• Mar 30 2017

संरक्षणवाद का दामन आगे भी थामे रहेगा चीन

  • Preety Bhogal

चीन की व्यापार और निवेश संवर्धन नीति काफी हद तक व्यापारिकता या व्यावसायिकता से प्रेरित थी, जिसके तहत अकूत धन-दौलत बटोरने के लिए संरक्षणवादी नीतिगत उपायों को अपनाकर आयात की तुलना में निर्यात को कहीं अधिक बढ़ावा दिया गया।

यह लेख श्रृंखला The China Chronicles का पांचवां भाग है। 

पहला भाग ► चीन के लिए आसान नहीं क्षेत्रीय वर्चस्व की डगर

दूसरा भाग  ► वैश्वीकरण के गेम में चीन का चैंपियन बनना खतरनाक

तीसरा भाग ► चीन के ऊर्जा सुरक्षा लक्ष्यों को फि‍र से तय करने की कोशिश

चौथा भाग ► आईएसआईएस से चीन को नए खतरे की तह में जाना जरूरी


संरक्षणवाद के इस युग में चीन मुक्त व्यापार और खुले बाजारों के एक हिमायती के रूप में उभरने की कोशिश कर रहा है। इस वर्ष दावोस में विश्व आर्थिक फोरम के वार्षिक सम्मेलन के दौरान चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने दुनिया की अर्थव्यवस्थाओं के बीच और ज्‍यादा एकीकरण सुनिश्चित करने की वकालत की। यदि कोई उनके शब्दों पर भरोसा करे, तो वैसे में यह सवाल अवश्‍य ही लाजिमी है: क्या चीन वास्तव में अपने बाजारों को विदेशी प्रतिस्पर्धा हेतु खोल रहा है अथवा क्‍या यह महज अमेरिका के मुकाबले चीन को कहीं ज्‍यादा बेहतर ढंग से पेश करने के लिए बहुपक्षीयवाद को लेकर उनकी धूर्त व्‍यग्रता को दर्शाता है?

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वर्ष 1978 में चीन ने अपनी मौजूदा सरकार नियंत्रित नियोजन प्रणाली को और अधिक उदार एवं बाजार-आधारित व्‍यवस्‍था में बदलने के लिए आर्थिक सुधार प्रक्रिया शुरू की। अर्थव्यवस्था के उदारीकरण के इस निर्णय ने चीन के आर्थिक विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। 'खुले द्वार' की अपनी नीति (सुधार पैकेज के हिस्से के रूप में पेश किया गया) के तहत चीन ने विदेश व्यापार और निवेश को प्रोत्साहित किया। इसके बावजूद चीन की व्यापार और निवेश संवर्धन नीति काफी हद तक व्यापारिकता या व्यावसायिकता से ही प्रेरित थी, जिसके तहत अकूत धन-दौलत (विदेशी मुद्रा) बटोरने के लिए संरक्षणवादी नीतिगत उपायों को अपनाकर आयात की तुलना में निर्यात को कहीं अधिक बढ़ावा दिया गया। सरकार ने जान-बूझकर निर्यात उद्योगों को विशेष रियायतें दीं। निर्यात उद्देश्यों के लिए आयात की गई सामग्री पर कोई शुल्क नहीं लेना, प्रांतों में निर्यात प्रसंस्करण क्षेत्रों (जोन) की स्थापना करना, अल्पकालिक या दीर्घकालिक वित्तपोषण के लिए विशेष ऋण देना, इत्‍यादि इन विशेष रियायतों में शामिल हैं। इसके अलावा, इन उद्योगों को निर्यात से अर्जित विदेशी मुद्रा का एक हिस्सा अपने पास बनाए रखने और व्यवसाय में फिर से इसका निवेश करने की स्वायत्तता दी गई थी। सरकार ने अस्‍सी के दशक के दौरान विदेशी मुद्रा को रेन्मिन्बी (आरएमबी) में परिवर्तित करने के लिए एक अनुकूल विनिमय दर (1 अमेरिकी डालर में 1.6 आरएमबी की आधिकारिक विनिमय दर के बजाय 1 अमेरिकी डालर में 2.8 आरएमबी) भी निर्यात उद्योगों को सुलभ कराई। जहां तक निवेश का सवाल है, विदेशी निवेशकों को चीनी श्रमशक्ति का उपयोग करके निर्यात वस्‍तुओं के उत्पादन के लिए निर्यात प्रसंस्करण क्षेत्रों में कारखाने (या तो स्वतंत्र रूप से या चीनी कंपनियों के साथ मिलकर संयुक्त रूप से) लगाने के लिए प्रोत्साहित किया गया। इसके परिणामस्वरूप चीन को दो तरह से भरपूर फायदा हुआ — विदेशी निवेशकों की प्रौद्योगिकी, ज्ञान और पूंजी का उपयोग करके उत्पादकता में अच्‍छी-खासी बढ़ोतरी करने में कामयाबी मिली तथा इसके साथ ही घरेलू कामगार ज्‍यादा रोजगार अवसर एवं बेहतर मजदूरी हासिल करने में सफल रहे।

चीन ने अपनी अर्थव्यवस्था को चुनिंदा ढंग से उदार बनाया है जिसके तहत टुकड़ों-टुकड़ों में सुधार लागू करने का नजरिया अपनाया गया। इसके तहत विदेशी निवेशकों के लिए केवल उन क्षेत्रों (सेक्‍टर) को ही खोला गया जिन्‍हें उसकी अर्थव्यवस्था के विकास और प्रगति के लिहाज से अत्‍यंत महत्वपूर्ण माना गया था। इन क्षेत्रों (सेक्‍टर) में मुख्य रूप से श्रम प्रधान या बेहद ज्‍यादा श्रमिकों वाली उत्पादन इकाइयों के साथ-साथ ऐसे क्षेत्र शामिल थे जिन्‍हें उन्नत प्रौद्योगिकी और बुनियादी ढांचे (ऊर्जा एवं पारंपरिक उद्योग) की सख्‍त जरूरत थी। चीन में विदेशी निवेश के प्रवाह के मार्ग में नौकरशाहों से जुड़ी लालफीताशाही और जटिल प्रक्रियाएं भी बाधक थीं। हालांकि, यह नब्‍बे के दशक के मध्य तक की ही गाथा थी। जब चीन उदारीकरण की दिशा में आगे बढ़ा, तो उसकी व्यापारिक और निवेश व्यवस्था में कुछ बदलाव नजर आने लगे।

चीन ने अपनी अर्थव्यवस्था को चुनिंदा ढंग से उदार बनाया है जिसके तहत टुकड़ों-टुकड़ों में सुधार लागू करने का नजरिया अपनाया गया। इसके तहत विदेशी निवेशकों के लिए केवल उन क्षेत्रों (सेक्‍टर) को ही खोला गया जिन्‍हें उसकी अर्थव्यवस्था के विकास और प्रगति के लिहाज से अत्‍यंत महत्वपूर्ण माना गया था।

बाद में, चीन ने विदेशी निवेशकों के लिए सेवा क्षेत्र को खोल दिया और यहां तक कि कुछ विनिर्माण एवं कृषि आयात पर शुल्क दरें भी घटा दीं। औसत व्यापार भारित (वेटेड) शुल्क दरों को वर्ष 1992 के 40.6 प्रतिशत से घटाकर वर्ष 2001 में 9.1 प्रतिशत के स्‍तर पर ला दिया गया। वर्ष 2001 में चीन जब विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) का सदस्‍य बना तो शुल्‍क दरें (टैरिफ) कम करने, गैर-टैरिफ बाधाओं (कोटा) को समाप्‍त करने और विदेशी भागीदारी के लिए महत्वपूर्ण सेवाओं को खोलने की प्रक्रिया को मजबूत बनाया गया था जो अब भी जारी है। वर्ष 2014 में व्यापार भारित औसत शुल्‍क दर घटकर 4.5 प्रतिशत के स्‍तर पर आ गई। हालांकि, यह विकसित देशों जैसे कि संयुक्त राज्य अमेरिका और यूरोपीय संघ की शुल्‍क दरों की तुलना में अब भी अधिक है। वैसे तो विश्व व्यापार संगठन में शामिल होने के बाद चीन ने समग्र औसत शुल्‍क दरें घटा दी हैं, लेकिन कुछ क्षेत्रों जैसे कि ऑटोमोबाइल एवं कृषि वस्तुओं पर शुल्‍क दरें अब भी ज्‍यादा होने के साथ-साथ व्यापार का स्‍वरूप बिगाड़ने वाले अन्‍य उपायों (निर्यात सब्सिडी, सरकार नियंत्रित ट्रेडिंग) को थोपने का सिलसिला भी जारी है। कई विकासशील और विकसित देश अनुचित व्यापारिक तौर-तरीके अपनाने जैसे कि मुद्रा संबंधी गड़बड़ी (मैनिपुलेशन), बौद्धिक संपदा की चोरी, डंपिंग और विदेशी इक्विटी पर पाबंदियां लगाने के आरोप अक्‍सर चीन पर लगाते रहे हैं, जो मुक्त व्यापार के मार्ग में बाधाएं हैं। उदाहरण के लिए, संयुक्त राज्य अमेरिका ने चीन के खिलाफ डब्ल्यूटीओ में शिकायत दर्ज कराई। यह शिकायत चीन के बाजार में अमेरिकी बैंकों के प्रवेश के लिए व्‍यापक पूंजी की अनिवार्यता के रूप में बाधाएं खड़ी करने, चीन में कारोबार करने से अमेरिकी दूरसंचार कंपनियों को बाहर रखने, इत्‍यादि के मद्देनजर दर्ज कराई गई। भारत ने भी चीन द्वारा की जाने वाली डंपिंग के तौर-तरीकों को लेकर उसकी आलोचना की है। वर्ष 2005 से लेकर अब तक डब्ल्यूटीओ ने निर्यात सब्सिडी से संबंधित समस्‍त शिकायतों का लगभग 43 प्रतिशत अकेले चाइनीज कंपनियों के खिलाफ ही दर्ज किया है।

पिछले कुछ दशकों के दौरान वैश्विक अर्थव्यवस्था में चीन का एकीकरण बढ़ तो गया है, लेकिन यह जुड़ाव सर्वदा ही बड़ी सतर्कता के साथ सुनिश्चित किया जाता रहा है क्‍योंकि ऐसा करते समय विदेशी प्रतिद्वंद्वि‍यों के मुकाबले चीन की घरेलू कंपनियों के हितों की रक्षा करने पर ध्‍यान केंद्रित किया जाता रहा है। चीन सामान्‍यत: वैश्वीकरण और मुक्त व्यापार पर एक अलग नजरिया अपनाता है जिसके तहत केवल उन्‍हीं देशों की तरफ सहयोग के हाथ बढ़ाए जाते हैं और उनके लिए चीन के द्वार खोले जाते हैं जो उसे लाभान्वित कर सकें। इतिहास इस बात का गवाह है। यहां तक कि चीन के बाजारों में विदेशी निवेशकों के प्रवेश पर भी कई शर्तें थोप दी जाती हैं। दूसरे शब्दों में, चीन विदेशी कंपनियों को अपने यहां निवेश की अनुमति देने के बदले में प्रौद्योगिकी का हस्तांतरण सुनिश्चित करना चाहता है। चीन को डब्ल्यूटीओ का सदस्‍य बनाने के समझौते में किसी भी तरह के जबरन प्रौद्योगिकी हस्तांतरण की स्‍पष्‍ट तौर पर मनाही है। हालांकि, चीन में बगैर किसी संकोच के इसका अनुकरण किया जाता है। विदेशी निवेशकों पर लगाई गई पाबंदियों के बावजूद चीन विश्व की अन्य अर्थव्यवस्थाओं के साथ साझेदारी करके आर्थिक फायदे हासिल करने में बिल्‍कुल सक्षम है। वित्त यानी पूंजी, बुनियादी ढांचे के विकास और अर्द्ध-तैयार वस्तुओं के साथ-साथ तैयार उत्पादों के लिए भी चीन पर दुनिया की अर्थव्यवस्थाओं की बढ़ती निर्भरता के कारण ही ऐसी नौबत आई है।

चीन सामान्‍यत: वैश्वीकरण और मुक्त व्यापार पर एक अलग नजरिया अपनाता है जिसके तहत केवल उन्‍हीं देशों की तरफ सहयोग के हाथ बढ़ाए जाते हैं और उनके लिए चीन के द्वार खोले जाते हैं जो उसे लाभान्वित कर सकें। इतिहास इस बात का गवाह है।

अतीत में चीन द्वारा विदेशी कंपनियों पर लगाई गई व्‍यापक व्यापारिक और निवेश पाबंदियों को देखते हुए हाल ही में दावोस में चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने जिस तरह से मुक्त व्यापार और बहुपक्षीयवाद की हिमायत की है वह महज बयानबाजी प्रतीत होती है। सूचना प्रौद्योगिकी और नवाचार फाउंडेशन के सूचकांक, जो वैश्विक नवाचार प्रणाली पर विभिन्‍न देशों की आर्थिक और व्यापार नीतियों के प्रभाव का आकलन करने के बाद उनकी रैंकिंग करता है, के मुताबिक चीन 56 देशों की सूची में 44वें स्थान पर है। इससे यह साफ जाहिर होता है कि व्यापार एवं निवेश के जबरन स्थानीयकरण, निर्यात सब्सिडी, या बौद्धिक संपदा अधिकारों की रक्षा करने में विफलता जैसी नीतियों को अपनाते हुए चीन एक ठेठ 'नवाचार लालची व्यवसायी' की तरह बर्ताव करता है। ये नीतियां महज चीन को लाभान्वित करती हैं, जबकि वैश्विक नवाचार प्रणाली को भारी नुकसान पहुंचाती हैं। चीन में प्रतिबंधात्मक नीतिगत माहौल होने के बावजूद इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि 'चयनात्मक उदारीकरण' वाला मॉडल इस देश के विकास में कारगर साबित हुआ है। वर्ष 1989 से लेकर वर्ष 2016 तक की अवधि के दौरान चीन नौ प्रतिशत से भी ज्‍यादा की सालाना औसत विकास दर हासिल करने में कामयाब रहा। जब तक चीन को 'टुकड़ों-टुकड़ों में उदारीकरण' वाली नीति या दृष्टिकोण से पर्याप्त लाभ होते रहेंगे, वह अपेक्षाकृत अधिक पारदर्शी, निष्पक्ष, उदार और नियम-आधारित कारोबारी प्रणाली को अपनाने के लिए तैयार नहीं होगा। चीन की व्यापार व्यवस्था में कुछ भी बदलाव होने के आसार कतई नजर नहीं आ रहे हैं।

राष्ट्रपति शी जिनपिंग की बयानबाजी के बावजूद यही सच है कि चीन संरक्षणवादी था और निकट भविष्य में भी वहां संरक्षणवाद बदस्‍तूर जारी रहेगा।


लेखक के बारे में

प्रीति भोगल ORF में अर्थव्यवस्था और विकास कार्यक्रम में एक जूनियर फेलो के रूप में कार्यरत हैं। वर्तमान में वह कृषि और अंतरराष्ट्रीय व्यापार से संबंधित परियोजनाओं पर काम कर रही हैं। ORF में उनके अनुसंधान अंतर्राष्ट्रीय व्यापार एवं अर्थशास्त्र, डब्ल्यूटीओ और कृषि पर केंद्रित हैं।

ये लेखक के निजी विचार हैं।

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