• Jan 07 2017

भारत की सैन्य कूटनीति के सामने चुनौतियां

भारत की सैन्य कूटनीति को मजबूती प्रदान करने के लिए विशेष कर रक्षा मंत्रालय और विदेश मंत्रालय के बीच तालमेल लाभ दायक होगा।

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इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि भारत की आजादी के बाद के इन सात दशकों के दौरान अंतर्राष्ट्रीय मामलों में सैन्य बलों की प्रकृति में बदलाव आया है। भारत को बड़ा परम्परागत युद्ध लड़े लगभग 45 साल बीत चुके हैं और उसके बाद भारत द्वारा परमाणु हथियार बनाने, भारत और उसके पड़ोसियों के बीच बदलते वाणिज्यिक, राजनीतिक और सामाजिक रिश्ते और श्रीलंका में आतंकवाद-विरोधी कार्रवाई में भारत के भाग लेने सहित घटनाओं ने बड़े पैमाने पर युद्ध की संभावनाओं को और घटा दिया है। हालांकि भारतीय सशस्त्र बलों की संरचना और तैयारियों को अब तक इन बदलती परिस्थितियों के अनुरूप नहीं ढाला जा सका है।

सैन्य कूटनीति मानी जा सकने वाली गतिविधियों में से एक व्यापक फ्रीक्वेंसी और विजिबिलिटी — और उसके परिणाम के व्यापक महत्व को अपेक्षाकृत नजरंदाज किया गया। शांतिकाल में और एक ऐसे अंतर्राष्ट्रीय वातावरण में, जहां भारत के कुछ घोर विरोधी और अनेक साझेदार हैं, ऐसा होना स्वाभाविक है। वैसे सैन्य कूटनीति अथवा रक्षा कूटनीति की कोई सार्वभौमिक परिभाषा तो नहीं है, लेकिन कहा जा सकता है कि यह स्पष्ट तौर पर कूटनीतिक उद्देश्य से की जाने वाली कोई भी सैन्य गतिविधि है, या दूसरे शब्दों में कहें कि ये ऐसी गतिविधियां हैं, जिनका प्रमुख उद्देश्य अन्य देशों में भारत के प्रति सदभावना को बढ़ावा देना है।

भारत ने ब्रिटिश राज से विरासत में मिले विशाल, पेशेवर सैन्य बल, अपने आकार और खुद को उपनिवेशवादी युग के बाद की दुनिया के नेता के रूप में प्रस्तुत करने के गुणों की बदौलत, लगभग आजादी के बाद से ही विदेशों के साथ अपने संबंधों में सैन्य कूटनीति का उपयोग किया है। लेकिन हाल के वर्षों में सैन्य कूटनीति की बढ़ती मांग और आकर्षण की वजह से उसे अनेक गतिविधियों के लिए बड़े पैमाने पर संसाधन, कर्मियों और उपकरणों की आवश्यकता होगी। इनमें विदेशी अधिकारियों को प्रशिक्षण और शिक्षा देना, दूसरे देशों में बड़े पैमाने पर ध्यान आकर्षित करने वाले सैन्य दौरे और विदेश में मानवीय सहायता एवं आपदा राहत के प्रयास (एचएडीआर) शामिल हैं। बेहतर सैन्य कूटनीति के लिए संसाधनों से कहीं ज्यादा बढ़कर, सेनाओं के बीच, भारत के सैन्य और नागरिक नेतृत्व के बीच और रक्षा मंत्रालय और विदेश मंत्रालय के बीच ज्यादा निकट सहयोग की आवश्यकता है।

सैन्य कूटनीति क्या है

सैन्य कूटनीति या रक्षा कूटनीति की सार्वभौमिक रूप से स्वीकृत कोई परिभाषा नहीं है। इसे मोटे तौर पर इस तरह परिभाषित किया जा सकता है कि विदेश के प्रति उन्मुख सैन्य गतिविधि को सैन्य कूटनीति कहा जा सकता है, क्योंकि यह अंतर्राष्ट्रीय नीति का विस्तार होगी। जैसा कि प्रशिया के सैन्य विचारक कार्ल वाॅन क्लाजवित्ज की प्रसिद्ध उक्ति है, ”सैन्य बल, सही मायने में एक राजनीतिक साधन, अन्य साधनों के साथ निरंतर जारी रहने वाला राजनीतिक मेल-जोल है।”

हालांकि बहुत सी सैन्य गतिविधियों के ज्यादा विशिष्ट अथवा पूरक कार्यकलाप होते हैं और इसलिए वे सिर्फ कूटनीतिक नहीं होतीं। मूलभूत रूप से ज्यादातर सैन्य अभियानों के — प्रतिरोधक बल, शांति अभियान तथा राहत और बचाव कार्यों सहित कूटनीतिक उद्देश्य होते हैं — जिनका आशय सामरिक और परिचालन संबंधी लक्ष्यों को हासिल करना होता है। दो या अधिक देशों की सेनाओं के बीच आधिकारिक वार्ता और सैन्य कार्रवाइयों जैसे आधिकारिक संपर्कों का उद्देश्य अक्सर केवल सदभावना बढ़ाना नहीं, बल्कि पारस्परिकता और तालमेल को बेहतर बनाना होता है। इसके अलावा सैन्य सहायता बिक्री एवं प्रौद्योगिकी हस्तांतरण सहित — केवल पारस्परिकता और कूटनींति में ही योगदान नहीं देती, बल्कि स्पष्ट रूप से वाणिज्यिक उद्देश्यों की पूर्ति भी कर सकती है।

सैन्य कूटनीति की संक्षिप्त परिभाषा — केवल कूटनीतिक उद्देश्य से की जाने वाली सैन्य गतिविधियां हैं — यह परिभाषा उन विशिष्ट कार्यों को दर्शाती है, जो सैन्य कूटनीति के दायरे में आती है। इनमें विदेशी अधिकारियों और कैडेट्स को शिक्षा और प्रशिक्षण देना,  ध्यान आकृष्ट करने वाले महत्वपूर्ण सैन्य दौरे (जैसे नौसैनिक पोतों द्वारा पोर्ट काॅल्स अथवा परेड में सेना का भाग लेना) और दूसरे देशों में मानवीय सहायता और आपदा राहत के कार्य करना शामिल है। ऐतिहासिक रिकाॅर्ड यह दर्शाते हैं कि जहां एक ओर भारत के प्रयास सराहनीय रहे हैं, वहीं दूसरी ओर, इनमें से प्रत्येक क्षेत्र में भारत की योग्यताओं में पुख्ता सुधार लाने के लिए अब भी कुछ कदम उठाया जाना बाकी है।

अधिकारियों की शिक्षा और प्रशिक्षण

ब्रिटिश राज से विरासत में सशस्त्र बल प्राप्त होने के कारण आजादी के समय भारत के पास सभी विकासशील देशों से सबसे ज्यादा अत्याधुनिक सैन्य प्रशिक्षण और शिक्षा केंद्र थे। आजादी के समय आर्मी स्टाॅफ काॅलेज क्वेटा में था और इसलिए वह पाकिस्तान को सौंप दिया गया। भारतीय सुविधाओं को 1947 में वेलिंग्टन छावनी भेज दिया गया, जो इस समय तमिलनाडु कहलाता है। रक्षा मामलों की मंत्रिमंडलीय समिति ने 1958 में, नेशनल डिफेन्स काॅलेज को मंजूरी प्रदान की और उसने 1960 में अपने द्वार खोल दिए। 1970 के दशक में, मध्य प्रदेश के मऊ में काॅलेज आॅफ काॅम्बेट (बाद में जिसका नाम बदलकर आर्मी वाॅर काॅलेज रख दिया गया) की स्थापना की गई। इसके अलावा सिकंदराबाद में इंस्टीट्यूट आॅफ डिफेन्स मैनेजमेंट (जिसका नाम बाद में काॅलेज आॅफ डिफेन्स मैनेजमेंट रखा गया) की स्थापना की गई। भारतीय सैन्य अकादमियों और स्टाॅफ काॅलेजों ने भारतीय अधिकारियों को प्रशिक्षण देने के अतिरिक्त अन्य सशस्त्र बलों के छात्रों को भी प्रशिक्षण दिया, अन्य देशों के सैन्य अधिकारियों के साथ सहयोग और सदभावना को प्रोत्साहन देते कूटनीतिक प्रयासों को आगे बढ़ाया।

वेलिंग्टन में, विदेशी छात्रों को शिक्षा प्रदान करने का कार्य, ब्रिटेन, बर्मा, अमेरिका, आॅस्ट्रेलिया और कनाडा के सात छात्रों के साथ वर्ष 1950 में प्रारंभ हुआ। 1950 के दशक में गुटनिरपेक्ष देशों और उसी समय आजादी प्राप्त करने वाले इंडोनेशिया, मिस्र, इथियोपिया और नाइजीरिया जैसे देशों के बड़ी तादाद में छात्रों (आॅल्सेगन ओब्सान्जो और मुहम्मदु बुहारी जैसे भावी राष्ट्रपतियों) के साथ इनमें विस्तार हुआ। शीत युद्ध के दौरान रूस के साथ करीबी संबंध होने के बावजूद, 1988 तक रूसी अधिकारी ने वेलिंग्टन में पाठ्यक्रम में भाग नहीं लिया था। इसबीच, एनडीसी ने बहुत से विशिष्ट विदेशी सैन्य अधिकारियों सहित श्रीलंका, मलेशिया, आॅस्ट्रेलिया और केन्या की थल सेना, वायुसेना या नौसेना के प्रमुखों और साथ ही साथ भूटान, बांग्लादेश और घाना के भावी राष्ट्राध्यक्षों या शासनाध्यक्षों को भी प्रशिक्षण प्रदान किया।

व्यापक ध्यान आकृष्ट करने वाले सैन्य दौरे

जहां एक ओर अधिकारियों की शिक्षा और प्रशिक्षण अन्य देशों की सेनाओं के सैनिकों को लक्षित करते हैं, जिनमें से कुछ अपने सशस्त्र बलों में महत्वपूर्ण पदों तक पहुंचते हैं, वहीं दूसरी ओर सैन्य कूटनीति के अन्य स्वरूपों में व्यापक प्रभाव छोड़ने, जनता तक पहुंच बनाने की योग्यता है। इनमें विदेशी धरती पर सैन्य अभ्यासों जैसी सैन्य गतिविधियां शामिल हैं। हालांकि द्विपक्षीय और बहुपक्षीय सैन्य अभ्यासों, दोनों को ही सैन्य कूटनीति के प्रमुख कारक के तौर पर देखा जाता है, लेकिन वे पारस्परिकता बढ़ाने सहित अनेक उद्देश्यों की पूर्ति करते हैं और वे प्रशिक्षण के साधन हैं। इसके विपरीत भारतीय सशस़्त्र बलों का सैन्य परेडों में शामिल होना और भारतीय नौसेना के पोतों द्वारा पोर्ट विजिट्स जैसे ध्यान आकृष्ट करने वाले प्रयास, अंतर्राष्ट्रीय बेड़े की समीक्षा जैसी गतिविधियां स्पष्ट तौर पर कूटनीतिक कार्य संपन्न करती हैं। विदेश में ध्यान आकृष्ट करने वाले कूटनीतिक प्रयास में भारत के योगदान का ताजातरीन उदाहरण मई 2015 में मास्को में विक्टरी डे परेड में भारतीय सेना की टुकड़ी का शामिल होना था। इसे मेजबान देश के साथ एकजुटता प्रदर्शित करने और भारत की सैन्य क्षमताओं के सार्वजनिक प्रदर्शन के तौर पर देखा गया।

बंदरगाहों का दौरा(पोर्ट विज़िट्स) इसी तरह का उद्देश्य पूरा करती है और अब वे भारतीय नौसेना के कार्यकलापों की प्रमुख विशेषता और अंतर्राष्ट्रीय आकर्षण बन चुके हैं। साल 2015 में, पश्चिमी जहाजी बेडे़ से एक भारतीय नौसैनिक बेड़े ने ओमान, संयुक्त अरब अमीरात और कतर का दौरा किया था। उसी साल, भारतीय पोतों ने फिलीपींस, सिंगापुर और आस्ट्रेलिया सहित दक्षिण-पूर्व एशिया और पश्चिमी प्रशांत क्षेत्रों के बंदरगाहों पर भी लंगर डाले थे। इन दौरों कोे मीडिया में अनुकूल कवरेज और मेजबान देशों के बीच प्रगाढ़ होती सद्भावना को पहचान मिली। ये प्रयास उन रुझानों को बनाए रखने की दिशा में कदम साबित हुआ, जिनकी शुरूआत वर्ष 2000 से हुई थी, जब भारतीय नौसेना ने एशिया प्रशांत और पश्चिम एशिया और खाड़ी में नियमित दौरे करना प्रारंभ किया था। यह अतीत में प्रचलित पद्धतियों से महत्वपूर्ण बदलाव का संकेत है, जब भारतीय नौसेना के पोत कभी-कभार ही हिंद महासागर से बाहर निकलते थे।

मानवीय सहायता और आपदा राहत

सैन्य कूटनीति का एक अन्य क्षेत्र, जिसमें हाल के वर्षों में भारत ने अपार क्षमताओं का प्रदर्शन किया, वह है — विदेश में मानवीय सहायता और आपदा राहत कार्य। अब तक मुख्य रूप से भारत वंशियों को सुरक्षित निकालने पर ध्यान दिया जाता रहा है, जैसा कि लेबनान (आॅपरेशन सुकून), लीबिया (आॅपरेशन सेफ होमकमिंग), या यमन (आॅपरेशन राहत) में किया गया है। इन सभी आॅपरेशन्स के दौरान अक्सर अन्य देशों (प्रमुख रूप से भारत के पड़ोसी देशों) के नागरिकों को भी सुरक्षित निकाला गया है। इन कार्यों नेे कूटनीतिक सद्भावना में योगदान दिया और वे भारतीय नेतृत्व का प्रदर्शन करने का साधन साबित हुए हैं।

जहां एक ओर भारतीय सशस्त्र बलों का अपने देश के भीतर आपदा राहत अभियान चलाने और भारतीय नागरिकों को सुरक्षित निकालने का रिकाॅर्ड बहुत अच्छा रहा है, वहीं दूसरी ओर उन्होंने इनके अलावा भी अन्य प्रकार के राहत कार्यों में योगदान दिया है, जो विशुद्ध सैन्य कूटनीति हैै। इसके ताजातरीन उदाहरणों में वर्ष 2004 में इंडोनेशिया और श्रीलंका सहित हिंद महासागर में आई त्सुनामी में भारत की भूमिका तथा म्यांमार में आए समुद्री तूफान नरगिस और बांग्लादेश में आए समुद्री तूफान सिद्र और नेपाल में हाल के विनाशकारी भूकम्प के दौरान प्रदान की गई सहायता शामिल हैं। क्षेत्रीय सेनाओं के मानकों के अनुसार, भारतीय सशस्त्र बलों के पास पर्याप्त संख्या में परिवहन विमान, हेलीकाॅप्टर और सहायता पोत हैं और इनकी बदौलत वे जल्द से जल्द भोजन, पानी और मेडिकल सप्लाई पहुंचाने में सक्षम हो सके हैं। वर्ष 2007 में आईएनएस जलाश्व के अधिग्रहण और 2000 के दशक के मध्य में मगर-क्लास टैंक लैंडिंग शिप्स के विशाल शार्दूल-क्लास वेरीअंट को साथ जोड़ने से सामुद्रिक क्षेत्र में भारतीय नौसेना की आपदा राहत क्षमताओं में वृद्धि हुई है। इसी तरह, हाल ही में किए गए सी-17 विमान के अधिग्रहण से भारत को महत्वपूर्ण लाभ पहुंचा है। यह भारतीय वायुसेना का सबसे बड़ा परिवहन विमान है और आने वाले वर्षों में बहुत कुछ पहुंचाया जाएगा।

संसाधनों संबंधी अवरोधों को दूर करना

प्रत्यक्ष सैन्य कूटनीति के सभी तीनों क्षेत्रों-अधिकारियों का प्रशिक्षण एवं शिक्षा, व्यापक ध्यान आकृष्ट करने वाले सैन्य दौरे और मानवीय सहायता एवं आपदा राहत में भारत की योग्यताओं में सुधार हुआ है, जो बेहतर कूटनीतिक रिश्तों, व्यापक अंतर्राष्ट्रीय हितों, विशाल बजटीय संसाधनों और उपकरण के प्रमुख भाग प्राप्त करने का परिणाम है। विशिष्ट सामरिक दूरदृष्टि पर आधारित सैन्य तैयारियों के बहुत से अन्य पहलुओं के विपरीत, सैन्य कूटनीति मांग पर आधारित और भारतीय हितों तथा विद्यमान क्षमताओं के अनुरूप होती है।

सैन्य कूटनीति, स्वभाविक तौर पर किफायती और उच्च प्रभाव वाली है। यूं तो संसाधनों और क्षमता संबंधी खामियों को ज्यादा महत्व नहीं दिया जाना चाहिए, लेकिन वे ही असल में अवरोध और रुकावटे उत्पन्न करती हैं। मिसाल के तौर पर, प्रशिक्षण और शिक्षा, भारत की बजट का बहुत मामूली मद है, जो समग्र रक्षा आवंटन में राउंडिंग एरर के समान है। यदि भारत को केवल अपने सुरक्षा बलों की संख्या में ही नहीं, बल्कि गुणवत्ता में भी सुधार लाना है, तो उसे सैन्य सिद्धांतों के निरूपण, प्रशिक्षण और शिक्षा पर खर्च बढ़ाना होगा। भारत की रक्षा अकादमियों और स्टाॅफ काॅलेजों में बड़ी संख्या में विदेशी छात्रों को आने की अनुमति देने से अतिरिक्त लाभ पहुंच सकता है और तो और वे बेहद प्रतिभाशाली अंतर्राष्ट्रीय छात्रों को भी इस ओर आकर्षित कर सकते हैं।

इसी तरह, हाल के वर्षों में रक्षा बजट में भारतीय नौसेना के अंश में भले ही वृद्धि हुई हो, लेकिन यह अब तक 20 प्रतिशत से भी कम है। व्यापक ध्यान आकृष्ट करने वाली सैन्य कूटनीति के पहलु के रूप में पोर्ट विजिट्स के महत्व को देखते हुए, विशाल नौसैनिक आवंटन से ज्यादा नियमित तौर पर और ज्यादा स्थानों तक पहुंच बनाने की भारत की योग्यता में वृद्धि होगी। बजट और संसाधन संबंधी रुकावटें संभवतः मानवीय सहायता और आपदा राहत प्रयासों पर सबसे ज्यादा लागू होती हैं। 2000 के दशक के प्रारंभ से ही भारत की एयरलिफ्ट और अभियान संबंधी क्षमताओं में सुधार हुआ है, लेकिन अनेक मामलों में अभी काफी कुछ किया जाना बाकी है।

मतभेद मिटाना और सहायता सुगम बनाना

भारत की सैन्य कूटनीति को मजबूती प्रदान करने वाले संसाधनों के सुविचारित आवंटन से कहीं बढ़कर सेनाओं के बीच, सरकार के सैन्य और नागरिक अंगों के बीच, विशेषकर रक्षा मंत्रालय और विदेश मंत्रालय के बीच तालमेल लाभदायक होगा। सेनाओं के बीच परस्पर सहयोग से विभिन्न सैन्य अकादमियों और स्टाफ काॅलेजों (तीनों सेनाओं की संस्थाओं सहित) के प्रयासों में दोहराव से बचा जा सकेगा। इससे विशेषकर आपात स्थितियों में संसाधनों या विभिन्न सेनाओं (या अर्द्धसैनिक बलों) के कर्मियों को शामिल करने वाले मानवीय सहायता के प्रयासों, वृद्धि हो सकेगी।

नागरिक और सैन्य अंगों में तालमेल न होने पर विचार करना संभवतः ज्यादा महत्वपूर्ण है, क्योंकि इससे परिचालन संबंधी दक्षता में धीमापन आता है। इसके अलावा मूलभूत रूप से इस मतभेद को मिटाना आवश्यक है, ताकि सैन्य साधनों से इच्छित राजनीतिक और कूटनीतिक परिणामों की प्राप्ति सुनिश्चित की जा सके। यह सुनिश्चित करने के लिए दोतरफा संवाद आवश्यक है कि राजनीतिक उद्देश्य नागरिक नेतृत्व (चाहे वे राजनीतिक हों या नौकरशाही) द्वारा स्पष्ट रूप से व्यक्त किए गए हैं और सेना में विशेषकर प्रशिक्षण और शिक्षा या मानवीय अभियानों से संबंधित उन उद्देश्यों को प्राप्त करने की क्षमता और इच्छा है।

अंततः, अपनी प्रकृति के कारण सैन्य कूटनीति विदेश मंत्रालय और रक्षा मंत्रालय के परस्पर संबद्ध दायरे से संबंधित है और इसलिए उन दोनों में निकट सहयोग की आवश्यकता है। यह हमेशा दोषरहित नहीं रहा है। जैसा कि रक्षा विश्लेषक नितिन गोखले विदेशी सुरक्षा बलों को प्रशिक्षण देने के संदर्भ में कहना है, ’’सेना स्वयं को विशुद्ध रूप से व्यवसायिक आदान-प्रदान और अभ्यासों तक सीमित रखती है और राजनीतिक आयाम का दारोमदार विदेश मंत्रालय पर छोड़ देती है। वरिष्ठतम कैबिनेट और सचिव स्तरों पर कुछ हद तक सहयोग होता है। विदेश मेें दूतावासों में तैनात डिफेन्स अताशेज़ भी रक्षा नीति का कूटनीति के साथ सामंजस्य बैठाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। हाल के वर्षों में भारत में इस अंतर को मिटाने के प्रयास भी किए गए हैं और रक्षा मंत्रालय के योजना एवं अंतर्राष्ट्रीय सहयोग विभाग में भारतीय विदेश सेवा के अधिकारी की नियुक्ति की गई है और विदेश मंत्रालय में तैनात सैन्य अधिकारी को सैन्य मामलों का निदेशक बनाया गया है। लेकिन अब भी इन प्रयासों को जारी रखने और उन्हें व्यापक बनाने की आवश्यकता है।

इन सभी फासलों को मिटाने में सहायता प्रदान करने के लिए कुछ विशेष कदम उठाए जा सकते हैं। विदेश मंत्रालय के अंतर्गत राजनीतिक-सैन्य मामलों का प्रभाग सृजित करने संबंधी कार्य किया जा सकता है। वर्तमान निरस्त्रीकरण एवं अंतर्राष्ट्रीय सुरक्षा मामलों से संबंधित प्रभाग (डी एंड आईएसए) पर अप्रसार मामलों का उत्तरदायित्व है, ऐसे में उसके पास रक्षा समन्वयन और योजना के लिए ज्यादा समय नहीं बचता। साथ ही, रक्षा मंत्रालय में अंतर्राष्ट्रीय नीति के विविध पहलुओं से निपटने के लिए कर्मियों की संख्या बढ़ाया जाना आवश्यक है। भारतीय प्रशासनिक सेवा (आई.ए.एस.) के भीतर ‘‘रक्षा विशेषज्ञों के विशेष कैडर’’ के सृजन के जरिए विशिष्ट डिफेन्स ट्रैक की मांग, तत्काल रूप से संभव या असंभव हो सकती है और उसे यकीनन विरोध का सामना करना पड़ेगा। लेकिन असैन्य नौकरशाही के भीतर रक्षा विशेषज्ञता के सृजन से सेनाओं के साथ और कूटनीतिक हलकों के साथ तालमेल बेहतर बनाने में मदद मिलेगी।

दूसरा, भारत के रक्षा संबंधी थिंक टैंक्स-इंस्टीट्यूट फाॅर डिफेन्स स्टडीज़ एंड एनालिसिज(आई.डी.एस.ए.), सेंटर फाॅर लैंड वाॅरफेयर स्टडीज़ (सी.एल.ए.डब्ल्यू.एस.), सेंटर फाॅर एयर पाॅवर स्टडीज़ (सी.ए.पी.एस.), नेशनल मैरीटाइम फाउंडेशन (एन.एम.एफ.) और यूनाइटेड सर्विसिज इंस्टीट्यूट आॅफ इंडिया (यू.एस.आई.) — रक्षा नीति से संबंधित सार्वजनिक चेहरा होने की अपनी विशिष्ट स्थिति के मद्देनजर-सैन्य कूटनीति के क्षेत्र में विशेष तौर पर उपयोगी भूमिका निभा सकते हैं। ऐसा सशस्त्र बलों की ओर से, ओपन सोर्स इंटैलिजेंस के आधार पर अन्य देशों की सरकारों सहित विदेशी भागीदारों के साथ सामंजस्यपूर्ण गतिविधियों और पारस्परिक संवाद के माध्यम से परिस्थितियों के विश्लेषण के आधार पर बनाई गयी योजनाओं द्वारा किया जा सकता है। इन थिंक टैंक्स में कर्मियों की संख्या बढ़ाने से उन्हें ज्यादा करंसी प्राप्त होगी और वे बौद्धिक संसाधन और वाहक होने का दोनों तरह का लाभ उठा सकेंगे।

अंत में, मानवीय सहायता और आपदा राहत कार्यों में अन्य देशों तथा मंत्रालयों के बीच बेहतर तालमेल से निश्चित तौर पर लाभ पहुंच सकता है। उचित नौसैनिक और वायु सैनिक परिसम्पत्तियां प्राप्त करने के लिए बेहतर स्टेंडर्ड आॅपरेटिंग प्रोसीजर्स, आपात स्थिति में कम्युनिकेशन के लिए निर्धारित चैनल, योजनाबद्ध कूटनीतिक प्रोटोकाॅल्स और कुछ हद तक अग्रिम तैयारियांे की आवश्यकता है। सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण बात तो यह है कि मानवीय सहायता और आपदा राहत कार्यों को आपात स्थितियों की योजना तैयार करने से लाभ पहुंच सकता है, यह एक अन्य क्षेत्र है, जिसमें सेनाएं और रक्षा तथा विदेश मंत्रालय भारत के थिंक टैंक्स से परामर्श ले सकते हैं।

निष्कर्ष: मामूली वृद्धि

भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा के समक्ष मौजूद बहुत सी चुनौतियों के बीच सैन्य कूटनीति एक प्रकार का अवसर प्रदान करती है। भारत ऐतिहासिक रूप से सैन्य कूटनीति में सक्रिय भूमिका निभाता और दिलचस्पी लेता आया है। साथ ही भारत सरकार और सेना का मानना है कि भारत का खुद को जिम्मेदार स्टेकहोल्डर, सुरक्षा प्रदाता और दयालु सैन्य ताकत के रूप में प्रस्तुत करना महत्वपूर्ण है। सैन्य कूटनीति को अनुकूल अंतर्राष्ट्रीय वातावरण और भारत के व्यापक होते स्वरूप और हितों से भी फायदा हुआ है। आवश्यकता के कारण, यह अवसरवादी भी बनी हुई है। प्रवृत्तियों से मोटे तौर पर यह संकेत मिलता है कि भारत की क्षमताएं स्वभाविक तौर पर बढ़ेंगी।

फिर भी, कुछ अपेक्षाकृत साधारण कदमों का भारत की सैन्य कूटनीति के स्वरूप पर सार्थक प्रभाव पड़ सकता है। इन कदमों में भारत की सैन्य अकादमियों और स्टाफ काॅलेजों में विदेशी छात्रों की संख्या और गुणवत्ता में वृद्धि करने के लिए उनमें संसाधन आवंटित करना, विशेषकर समुद्रीय क्षेत्र में अभियान चलाने की भारत की क्षमताओं में निखार लाना और रक्षा बजट में नौसेना के अंश में वृद्धि करना शामिल हैं। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि सेनाओं के बीच, सरकार की सैन्य और नागरिक अंगों के बीच तथा विदेश मंत्रालय और रक्षा मंत्रालय के बीच तालमेल में सुधार लाने के प्रयास हर हाल में किए जाने चाहिए। इन कदमों को दोनों मंत्रालयों में विशेषज्ञता प्राप्त प्रभाग बनाने, भारत के रक्षा संबंधी थिंक टैंक्स का संयोजक के तौर पर और योजना बनाने के उद्देश्य के लिए बेहतर उपयोग करने और मानवीय आपदाओं के लिए बेहतर तैयारी करने जैसे छोटे कदम उठाकर पूर्णता प्रदान की जा सकती है। शांतिकाल में अंतर्राष्ट्रीय वातावरण वैश्विक अनिश्चितता और क्षेत्रीय अस्थिरता से भरपूर है, ऐसे कुछ साधारण कदम भारत को अपनी सैन्य चुनौतियों के लिए अधिकतम कूटनीतिक लाभ दिलाना सुनिश्चित करने में मददगार होंगे।

मूलभूत रूप से ज्यादातर सैन्य अभियानों के — प्रतिरोधक बल, पीस कीपिंग आॅपरेशन्स तथा राहत और बचाव कार्यों सहित कूटनीतिक उद्देश्य होते हैं— जिनका आशय सामरिक और परिचालन संबंधी लक्ष्यों को हासिल करना होता है।

वर्ष 2015 में, पश्चिमी जहाजी बेडे़ से एक भारतीय नौसैनिक बेड़े ने ओमान, संयुक्त अरब अमीरात और कतर का दौरा किया था। उसी साल, भारतीय पोतों ने फिलीपींस, सिंगापुर और आस्ट्रेलिया सहित दक्षिण-पूर्व एशिया और पश्चिमी प्रशांत क्षेत्रों के बंदरगाहों पर भी लंगर डाले थे। इन दौरों को मीडिया में अनुकूल कवरेज और मेजबान देशों के बीच प्रगाढ़ होती सद्भावना को पहचान मिली।

कुछ निश्चित पैमाने की सामरिक दूरदृष्टि पर आधारित सैन्य तैयारियों के बहुत से अन्य पहलुओं के विपरीत, सैन्य कूटनीति मांग पर आधारित और भारतीय हितों तथा विद्यमान क्षमताओं के अनुरूप होती है।

ध्रुव जयशंकर ब्रूकिंग्स इंस्टीट्यूशन इंडिया सेंटर में फाॅरेन पाॅलिसी फेलो है। ये लेख ORF प्रकाशन डिफेंस प्राइमर, इंडिया एट 75 से लिया गया है।


एंडनोट

1. Carl von Clausewitz, On War, trans. Michael Howard and Peter Paret (Princeton: Princeton University Press, 1976), p. 87.

2. See, for example, Alan Bullion, “India in Sierra Leone: A Case of Muscular Peacekeeping?” International Peacekeeping, Vol. 8, Issue 4, 2001, pp. 77-91; David Brewster and Ranjit Rai, “Operation Lal Dora: India’s Aborted Military Intervention in Mauritius,” Asian Security, Volume 9, Issue 1, 2013, pp. 62-74; Ishaan Tharoor, “India Leads Rescue of Foreign Nationals, Including Americans, Trapped in Yemen,” Washington Post, 8 April 2015.

3. “The U.S. Army Staff Talks Program,” Stand-To!, U.S. Army, 13 March 2012; Ajaya Kumar Das, “India-U.S. Maritime Partnership: Time to Move Forward,” RSIS Policy Brief, S. Rajaratnam School of International Studies, August 2012.

4. “Defence Exports Will Be Doubled This Year, Says Manohar Parrikar,” Financial Express, 18 October 2015.

5. “History of Defence Services Staff College (DSSC),” Defence Services Staff College, 2016 (http:// www.dssc.gov.in/dssc-history.html), pp. 29-34.

6. Anit Mukherjee, “India as a Net Security Provider: Concepts

ये लेखक के निजी विचार हैं।

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