• Apr 25 2017

किसानों, उपभोक्ताओं की खातिर मल्टी-ब्रांड रिटेल को भी खोलें

भारत में मल्टी-ब्रांड रिटेल व्‍यवसाय फल-फूल रहा है। ऐसे में भारतीय रिटेल कंपनियों की ओर से ग्‍लोबल रिटेल दिग्‍गजों को कड़ी टक्‍कर मिलेगी।

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स्रोत: माइक मोजार्ट/फ्लिकर

केंद्र सरकार ने वर्ष 2016 के अपने आम बजट में प्रसंस्कृत (प्रोसेस्‍ड) खाद्य पदार्थों की खुदरा बिक्री (रिटेलिंग) में 100 फीसदी विदेशी पूंजी की घोषणा की थी। अमेजन को ई-कॉमर्स के जरिए ऐसा करने की अनुमति मिल गई है और उसने खाद्य सामग्री ऑनलाइन बेचने के लिए पूर्ण स्वामित्व वाले उद्यम में 500 मिलियन डॉलर निवेश करने हेतु सरकार के समक्ष आवेदन किया है। अब अमेरिका स्थित दिग्गज रिटेल कंपनी वालमार्ट 50 स्टोर खोलने की योजना बना रही है, जिनमें से आधे उत्‍तर प्रदेश और उत्तराखंड में होंगे। वालमार्ट के पहले से ही एक थोक बिक्री (होलसेल) चेन ‘बेस्ट प्राइस स्टोर्स’ के बैनर तले 21 स्टोर हैं। वर्ष 2013 में दोनों के संयुक्त उद्यम का अस्तित्‍व समाप्त हो जाने के बाद वालमार्ट ने इस ‘कैश एंड कैरी’ उपक्रम में भारती एंटरप्राइज की 50 प्रतिशत हिस्सेदारी खरीद ली थी (उन कैश एंड कैरी उपक्रमों में 100 फीसदी एफडीआई, जो केवल सदस्यों को ही थोक में बेचते हैं, इसे वर्ष 2003 में अनुमति दी गई थी)।

सामान्‍य स्टोर के रूप में कार्यरत खाद्य खुदरा क्षेत्र को खोलने के लिए सरकार की शर्त यही है कि सभी उत्पादों को भारत के अंदर से ही हासिल करना होगा। मतलब यह कि इसके तहत विदेश से उत्‍पादों को मंगाकर यहां बेचने की इजाजत नहीं होगी। हालांकि, इस शर्त से वालमार्ट परेशान नहीं है, क्‍योंकि इसके सीईओ के मुताबिक सीमा शुल्‍क (कस्टम ड्यूटी) ज्‍यादा होने के कारण उनकी कंपनी कई आयातित वस्तुओं को यहां नहीं लाती है।

अतीत में भाजपा सरकार ने मल्टी-ब्रांड रिटेल को खोलने का विरोध किया था। वहीं, यूपीए सरकार इसे आगे बढ़ाने की कोशिश करती रही थी और वर्ष 2011 में तो उसने 51 फीसदी तक एफडीआई की अनुमति दे दी थी। इस विरोध के राजनीतिक कारण थे। दरअसल, सामान्‍य किराना स्‍टोर चलाने वाले छोटे व्यापारीगण भाजपा के महत्वपूर्ण समर्थक मतदाता माने जाते हैं। ऐसे व्यापारियों की तादाद लगभग 50 मिलियन है। वहीं, खाद्य पदार्थों का खुदरा कारोबार 70 अरब डॉलर का है। अत: यह स्वाभाविक ही है कि इस लाभप्रद बाजार का एक हिस्‍सा प्राप्त करना वालमार्ट और टेस्को जैसे दिग्‍गज बहुराष्ट्रीय रिटेल कंपनियों का सपना है।

वैसे तो सरकार ने खाद्य पदार्थों के मल्टी-ब्रांड रिटेल को खोल दिया है, लेकिन उसने अभी तक इस तरह के स्‍टोरों में अन्य वस्‍तुओं की बिक्री करने की इजाजत नहीं दी है। एक विकल्प यह है कि खाद्य पदार्थों के खुदरा विक्रेताओं को अपनी कुल बिक्री का 20 से 25 प्रतिशत तक अखाद्य वस्तुओं जैसे कि रसोई में इस्‍तेमाल किए जाने वाले उत्पादों या बुनियादी घरेलू जरूरतों जैसे कि टूथपेस्ट से सृजित करने की अनुमति दे दी जाए। वालमार्ट इसके लिए विशेष रूप से प्रयास कर रही है क्योंकि खाद्य सामग्री के खुदरा कारोबार में मार्जिन बेहद कम है।

सरकार भविष्य में मल्टी-ब्रांड रिटेल में 100 फीसदी एफडीआई की अनुमति देगी या नहीं, यह एक बहुप्रतीक्षित कदम है और अगर वाकई ऐसा होता है, तो खाद्य प्रसंस्करण मंत्री हरसिमरत कौर बादल इसका अवश्‍य ही स्वागत करेंगी। जो भी इसके पक्ष में हैं वे यही कहेंगे कि इससे रोजगार सृजित होंगे, भंडारण एवं तैयार माल या स्‍टॉक के प्रबंधन में दक्षता सुनिश्चित होगी, खाद्य प्रसंस्करण को प्रोत्साहन मिलेगा और बिचौलियों की श्रृंखला के बिना ही किसानों की उपज स्‍टोर तक पहुंच जाएगी। अंत में, सबसे बड़ा फायदा भारी-भरकम एफडीआई के तेज प्रवाह के रूप में होगा जिसकी बेहद जरूरत भारत को है।

यदि वालमार्ट केवल खाद्य पदार्थों की खुदरा दुकानें ही खोलती है, तो वे दिग्गज घरेलू रिटेल कंपनियों जैसे कि रिलायंस फ्रेश, बिग बाजार, स्पेन्सर इत्‍यादि को कड़ी टक्‍कर देंगी। ऐसे में उपभोक्ताओं को लाभ हो सकता है, बशर्ते कि कीमतें प्रतिस्पर्धी हो जाएं और पोषण संबंधी सूचनाओं के साथ ज्‍यादा स्‍वच्‍छ और उचित लेबल वाले खाद्य पदार्थ सुलभ हों। यही नहीं, वालमार्ट तैयार माल या स्‍टॉक के प्रबंधन और नियंत्रण में प्रोफेशनल अंदाज भी सुनिश्चित कर सकती है।

यह किसानों के साथ सीधे स्टोर को ही अपनी उपज बेचने के लिए अनुबंध कर सकती है। इससे किसानों को उनकी उपज के बेहतर मूल्‍य मिलेंगे। इससे बिचौलियों की लंबी श्रृंखला (चेन) का खात्‍मा हो जाएगा। हालांकि, हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि वालमार्ट भी एक बिचौलिया है क्योंकि यह भी तो किसानों और उपभोक्ताओं के बीच एक मध्यस्थ ही है।

वैसे तो यह सच है कि वैश्विक (ग्‍लोबल) सुपरमार्केट सीधे किसानों से ही उपज खरीद सकते हैं और फि‍र इन्‍हें वातानुकूलित ट्रकों के जरिए अपने स्‍टोरों में भेज देंगे जिससे फलों एवं सब्जियों की बर्बादी कम हो जाएगी, लेकिन प्रशीतन की अत्यधिक मात्रा और पैकेजिंग के लिए स्टायरोफोम/प्लास्टिक का व्यापक उपयोग पर्यावरण के लिए ठीक नहीं है। यही नहीं, इससे हमारे देश में ठोस कचरे की समस्या और भी गंभीर हो जाएगी।

हालांकि, उपभोक्ता इस रूप में लाभान्वित हो सकते हैं कि उन्‍हें समुचित ढंग से छांटे, धोये और काटे गए खाद्य पदार्थ सुलभ हो जाएंगे, जिससे औसत कामकाजी महिलाओं को भोजन बनाने में काफी सहूलियत होगी क्‍योंकि उनके पास समय की कमी रहती है। लेकिन भारत के बड़े शहरों में अवस्थित अनेक महंगे सुपरमार्केट में ये सारे कार्य पहले से ही किए जा रहे हैं। अत: वालमार्ट संभवत: ज्‍यादा स्‍वच्‍छ माहौल को छोड़कर और कोई नई सुविधा उपभोक्‍ताओं को सुलभ नहीं करा पाएगी।

कई लोगों का यह मानना है कि इन ग्लोबल सुपरमार्केट में खासकर महिलाओं के लिए अतिरिक्त नौकरियां सुलभ होंगी जो कैश काउंटरों को संभालेंगी। वहीं, अन्‍य लोगों को माल ढुलाई, लेबलिंग करने और अच्‍छे माल की छंटाई करने के काम मिल सकते हैं। हालांकि, वालमार्ट का ट्रैक रिकॉर्ड अपेक्षाकृत कम रोजगारों को सृजित करने और स्वचलन/प्रौद्योगिकी का ज्‍यादा उपयोग करने का रहा है। वालमार्ट औसत अकुशल नौकरी तलाशने वालों के बजाय शिक्षित स्मार्ट युवा लोगों को ही काम पर रखेगी। वालमार्ट अपने ‘बैकएंड’ परिचालनों (डेटा प्रोसेसिंग, एकाउंटिंग इत्‍यादि) के लिए अधिक कामगारों को नौकरी देने के बजाय ज्‍यादा पूंजीगत खर्च वाले प्रसंस्करण (प्रोसेसिंग) को तवज्‍जो दे सकती है।

कुल मिलाकर, वालमार्ट का जोर विशिष्टता का माहौल बनाए रखने पर होगा जो संभवत: ऊपरी मध्यम वर्गों को रास आएगा। इस‍की विशिष्टता का मतलब यही होगा कि किराना स्टोर्स और कोने वाली दुकानों (कार्नर शॉप) का वजूद आगे भी उन ग्राहकों के बल पर बना रहेगा जो क्रेडिट कार्ड से भुगतान करके ढेर सारी वस्‍तुओं से भरी गाड़ी के बजाय फुटकर नकद राशि देकर एक-दो वस्तुएं ही खरीदना चाहते हैं।

भारत के सबसे बड़े रिटेलर किशोर बियानी सदा ही आगे की सोचते रहे हैं। वह अगले चार वर्षों में ऐसे 10,000 स्टोर खोलने की योजना बना रहे हैं जो किराना स्टोर्स, ई-कॉमर्स और बड़े सुपरमार्केट का एक मिला-जुला रूप (हाइब्रिड) होगा। उनके अनुसार, वह अद्वितीय कीमतों की पेशकश करेंगे और ग्राहकों की निष्ठा पर भरोसा रखेंगे। इससे ग्‍लोबल दिग्गजों के लिए बिजनेस करना और भी अधिक कठिन हो जाएगा, क्योंकि वे यह मानकर चल रहे हैं कि पूरे भारत में एक समान स्वाद और संस्कृति है। फिर भी, यह बात अवश्‍य ही याद रखनी चाहिए कि ग्‍लोबल सुपरमार्केट के पास अपार दौलत है और वे ग्राहकों को भारी-भरकम डिस्‍काउंट देने में सक्षम हैं। यही नहीं, ग्‍लोबल सुपरमार्केट के पास बाजार में लंबे समय तक टिके रहने की क्षमता है जो दूसरों के वजूद को खत्म कर देगा, चाहे वे बड़े हों या छोटे। ग्‍लोबल सुपरमार्केट आगे चलकर बाजार पर कब्जा जमाने के उद्देश्‍य से कई वर्षों तक नुकसान उठाने को भी तैयार रहते हैं।

वैश्विक खुदरा दिग्गजों के लिए आदर्श स्थिति यह होगी कि उन्हें चीन की तरह अन्य वस्तुओं को भी बेचने की अनुमति दे दी जाए। वालमार्ट चीन में बहुत लोकप्रिय है क्योंकि वहां लोग एक ही छत के नीचे लगभग सब कुछ जैसे कि कपड़े, जूते, किराने के सामान, घरेलू सामान, शराब और स्पिरिट्स खरीद सकते हैं। लेकिन चीन के लिए चिंता की कोई खास बात नहीं है क्योंकि ज्यादातर सामान ‘मेड इन चाइना’ होते हैं। हालांकि, भारत में स्थितियां बहुत भिन्न हो सकती हैं क्‍योंकि यहां के लोगों में अब भी अन्य देशों से आयातित वस्तुओं के लिए काफी आकर्षण है।

मल्टी-ब्रांड रिटेल क्षेत्र को पूरा खोलने के लिए ‘मेड इन इंडिया’ उत्पादों की ही बिक्री करने की समान शर्त लागू की जा सकती है और अगर ग्‍लोबल कंपनियां सहमत हो जाएं, तो भारतीय उत्पादों को इस तरह के विशाल रिटेल स्‍टोरों या केंद्रों में बेचने का बड़ा अवसर मिल जाएगा। जाहिर है, ऐसे में सुस्‍त पड़ चुके भारतीय विनिर्माण उद्योग को काफी बढ़ावा मिल सकता है।

खुशी की बात यह है कि भारत में मल्टी-ब्रांड रिटेल व्‍यवसाय फल-फूल रहा है। ऐसे में भारतीय रिटेल कंपनियों की ओर से ग्‍लोबल रिटेल दिग्‍गजों को कड़ी टक्‍कर मिलेगी और इससे आखिरकार देश के उपभोक्तागण ही लाभान्वित होंगे।

ये लेखक के निजी विचार हैं।

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