• Mar 08 2017

#बजट2017 और #नोटबंदी — वर्ष 2019 के लिए प्रधानमंत्री का चुनावी जुमला

वर्ष 2019 में जब भी यह सवाल पूछा जाएगा कि उनकी सरकार ने भ्रष्टाचार से निपटने के लिए क्या किया, तो प्रधानमंत्री मोदी झट से नोटबंदी (विमुद्रीकरण) का जिक्र कर सकते हैं।  

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फाइल फोटो

वैसे तो केंद्रीय या आम बजट में सरकार द्वारा आने वाले वित्‍त वर्ष के लिए आय-व्‍यय का लेखा-जोखा पेश किया जाता है, लेकिन यह एक आर्थिक वक्तव्य के साथ-साथ नितांत राजनीतिक दस्तावेज भी होता है। अत: बजट की बारीकियों को निश्चित तौर पर मौजूदा अंतरराष्ट्रीय और घरेलू राजनीतिक एवं आर्थिक माहौल के संदर्भ में समझा जाना चाहिए। वर्ष 2017 में आम बजट पेश करने से ठीक पहले जो अंतरराष्ट्रीय माहौल था उसका अनुमान आसानी से लगाया जा सकता है। मसलन, तेल की कीमतें तेजी से बढ़ने का अंदेशा नहीं है; अंतरराष्ट्रीय व्यापार में कमी का सिलसिला आगे भी जारी रहेगा; और अमेरिका में राष्ट्रपति चुनाव एवं ब्रिटेन में जनमत संग्रह के नतीजों को देखते हुए वैश्वीकरण के खिलाफ बने माहौल का जारी रहना अभी तय है। जहां तक घरेलू हालात का सवाल है, पांच राज्यों, विशेष रूप से पंजाब और उत्तर प्रदेश के दो बड़े राज्यों में विधानसभा चुनाव ही अधिकतर राजनीतिक परिचर्चाओं में छाए हुए हैं।

हालांकि, वर्ष 2017 में पेश किए गए आम बजट में दर्शाई गई अहम राजनीतिक गतिशीलता के तहत न तो अंतरराष्ट्रीय परिदृश्यों और न ही पांच राज्यों में हो रहे चुनावों पर ध्‍यान केंद्रित किया गया है। दरअसल, इसके तहत भारत में वर्ष 2019 में होने वाले आम चुनाव के मद्देनजर सीधे तौर पर इस सरकार की मुहिम पर ही ध्‍यान केंद्रित किया गया है।

उपर्युक्‍त मुहिम के तहत भ्रष्टाचार से लड़ने के लिए सरकार द्वारा किए गए विभिन्‍न प्रयासों को भी जोर-शोर से प्रचारित किया जाएगा जिनमें से सबसे प्रमुख कदम नोटबंदी नीति ही है।

वर्ष 2017 में आम बजट पेश करने से ठीक पहले जो अंतर्राष्ट्रीय परिदृश्य था उसकी अनदेखी आसानी से की जा सकती है। वर्ष 2008 और वर्ष 2010 में गहराए वित्तीय संकटों के विपरीत इस बार अंतरराष्ट्रीय जगत में ऐसा कोई भी बड़ा घटनाक्रम नहीं था जिसे ध्‍यान में रखते हुए वित्त मंत्री की ओर से कोई विशेष अभिप्रायपूर्ण नीतिगत घोषणा करना जरूरी हो गया था।

हालांकि, यह उम्मीद अवश्‍य ही थी (जैसा कि पहले से ही होता आया है) कि केंद्र सरकार कुछ ऐसे नीतिगत उपायों की घोषणा करेगी जिससे पंजाब और उत्तर प्रदेश के चुनावों में उसकी पार्टी के जीतने की संभावनाओं को बल मिलेगा। नि:संदेह, विपक्षी दलों ने राज्यों में चुनाव खत्म होने तक बजट की घोषणा को स्थगित करने की मांग की थी, लेकिन इन दोनों राज्‍यों में चुनावों के स्‍वरूप को देखते हुए यह दलील भी काम नहीं आई। पंजाब में सत्ता विरोधी तेज लहर को देखते हुए सत्ता में भाजपा की वापसी होने के आसार नजर नहीं आ रहे हैं (‘मोदी लहर’ जो वर्ष 2014 के आम चुनाव में उत्तर भारत के अधिकतर राज्यों में बही थी, वह इस बार अपेक्षा के अनुरूप नजर नहीं आई और ऐसे में राज्य चुनाव में इस लहर के भी एक अहम कारक (फैक्‍टर) होने की संभावना नहीं है)। उत्तर प्रदेश में, ऐसे बहुत सारे स्थानीय फैक्‍टर हैं जो चुनावी नतीजे निर्धारित करेंगे — समाजवादी पार्टी (सपा) और कांग्रेस के नए गठबंधन के मद्देनजर जाति एवं धर्म का समीकरण, सपा सरकार का प्रदर्शन, बहुजन समाजवादी पार्टी (बसपा) में अपने दलित मतदाता आधार को खुद से जोड़े रखने की जबरदस्‍त क्षमता, इत्‍यादि।

मोटे तौर पर, सरकार ने भ्रष्टाचार के खिलाफ अपनी लड़ाई के मामले में बजट में दो अहम प्रयास किए हैं — पहला, सरकार ने अपनी नोटबंदी नीति को एक कदम और आगे बढ़ाने की कोशिश की है, जिसका उद्देश्‍य बेहिसाब धन के स्रोत को ही खत्‍म करना है ताकि उसके सृजन एवं प्रवाह की नौबत ही न आए। इस दिशा में सबसे बड़ा कदम राजनीतिक दलों को होने वाले गुमनाम नकद दान को 20,000 रुपये से घटाकर महज 2000 रुपये करने संबंधी वित्त मंत्री की घोषणा थी। इसके साथ ही डिजिटल भुगतान को प्रोत्साहित करने के उपाय भी प्रस्तावित किए गए जिनमें भारतीय रिजर्व बैंक के अंतर्गत एक भुगतान नियामक बोर्ड का गठन करना, भुगतान एवं निपटान प्रणाली अधिनियम 2007 की समीक्षा करना और सरकार के मोबाइल भुगतान एप ‘भीम’ पर लेन-देन करने वाले व्यापारियों एवं व्यक्तियों को प्रोत्साहन देना शामिल हैं। दूसरा, सरकार ने इस नीति के परिणामस्वरूप होने वाले किसी भी राजनीतिक नुकसान से बचने की ठोस कोशिश की है। बजट 2017 में लघु एवं मध्यम उद्यमों, रियल एस्टेट सेक्टर और निम्‍न मध्‍यम वर्ग सभी को कोई न कोई तोहफा या रियायत दी गई क्‍योंकि नोटबंदी से सबसे ज्‍यादा अहित इन्‍हीं सब का हुआ था।

हालांकि, वृहद रूप से समस्‍त बारीकियों पर गौर करने पर यही प्रतीत होता है कि भ्रष्टाचार से निपटने संबंधी सरकार की इच्छा-श‍क्ति अब भी सवालों के घेरे में है।

उदाहरण के लिए, राजनीतिक दल अब 20,000 रुपये के एकबारगी ‘गुमनाम’ नकद दान के बजाय 2,000-2,000 रुपये के ऐसे 10 दानों को स्वीकार कर सकते हैं। बेशक यह बोझिल हो सकता है, लेकिन यह एक ऐसा ठोस कदम नहीं है जिससे राजनीतिक दल अपेक्षाकृत ज्‍यादा पारदर्शी या कैशलेस होने के लिए विवश हो जाएं, जैसा कि शेष अर्थव्यवस्था से अपेक्षित है। इसके अलावा, बजट 2017 ने भारत की पहले से ही कुख्यात राजस्व सेवा को और अधिक विवेकाधीन अधिकार प्रदान कर दिए हैं। उदाहरण के लिए, धारा 132 और धारा 132 (ए) को संशोधित कर दिया गया है जिससे आयकर अधिकारियों के लिए अब कहीं भी तलाशी लेने का कोई कारण बताना जरूरी नहीं रह गया है। इसी तरह धारा 133 में संशोधन किया गया है जिसके तहत यहां तक कि जूनियर आयकर अधिकारियों को भी आईटी अधिनियम के तहत किसी भी तरह की जांच या कार्यवाही के उद्देश्य से आवश्‍यक जानकारी मांगने का अधिकार दे दिया गया है। इसके साथ ही धारा 133 (ए) में भी संशोधन किया गया है जिसके तहत कोई भी आईटी प्राधिकरण किसी भी ऐसी जगह में पूरे अधिकार के साथ प्रवेश कर सकता है जहां धर्मार्थ उद्देश्य के लिए किसी भी तरह की गतिविधि जारी है। इस तरह के अधिकार सत्‍तर के दशक की याद दिलाते हैं, जब ‘रेड राज’ का बोल-बाला था और नतीजतन, समान रूप से नौकरशाहों एवं राजनेताओं के बीच ‘उद्यमियों से रिश्‍वत लेकर उन्‍हें लाभ पहुंचाने का खेल’ अपने चरम पर था।

भारत में अनगिनत चुनाव भ्रष्टाचार को खत्म करने के वादे पर लड़े जाते रहे हैं। सत्‍तर के दशक में जनता पार्टी आंदोलन के समय से ही राष्ट्रीय और राज्य दोनों ही स्‍तरों के नेतागण भ्रष्टाचार के उन्मूलन के दावों पर सफल अभियान चलाते रहे हैं। यही कारण है कि वर्ष 2014 में प्रधानमंत्री मोदी ने जबना खाऊंगा, ना ही खाने दूंगा (न तो मैं रिश्वत लूंगा, और न ही अपने प्रशासन में किसी को भी ऐसा करने दूंगा) के नारे (राग या जुमला) को पूरे जोर-शोर से सफलतापूर्वक पेश किया था तो यह कोई नई बात नहीं थी।

हालांकि, नोटबंदी से उन्‍हें सियासी धार हासिल हो गई है। वर्ष 2019 में जब भी यह सवाल पूछा जाएगा कि उनकी सरकार ने भ्रष्टाचार से निपटने के लिए क्या किया, तो प्रधानमंत्री मोदी झट से नोटबंदी (विमुद्रीकरण) का जिक्र कर सकते हैं। इससे सदा ही यह वृत्तांत या उदाहरण तो पेश करने में अवश्‍य ही मदद मिलेगी कि भारत में एक ऐसे प्रधानमंत्री भी थे, जिन्होंने भ्रष्टाचार से निपटने के लिए अपनी सरकार की प्रतिष्ठा को दांव पर लगाकर भी एक साहसिक नीतिगत निर्णय लिया था। यह उपाय कारगर था या नहीं, यह सवाल कोई खास मायने नहीं रखता है। दरअसल, बेहिसाब धन से जुड़ी समस्याओं से निपटने के लिए राजनीतिक इच्छाशक्ति की सरासर कमी इस सरकार और नोटबंदी को एक-दूसरे से भिन्‍न कर देती है। अत: बजट में घोषित कदमों या उपायों को ठीक इसी संदर्भ में देखा जाना चाहिए। दरअसल, इन कदमों या उपायों के पीछे मुख्‍य उद्देश्‍य देश में भ्रष्टाचार से गंभीरता से निपटने के बजाय महज प्रधानमंत्री की छवि को निखारते हुए उन्‍हें एक साधक या काम करने वाली शख्सियत के रूप में पेश करना है।

ये लेखक के निजी विचार हैं।

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