• Feb 16 2017

सेहत के काम नहीं आ रही हरिद्वार की समृद्धि

कुपोषण से लेकर उच्च शिशु मृत्यु दर तक, स्वास्थ्य के लगभग हर पैमाने पर उत्तराखंड के हरिद्वार जिले को खास सुधार करने की जरूरत है।

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मांग कर गुजारा चलाने वाला छोटा बच्चा अस्सी घाट पर

Source: Valenciano

हरिद्वार को ईश्वर के द्वार के रूप में तो जाना ही जाता है, यह अपनी समृद्ध संस्कृति, इतिहास और प्राकृतिक माहौल के लिए भी विख्यात है। यहां हरे-भरे जंगल तो प्रचुर हैं ही, साथ ही यह उन शुरुआती शहरों में भी शामिल है, जहां गंगा पहाड़ों से निकल कर मैदान से मिलती है। इसी तरह इस जिले के पास खेती और विकास से जुड़ी दूसरी गतिविधियों के लिए अच्छे खासे जल संसाधन भी हैं। लेकिन भौगोलिक रूप से इसकी बेहतर स्थिति और राज्य में अधिकतम प्रति व्यक्ति घरेलू उत्पादन के रूप में अच्छी आर्थिक स्थिति के बावजूद हरिद्वार उत्तराखंड के दूसरे जिलों के मुकाबले स्वास्थ्य के पैमाने पर बेहद पिछड़ा है।

सामाजिक जनसांख्यिकी

उत्तराखंड की लगभग 10 मिलियन आबादी के पांचवें हिस्से का प्रतिनिधित्व करने वाला हरिद्वार भी मतदान कर राज्य मं नई सरकार चुनने की प्रक्रिया में शामिल है। 48% महिला आबादी के बावजूद क्या यहां महिलाओं से जुड़े मुद्दे इस प्रक्रिया में अहम भूमिका निभाएंगे? यहां हम यह देखने की कोशिश करेंगे कि राज्य का सबसे बड़ा और सबसे ख्यात जिला स्वास्थ्य के मुख्य पैमानों पर कैसा प्रदर्शन कर रहा है। राज्य के अन्य जिलों से अलग, हरिद्वार की आबादी में 64% हिंदू, 34% मुस्लिम और एक प्रतिशत सिख हैं। प्रति हजार पुरुष के मुकाबले महिलाओं के अनुपात यानी लिंगानुपात में यह जिला हमेशा से राज्य के अनुपात से काफी कम रहा है। महिला और पुरुष साक्षरता में जिले में 16% का अंतर है।

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ऊंची बाल मृत्यु दर

अगर मृत्यु दर को आर्थिक सफलता या नाकामी के पैमाने के तौर पर देखा जाए तो हरिद्वार का प्रदर्शन साफ तौर पर बहुत खराब माना जाएगा। एएचएस (वार्षिक स्वास्थ्य सर्वे) के आंकड़े दिखाते हैं कि राज्य में हरिद्वार जिला नवजात मृत्यु दर (45), शिशु मृत्यु दर (64) और पांच साल से कम उम्र के बच्चों की मृत्यु दर (77) सभी मामलों में सबसे बुरी स्थिति में है। यह दर प्रति हजार जीवित प्रसव के अनुपात में होने वाली मृत्यु के हिसाब से दर्ज की जाती है। राज्य में जिलों के बीच इस लिहाज से भारी अंतर है और हरिद्वार इस लिहाज से सबसे बुरी स्थिति में है। उदाहरण के तौर पर रुद्रप्रयाग जिले के मुकाबले हरिद्वार की नवजात मृत्यु दर चार गुना और पांच साल से छोटे बच्चों की मृत्यु दर तीन गुना ज्यादा है।

ग्रामीण इलाकों में लैंगिक भेदभाव

बाल मृत्यु के लिहाज से हरिद्वार की एक और अलग बात यह है कि यहां लड़कियों के बचने की संभावना कम होती है। यहां लड़कियों की मृत्यु दर के आंकड़े उनकी बदहाली दिखाते हैं। ग्रामीण हरिद्वार में शिशु मृत्यु दर 75 और पांच साल से कम उम्र की बच्चियों की मृत्यु दर 96 है। जन्म के समय लैंगिक अनुपात शहरी हरिद्वार में प्रति हजार लड़कों के मुकाबले 773 लड़कियों का है। लड़कों और लड़कियों के बीच इतना अंतर दूसरे जिलों में नहीं दिखाई देता। जीवित बचने के लिहाज से भी ये आंकड़े दूसरे जिलों से विपरीत हैं, जहां लड़कों के जीवित बचने के अनुपात में बहुत कम अंतर है।

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ऊंची नवजात मृत्यु दर

नवजात मृत्यु दर एक गंभीर चिंता का विषय है और शिशु मृत्यु का 70% योगदान इसी का है। ज्यादा खतरे वाली गर्भवती महिलाओं की पहचान कर उन्हें प्रसव के दौरान और इसके उपरांत देखभाल उपलब्ध करवाना बेहद जरूरी है। हरिद्वार में बाल मृत्यु दर को तेजी से कम करने के लिए यह कारगर कदम हो सकता है। साथ ही नवजात मृत्यु के मामलों की पहचान करना भी जरूरी है, ताकि बच्चों को बचाने के लिए नीतियों में जरूरी बदलाव लाया जा सके।

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स्वास्थ्य प्रदर्शन के लिहाज से पिछड़ा

दूसरे जिलों के मुकाबले हरिद्वार स्वास्थ्य पैमानों पर कई लिहाज से पिछड़ा हुआ है। गर्भावस्था के दौरान पूर्ण देखभाल (एएनसी), प्रसव के दौरान सांस्थानिक देख-भाल और पूर्ण टीकाकरण ऐसे मुख्य उपाय हैं, जिनके जरिए शिशु मृत्यु दर में कमी लाई जा सकती है। एएचएस के आंकड़े बताते हैं कि हरिद्वार में प्रत्येक छह गर्भवति महिलाओं में सिर्फ एक को ही पूर्ण एएनसी मिल पाता है। पूर्ण एएनसी का मतलब है तीन बार डॉक्टरी जांच, कम से कम एक टीटी इंजेक्शन और आयरन व फॉलिक एसिड का सौ दिनों तक उपयोग। लेकिन एएचएस के बाद के राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वे (एनएफएचएस — 2015-16) में तो यह स्थिति और बुरी पाई गई है, जिसके मुताबिक प्रत्येक 13 में सिर्फ एक महिला को एएनसी मिल पा रहा है।

एनएफएचएस — 2015-16 के मुताबिक हरिद्वार में (63%) सांस्थानिक प्रसव इसके पड़ोसी देहरादून (84%) या दूसरे मैदानी जिले, जैसे कि ऊधम सिंह नगर (68%) के मुकाबले बहुत कम है। चूंकि राज्य की आबादी का पांचवां हिस्सा यहीं रहता है, यह पूरे राज्य के अनुपात को भी नीचे पहुंचा देता है।

मूलभूत टीकों की उपलब्धता से शिशुओं और बच्चों को कम से कम ऐसी बीमारी से बचाया जा सकता है, जिनमें टीके प्रभावी हैं। लेकिन राज्य में बच्चों को सभी टीके दिलाने के लिहाज से भी हरिद्वार का प्रदर्शन बहुत खराब है। यहां सिर्फ 55 फीसदी बच्चों का पूर्ण टीकाकरण हो पाता है, जबकि राज्य में यह दर 58 फीसदी है और सबसे अच्छा प्रदर्शन करने वाले पिथौरागढ़ जिले में तो यह 74% है। इसका नतीजा हम शिशु मृत्यु दर में देख सकते हैं जो राज्य के दूसरे जिलों के मुकाबले काफी अधिक है।

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हरिद्वार पिछड़ा क्यों है?

मैदानी इलाके में होने और अच्छी परिवहन व्यवस्था होने की वजह से यहां प्रभावी लोक स्वास्थ्य व्यवस्था को ले कर कोई गंभीर चुनौती नहीं होनी चाहिए। खास तौर पर स्वास्थ्य कर्मियों और अन्य कर्मचारियों की यहां कमी नहीं होनी चाहिए, क्योंकि ग्रामीण इलाकों की तरह यहां रहने में किसी को शायद ही एतराज हो। इसके बावजूद स्वास्थ्य पैमाने यहां की बेहतर आर्थिक और भौगोलिक स्थिति को नहीं दर्शाते। ऐसी बदहाली को लचर स्वास्थ्य प्रशासन और दूसरे सामाजिक पैमाने और बुरी स्थिति में पहुंचा देते हैं।

कुपोषण इस जिले में एक अहम चिंता का विषय है। यहां पैदा होने वाले एक-तिहाई बच्चे कम वजन के पैदा होते हैं। यह खतरे की एक प्रमुख वजह है और बच्चे की मृत्यु का अहम कारण बनता है। हरिद्वार में डायरिया भी बहुत अधिक (18%) है। राज्य के अनुपात से यह एक प्रतिशत ज्यादा है, लेकिन भारत में यह बच्चों की मृत्यु का एक प्रमुख कारण है।

हरिद्वार में कुल प्रजनन दर (टीएफआर) भी सबसे ज्यादा 2.7 है, जबकि अधिकांश दूसरे जिले 2.1 के प्रतिस्थापन दर पर या उसके बहुत करीब हैं। यहां कुपोषण की दर ज्यादा है और विवाह की औसत उम्र कम। ऐसे में जब महिलाओं को ज्यादा बच्चे पैदा होते हैं तो कम वजन वाले बच्चे होने, बच्चों के कुपोषित होने और उनकी मृत्यु होने की आशंका बढ़ जाती है। साथ ही उनके पर्याप्त और व्यवस्थित देखभाल की उम्मीद भी घट जाती है।

ग्रामीण स्वास्थ्य आंकड़े दर्शाते हैं कि उत्तराखंड में प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में डॉक्टरों के 50% से ज्यादा स्वीकृत पद (लगभग 165 डॉक्टर) खाली पड़े हैं। विशेषज्ञों के लिहाज से देखें तो यह स्थिति और बुरी है, क्योंकि राज्य के सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों में 75 फीसदी पद (148 सर्जन, ओब्सटेट्रीसियन, गायनाकोलॉजिस्ट, फिजीसियन और पिडिएट्रीसियन) खाली हैं। राज्य भर में खाली पड़े इन पदों का असर ग्रामीण हरिद्वार की सेवाओं पर भी पड़ना लाजमी है।

जरूरी है बेहतर स्वास्थ्य प्रशासन

प्रधानमंत्री की घोषणा के अनुकूल 2017 के बजट में गर्भवती महिलाओं को बढ़ी हुई वित्तीय मदद देने के लिए संसाधन आवंटित किए गए हैं। स्वास्थ्य और संबंधित क्षेत्रों में ऐसी बढ़ोतरी से हरिद्वार जैसे जिलों में शिशु मृत्यु दर और कुपोषण को दूर करने में काफी मदद मिल सकती है।

लेकिन राज्य और जिले को भी स्वास्थ्य प्रशासन के लिए एक दृष्टिकोण विकसित करना होगा। सबसे पहली प्राथमिकता स्वीकृत पदों पर डॉक्टरों और विशेषज्ञों को उपलब्ध करवाने की होनी चाहिए। अच्छे प्रशासन के लिए सार्वजनिक स्वास्थ्य केंद्रों और अस्पतालों में जांच सुविधाओं की उपलब्धता और गुणवत्ता सुनिश्चित करना भी जरूरी है।

समय पूर्व प्रसव के प्रबंधन और नवजात बच्चों में होने वाले संक्रमण को रोकने के लिए स्वच्छता और व्यवस्थित ओब्सटेट्रिक प्रबंधन भी बहुत जरूरी है। जन्म के समय सांस्थानिक सुविधा का उपलब्ध होना भी एक महत्वपूर्ण पहलू है। क्योंकि घर पर होने वाले प्रसव के दौरान अगर कोई आपातकालीन स्थिति आ जाए तो ना मेडिकल विशेषज्ञता उपलब्ध होती है और ना ही जरूरी संसाधन। सामुदायिक स्वास्थ्य सेवाओं को भी मजबूत किए जाने की जरूरत है। नवजात बच्चों की रेफरल, परिवहन, सस्ती स्वास्थ्य सेवा की उपलब्धता या जानकारी के अभाव में मृत्यु नहीं होनी चाहिए।

स्वास्थ्य के पैमानों पर हरिद्वार की बदहाली को देखते हुए स्पष्ट है कि अगर इसे सस्टेनेबल डेवलपमेंट गोल (एसडीजी) हासिल करना है तो अपनी नीतियों पर गंभीरता से पुनर्विचार करना होगा। जिले की पहली तात्कालिक प्राथमिकता तो राष्ट्रीय कार्य योजना के लक्ष्य को पूरा करने में सहयोग करना होनी चाहिए। इस कार्य योजना के तहत यह लक्ष्य रखा गया है कि 2019 तक भारत की शिशु मृत्यु दर को 29 तक लाया जा सके। इस लक्ष्य के करीब पहुंचने में हरिद्वार के लिए बेहतर स्वास्थ्य प्रशासन बेहद जरूरी है।

ये लेखक के निजी विचार हैं।

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