और जेल भेज दिए जाने के बाद जम्मू-कश्मीर की संविधान सभा की वैधानिक मान्यता समाप्त हो गई थी। यही वह कारण था कि शेख अब्दुल्ला और प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के बीच 1975 में किए गए समझौते में संवैधानिक समीक्षा के दायरे को बहुत सीमित रखा गया था। इसने जम्मू-कश्मीर पर लागू होने वाले संवैधानिक संशोधनों की समीक्षा को नए रूप में मंजूरी दी लेकिन साथ ही कहा कि ‘बिना स्वीकृत या परिवर्तित’ किए गए सभी संशोधन ‘स्थायी’ होंगे।
चार जुलाई, 2000 को हुई केंद्रीय मंत्रिमंडल की बैठक में फारुक अबदुल्ला की स्वायत्तता की मांग को अस्वीकार्य बता कर कचरे की पेटी में डाल दिया गया। जम्मू-कश्मीर को स्वायत्तता और संघीय ढांचे की पुनर्रचना पर जवाब में भाजपा के तब के महासचिव और जम्मू-कश्मीर के प्रभारी नरेंद्र मोदी ने नारा दिया– ‘विकास, लोकतंत्र, संवाद और सुरक्षा बलों का उपयोग।’ वही पार्टी महासचिव मोदी अब प्रधानमंत्री हैं जो अब निर्णायक फैसला ले सकते हैं।

निम्न हिस्से में हम कश्मीर की स्वायत्तता से जुड़े मुद्दों की समीक्षा करेंगे –

‘व्यापक स्वायत्तता’ या 1953 से पूर्व की स्थिति क्या है? इस मामले पर जम्मू-कश्मीर विधानसभा में हुई चर्चा में यह बिंदू सामने आते हैं-

कांग्रेस नेता और खास तौर पर नेहरू ने यह धारणा पैदा कि थी कि जम्मू-कश्मीर की विशेष स्थिति की वजह से इसे विशेष दर्जा दिया जाना जरूरी था।

‘विशेष परिस्थिति’ शब्द ने सांप्रदायिक शक्तियों को यह कहने का मौका दिया कि कांग्रेस ने सैद्धांतिक रूप से यह स्वीकार कर लिया है कि राज्य की मुस्लिम बहुल स्थिति को हर हालत में बनाए रखना है।

संविधान सभा में बिना व्यापक चर्चा के ही भारतीय संविधान में धारा 370 के तहत राज्य को विशेष दर्जा दे दिया गया।

1952 में नेहरू और शेख के बीच दिल्ली संधि इस विशेष दर्जे को व्यवहारिक आकार देने के लिए की गई।

समझौते के तहत राज्य को अलग संविधान दिया गया और इसका अपना झंडा दिया गया। राज्य के प्रमुख और सरकार के प्रमुख के पद को क्रमशः सदर-ए-रियासत और वजीर-ए-आजम का नाम दिया गया।

राज्य में प्रवेश करने के इच्छुक लोगों और यहां से बाहर जाने के इच्छुक लोगों को राज्य से इजाजत लेनी होती।

जम्मू-कश्मीर के भारतीय संघ में विलय को सिर्फ तीन लिहाज से मंजूरी दी गई- रक्षा, विदेश और संचार।

इन परिस्थितियों में जम्मू-कश्मीर प्रजा परिषद ने ‘एक प्रधान, एक विधान और एक निशान’ की मांग करते हुए आंदोलन छेड़ दिया। एक दर्जन से ज्यादा कार्यकर्ताओं ने अपनी जान गंवाई और हजारों गिरफ्तार किए गए।

भारतीय जनसंघ ने श्यामा प्रसाद मुखर्जी के नेतृत्व में इस आंदोलन के समर्थन में देश भर में सत्याग्रह चलाया। डॉ. मुखर्जी ने आठ मई, 1953 को बिना परमिट के राज्य में प्रवेश किया। उन्हें श्रीनगर में गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया, जहां 23 जून 1953 को संदेहास्पद परिस्थितियों में उनका निधन हो गया।

राज्य के लिए अधिकतम स्वायत्तता हासिल करने में कायमाब रहे शेख अब्दुल्ला पर आरोप लगाया गया कि वे अमेरिका और पाकिस्तान के साथ मिल कर कश्मीर को भारत से अलग करने की साजिश रच रहे हैं। उन्हें नौ अगस्त, 1953 को गिरफ्तार कर लिया गया और इस तरह राज्य में अलगाववाद का एक चरण समाप्त हुआ।

1953 से 1975 के बीच राज्य की दब्बू सरकारें केंद्र की हर बातें मानती रहीं और राज्य की स्वायत्तता में कमी आती रही। इस अवधि के दौरान 13 ऐसे कदम उठाए गए जिनसे व्यवस्थित रूप से भारतीय संविधान की व्यवस्थाओं को राज्य में लागू किया जा सके। इनमें से कुछ खास ये हैं-

1954 के राष्ट्रपति के आदेश से केंद्रीय उत्पाद और सीमा शुल्क, नागरिक उड्डयन, डाक और टेलीग्राफ पर संघीय व्यवस्था को राज्य में लागू कर दिया गया।

1958 के अखिल भारतीय सेवा के तहत आईएएस और आईपीएस शुरू कर दिए गए और नियंत्रक और महालेखा परीक्षक (सीएजी) के कार्यक्षेत्र को विस्तार दे दिया गया।

1959 में जनगणना के लिए अधिकार दे दिए गए ताकि 1961 की जनगणना केंद्रीय कानून के तहत हो सके।

1960 में जम्मू-कश्मीर को सुप्रीम कोर्ट के कार्यक्षेत्र के दायरे में लाया गया और चुनाव आयोग का दायरा भी बढ़ा दिया गया।

1964 में संविधान की धारा 356 और 357 को लागू कर दिया गया ताकि आपात स्थितियों में राष्ट्रपति शासन लगाया जा सके।

1965 में श्रमिकों, ट्रेड यूनिनयों, सामाजिक सुरक्षा और सामाजिक बीमा से जुड़े कई विधेयकों का दायरा बढ़ा दिया गया।

1966 में लोकसभा के प्रत्यक्ष निर्वाचन के प्रावधान लागू किए गए।

1953 से 337 कानूनों को राज्य में लागू किया गया जिनमें चार्टर्ड एकाउंटेंड कानून, विदेशी मुद्रा कानून, अदालत की अवमानना का कानून, कॉपी राइट कानून और परिसीमन आदि शामिल हैं।

वीजा की तरह की परमिट की व्यवस्था को समाप्त कर दिया गया।

घाटी में उदासी का माहौल छा गया और लोगों को लगने लगा कि उन्हें और कमजोर कर दिया गया है। उधर, नई दिल्ली ने लिफाफे भेजना और धारा 370 को कमजोर करना जारी रखा। यही रवैया दिल्ली संधि को ले कर भी दिखाया गया, जो वास्तव में देखा जाए तो सीमित स्वायत्तता की बजाय पूर्ण एकीकरण का पहला प्रयास था। कुल मिला कर लब्बोलुआब यह है कि शेख अब्दुल्ला ने दिल्ली संधि पर दस्तखत करने के बाद पाया कि स्वायत्त और यहां तक कि अर्ध-स्वतंत्र कश्मीर की बात भी महज एक भ्रम था।

राज्य स्वायत्तता समिति की सिफारिशों में क्या खतरे निहित थे? केंद्रीय मंत्रीमंडल ने इसे पूरी तरह कचरे के डब्बे में क्यों फेंक दिया?
इसकी सिफारिशों में यह भी शामिल था कि धारा 370 जिसे तात्कालिक प्रावधान के रूप में शामिल किया गया था, उसे विशेष धारा के तौर पर मंजूरी दी जाए।
जम्मू-कश्मीर के भारत में विलय को फिर से रक्षा, विदेश और संचार के तीन विषयों तक सीमित किया जाए। बाकी सभी विषयों में राज्य स्वतंत्र रहे।
राज्यपाल (गवर्नर) और मुख्य मंत्री (चीफ मिनिस्टर) के पदनाम को फिर से सदर-ए-रियासत और प्रधान मंत्री (प्राइम मिनिस्टर) किया जाए।
इस सदर-ए-रियासत का चयन राज्य विधायिका करे ना कि केंद्र। इसी तरह वह भारत के राट्रपति के प्रति नहीं बल्कि राज्य विधानसभा के प्रति उत्तरदायी हो।
सुप्रीम कोर्ट, केंद्रीय चुनाव आयोग और सीएजी के अधिकार क्षेत्र से राज्य को बाहर किया जाए।
समिति ने मौलिक अधिकारों से जुड़ी धारा 12 से 35 को भी समाप्त करने की सिफारिश की थी।
आईएएस और आईपीएस जैसी संघीय सेवाओं के दायरे से राज्य को बाहर किया जाए।
धारा 356 और 357 को जम्मू-कश्मीर पर प्रभावी नहीं माना जाए।

लेकिन सवाल है कि अगर 1989 में भारत के राष्ट्रपति ने राज्य में राष्ट्रपति शासन नहीं घोषित किया होता तो यहां की क्या हालत होती, जब पाकिस्तान ने ‘हजार जख्म की मौत’ की नीति पर काम करते हुए पूरी घाटी को आतंकवाद से भर दिया था? इसी तरह शेख अब्दुल्ला की नेशनल कांफ्रेंस ने 1950 में स्वायत्तता हासिल करने के बाद खुद को गौरवान्वित नहीं किया था। आज के समय में निम्न बिंदुओं पर ध्यान देना जरूरी है-

सितंबर 1951 में हुआ राज्य की संविधान सभा का चुनाव राज्य के कानून के तहत हुआ था। इसमें सभी 75 सीटों पर विपक्षी उम्मीदवारों के नामांकन को रद्द करते हुए नेशनल कांफ्रेंस का कब्जा हुआ था।

कश्मीरी नेतृत्व ने खुद को मिले विशेषाधिकार का जम कर दुरुपयोग कर जम्मू और लद्दाख के लोग (जो 50 फीसदी हैं) को उनके अधिकारों से वंचित रखा। इन लोगों को पिछले 50 साल से दूसरे दर्जे के नागरिकों की तरह जीना पड़ा है।

जम्मू और लद्दाख क्षेत्र को भी मुस्लिम बहुल बनाने के पाकिस्तान की आईएसआई के इरादे को पूरा करने में एनसी सरकार ने कभी छुप कर और कभी खुल कर पूरा सहयोग किया है। पिछले दो-तीन साल के अंदर कश्मीर के 25 हजार परिवारों ने जम्मू क्षेत्र में सरकारी जमीन पर कब्जा कर मकान बना लिए हैं।

1975 के इंदिरा-शेख समझौते के तहत सत्ता में आने के बाद एनसी सरकार ने पुनर्वास कानून पारित किया जिसके तहत 1947 में पाकिस्तान जा बसे हजारों परिवारों के वापस आ कर बसने का रास्ता साफ हो गया। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने पाबंदी लगाई। अगर राज्य पर सुप्रीम कोर्ट का अधिकार क्षेत्र नहीं होता तो सोचिए कि क्या स्थिति होती?

व्यापक स्वायत्तता की कल्पना करने वाले लोगों की सोच के उलट स्वायत्तता ने घाटी को भारत के करीब लाने में कोई भूमिका नहीं निभाई। उल्टा इसकी वजह से राज्य में आईएसआई को अपनी फसल उगाने में मदद मिली और आतंकवादी मुस्लिम अलगाववाद को बढ़ावा देने में इसने अहम भूमिका निभाई।

1996 के चुनाव में एनसी को कुल वोट का 15 फीसदी से भी कम मिला था। उन चुनावों में लोगों ने लोकतंत्र की पुनर्स्थापना के लिए वोट डाला था। उससे भी खास बात यह है कि यह व्यापक स्वायत्तता पर लोगों की मुहर नहीं थी, जैसा कि एनसी दावा करती है।

कुछेक को छोड़ कर पूरे कश्मीरी समुदाय ने एनसी के अधिक स्वायत्तता की मांग को ठुकरा दिया है। जम्मू और लद्दाख क्षेत्र के लोगों के साथ ही गुर्जर, शिया, सिख और कश्मीरी हिंदू भी इसी विचार के हैं।

1975 में सत्ता में आने के बाद शेख अब्दुल्ला ने भी अपने वरिष्ठ मंत्री डीडी ठाकुर के नेतृत्व में ऐसी ही समिति गठित की थी। इसे 1953 से 1975 के दौरान राज्य में लागू किए गए केंद्रीय प्रावधानों की समीक्षा करनी थी। इस समिति ने कहा था कि इस दौरान किए गए सभी प्रावधान राज्य के लोगों के हित में हैं और उनसे कोई छेड़छाड़ नहीं की जानी चाहिए। शेख अब्दुल्ला ने उस रिपोर्ट को मान भी लिया था।

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नाकाम चार सूत्रीय फार्मूला

वर्ष 2006 में कश्मीर के लिए एक विशेष फार्मूला लगभग तय हो गया था। तब के भारतीय प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और तात्कालीन पाकिस्तानी राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ के बीच तय हो रहे इस समझौते को चार सूत्रीय फार्मूले के नाम से जाना जाता। इसमें कश्मीर के लिए अधीनस्थ क्षेत्रों से परे एक समाधान तलाशा गया था। नियंत्रण रेखा (एलओसी) को मानचित्र में एक ऐसी रेखा के रूप में तब्दील कर दिया जाना था जो दोनों तरफ के लोगों को कश्मीर में आसान और मुक्त आवागमन को सुनिश्चत करे, राज्य से सेना हटा ली जाती, राज्य के दोनों हिस्सों को सहमति से तय स्तर पर स्वशासन या आजादी मिल जाती, दोनों तरफ से प्रतिनिधित्व की एक साझा व्यवस्था होती जिसे कोई कार्यकारी शक्ति नहीं होती और इसका काम समझौते के पालन को सुनिश्चित करना और साझा महत्व के मुद्दों पर चर्चा करना होता। इस समाधान में एलओसी के आर-पार मुक्त व्यापार और आवागमन भी शामिल था।
वीकीलिक्स ने अमेरिकी दूतावास के 21 अप्रैल, 2009 के एक संदेश का खुलासा किया था जिसमें दर्ज है कि सिंह ने एक अमेरिकी प्रतिनिधि मंडल के सामने इस फार्मूले की पुष्टि की थी। सिंह ने अमेरिकी प्रतिनिधि मंडल को बताया था कि फरवरी, 2007 से पहले इस फार्मूले पर काफी प्रगति हो चुकी थी। दूतावास के उस केबल संदेश के मुताबिक सिंह ने कहा था, ‘हम बैक चैनल बातचीत के जरिए आपसी समझ विकसित कर चुके थे।’ सिंह ने यह भी कहा था कि ‘भारत एक मजबूत, स्थायी और शांतिपूर्ण पाकिस्तान चाहता है और इसकी एक इंच भी जमीन पर कब्जा नहीं करना चाहता।’

यहां ध्यान देने की बात है कि इस फार्मूले में डोगरा, कश्मीरी पंडित, लद्दाख के लोग, सिख और ईसाइयों के साथ ही सुन्नी, शिया, गुज्जर, बरकरवाल और पहाड़ी जैसे विभिन्न कश्मीरी मुस्लिम समुदायों के रूप में मौजूद कश्मीरी जनता की आकांक्षाओं का ध्यान नहीं रखा गया था। आखिरकार आजादी की मांग मुख्य रूप से कश्मीरी बोलने वाले सुन्नी मुसलमानों की है जो घाटी में रहते हैं और जो कश्मीर के भारत में विलय की मूल अवधारणा को ही नकारते हैं। इस अहम पहलू के बिना चार सूत्रीय फार्मूला को कामयाब नहीं होना था।

इतिहासकार और कश्मीर के विशेषज्ञ ए. जी. नूरानी ने एक बार सिंह-मुशर्रफ फार्मूला को आंकते हुए कहा था, ‘कश्मीर से भारत के दावे को समाप्त कर देने वाली कोई सरकार यहां टिक नहीं सकती, इसी तरह पाकिस्तान में भी किसी सरकार के लिए नियंत्रण रेखा को अंतरराष्ट्रीय सीमा मान लेने के बाद बने रहना नामुमकिन हो जाता। कश्मीरी भी उनके राज्य के विभाजन और लगातार स्वसासन और मानवाधिकार के उल्लंघन को स्वीकार नहीं करते।’ इस तरह चार सूत्रीय फार्मूला नूरानी के पैमानों पर खरा उतर रहा था। इस पर भारत का दावा समाप्त नहीं हो रहा था, नियंत्रण रेखा अंतरराष्ट्रीय सीमा में नहीं बदल रही थी, कश्मीर के दोनों हिस्से एक हो रहे थे और दोनों ही हिस्सों को मानवाधिकार के उल्लंघन की लगातार होने वाली शिकायतों से छुटकारा पाने का मौका दिया जा रहा था।

निष्कर्ष

कश्मीर के भारत में विलय से संबंधित दो मुख्य बिंदुओं पर कोई असहमति नहीं है – विलय संबंधी दस्तावेज (इंस्ट्रूमेंट ऑफ एक्सेशन) और दिल्ली संधि। इसी तरह शेष स्वायत्तता और अन्य शक्तियां धारा 370 के तहत राज्य के अधीन हैं। सभी रिसायतों को अपनी संविधान सभा के जरिए अपना संविधान तैयार करने का हक दिया गया था। उस समय सिर्फ चार रिसायतों ने इस विकल्प का लाभ उठा कर अपनी संविधान सभा गठित की जो थीं- सौराष्ट्र, त्रावणकोर और कोचीन, मैसूर और जम्मू-कश्मीर। इनमें से भी तीन ने अपना संविधान नहीं बनाया। सिर्फ जम्मू-कश्मीर ने अपना संविधान बनाया जो आज भी मौजूद है।

इस लिहाज से मोदी सरकार ने अलगाववादियों को मुख्य धारा में लाने और गठबंधन की मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती को लोगों और कट्टरपंथियों से बातचीत करने की शक्ति देना का जो दो-स्तरीय फार्मूला चलाया है वह काम आ सकता है। हालांकि मोदी जिस स्थायी समाधान की बात कर रहे हैं वह काफी मुश्किल है क्योंकि इसके तहत पुराने जख्मों को फिर से कुरेदना होगा, स्वायत्तता के स्तर और सीमा को बढ़ाना होगा। यह भी सच है कि जम्मू-कश्मीर के मामले को जिस पैमाने पर परखा जाना है, वह है- इंस्ट्रूमेंट ऑफ एक्सेशन और दिल्ली संधि।

बाकी सब तो शहरों में सुनाई जाने वाली कहानियां भर हैं।

ये लेखक के निजी विचार हैं।

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