एक सॉफ्ट पॉवर के रूप में भारत

  • STÉPHANIE M.-L. HENG
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भारत अपनी बौद्धिक व सांस्कृतिक ताकत (सॉफ्ट पॉवर) को तब से दुनिया के सामने पेश करता रहा है, जब राजनीतिक विशेषज्ञों ने इस धारणा का प्रतिपादन भी नहीं किया था। पिछले दशक के दौरान भारत ने कूटनीति के मामले में अपनी सॉफ्ट पॉवर का ज्यादा व्यवस्थित तरीके से इस्तेमाल किया है। वर्ष 2014 में सत्ता में आए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भारत की सॉफ्ट पॉवर का इस्तेमाल पूरी शिद्दत से करने के लिए जाने जा रहे हैं। इसके लिए वे प्रभावशाली मीडिया प्रबंधन रणनीति के साथ ही सोशल मीडिया के बेहतर उपयोग का भी सहारा ले रहे हैं। यह लेख बताता है कि इन प्रयासों से भारत की छवि विश्व समुदाय के सामने बेहतर तो हुई है लेकिन इसका फायदा दूसरे देशों से रिश्ते बेहतर करने के लिहाज से बहुत सीमित रहा है।

परिचय

अमेरिकी राजनीति विज्ञानी जोसेफ न्ये ने 1990 में जब इस धारणा को लोकप्रिय बनाया था, उससे पहले से ही भारत की सॉफ्ट पॉवर काफी मजबूत है और उसे दुनिया के विभिन्न हिस्सों में शताब्दियों पूर्व से ही स्वीकृति मिलती रही है। लोगों ने दुनिया की प्रचानीतम सभ्यताओं में शामिल इस देश की कला और संस्कृति के बारे में जाना-समझा है। लेकिन खास तौर पर पिछले दशक के दौरान भारत ने अपनी खास तौर पर  पॉवर का ज्यादा व्यवस्थित तरीके से उपयोग करना शुरू किया है (रामचंद्रन 2015)। भारत को अंतरराष्ट्रीय समुदाय के सामने पेश करने के लिए कई कदम उठाए गए हैं। इनमें 2006 में विदेश मंत्रालय के अधीन एक पब्लिक डिप्लोमेसी डिवीजन शुरू करना भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद (आइसीसीआर) का दुनिया भर में विस्तार, पर्यटन मंत्रालय का ‘अतुल्य भारत अभियान’ और प्रवासी कार्य मंत्रालय के काम-काज भी शामिल है। इन प्रयासों ने न सिर्फ भारत के सामाजिक और सांस्कृतिक पहलू को विदेशों में प्रदर्शित करने में मदद की है, बल्कि देश की अहम विदेश नीति से जुड़े प्रयासों में भी मदद की है। इनमें अफ्रीका में की गई सामरिक मदद और व्यापारिक साझेदारी भी शामिल हैं (रामचंद्रन 2015)। अब व्यापार और कारोबार का संवर्धन और उसके साथ रोजगार के अवसरों का विकास प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कूटनीतिक प्रयासों का अहम तत्व है।

यह भी सच है कि देश की छवि को बेहतर करने के लिए सरकार के तरकश में सॉफ्ट पॉवर ही एकमात्र तीर नहीं है। भ्रष्टाचार और अपराध से लड़ने जैसे दूसरे गंभीर अभियानों से भी बाहर के लोगों की नजर में भारत की छवि में बदलाव आता है और अंतरराष्ट्रीय जगत में प्रमुख ताकत के रूप में भारत कैसा होगा, इसकी लोगों को झलक मिल पाती है (अश्विनी 2016)। प्रभावशाली मीडिया प्रबंधन और सोशल मीडिया का बेहतर उपयोग प्रधानमंत्री मोदी की रणनीति का अहम हिस्सा हैं।

सॉफ्ट पॉवर: पब्लिक डिप्लोमेसी का एक औजार

सॉफ्ट पॉवर शब्द का उपयोग उस क्षमता के लिए किया जाता है जिससे दूसरों को बिना ताकत या धमकी का इस्तेमाल किए ही कुछ करने के लिए तैयार किया जा सके (न्ये 1990)। पारंपरिक रूप से ‘हार्ड पॉवर’ जहां राज्य के सैन्य और आर्थिक संसाधनों पर निर्भर करती है वहीं सॉफ्ट पॉवर किसी देश के सामने अपने आकर्षण को पेश कर उसको खुद से सहमत करने की कोशिश करता है। यह किसी भी देश के तीन प्रमुख संसाधनों पर निर्भर करता है- संस्कृति, राजनीतिक मूल्य और विदेश नीति (न्ये 2004)। सॉफ्ट पॉवर मूल रूप से ऐसी चीजों पर निर्भर करता है जिसको मापा नहीं जा सकता। यानी यह दूसरे देश को अपनी अच्छी छवि पेश कर उसकी अपने बारे में सोच को बदलने से जुड़ा है (ब्लारेल २०१२-२८)। आज ज्यादातर देश सॉफ्ट पॉवर और हार्ड पॉवर को एक साथ मिला कर इस्तेमाल करते हैं जिसे ‘स्मार्ट पॉवर’ भी कहते हैं। साल 2014 में मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद से भारत ने भी ऐसे ही मिश्रण का इस्तेमाल करना शुरू किया है हालांकि अब भी इसमें सॉफ्ट पॉवर पर ही ज्यादा ध्यान है।

सच तो यह है कि पब्लिक डिप्लोमेसी में सॉफ्ट पॉवर ज्यादा अहम हो गयी है। विश्व राजनीति में एजेंडा तय करना और स्थिति की संरचना करना जितना महत्वपूर्ण है अतना ही महत्वपूर्ण यह भी है कि किसी खास मामले में दूसरों का रुख मोड़ सकें (न्ये 1990- 166)। सॉफ्ट पॉवर से जुड़े प्रयास उन सरकारी कूटनीतिक प्रयासों में मददगार होते हैं जिनका अंतिम मकसद अपने देश के बारे में विदेशों में जागरुकता बढ़ाना होता है। यह भारत के मामले में भी सच है। जहां तक कूटनीति का प्रश्न है प्रधानमंत्री मोदी ने पिछले दो साल के दौरान बहुत से विश्व नेताओं से मुलाकात की है (फाउंटेन- 2016)। इन मुलाकातों ने विदेशों में भारत के बारे में चर्चा को बढ़ावा दिया है। नमन जैन के मुताबिक, ‘प्रधानमंत्री मोदी की पडो़सी देशों के साथ बातचीत के मुकाबले विश्व नेताओं के साथ करिश्माई मुलाकातों ने अंतरराष्ट्रीय मीडिया में ज्यादा जगह बनाई है। इससे भारत को इस क्षेत्र में अपनी सोफ्ट पॉवर को स्थापित करने के लिहाज से रणनीतिक लाभ दिलाता है।’ वे यह भी मानते हैं कि मोदी ने जिस तरह विश्व नेताओं के साथ व्यक्तिगत संबंध बनाए और कायम रखे हैं उससे न सिर्फ देशों के साथ भारत के संबंधों को प्रगाढ़ करने में मदद मिली है, बल्कि मीडिया में भारत की छवि और प्रोफाइल दोनों को बढ़ावा मिला है जिससे भारत की सॉफ्ट पॉवर को भी बढ़त मिली है।

सितंबर, 2015 में इंडियन इंस्टूट्यूट ऑफ एडवांस स्टडीस, शिमला ने आइसीएमआर की साझेदारी में ‘द मेन फॉर्म्स ऑफ सॉफ्ट पॉवर – इंडिया एंड द वर्ल्ड’ विषय पर सम्मेलन आयोजित किया। इसमें न्ये की ओर से दी गई व्याख्या और उसके भारतीय संदर्भ पर चर्चा की गई। सॉफ्ट पॉवर को ले कर कुछ मान्यताएं इस तरह हैं- सॉफ्ट पॉवर का मतलब है सांस्कृतिक शक्ति, आर्थिक क्षमता भी सॉफ्ट पॉवर है, हार्ड पॉवर के मुकाबले सॉफ्ट पॉवर ज्यादा मानवीय है, हार्ड पॉवर को मापा जा सकता है, जबकि सॉफ्ट पॉवर को नहीं, सॉफ्ट पॉवर का इस्तेमाल बहुत मुश्किल है।

विश्लेषकों का कहना है कि सॉफ्ट पॉवर में यह क्षमता है कि वह भारतीय कूटनीति के प्रयासों को काफी मजबूती दे सके और इस संदर्भ में इसे एक अहम लक्ष्य के तौर पर देखा जाना चाहिेए (मुखर्जी, 2014, 56)। प्रधानमंत्री मोदी चाहते हैं कि देश के प्राचीन मूल्यों को जिंदा कर इसकी सॉफ्ट पॉवर को मजबूत किया जाए और साथ ही साथ इसका इस्तेमाल कर देश के लिए हार्ड पॉवर भी हासिल की जाए (पंत, 2015)। हालांकि पब्लिक डिप्लोमेसी का तब तक फायदा नहीं मिल सकता जब तक कि यह देश की विदेश नीति के साथ मेल नहीं खाती हो (मेलिसेन, 2015, 14)।

देश की सॉफ्ट पॉवर को बढ़ावा देना विदेश नीति के लक्ष्य को हासिल करने का एक जरिया है।

“2014 के आम चुनाव के नतीजों ने देश की विदेश नीति के संचालन में एक बड़े बदलाव को रेखांकित किया है। करिश्माई और लोकप्रिय नेता के तौर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के उदय ने भारतीय विदेश नीति को सॉफ्ट पॉवर के क्षेत्रीय और अंतरराष्ट्रीय उपयोग के लिहाज से नए सिरे से परिभाषित कर दिया है” (जैन, 2016)। भारत  की सॉफ्ट पॉवर को बढ़ावा देने (बॉलीवुड फिल्मों या योग के रूप में) का लक्ष्य भारत की विदेश नीति के लक्ष्यों को पूरा करना है और साथ ही अंतरराष्ट्रीय राजनीति में बड़ी भूमिका के लिए अपनी तैयारी को भी पेश करना है। इससे भारत की पेशबंदी इस रूप में करने में मदद मिलेगी कि यह ऐसा उभरता देश है जो बड़ी आर्थिक कामयाबी को हासिल करने की क्षमता रखता है (पंत, 2015)। भारत की सॉफ्ट पॉवर महत्वपूर्ण है, यह भौगोलिक-राजनीतिक औजार से कम नहीं है।

यह सही है कि पिछली सरकारों ने भी विदेश नीति से जुड़े देश के लक्ष्यों को हासिल करने में सॉफ्ट पॉवर की अहमियत को समझा था, लेकिन इस सिलसिले में किए गए प्रयास काफी हद तक चलताऊ किस्म के थे (पंत, 2015)। पंत का मनना है कि भारत की छवि और ब्रांड वैल्यू को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चमकाने का पहली बार इतने बड़े स्तर पर प्रयास किया गया है। प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में भारत ने अपनी सॉफ्ट पॉवर का उपयोग देश के छवि-निर्माण के लिए करने के लिहाज से एक रणनीतिक रवैया अपनाया है। फिर भी सवाल कायम है कि सॉफ्ट पॉवर आखिर कितनी उपयोगी है। विशेषज्ञ इस संबंध में बंटे हुए हैं। इस लिहाज से जे न्ये की सॉफ्ट पॉवर की धारणा सबसे अहम है, जिसमें इसे व्यवहारवादी परिणाम(बिहेवेरियल आउटकम)बिहेवेरियल आउटकम के तौर पर देखा गया है (टंर्कोस, २०१३)।

मोदी का संचार और ब्रांडिंग कौशल

प्रधानमंत्री मोदी को एक शानदार संचारक (कम्युनिकेटर) के रूप में देखा जाता है (वेंकटेश, 2015)। यह सिर्फ तकनीक के इस्तेमाल के लिहाज से ही सही नहीं है, बल्कि उनकी निजी शैली में भी इसे देखा जा सकता है (फार्सिस, 2016)। उनकी संचार संबंधी रणनीति में उनके भाषण एक बहुत प्रमुख तत्व हैं (मुखोपाध्याय, 2016)। विदेशों में बसे भारतीय मूल के लोगों को जब वे संबोधित करते हैं तब भी ऐसा ही होता है। प्रधानमंत्री मोदी ने भारत की सॉफ्ट पॉवर को पेश करने के लिए खास तौर पर प्रवासी भारतीयों पर ध्यान दिया है (जैन, 2016)। चूंकि विदेशों में गए प्रवासी भारतीय काफी प्रभावशाली भूमिकाओं में हैं, इसलिए प्रधानमंत्री ने विभिन्न देशों के प्रमुख शहरों (जैसे कि ब्रसेल्स या दुबई) में इनके लिए विशेष कार्यक्रम आयोजित किए जिससे कि मजबूत संदेश दिया जा सके। ये प्रवासी भारतीय ‘विदेश नीति संबंधी प्रयासों में एक अहम तत्व’ हो सकते हैं और साथ ही भारत की ‘सॉफ्ट पॉवर को आगे भी बढ़ा सकते हैं’ (सिंह, 2015)।

हालांकि प्रवासी भारतीयों तक पहुंचने के लिहाज से अब तक किए गए प्रयास काफी नहीं हैं और प्रवासी बॉन्डों (डायस्पोरा बॉन्ड्स)के लिहाज से काफी प्रयास करने की जरूरत है। अगर व्यवस्थित रूप से ये बॉन्ड लाए गए तो देश में विकास की विभिन्न योजनाओं में इनका काफी उपयोग हो सकता है। “इससे न सिर्फ प्रवासी उद्यमियों और वित्तपोषकों(फाइनेन्सर्स) को बल्कि सभी प्रवासियों को अपना योगदान करने में मदद मिलेगी और साथ ही वे भारत के विकास की गाथा में भागीदार भी बन सकेंगे। मोदी इसके लिए अक्सर उन्हें प्रोत्साहित भी करते रहते हैं” (सुब्रमण्या, 2015)।

विभिन्न विश्लेषकों ने कहा है कि प्रधानमंत्री मोदी इस लिहाज से इसलिए कामयाब हो रहे हैं, क्योंकि उनके पास करिश्माई व्यक्तित्व है, वे सोशल मीडिया और पारंपरिक मीडिया का जम कर उपयोग करते हैं, मीडिया प्रबंधन की उनके पास बहुत कारगर रणनीति है और साथ ही उनमें यह क्षमता भी है कि पुरानी सरकारों की ओर से की गई गलतियों से सीख ले कर उन्हें दुहराने से बचें। मीडिया के बेहतर प्रबंधन के जरिए वे इस बात पर भी नियंत्रण कर सकते हैं कि किसी विषय पर लोगों में क्या संदेश जाएगा। प्रधानमंत्री रिश्तों में जम कर निवेश करते हैं और मोदी का समर्थन करने वाले भारतीय व्यापारी समुदाय ने भारतीय मीडिया में जम कर निवेश किया हुआ है।

यह भी सच है कि प्रधानमनंत्री मोदी की संचार रणनीति की आलोचना भी हुई है। फ्रीडम हाउस की 2015 की भारत की प्रेस फ्रीडम रिपोर्ट [i] के मुताबिक बहुत से पत्रकार हैं, जिनकी शिकायत है कि 2014 में सरकार ने प्रेस को निकट आने देने की बजाय एकतरफा संचार प्रवाह साधनों पर जम कर ध्यान दिया। जैसे कि सोशल मीडिया पर किए जाने वाले पोस्ट और प्रधानमंत्री का मासिक रेडियो कार्यक्रम मन की बात, जिसके जरिए वे आम लोगों तक अपना संदेश पहुंचाते हैं। इसिलए अक्सर माना जाता है कि सरकार में पारदर्शिता की कमी है। प्रधानमंत्री मोदी मीडिया को अपना विरोधी मानते हैं और इसी वजह से वे अपने काम-काज की समीक्षा को पसंद नहीं करते (मुखोपाध्याय, 2016)।

गुजरात के मुख्यमंत्री के तौर पर बिताए कार्यकाल सहित पिछले 15 वर्षों के दौरान मीडिया के साथ उनके संबंध बहुत अच्छे नहीं रहे हैं। ऐसे में सोशल मीडिया उनके लिए एक विकल्प रहा है जिसके जरिए वे अपनी बात रख सकें। विश्लेषकों का मानना है कि इस वजह से धीरे-धीरे उनकी नजर में मुख्यधारा मीडिया की अहमियत घटती गई (भट्टाचार्य, 2014)। प्रधानमंत्री मोदी नहीं चाहते कि मीडिया गेटकीपर की भूमिका में रहे। विदेशी मीडिया के काम-काज तक ही नहीं वे भारतीय मीडिया में सरकार की काम-काज की आलोचना को ले कर भी चिंतित रहते हैं। वे सोशल मीडिया की अहमियत को हमेशा स्वीकार करते रहे हैं और इसलिए लोगों को सीधे इसी के जरिए संबोधित करते हैं। इसमें भारत में रहने वाले नागरिक और विदेशों में रहने वाले प्रवासी दोनों ही शामिल हैं।

गुजरात के मुख्यमंत्री के तौर पर नरेंद्र मोदी ने 2011 में अपनी छवि विकास को समर्पित नेता के तौर पर और गुजरात की छवि देश के सबसे विकसित राज्य के तौर पर बनाने की कोशिश शुरू की। इसमें उन्होंने राष्ट्रीय मीडिया से आने वाली सूचना का प्रभाव सीमित करने के लिए सोशल मीडिया का इस्तेमाल किया। 2005 से ही वे गुजरात की छवि बदलने के प्रयास में जुट गए थे। वे अक्सर पत्रकारों को गुजरात बुलाते थे और आर्थिक बदलावों में इसकी कामयाबी की कहानी का प्रचार करने में सफल रहे। इस प्रक्रिया में देश के सबसे पश्चिम में स्थित इस राज्य में निवेश भी आया। मोदी ने विदेशों से राष्ट्राध्यक्षों को भी गुजरात का न्यौता दिया जिससे उनकी लोकप्रियता को और बल मिला।

मोदी के उदय को पिछली सरकार के पतन के साथ जोड़ कर देखा जाता है, खास तौर पर 2013—14 का काल जिस दौरान भारत की विकास दर कई वर्षों के मुकाबले निम्नतम स्तर पर थी और लोगों में सरकार के काम-काज को ले कर खासी नाराजगी थी। ऐसे में उनकी संचार रणनीति जिसमें सोशल मीडिया का खासा स्थान था, जल्दी ही कामयाब साबित हुई। वे 2014 में चुन लिए गए, क्योंकि लोगों को लगा कि यही वह नेता है जो देश की छवि को बेहतर कर सकता है।

प्रधानमंत्री मोदी उन शुरुआती नेताओं में से हैं, जिन्होंने बिल्कुल हाल के समय में शुरू हुए सेल्फी के ट्रेंड के महत्व को समझा और इसका उपयोग उन्होंने अपने प्रचार के लिए किया। सेल्फी और दूसरी सोशल मीडिया रणनीतियां भाजपा नेता की छवि को बेहतर करने में मददगार साबित हो सकती हैं (टेलर, 2015)। मोदी के बेहद लोकप्रिय ट्विटर एकाउंट पर सेल्फी को काफी महत्वपूर्ण जगह मिलती है और सोशल मीडिया के इस चालाकी से किए गए इस्तेमाल से युवाओं में उनकी काफी लोकप्रियता है। संचार को ले कर वे जैसी रणनीति बनाते हैं, उसे देख कर दर्शन का ध्यान आता है, जिसमें आप भगवान की ओर देखते हैं और खुद को धन्य समझते हैं (बॉयसो, 2016)। कई बार लोग मोदी को भगवान की तरह देखते हैं। खास कर इस उदाहरण से आप आसानी से समझ सकते हैं कि वे अपनी छवि का कैसा इस्तेमाल करते हैं। साल 2014 के प्रचार के दौरान उन्होंने होलोग्राम तकनीक का इस्तेमाल किया ताकि एक साथ उन्हें कई जगह पर देखा जा सके। संभव है कि वह रणनीति उनकी देवता-सरीखी छवि बनाने में मददगार साबित हुई हो।

ये उदाहरण बताते हैं कि मोदी लोगों से सीधा संवाद कायम करने में सक्षम भी हैं और इच्छुक भी हैं। वे चाहते हैं कि पारंपरिक मीडिया जो फिल्टर का काम करता है, उसकी भूमिका समाप्त हो जाए (मलिक, 2016)। मोदी जब विदेश जाते हैं उस दौरान वहां के लिए संदेश देने के लिहाज से भी सोशल मीडिया ही उनकी पहली पसंद हो गई है। वे दूसरे देशों के लोगों के सामने उनकी अपनी भाषा में बात रखते हैं। सोशल मीडिया एक (अकेला नहीं) जरिया है लोगों को भारत और यहां की सरकार की नीतियों के बारे में अच्छी बातें बताने का। देखा जाए तो यह भारतीय कूटनीति के तरकश में एक तीर है (थरूर, 2016)। साल 2015 की मई के मध्य में चीन के दौरे से पहले वे चीनी सोशल मीडिया प्लेटफार्म वीबो पर भी गए ताकि चीन के लोगों से जुड़ सकें। सोशल मीडिया के जरिए पब्लिक डिप्लोमेसी आधुनिक कूटनीति का एक अहम साधन है, जिसका उद्देश्य खास तौर पर अपनी सॉफ्ट पॉवर को पेश करना है (मल्लापुर, 2015)।

निष्कर्ष – क्या सॉफ्ट पॉवर ही सब कुछ है? 

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की रणनीति है कि वे भारत की सॉफ्ट पॉवर को परोसें। इस रणनीति से निश्चित रूप से भारत की विदेश नीति को संचालित करने में नई ऊर्जा का संचार हुआ है। हालांकि मुखर्जी के मुताबिक “इस समय भारत के पास कोई सुसंगत संदेश या छवि नहीं है” (2005,56)। साथ ही इस बात के भी बहुत कम प्रमाण हैं कि भारत की सॉफ्ट पॉवर की वजह से किसी और देश की भारत के संबंध में नीति या भारत की किसी और देश के संबंध में नीति पर कोई प्रभाव पड़ा हो (बारू, 2009, 283)।

इस समय सॉफ्ट पॉवर के हिसाब से भारत शीर्ष 30 देशों में शामिल नहीं है।[ii] भारत आज भी साफ्ट पॉवर के लिहाज से छोटा देश ही है (हायमैन्स, २००९, २३४)। प्रधानमंत्री मोदी भारत की सॉफ्ट पॉवर और खास तौर पर मूल्यों और संस्कृति का प्रदर्शन करने के साथ ही आर्थिक साझेदार के तौर पर इसकी संभावनाओं को भी दिखा रहे हैं। उन्होंने पिछले दो साल के दौरान कई देशों का कूटनीतिक दौरा किया है। हालांकि इस दौरान दूसरे देशों के साथ रिश्तों को मजबूती देने में सॉफ्ट पॉवर के इस्तेमाल का बहुत सीमित लाभ मिला है। उदाहरण के तौर पर “भारत को अभी भी अपने सॉफ्ट पॉवर का इस्तेमाल कर अपने पड़ोसियों का व्यवहार ठीक करने में परेशानी आ रही है। कमजोर लोकतंत्र और तेजी से हो रहे राजनीतिक बदलावों वाले पड़ोस के देश भारत के मजबूत और स्थायी लोकतंत्र से खतरा महसूस करते हैं” (मिश्रा, 2016)।

लेखक परिचय- स्टेफनी एम. –एल. हेंग- ओआरएफ में विजिटिंग फेलो और सेंट लूईस यूनिवर्सिटी, ब्रूसेल्स के पीआरईसीओएम (पोल डी रिसर्चेज सुर ला कम्यूनिकेशन एट लेस मीडियास) में सदस्य हैं।

ये लेखक के निजी विचार हैं।

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