• Mar 06 2017

मणिपुर में स्वास्थ्य क्षेत्र में चुनौतियां

मणिपुर के स्वास्थ्य ढांचे से जुड़े सामान्य आंकड़े मोटे तौर पर तो राज्य की बेहतर स्थिति को दर्शाते हैं, लेकिन इसके बावजूद राज्य की स्वास्थ्य संबंधी ढांचागत सुविधाओं, पहुंच और नतीजों को ले कर कई सवालों का संतोषजनक जवाब नहीं मिल पाता।

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Courtesy: Jakfoto Productions/CC BY-SA 2.0

उत्तर-पूर्व का एक छोटा सा राज्य मणिपुर, जिसकी आबादी 27 लाख है और जिसकी सीमा मिजोरम, असम, नागालैंड और म्यांमार से मिलती है। यह उन पांच राज्यों में शामिल है, जिनमें इस वर्ष विधानसभा चुनाव हो रहे हैं। राज्य मुख्य तौर पर पहाड़ी इलाके से भरा है और नौ जिलों में बंटा है (पांच पहाड़ी और चार घाटी के जिले)। यह लैंगिक समानता और महिला सशक्तिकरण के लिए हमेशा से जाना जाता रहा है। साथ ही स्वास्थ्य के पैमानों पर भी राष्ट्रीय औसत से बेहतर रहा है।

पिछले दशक के दौरान मणिपुर का लैंगिक अनुपात 1,041 से घट कर 962 पर पहुंच गया, लेकिन अभी भी यह राष्ट्रीय औसत 919 से ज्यादा तो है ही, इस लिहाज से सबसे बेहतर राज्यों में से है। यहां महिला (15 से 49 वर्ष) साक्षरता और रोजगार क्रमशः 85% और 40.9% है जबकि इन दोनों मामलों में भारत का राष्ट्रीय औसत 68.4% और 24.6% है। पितृ प्रधान समाज होने के बावजूद राज्य की 96.2% महिलाएं घरेलू फैसलों में हिस्सा लेती हैं और 69.9% घर और या जमीन की मालकीन हैं, जो राष्ट्रीय औसत का लगभग दुगना है। ये आंकड़े मणिपुर की बहुत आकर्षक तस्वीर पेश करते हैं लेकिन ये राज्य में स्वास्थ्य की ढांचागत सुविधाओं, पहुंच और नतीजों से जुड़े कई अहम मुद्दों को नहीं दर्शाती।

मणिपुर में लैंगिक अनुपात 1,014 से घट कर 962 हो गया है, लेकिन अब भी यह राष्ट्रीय औसत 919 से काफी अधिक है।

ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन की ओर से किए गए विश्लेषण के मुताबिक स्वास्थ्य पर किया गया प्रति व्यक्ति सार्वजनिक खर्च (केंद्र और राज्य सरकार का संयुक्त रूप से) मणिपुर में 1,364 रुपए है। यह उत्तर प्रदेश के मुकाबले तीन गुना है जबकि पंजाब और राष्ट्रीय औसत से दुगना है। इसके बावजूद किसी भी सदस्य के लिए कोई स्वास्थ्य बीमा या योजना लेने वाले परिवारों का प्रतिशत सिर्फ 3.6 है जो दूसरे चुनावी राज्यों (उत्तर प्रदेश को छोड़ कर) से कम से कम तीन गुना कम है। साथ ही यह राष्ट्रीय औसत 28.7% से भी बहुत कम है। सेनापति (0.6%), उखरूल (1%) और चंदेल (1.1%) में तो यह और भी कम है। यह दर्शाता है कि अधिसंख्य मणिपुरी अपने चिकित्सा खर्च का भुगतान अपनी जेब से ही करते हैं। (देखें तालिका 1)

तालिका 1: परिवार के किसी भी सदस्य के स्वास्थ्य बीमा या किसी योजना में शामिल होने का जिलावार प्रतिशत

Source: NFHS 4

हालांकि, अस्पताल में भर्ती होने (सरकारी और निजी) पर आने वाला औसत चिकित्सा खर्च राष्ट्रीय औसत (सरकारी और निजी) 18,268 रुपए के मुकाबले यहां सिर्फ 7,226 रुपए है। इसका मतलब है कि मणिपुर में इलाज के लिए अपनी जेब से लोगों को कम खर्च करना होता है। अस्पताल में भर्ती होने पर होने वाले औसत खर्च का कम होना, लोक स्वास्थ्य पर खर्च का ज्यादा होना व स्वास्थ्य बीमा का कवरेज कम होना यह दर्शाता है कि चूंकि मणिपुर में लोक स्वास्थ्य सेवाएं बेहतर हैं इसलिए सरकारी अस्पतालों में भर्ती होने का औसत निजी अस्पतालों से ज्यादा है। शहरी इलाकों में यह 89% है और ग्रामीण इलाकों में 79% है। इसका मतलब यह हो सकता है कि यहां सरकारी अस्पतालों में गुणवत्तापूर्ण सेवा मिलती है या फिर लोग निजी अस्पतालों का खर्च वहन नहीं कर पाते। निजी अस्पतालों में होने वाला खर्च सरकारी अस्पतालों के मुकाबले लगभग तीन गुना है। (देखें तालिका 2)

तालिका 2: मणिपुर और भारत का लोक स्वास्थ्य खर्च तथा अस्पताल में भर्ती होने पर आने वाला औसत खर्च

2-Graph
Source: MoHFW, NSSO 71st round

इस स्थिति को सकारात्मक तौर पर भी देखा जा सकता है, क्योंकि चिकित्सा खर्च का अधिकांश हिस्सा व्यक्ति को खुद ही नहीं उठाना पड़ता। जबकि हिमाचल प्रदेश (एक और पहाड़ी इलाके वाला राज्य) में यह खर्च 14,431 रुपए है और चंडीगढ़ में यह खर्च 34,606 रुपए है। अस्पताल पर होने वाला खर्च राष्ट्रीय औसत के मुकाबले कम होने के बावजूद राज्य में सरकारी स्वास्थ्य सुविधाओं में होने वाले प्रसव पर आने वाला औसत खर्च बहुत ज्यादा 10,076 रुपए है। यह देश में सबसे ज्यादा है। इतने अधिक खर्च की वजह अज्ञात है और इसलिए इस संबंध में और शोध किए जाने की जरूरत है कि इस मामले में खर्च राष्ट्रीय राजधानी के बराबर महंगा क्यों है।

अस्पताल में भर्ती होने के दौरान होने वाले खर्च के लिहाज से मणिपुर का औसत राष्ट्रीय औसत से कम है लेकिन सरकारी अस्पतालों में प्रसव के दौरान होने वाला खर्च बहुत ज्यादा है। ऐसे हर प्रसव पर यहां 10,076 रूपए खर्च होते हैं जो देश में सबसे अधिक है।

स्वास्थ्य क्षेत्र में कर्मियों के लिहाज से मणिपुर की स्थिति दूसरे उत्तर-पूर्व राज्यों से बेहतर है। प्रति व्यक्ति नर्सों की उपलब्धता के लिहाज से यह केरल के बाद दूसरे स्थान पर है। यहां दो शीर्ष स्तरीय अस्पताल हैं, सात जिला अस्पताल हैं, 59 प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र (पीएचसी) और 148 स्वास्थ्य उप केंद्र (एसएचसी) हैं। 76.4% ग्रामीणों को दस किलोमीटर के अंदर पीेएचसी उपलब्ध हो जाता है, 75.2% को तीन किलोमीटर के अंदर एसएचसी उपलब्ध हो जाता है। राष्ट्रीय स्तर पर सीएचसी में स्वीकृत पदों के मुकाबले विशेषज्ञ डॉक्टरों की 81% कमी है, वहीं मणिपुर में यह कमी 96% है। जहां सीएचसी स्तर पर स्पेशलिस्ट डॉक्टरों की कमी बहुत ज्यादा है, यह भी ध्यान रखना होगा कि राज्य की राजधानी में रीजनल इंस्टीट्यूट अॉफ मेडिकल साइंसेज उपलब्ध है, जो उत्तर-पूर्व में विशिष्ट चिकित्सा के बड़े केंद्र के रूप में काम करता है। हालांकि इसके बावजूद यह मानना होगा कि सीएचसी में स्पेशलिस्ट डॉक्टर तो होने ही चाहिएं। दूसरी तरफ, पीेएचसी कर्मियों के लिहाज से बेहतर स्थिति में हैं। सिर्फ दो फीसदी पीएचसी ही हैं, जहां डॉक्टर उपलब्ध नहीं हैं। 39% पीएचसी में लैब तकनीशियन नहीं हैं और 22% में फार्मासिस्ट नहीं हैं। स्वास्थ्य ढांचे की समस्या राज्य में पहाड़ी जिलों में ज्यादा है। डॉक्टर/नर्स/एलवीएच/एएनएम की निगरानी में होने वाले सांस्थानिक प्रसव(इंस्टीट्यूशनल डिलीवरी) घाटी के इंफाल पूर्व और इंफाल पश्चिम जिलों में क्रमशः 72.8% और 78% हैं, जबकि पहाड़ी जिलों तमेंगलांग और उखरूल में यह सिर्फ 32% और 34% ही है। यह बहुत चिंताजनक स्थिति है, क्योंकि सांस्थानिक प्रसव का औसत 100% होना चाहिए। (देखें तालिका 3)

मणिपुर के पहाड़ी जिलों में स्वास्थ्य ढांचे की समस्या ज्यादा देखी जा सकती है।

तालिका 3: डॉक्टर/नर्स/एलवीएच/एएनएम की निगरानी में होने वाले सांस्थानिक प्रसव की जिलावार स्थिति

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Source: NFHS 4

स्वास्थ्य पैमानों के लिहाज से मणिपुर राष्ट्रीय औसत से बेहतर है। इसकी शिशु मृत्यु दर (आईएमआर) 22 है, जबकि राष्ट्रीय औसत 41 है। इसी तरह यहां पांच साल से कम उम्र के बच्चों की मृत्यु दर (यू5 एमआर) 26 है, जो राष्ट्रीय दर से आधी है। एनएफएचएस- चार के आंकड़े बताते हैं कि मणिपुर में टीकाकरण की पहुंच राष्ट्रीय औसत से ज्यादा है। लेकिन एक सच्चाई यह भी है कि यहां सिर्फ 32.1% बच्चों को विटामिन ए की खुराक मिल पाती है, जो राष्ट्रीय औसत से आधी है। एनएफएचएस के तीसरे चरण के मुकाबले इस चरण में इस लिहाज से आई प्रगति बहुत शानदार है। पहले जहां यह आंकड़ा सिर्फ 11.2% था, दस साल के दौरान लगभग 20% बढ़ गया। लेकिन अभी भी इसकी कवरेज काफी अधिक बढ़ाने की जरूरत है और खास तौर पर ग्रामीण इलाके पर विशेष ध्यान देना होगा। इस लिहाज से भी पहाड़ी और घाटी के जिलों में काफी विषमता है। (देखें तालिका 4)

मणिपुर में ज्यादा वजन, मोटापे और मधुमेह की समस्या से ग्रसित पुरुष और स्त्रियों का प्रतिशत राष्ट्रीय औसत से ज्यादा है।

तालिका 4: सभी टीके (बीसीजी व खसरा के अलावा पोलियो और डीपीटी की तीन-तीन खुराक) पाने वाले बच्चों का जिलावार प्रतिशत (%)

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Source: NFHS 4

शहरी मणिपुर इलाके में निजी स्वास्थ्य सुविधाओं में होने वाले प्रसव में आधे सीजेरियन अॉपरेशन से ही होते हैं। जबकि सरकारी सुविधाओं में होने वाले प्रसव में यह संख्या 30% ही है। हालांकि सरकारी क्षेत्र में भी यह औसत काफी ज्यादा है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) का मानना है कि 10 से 15% प्रसव सीजेरियन अॉपरेशन से होते हों तो इसे सुरक्षित स्थिति माना जा सकता है। (टेबल 1 देखें)

टेबल 1: मणिपुर मे सरकारी और निजी स्वास्थ्य सुविधाओं में होने वाले सीजेरियन प्रसव का प्रतिशत

RuralUrbanTotal
Total births in a public health facility delivered by a caesarean section (%)17.6%30%22.6%
Births in private health facility delivered by a caesarean section (%)40.9%52.9%46.2%
Births delivered by a caesarean section (%)15.2%33%21.1%

Source: NFHS 4 Manipur

राज्य के पुरुष और महिला दोनों ही शराब व तंबाकू का सेवन करने के लिहाज से राष्ट्रीय औसत से आगे हैं। उस पर से राज्य में नशे की समस्या अलग है, मादक पदार्थों में हेरोइन का प्रचलन ज्यादा है। युनाइटेड नेशंस ऑफिस ऑन ड्रग एंड क्राइम (यूएनओडीसी) की एक रिपोर्ट के मुताबिक उत्तर-पूर्व में इंजेक्शन से मादक पदार्थ लेने वाली महिलाओं की संख्या सबसे ज्यादा मणिपुर में ही है। मादक पदार्थों के तस्करों के लिए कुख्यात दक्षिण-पूर्व एशिया के ‘गोल्डन ट्रायंगल’ के बिल्कुल करीब होने की वजह से भी यहां ड्रग्स का चलन ज्यादा है। क्योंकि लोगों को यह आसानी से और सस्ते में मिल जाता है। ड्रग का इतना ज्यादा इस्तेमाल और उसमें भी हेरोइन का चलन राज्य में एचआईवी के प्रसार में भी मदद करता है। मणिपुर की वयस्क आबादी में एचआईवी का मौजूदा प्रसार 1.15% है जो देश में सबसे ज्यादा तो है ही, राष्ट्रीय औसत से चार गुना ज्यादा है। हालांकि राज्य के वयस्कों (15 से 49 वर्ष) में एचआईवी/एड्स के बारे में जानकारी भी देश की आम जनता के मुकाबले काफी ज्यादा है। साथ ही पिछले साल से एचआईवी का प्रसार कम हो रहा है।

ड्रग तस्करों के लिए कुख्यात दक्षिण-पूर्व एशिया के गोल्डन ट्रायंगल के बिल्कुल करीब होने की वजह से भी यहां ड्रग्स का चलन ज्यादा है। क्योंकि लोगों को यह आसानी से और सस्ते में मिल जाता है।

कुल मिला कर स्वास्थ्य पैमानों पर मणिपुर की स्थिति उत्साहजनक है। सहस्त्राब्दि विकास लक्ष्य (एमडीजी) के तहत सुनिश्चित किए गए आईएमआर और यू5एमआर के राष्ट्रीय लक्ष्यों को इसने बहुत आसानी से हासिल कर लिया है। मातृत्व और बाल स्वास्थ्य के दूसरे पैमानों पर भी यह बाकी राज्यों से बेहतर स्थिति में दिखाई देता है। ये आंकड़े राज्य की सफलता की कहानी तो बयान करते हैं, लेकिन राज्य की आने वाली सरकार के लिए यह बेहद जरूरी होगा कि वह यहां की ड्रग समस्या को काबू करे, जिसकी वजह से यहां एचआईवी का भी खतरा बढ़ जाता है। सीएचसी स्तर पर स्पेशलिस्ट डॉक्टरों की कमी और ग्रमीण व पहाड़ी क्षेत्रों में प्रसव के लिए प्रशिक्षित कर्मियों की कमी को दूर करने जैसी स्वास्थ्य क्षेत्र की ढांचागत समस्याओं को भी दूर करना बहुत जरूरी है। इसी तरह मधुमेह और मोटापे जैसे जीवन शैली से जुड़े तेजी से बढ़ते खतरों की ओर भी तुरंत ध्यान देना होगा।

ये लेखक के निजी विचार हैं।

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