• Apr 11 2017

मोदी का अगला बड़ा कदम: बुनियादी आय हस्तांतरण!

क्यो पीएम मोदी का अगला बड़ा कदम बुनियादी आय हंस्तातरण हो सकता है?

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नोटबंदी (विमुद्रीकरण) के आर्थिक फायदे चाहे जो भी रहे हों, लेकिन यह तो बिल्‍कुल तय है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की इस आक्रामक एवं अभूतपूर्व पहल ने उत्तर प्रदेश में हुए विधानसभा चुनाव में भाजपा पर वोटों की बारिश सुनिश्चित करके उसे इस राज्‍य का एकछत्र मालिक बना दिया। सबसे खास बात यह रही कि अकूत काला धन बटोर कर धन्‍ना सेठ की कुर्सी पर विराजमान लोगों को दंडित करने के उनके दृढ़ संकल्प से मतदाता बेहद ज्‍यादा प्रभावित थे। हालांकि, इस अप्रत्‍याशित कदम से वे लोग भी 'दंडित' होने से नहीं बच पाए जिनके पास कुछ भी काला धन नहीं था। यह 'समानान्‍तर दंड' उन्‍हें लंबे समय तक हुई असुविधा, बिजनेस अथवा रोजगार के नुकसान के रूप में मिला।

चुनाव में बेहद आश्‍चर्यजनक रूप से 41 प्रतिशत मतदाताओं ने भाजपा को जबरदस्‍त बहुमत के साथ राज्‍य की सत्‍ता की बागडोर सौंप दी। इन मतदाताओं में संभवत: वे लोग भी शामिल थे जिन पर नोटबंदी (विमुद्रीकरण) की मार अप्रत्‍यक्ष रूप से पड़ी थी। इससे यह बात एक बार फिर साबित हो गई है कि राजनीति में 'अच्छे इरादों' का कोई सानी नहीं है क्‍योंकि वे सदा ही 'तकनीकी दृष्टि से उचित कदम' पर भारी पड़ते हैं।

अत: ऐसे में यह सवाल उठना लाजिमी ही है कि विपक्ष को तगड़ा झटका देने एवं विस्‍मय से भर देने और देश भर में लोगों के दिलों-दिमाग को जीतने के लिए प्रधानमंत्री आगे कौनसा कदम उठा सकते हैं? वर्ष 2018 में कर्नाटक में चुनाव होने हैं, जहां फि‍लहाल कांग्रेस का शासन है। इसी तरह वर्ष 2019 में राष्ट्रीय स्‍तर पर आम चुनाव होने हैं। इसे ध्‍यान में रखते हुए चाहे जो भी कार्यक्रम शुरू किया जाए उसे निश्चित तौर पर जटिल होने के बजाय सहज, महज पीड़ानाशक होने के बजाय कारगर, शीघ्र लाभ देने योग्य और वित्‍तीय दृष्टि से विवेकपूर्ण या मितव्‍ययी होना चाहिए।

केंद्र सरकार वर्तमान में अपने-आपको 'जनहितकारी' के रूप में पेश करने के लिए बेढंगी एवं आंशिक या पूरी तरह से वित्त पोषित योजनाओं को उपयोग में लाती है जिनका कार्यान्‍वयन राज्य सरकारों द्वारा किया जाता है। कुल मिलाकर इस तरह की 1500 योजनाएं अमल में थीं जिनकी संख्‍या को घटाकर मोदी सरकार ने 657 के आसपास ला दिया है। इनमें से ज्‍यादातर योजनाएं व्‍यापक रूप से अप्रभावी हैं। पूर्व मुख्य आर्थिक सलाहकार अरविंद विरमानी का दावा है कि वे 'एक तिहाई नियम' का पालन करते हैं। उनके मुताबिक, लक्षित लाभार्थियों के लिए केवल एक तिहाई, प्रशासनिक व्यय के लिए एक तिहाई और भ्रष्टाचार के लिए एक तिहाई पर ध्‍यान केंद्रित किया जाता है।

यह ध्यान देने योग्‍य बात है कि यदि नकद सहायता व्‍यवस्‍था के जरिए भी सार्वजनिक सेवाओं और वस्‍तुओं तक लोगों की पहुंच सुनिश्चित की जाए तो भी यह काफी महंगी ही साबित होगी। एमआईटी के प्रो. अभिजीत बनर्जी ने यह आकलन किया है कि समस्‍त देशों में नकद सहायता कार्यक्रमों की औसत प्रशासनिक लागत वितरित की गई कुल धनराशि का 50 प्रतिशत बैठती है।

सभी नागरिकों को नकदी के रूप में सार्वभौमिक एवं बिना शर्त आय हस्तांतरण सबसे कारगर विकल्प है। हालांकि, यह अवधारणा ही सरासर गलत है। कारण यह है कि जितनी धनराशि किसी भिखारी को दी जाती है उतनी ही रकम अचल संपत्ति क्षेत्र के महारथी के खाते में भी डाली जाती है। लेकिन एनआईपीएफपी के सुदीप्‍तो मुंडल का तर्क है कि कार्यक्षमता को व्‍यापक रूप से प्रभावित किए बगैर ही चुनिंदा लोगों या समूहों को इसके दायरे से बाहर किया जा सकता है। उदाहरण के लिए, शहरी क्षेत्रों में रहने वाले किसी भी व्‍यक्ति को नि:संदेह इसके दायरे से बाहर रखा जा सकता है। दरअसल, शहरी इलाकों में औसत आमदनी ग्रामीण इलाकों की तुलना में निरंतर अधिक पाई जाती रही है। वहीं, ग्रामीण क्षेत्रों में ही 80 प्रतिशत गरीब जीवन यापन करते हैं।

उधर, अन्‍य विशेषज्ञ जैसे कि ज्यां द्रेज विशेष रूप से खाद्य पदार्थ संबंधी सहायता के लिए नकद हस्तांतरण को लेकर सशंकित हैं। उनका कहना है, "हम जानते हैं कि सूखे के दौरान खाद्य पदार्थों की कीमतें आसमान पर पहुंच जाती हैं। जाहिर है, इस तरह की आपदाओं के दौरान हस्‍तांतरित की जाने वाली नकद धनराशि से भोजन की लक्षित मात्रा कतई नहीं खरीदी जा सकती है। हाशिए पर रहने वाले लोग ऐसे हालात में अपना पेट कैसे भरेंगे।"

इससे यह साफ हो जाता है कि शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक सुरक्षा से जुड़ी सभी अन्य मौजूदा सामाजिक सहायता व्‍यवस्‍थाओं के लिए बुनियादी आय या नकद हस्तांतरण को सटीक विकल्प नहीं माना जा सकता है। हालां‍कि, यह उन सामाजिक सहायता व्‍यवस्‍थाओं का विकल्‍प हो सकता है जो सबसे बेकार हैं एवं जिनके तहत लाभार्थियों का निर्धारण बड़े ही खराब ढंग से किया गया है।

मुख्य आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रमण्यन की अगुवाई में तैयार किए गए आर्थिक सर्वेक्षण 2017 से राहत भरी जानकारी मिली है। दरअसल, मौजूदा योजनाओं में वित्‍तीय संसाधनों के गलत आवंटन की समस्या का खुलासा करते हुए इस दिशा में बेहतरी का स्‍पष्‍ट संकेत आर्थिक सर्वेक्षण में दिया गया है। देश के 40 फीसदी गरीब तो जिलों में ही रहते हैं, लेकिन इसके बावजूद गरीबी उन्‍मूलन योजनाओं जैसे कि मध्यान्ह भोजन योजना (मिड-डे मील स्‍कीम) के लिए किए गए आवंटन में जिलों की हिस्‍सेदारी सिर्फ 20 प्रतिशत ही है। इसी तरह स्वच्छ भारत मिशन हेतु किए गए आवंटन में जिलों की हिस्‍सेदारी महज 24 प्रतिशत ही है। इस तरह का गलत आवंटन निश्चित रूप से व्यर्थ है।

'सेवा' द्वारा मध्य प्रदेश के चार गांवों में पॉयलट आधार पर एक प्रोजेक्‍ट चलाया गया। दो साल चलाए गए इस प्रोजेक्‍ट के तहत सार्वभौमिक कवरेज सिद्धांत पर अमल करते हुए 6,000 लोगों को कवर किया गया और प्रत्येक वयस्क को प्रति वर्ष 3,600 रुपये हस्तांतरित किए गए, जबकि बच्‍चों को इससे कम धनराशि दी गई। इसके नतीजे अत्‍यंत उत्‍साहवर्धक रहे हैं। इसका सबसे अहम परिणाम यह है कि चार साल बाद भी निर्णय लेने के मामले में महिलाओं की बढ़ती भूमिका; परिसंपत्तियों, मुख्यत: पशुधन से सतत आमदनी और आय का निरंतर उत्पादक उपयोग जैसी कई प्रारंभिक उपलब्धियां अब भी मजबूती के साथ बरकरार हैं। अफ्रीका में भी इसी तरह के पॉयलट प्रोजेक्‍ट चलाए जा रहे हैं। हालांकि, इस बात को अवश्‍य ही ध्‍यान में रखा जाना चाहिए कि पॉयलट आधार पर चलाए जाने वाले इस तरह के प्रोजेक्‍ट के तहत अच्‍छी-खासी सहायता देना एवं मार्गदर्शन करना तथा समुचित निगरानी अत्‍यंत आवश्‍यक है, जिसके बिना सतत आय वृद्धि नगण्य ही रहेगी, जैसा कि घाना में देखा जा चुका है। इसे भी ध्‍यान में रखने की जरूरत है कि सार्वभौमिक बुनियादी आय योजना होने के बावजूद सहायता देने एवं मार्गदर्शन करने का सिलसिला आगे भी जारी रखना होगा।

भारत गरीबी को खत्म करने के उद्देश्‍य से 'योग्य-सार्वभौमिक' बुनियादी आय हस्तांतरण का उपयोग करने वाला दुनिया का पहला देश बन सकता है। वैसे, वास्तविक समस्या यह है कि पैसा आखिरकार कहां से लाएं। हालांकि, प्रधानमंत्री के मुख्य आर्थिक सलाहकार एवं नीति आयोग के उपाध्यक्ष अरविंद पनगढि़या ने वित्‍त की आवश्यकता पर प्रकाश डाला है। प्रति व्यक्ति प्रति वर्ष महज 10,000 रुपये भी मान कर चलें, तो लागत जीडीपी के 10 प्रतिशत के पूरे सरकारी राजस्व के बराबर बैठती है।

हालांकि, दूसरे सबसे अच्छे लाभप्रद विकल्प भी हैं। सबसे पहले, बड़ी रकम के बजाय छोटी धनराशि ही हस्‍तांतरित की जा सकती है। गरीबी की खाई प्रति वर्ष प्रति गरीब व्यक्ति लगभग 3,500 रुपये होने का अनुमान लगाया गया है, जो 'सेवा' के पॉयलट प्रोजेक्‍ट के अंतर्गत उपलब्‍ध कराई गई राशि के कमोबेश बराबर है। आर्थिक सर्वेक्षण में इस बात का उल्‍लेख किया गया है कि हर महिला को 3,240 रुपये के वार्षिक हस्तांतरण की कुल लागत जीडीपी के एक प्रतिशत के बराबर बैठेगी। एक ऐसी अर्द्ध-सार्वभौमिक योजना को अपना कर लागत को और भी घटाया जा सकता है जिसके तहत केवल ग्रामीण क्षेत्रों में ही रहने वाली महिलाओं पर ध्‍यान केंद्रित करना होगा और इसके तहत बालिकाओं को कम राशि तथा महिलाओं को अधिक राशि देनी होगी, जैसा कि 'सेवा' के पॉयलट प्रोजेक्‍ट में देखा गया।

उधर, सब्सिडी संबंधी सुधार पर अमल करना भी अभी बाकी है। प्रधानमंत्री ने 'सब्सिडी त्याग' के दृष्टिकोण को भी अपनाया था, जिसके तहत संपन्‍न लोगों से स्‍वेच्‍छापूर्वक सब्सिडी छोड़ने को कहा गया। इसी तरह अनावश्‍यक सब्सिडी जैसे कि रसोई गैस एवं उर्वरक पर दी जाने वाली सब्सिडी तथा आयकर छूट की प्राप्ति को प्रशासनिक रूप से और अधिक मुश्किल बनाना भी संभव है। इन्‍हें पूरी तरह समाप्‍त करने के लक्ष्य के साथ इस तरह का कदम उठाया जा सकता है।

इस बीच, सबसे गरीब जिलों में से एक तिहाई जिलों को महज 75,000 करोड़ रुपये (वर्ष 2017-18 में अनुमानित जीडीपी का सिर्फ 0.3 प्रतिशत) आवंटित करते हुए एक 'अर्द्ध-सार्वभौमिक' बुनियादी आय हस्तांतरण योजना का शुभारंभ किया जा सकता है। इतना ही नहीं, खासकर यदि आर्थिक विकास दर प्रति वर्ष आठ प्रतिशत से अधिक हो, तो वृद्धिशील राजस्व के सिर्फ 40 प्रतिशत (दो बटा पांचवां हिस्सा) को आवंटित करके इस कार्यक्रम को अन्य जिलों में भी विस्तारित किया जा सकता है।

प्रधानमंत्री मोदी सार्वजनिक हित में अभिनव विचारों के लिए आवश्‍यक वित्त मुहैया कराने में कतई संकोच नहीं करते हैं। अर्द्ध-सार्वभौमिक बुनियादी आय योजना दरअसल एक ऐसा अनोखा दरवाजा है जिससे होकर गुजरने पर प्रधानमंत्री को अवश्‍य ही विचार करना चाहिए। प्रधानमंत्री को यदि पक्‍का भरोसा है कि भारत आठ प्रतिशत से भी अधिक की आर्थिक विकास दर हासिल कर लेगा तो उन्‍हें वाकई इस पर गौर फरमाना चाहिए।

यह लेख सबसे पहले द एशियन एज  में प्रकाशित हुआ।


लेखक के बारे में

संजीव एस. अहलूवालिया ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन के सलाहकार हैं। वह नई दिल्ली स्थित ऊर्जा अनुसंधान संस्थान (टेरी) से अब भी संबद्ध हैं, जहां उन्होंने तीन साल काम किया। वह नई दिल्‍ली स्थित कट्स सेंटर फॉर इन्फ्रास्ट्रक्चर रेगुलेशन एंड कम्पीटिशन (सीआईआरसी) से भी एक मानद की हैसियत से संबद्ध हैं।

उन्‍हें आर्थिक नियमन, संस्थागत विकास, राजनीतिक अर्थव्यवस्था के विश्लेषण, सार्वजनिक क्षेत्र के वित्तीय प्रबंधन एवं प्रदर्शन से जुड़े प्रबंधन में विशेषज्ञता हासिल है।

ये लेखक के निजी विचार हैं।

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