मोदी, नोटबन्‍दी एवं उत्‍तर प्रदेश विधान सभा चुनाव

प्रधानमंत्री मोदी द्वारा नोटबंदी के लिए मांगे गये पचास दिन की मियाद अ‍ाखिरकार पूरी हो गयी । जैसा अपेक्षित था, नववर्ष की पूर्व संध्‍या पर प्रधानमंत्री मोदी ने राष्‍ट्र की जनता को संबोधित किया। उम्‍मीद के मुताबिक मोदी के सम्‍बोधन में बहुत कुछ था। गरीबों, किसानों, महिलाओं, वरिष्‍ठ नागरिकों एवं छोटे-मंझोले व्‍यापारियों के लिए कई रियायते थी। आश्‍चर्यजनक रूप से किसानों के कर्जा माफी या जनधन खातों में पैसा स्‍थानान्‍तरण की घोषणा जिसका कयास लगाया जा रहा था, ऐसा कुछ नहीं हुआ। मोदी सरकार एवं देश ने नोट बन्‍दी से क्‍या खोया क्‍या पाया, इसके आकलन से पूर्व यह आवश्‍यक है कि देश में ‘नोटबंदी’ लेकर क्‍या कुछ रहा, इसकी भी एक बानगी देख ली जाय।

पुराने प्रतिबन्धित 500-1000 के नोटों के जमा करने की समय सीमा समाप्‍त हो गयी है। लाखों करोड़ के प्रतिबन्धित नोट बैंको तक पहुँच चुकें हैं। दो हजार के नये नोटों को लोग मिश्रित भावों से देख रहे हैं । गरीब के हाथ में वो नोट एक ट्राफी से ज्‍यादा शायद कुछ नहीं है । नये नोट पाने की शायद उपलब्धि भर मात्र। अमीर के हाथ में एक विद्रूप एवं बिडम्‍बना भरी नकदी । एक सन्‍हेह से भरा नोट, जिसके बहाने भविष्‍य के ताने – बाने को शायद अब कभी भी आश्‍वस्‍त होकर नहीं बुना जा सकता है ।

शुरूआती सदमें से उबर कर विपक्षी दलों ने संसद एवं सड़क पर खूब हल्‍ला काटा। मोदी ने अघोषित आपात स्थिति ला दी है, पूरा देश बैंकों एवं एटीएम के बाहर लाईन में खड़ा है। अस्‍पताल में पैसों के अभाव में इलाज के लिए मरते मरीज हों या कन्‍यादान के लिए पैसा न जुटा पाने वाला असहाय पिता हो या बोवाई  न कर पाने से हताश किसान की आत्‍महत्‍या, अखबारों एवं चैनल मीडिया ने अपने लगावों के अनुसार नोटबंदी की खूब मीमांसा की। कतारें पहले लम्‍बी रहीं, फिर एटीएम तक में भी वैकल्पिक करेन्‍सी का टोटा रहा । जनता कतारबद्ध खड़ी रह। विपक्षी विस्‍फोटक स्थिति की भविष्‍यवाणियां करते रहें। समीक्षकों ने तो

बाकायदा नोटबंदी का मर्सिया ही पढ डाला। मोदी का फरमान तुगलकी है । मोदी को अर्थशास्‍त्र का ककहरा भी नहीं आता, मोदी अधिनायक वादी हैं वगैरह–– वगैरह ।

लेकिन हुआ कुछ उल्‍टा। जनता ने न तो बैंक लूटा एवं न ही खाद्यान के गोदाम। जनता ने कष्‍ट तो झेला किन्‍तु बगावत पर नहीं उतरी। विपक्षियों के लाख उत्‍तेजनात्‍मक आह्वान के बावजूद जनता सड़कों पर नहीं आयी। एटीएम के सामने लाइनों में घंटों से खड़ी जनता  ने लगभग एक स्‍वर से यही कहा कि यदि नोटबन्‍दी भ्रष्‍टाचार उन्‍मूलन, कालाबाजारी रोकने तथा उग्रवाद एवं सीमापार से आ रहे आतंकवाद के विरूद्ध उठाया हुआ कदम है, तो वे मोदी के साथ हैं। मोदी को पचास क्‍या अगर एक सौ पचास दिन भी देने पड़ेंगे तो सहर्ष देगें।

आम जनता विशेषकर गरीब, मजदूर, किसान, सैनिकों एवं वेतनभोगी अल्‍प/मध्‍यमवर्ग की नवजाग्रत इसी चेतना को समझने में शायद विरोधी दलों, राजनीतिक एवं आर्थिक मामलों के विश्‍लेषक एवं बुद्धिजीवी वर्ग बुरी तरह से असफल रहे। भारत में नोटबंदी कोई अभिनव प्रयोग नहीं है। वर्ष 1946 एवं 1978 में भी इसी प्रकार बड़े नोटों की नोटबंदी हुई थ। परन्‍तु वर्तमान स्थिति बिल्‍कुल भिन्‍न है। देश की मुद्रा का अस्‍सी प्रतिशत से अधिक हिस्‍सा बड़े नोटों में ही है। मोदी की नोटबन्‍दी केवल महज़ एक आर्थिक कदम नहीं है।

कहना मुश्किल है कि मोदी को ‘शक्ति के 48 सिद्धान्‍तों ( द 48 लॉज ऑफ पॉवर––राबर्ट ग्रीन रचित ) को पढने का अवसर मिला अथवा नहीं। किन्‍तु इतना तो निश्चित है कि मोदी के राजनैतिक दांव राबर्ट ग्रीन से अत्‍यधिक प्रेरित हैं। ग्रीन का तीसरा नियम है ‘’अपने इरादे छुपा कर रखो’’। इसकी व्‍याख्‍या में ग्रीन ने स्‍पष्‍ट किया है कि लोगों को अपने इरादों के विषय में अनभिज्ञ रखे, इतना अंधेरे में रखो कि वे संतुलन ही खो बैठे। उन्‍हें अपने असली मकसद की हवा भी न लगनें दो ताकि वे अपना बचाव भी न कर सकें। विरोधियों के मार्ग को धूम्राकुलित कर दो ताकि जब तक वे चेतें तब तक बहुत देर हो जाये।

मोदी इस रणनीति में बेहद कामयाब रहे। विरोधी दल (नितीश कुमार एवं नवीन पटनायक अपवाद स्‍वरूप हैं ) मोदी के झांसे में आ गये। वे नोटबन्‍दी के आर्थिक मर्म को ही समझते रह गये। उन्‍हें लगा कि नोटबन्‍दी से जनता में भूचाल आ जायेगा। जनता भगदड़ में सड़को पर आ जायेगी। सिविल वार जैसी स्थिति बनेगी। जनाक्रोश संभाले नहीं संभलेगा।  चारों तरफ अराजकता  की स्थिति बन जायेगी। लेकिन मोदी का निशाना कहीं और था। 70 साल की आजादी के बावजूद भी अमीर-गरीब की खाई सिर्फ बढ़ी है। एक ओर मुटठी भर नव धनाढ्य और धनाढ्य वर्ग है, जिसे भ्रष्‍ट नेता एवं भ्रष्‍ट अफसर थोडे से लालच के लिए निरन्‍तर पोषित करते रहते हैं। इस वर्ग के लोगों के बच्‍चे विदेशों में पढते है।  डोनेशन एवं कैपिटेशन फीस के माध्‍यम से इंजीनियरिंग/मेडिकल /विधि कालेजों की शिक्षा इनके कदमों पर बिछी है। चमचमाती बेहतरीन लम्‍बी गाड़ि‍यां अट्टालिकाओं जैसे बंगले,  जगमगाते हुए मॉल इस सम्‍पन्‍न वर्ग की पहचान है । शोषण एवं टैक्‍स चोरी एवं भ्रष्‍टाचार से जनित कमाई को धीरे धीरे इस वर्ग ने अपनी मेहनत की गाढी कमाई बताना शुरू कर दिया है। यह एक प्रजातांत्रिक देश में विकसित ‘क्रोनी कैपिटलिज्‍म’ का घिनौना रूप नहीं तो क्‍या है?

देश की 85 से 90 प्रतिशत जनता जो इस भ्रष्‍टाचारयुक्‍त व्‍यवस्‍था में केवल शोषित होने के लिए अभिशप्‍त थी, को नोटबंदी ‘संजीवनी’ से कम न लगी। साम्‍यवादी आम जनता से जिस जन क्रान्ति की उम्‍मीद करते –– करते देश की राजनीति में तेजी से हाशिये पर चले गये , उसी जनता को मोदी ने ‘नोटबंदी’ जैसे अहिसंक हथियार से अपनी ओर खींच लिया। केजरीवाल, ममता बनर्जी एवं मायावती जैसे ‘गरीबों के मसीहा’ नेताओं की भावनात्‍मक टिप्‍पणियां, ‘अरण्‍य रोदन’ से अधिक कुछ नही दिखती है। ‘भारत बन्‍द’ के आह्वान के तो नाम पर भी सहमति नहीं बन पायी। कांग्रेस की छटपटाहट तो समझ में आती है। मोदी ने 70 साल के कालेधन की बात करके प्रकारान्‍तर से कांग्रेस को ही कटघरे में जो खडा किया है।

विपक्ष, अर्थशास्‍त्री एवं समीक्षक नोटबंदी का विवेचन अर्थशास्‍त्र के सिद्धान्‍तों के चश्‍में से कर रहे हैं। लेकिन मोदी का तीर सही निशाने पर लगा है। 125 करोड के देश में यदि वाकई जादू की छड़ी हो तो भी शायद गरीबी दूर होने में वक्‍त लगे। भले ही मोदी गरीबी न दूर पाये हों,  किन्‍तु  उन्‍होने गरीबों का मन तो छू लिया है। गरीब व्‍यक्ति के पास भले ही कोई पूंजी न हो, किन्‍तु उसके पास देशभक्ति की अमीरी अवश्‍य है। पॉच सौ के दो नोट लेकर बैंक की लाईन में खडा होकर उसे कहीं न कहीं यह एहसास तो है कि वह उग्रवाद, सीमापार से प्रायोजित आतंकवाद, कालाबाजारियों के खिलाफ एवं भ्रष्‍टचारियों के विरूद्ध किए जा रहे इस देशव्‍यापी एवं अभिनव प्रयोग में वह महत्‍वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। चैनल के संवाददाता के पूछने पर कि आप घंटो से लाईन में खडे हैं, आपको कैसा लग रहा है? आम आदमी तुरंत खास हो जाता है । जीवन के समस्‍त दर्शन को समेटते हुए बस इतना ही कहता है कि ‘लाईन में लगे रहना तो हमारी नियति ही रही है, अगर देश के लिए कुछ कष्‍ट सहना पड़ रहा है तो इसमें क्‍या बुराई है?’’

विपक्ष का संसद में हंगामा, गरीबों के कथित शुभ चिंतक नेताओं का कल्पित कारणों से नोटबंदी का विरोध, जनता को भा नहीं रहा है। हाल में ही सम्‍पन्‍न लोकसभा––विधान सभा के उपचुनाव एवं महाराष्‍ट्र एवं गुजरात के निकाय चुनाव परिणाम नोटबंदी के पक्ष में आम अनता की सकारात्‍मक रायशुमारी को भलीभॉति दर्शाती है। कारण बहुतेरे हैं, आम जनता ने नोटबंदी के सकारात्‍मक पहलू को समझा है। आम जनता एवं विशेषकर गरीबों को नोटबंदी से कुछ लाभ मिल पायेगा या नहीं, इसका आंकलन करना जल्‍दी बाजी होगी। इतना तो तय है कि गरीब फिलहाल धनाढ्य, नवधनाढ्य, भ्रष्‍ट नेताओं एवं भ्रष्‍ट नौकर शाहों की कसमसाहट से खुश हैं। स्‍थानीय गुंडे, माफिया एवं दलाल जो इस काली कमाई की अपसंस्‍क़ति में ही फलते फूलते हैं, को ‘कोमा’ में देखकर मन ही मन आहलादित है। उसे मोदी की इस बात पर यकीन है कि जो कालाधन बाहर आयेगा, वह गरीबों के पास आयेगा।

उ0प्र0 विधानसभा के चुनाव नोटबंदी की इसी पृष्‍ठभूमि में महत्‍वपूर्ण हो जाते है।  चुनाव में कालाधन शक्तिपुंज की भॉति काम करता है। चुनाव प्रचार में लगी बेनामी गाड़‍ियां, तेल पेट्रोल , शराब, साड़ी, कपड़े मोबाईल फोन तथा नकदी आखिरी दिन तक मतदाताओं को लुभाती है। हरे––लाल नोट चुनावी परिद़श्‍य से तिरोहित हो चुके है। घूस देने वाले के पास भी नयी करेन्‍सी का टोटा है। धनबल हटते ही, किराये का बाहुबल भी काफूर हो गया है। आने वाले समय में भी नयी मुद्रा का संकट बना रहेगा। 70 वर्षो के काले धन की नकदी को पैदा होने में वर्षो लगेंगे। इन परि‍स्थितियों में कम से कम आर्थिक रूप से विधान सभा चुनाव की शुचिता तो तय है। अधिकांश उम्‍मीदवारों को यही चिंता खाए जा रही है।

प्रधानमंत्री की विभिन्‍न परिवर्तन रैलियों को छोड़ दिया जाए तो चुनाव आसन्‍न होने के बाद भी विभिन्‍न दलों की (भाजपा को छोड़कर) चुनावी तैयारियां धरातल पर उतरती नहीं दिख रही है। विपक्षी दल अपने प्रचार से अधिक नोटबंदी के विरोध में व्‍यस्‍त है। बाकी मुद्दो का अता–––पता नहीं है। अनायास ही उ0प्र0 विधान सभा का चुनाव ‘नोटबंदी’ पर जनमत संग्रह बनकर रह गया है।

नोटबंदी के आर्थिक-सामाजिक पहलुओं का आंकलन करना जल्‍दी बाज़ी होगी। क्‍या देश मंदी के दौर से गुजरेगा ? असंगठित क्षेत्रों में फैला रोजगार चौपट हो जायेगा, देश 10 वर्ष पीछे चला जायेगा जैसी अर्थशास्त्रियों की चिन्ताएं क्‍या निर्मूल हैं, यह कहना अभी संभव नहीं है। किंतु नये साल में कुछ संकेत तो स्‍पष्‍ट दिख रहे हैं। मोदी ने नोटबंदी के माध्‍यम से एक असंभव तो कर ही दिखाया है। एक धुर दक्षिणपंथी पार्टी जो उत्‍तर भारत की ब्राहमण-बनिया पार्टी भर जानी जाती है, अचानक गरीबों-मजदूरों की सबसे हितैषी पार्टी बनकर उभरी है। मोदी गरीबों के नये मसीहा है। वे एक ऐसे सपनों के सौदागर हैं जो ‘यथास्थितिवाद’  को बदलना चाहते हैं। एक ‘गरीब चायवाला’ अब भारत के करोड़ों ‘गरीब-गुरबा’ का

रहनुमा बन गया है। गरीबी का कोई ‘धर्म’ नहीं होता है। भाजपा ‘धर्मनिरपेक्षता’ के संशय से अब बहुत आगे बढ़ चकी है। मोदी ने ‘नोटबंदी’ के माध्‍यम से ‘वर्ग-चेतना’ (क्‍लॉस कांशसनेस) को छू लिया है। जाति एवं सम्‍प्रदाय में बंटे देश के लिए यह किसी वैचारिक क्रांति से कम नहीं है। ‘नोटबन्‍दी’ के बाद हुए निकायों के दस हजार से अधिक सीटों में से लगभग आठ हजार सीटों पर भाजपा की विजय आगामी विधान सभा चुनाव के संभावित परिणाम की ओर इशारा करती है।

ये लेखक के निजी विचार हैं।

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