• Apr 01 2017

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और विश्वविद्यालय

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता एकतरफा नहीं हो सकती, धर्मनिरपेक्षता की आड़ में भारत में कई बार विरोधियों पर सेंसरशिप लगाने का प्रयास हुआ।

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स्रोत: क़ुसै अल शीदी/CC BY 2.0

पिछले कुछ महीनों से भारत और अमेरिका के विश्वविद्यालयों के परिसरों में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से जुड़े विवाद सुर्खियों में रहे हैं। हिंसा की घटनाओं ने अक्सर इनमें आग में घी का काम किया है। अमेरिका में यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया, बर्कले में 1 फरवरी को एक समारोह का आयोजन हुआ जिसमें दक्षिणपंथी वक्ता मिलो इयानोपौलस को भाग लेना था। पर यह कार्यक्रम आरंभ होने से ठीक दो घंटे पहले स्थगित कर दिया गया। इसकी वजह इसके खिलाफ विरोध प्रदर्शन थे जो धीरे धीरे हिंसक हो गए। इयानोपौलस के भाषणों का विरोध अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के लिए उदार और विख्यात स्थान बर्कले की छवि के उलट है। भारत में भी फरवरी के तीसरे सप्ताह में दिल्ली विश्वविद्यालय के रामजस कॉलेज में आयोजित एक समारोह में ऐसी ही घटना घटी। इस आयोजन में जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) के छात्र उमर खालिद एवं शेहला रशीद को भाग लेना था। इस समारोह को हिंदू दक्षिणपंथी छात्र समूह अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) के सदस्यों द्वारा हिंसक विरोध प्रदर्शनों की वजह से स्थगित कर देना पड़ा। एबीवीपी ने दावा किया कि कॉलेज राष्ट्रद्रोहियों को एक मंच उपलब्ध करा रहा है। उल्लेखनीय है कि खालिद पर 2016 में जेएनयू परिसर में एक सार्वजनिक प्रदर्शन के दौरान भारत विरोधी नारे लगाने के आरोप हैं।

इन दोनों ही मामलों में उपजे विवादों ने विश्वविद्यालयों में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की स्थिति को लेकर प्रश्न उठाए हैं। अमर्यादित सोशल मीडिया और ‘फेक’ न्यूज के आज जमाने में ये घटनाएं और अधिक महत्वपूर्ण बन गई है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर अंकुश लगाने के प्रयासों से जुड़ी ये घटनाएं हमें इसका अहसास कराती हैं कि भविष्य कैसा रहने वाला है।  इसे देखते हुए मैं तीन तर्क देता हॅूः पहला, किसी भी विश्वविद्यालय व्यवस्था में, चाहें वे भारतीय हों या फिर अमेरिकी, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अर्थ किसी सिद्धांत को मनमाने तरीके से थोपा जाना नहीं हो सकता; दूसरा, बहुसंख्यकों के अधिकारों की आम तौर पर विभिन्न परिप्रेक्ष्यों में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के दुश्मनों के रूप में पहचान की गई है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का विरोध उदार और राजनीतिक क्षेत्र के वाम ध्रुव और अल्पसंख्यक वर्गों ने भी किया है। तीसरा, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर बहसों को राष्ट्रीय या वैश्विक राजनीतिक रूझानों से अलग कर नहीं देखा जा सकता। जैसेकि वर्तमान परिप्रेक्ष्य में इस्लामी आतंकवाद पर चर्चा को इससे अलग नजरिये से नहीं देखा जा सकता।

अमर्यादित सोशल मीडिया और ‘फेक’ न्यूज के आज जमाने में ये घटनाएं और अधिक महत्वपूर्ण बन गई है।

भारत के शैक्षणिक परिसरों में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता ने आम तौर पर उपनिवेशवाद के बाद दृष्टिकोण को अपनी आवाज दी है जिसने इसके बदले मुक्त अभिव्यक्ति को बाधित करने की अपनी औपनिवेशिक पूर्वजों की आदतों को जारी रखा है। ये भाषण अभिव्यक्ति के अधिकार के संवैधानिक अधिकारों की सीमाओं के अधीन रहे हैं। भारतीय दंड संहिता की धाराओं 153 ए और 295 ए के तहत उन लोगों को दंडित करने का प्रावधान है जो विभिन्न समुदायों के बीच विद्वेश को बढ़ावा देते हैं और जानबूझकर किसी धार्मिक समूह को अपमानित करते है। इन सिद्धांतों का दूसरे समूह को तंग करने के माध्यम के रूप में व्यापक रूप से इस्तेमाल किया गया है जिनका अभिप्राय लोगों की आवाजों को खामोश करना है। राजनीतिक पूंजी या पहचान हासिल करने के इच्छुक राजनीतिक, सांस्कृतिक या धार्मिक संगठनों द्वारा इनका बड़े पैमाने पर दुरूपयोग किया गया है। विश्वविद्यालय के परिसरों में भाषणों, अभिव्यक्तियों को खामोश करने के तरीकों ने अक्सर प्रत्यक्ष रूप से बदसूरत रूप अख्तियार कर ली है। लेखकों, कलाकारों एवं बुद्धिजीवियों को अलोकप्रिय विचारों को स्वीकार करने के एवज में अक्सर धमकी दी जाती रही हैं या उन पर हमले किए जाते रहे हैं। 1992 में, जामिया मिलिया के उपकुलपति मुशीरल हसन को उनके इस बयान के लिए बुरी तरह मारा पीटा गया कि सलमान रूशदी का उपन्यास ‘द सैटेनिक वर्सेस’ प्रतिबंध का हकदार नहीं था।

2011 में, विद्वान लेखक ए.के.रामानुजन के निबंध ‘300 रामायणः पांच उदाहरण और अनुवाद पर तीन विचार’ को दिल्ली विश्वविद्यालय के पाठ्यक्रम से हटा दिया गया क्योंकि हिंदू दक्षिणपंथी समूहों ने इसका विरोध किया था और उन्होंने इसकी प्रस्तावना पर ही आपत्ति जताई थी।

वैश्विक कल्पना में, अमेरिका के विश्वविद्यालय परिसरों को लंबे समय तक अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की एक माकूल जगह के रूप में देखा जाता रहा है। पर इसकी इस आदर्श छवि को दो महत्वपूर्ण तथ्यों ने धूमिल किया है।

1992 में, जामिया मिलिया के उपकुलपति मुशीरल हसन को उनके इस बयान के लिए बुरी तरह मारा पीटा गया कि सलमान रूशदी का उपन्यास ‘द सैटेनिक वर्सेस’ प्रतिबंध का हकदार नहीं था।

पहला भारत की तरह ही अमेरिका में भी उसके अपने अति संवेदनशील क्षेत्र हैं। ये सीमाएं सभी संस्थानों में अलग-अलग हैं लेकिन दो उदाहरण, जो पूरे शिक्षा क्षेत्र में व्यापक रूप से प्रयोग में लाए जाते हैं वे हैं — अश्वेतों को लेकर इस्तेमाल किए जाने वाला रंगभेद सूचक शब्द और फिलिस्तीनियों को लेकर इजरायल की नीतियों की आलोचना। 2003 में, एमरॉय विश्वविद्यालय में मानव शास्त्र विभाग में एक संकाय सदस्य ने एक सार्वजनिक समारोह में बुडपाइल में छह बार इस रंगभेद सूचक शब्द का प्रयोग किया। उस संकाय सदस्य की काफी भर्त्सना की गई और उसे जातिवादी भाषा का प्रयोग करने के लिए सजा के तौर पर विविधता की शिक्षा देनेा वाला प्रशिक्षण लेने को विवश किया गया। 2006 में, अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति जिमी कार्टर की किताब ‘पेलस्टाइन: पीस नॉट अपारथायड’ को इजरायली नीतियों की दक्षिण अफ्रीका के रंग भेद से तुलना किए जाने के कारण पूरे अमेरिका में अनगिनत यहूदी विद्वानों के हाथों कटु आलोचना का शिकार बनना पड़ा। वास्तव में रंग भेद (अपारथायड) शब्द के प्रयोग के लिए उनकी निंदा की गई।

दूसरा, अमेरिकी विश्वविद्यालय में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का उपयोग हमेशा ही विभिन्न कारकों के बीच संतुलन लाने के लिए किया जाता रहा है। ये कारक हैं — अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के सिद्धांत का बचाव; विभिन्न समूहों के बीच असमानता और विषम शक्ति संबंधों के इतिहासों की स्वीकृतिः और यह निष्पक्षता सुनिश्चित करने की जरुरत कि कोई भी समूह, विशेषकर ऐतिहासिक रूप से सताए गए समुदाय पर जानबूझकर विचारों द्वारा हमला न किया जाए। दूसरे शब्दों में, प्रथम संशोधन (फर्स्ट अमेंडमेंट) का बचाव करने का एसीएलयू मानक सटीक तरीके से अमेरिकी विश्वविद्यालय परिसर पर लागू नहीं होता।

अमेरिकी विश्वविद्यालय में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का उपयोग हमेशा ही विभिन्न कारकों के बीच संतुलन लाने के लिए किया जाता रहा है।

कहने की जरूरत नहीं कि दोनों स्थानों में अभिव्यक्ति की वास्तविकताएं काफी कड़वी हैं। भारतीय मामले में, टिप्पणीकारों ने सही ही कहा है कि जामिया मिलिया विश्वविद्यालय जैसे विश्वविद्यालयों ने पाखंड पूर्ण तरीके से धर्मनिरपेक्षवाद एवं अल्पसंख्यक अधिकारों की सुरक्षा जैसे उदार सिद्धांतों के आधार पर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को बाधित करने की कोशिश की। उन्होंने भारतीय उदार-वामपंथियों की दोहरी सोच की और भी इशारा किया कि जो अल्पसंख्यकों के लिए आक्रामक मानी जाने वाले सामग्री का सक्रिय रूप से विरोध करने जबकि बहुसंख्यक हिंदू समुदाय के चित्रण को लेकर प्रतिबंध (सेंसर) लगाने की इसी प्रकार की कार्रवाई से बचने का प्रयास किया। अमेरिका में श्वेत समूहों ने तर्क दिया है कि उन्हें भी अश्वेतों, समलैंगिकों, एलजीबीटी और पूर्व औपनिवेशिक देशों के व्यक्ति विशेषों की ही तरह पूर्व औपनिवेशिक राष्ट्रों से ऐतिहासिक रूप से उत्पीडि़त समुदाय माने जाने की जरुरत है। इन अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता विवादों में एक और महत्वपूर्ण मुद्दा वह अस्पष्ट क्षेत्र प्रतीत होता है जो सिर्फ आक्रामक भाषण और विद्वेषपूर्ण भाषण के बीच के अंतर को परिभाषित करता है। वैश्विक प्रचलित रीति(जैटगेइस्ट) में दक्षिणपंथ की तरफ बढ़ता आम झुकाव एवं चरम दक्षिण के राजनीतिक उदारवाद में बढ़ती वैधता, जो स्वीकृत अभिव्यक्ति में दायरे से बाहर निकलता प्रतीत होता था, को अब जाहिराना तौर पर अस्वीकार्य नहीं माना जाता। मिलो इयानोपौलस अभी भी कई लोगों के लिए इस दायरे के बाहर हो सकते हैं लेकिन अमेरिका के कॉलेज में बोलने के लिए उन्हें आमंत्रित किया जाना इस बात का संकेत हैं कि उनके द्वारा व्यक्त कई भेदभावपूर्ण विचारों को छात्रों के एक वर्ग द्वारा वैद्य माना जाता है। यह स्थित चिंताजनक है। इसी प्रकार, भारत में आरएसएस एवं उनसे संबद्ध संगठनों, जिन्हें एक समय हाशिये पर धकेल दिया गया था, की मौजूदगी अब नियमित रूप से परिसरों, संगोष्ठियों, साहित्यिक समारोह और ऐसे अन्य अवसरों देखी जा सकती है।

भारत में, मुसलमानों को ठेस न पहुंचाने की एक रणनीति के रूप में ‘धर्मनिरपेक्ष’ सेंसरशिप के प्रचलन, जिसे कांग्रेस द्वारा ‘द सैटेनिक वर्सेज’ पर लगाए गए प्रतिबंध से बढ़ावा मिला, को हिन्दूवादी दक्षिणपंथी संगठनों ने जमकर भुनाया है।

और अंत में, 9/11 की अमेरिकी घटना के बाद, अब यह कोई आश्चर्य की बात नहीं रही कि समसामयिक मौजूदा बौद्धिक परिचर्चा का एक महत्वपूर्ण घटक इस्लाम, इन सभी विवादों के मूल में है। भारत में, मुसलमानों को ठेस न पहुंचाने की एक रणनीति के रूप में ‘धर्मनिरपेक्ष’ सेंसरशिप के प्रचलन, जिसे कांग्रेस द्वारा ‘द सैटेनिक वर्सेज’ पर लगाए गए प्रतिबंध से बढ़ावा मिला, को हिन्दूवादी दक्षिणपंथी संगठनों ने जमकर भुनाया है। वास्तव में, धार्मिक समूह अब मजहब या सांस्कृतिक परंपरा के किसी भी प्रतिनिधित्व में एकाधिकार की मांग करने लगे हैं। अमेरिका में, विश्वविद्यालय परिसरों पर मुस्लिम समूहों ने वक्ताओं एवं यहां तक कि ‘अमेरिकन स्नाइपर’ जैसी फिल्मों को दिखाए जाने को लेकर इस्लाम के प्रति झूठा डर फैलने का आरोप लगाया है और उन पर ऐतराज किया है। छोटे स्तर पर आक्रामकता (माइक्रोएग्रेसन) एवं सांस्कृतिक विनियोग (एप्रोप्रिएशन) को लेकर कालेज परिसरों में देखे जा रहे नए उन्माद के साथ उन्होंने मुसलमानों की एक असहिष्णु, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के विरोधी की छवि बना दी हैं और विश्वविद्यालयों की छवि बहुसंख्यकों की कीमत पर अल्पसंख्यकों को लुभाने के लिए समर्पित स्थानों के रूप में गढ़ दी है।

इस समस्या का कोई एक और सर्वमान्य समाधान नहीं हो सकता। लेकिन अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और अहिंसक विरोध के एक स्थान के रूप में विश्वविद्यालयों के लिए लड़ाई एक छोटी लेकिन असरदार शुरुआत जरुर साबित हो सकती है।


लेखक के बारे में

रोहित चोपड़ा सांता क्लारा विश्वविद्यालय में कम्यूनिकेशन के एक एसोसिएट प्रोफेसर हैं।

ये लेखक के निजी विचार हैं।

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