• Feb 13 2017

केंद्रीय बजट: राजनीतिक वित्तपोषण को ‘वैध’ करने की दिशा में अच्छी शुरुआत

हो सकता है कि ये चुनाव सुधार अपने-आप में अत्यं त साहसिक एवं क्रांतिकारी न हों, लेकिन ये निश्चित रूप से सकारात्मक कदम हैं।

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Photolabs@ORF

केंद्र सरकार द्वारा नोटबंदी (विमुद्रीकरण) का निर्णय अचानक लेने के बाद से ही सभी की निगाहें वित्‍त वर्ष 2017-18 के आम (केंद्रीय) बजट पर जमी हुई थीं। सभी लोग यह जानना चाहते थे कि काले धन और राजनीतिक दलों को ‘संदेहास्‍पद चंदे’ के रूप में मिलने वाले अवैध धन पर अंकुश लगाने के लिए सरकार ने बजट में आखिरकार कौन-कौन से सुधारों का उल्‍लेख किया है अथवा कौन-कौन से कारगर प्रावधान किए हैं, क्‍योंकि यही तो समस्‍त बड़े घोटालों और सियासी कांड की जड़ में रहता है। नोटबंदी की पूरी अवधि के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने महत्‍वपूर्ण चुनाव सुधारों, विशेष रूप से चुनाव संबंधी खर्चों के वित्तपोषण के कानूनों पर बहस करने के लिए विपक्षी दलों से सहयोग करने की गुजारिश की थी। उम्मीद के मुताबिक, वित्त मंत्री अरुण जेटली ने आम बजट के एक अंश को विशेष रूप से चुनाव के वित्तपोषण और अवैध राजनीतिक चंदे पर अंकुश लगाने के तौर-तरीकों एवं उपायों पर ही केंद्रित रखा है। बजट पैकेज पर गौर करने पर इसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की विशिष्‍ट छाप नजर आती है।

राजनीतिक दलों को मिलने वाले गुमनाम दान या चंदे और अवैध धन के प्रवाह पर अंकुश लगाने के प्रयासों के तहत वित्त मंत्री ने नकद चंदे की सीमा को मौजूदा 20,000 रुपये से घटाकर प्रति व्यक्ति सिर्फ 2,000 रुपये करने का प्रस्‍ताव किया है। जन प्रतिनिधित्‍व अधिनियम (आरपीए), 1951 की धारा 29सी के अनुसार पंजीकृत राजनीतिक दलों को लोगों से 20,000 रुपये तक का चंदा प्राप्त करने की अनुमति दी गई है और इसके लिए राजनीतिक दलों की ओर से दस्तावेजी सबूत प्रस्तुत करना भी आवश्‍यक नहीं है। वैसे तो नकद चंदे की अधिकतम सीमा को घटाकर दसवें हिस्‍से पर ला देने वाला वर्तमान उपाय स्‍वागत योग्‍य है, लेकि‍न इसमें अब भी ऐसी अनगिनत खामियां हैं जिनकी वजह से इसका दुरुपयोग किए जाने की प्रबल संभावना है। वैसे तो नया उपाय सख्‍त होगा और पिछले रिकॉर्डों के मद्देनजर इस वजह से फर्जी दानदाताओं की संख्या को कई गुना बढ़ाने के लिए राजनीतिक दलों को काफी मशक्‍कत करनी पड़ेगी, लेकिन इसके बावजूद वे इसी विधा को अपनाएंगे क्‍योंकि इसे ‘सुरक्षित’ माना जाता है। यह सर्वविदित है कि राजनीतिक दलों को 75 प्रतिशत से भी अधिक चंदे इसी धारा के तहत प्राप्‍त हो रहे हैं और इनमें ज्यादातर हवाला का ही पैसा होता है।

बेशक यह एक आधा-अधूरा उपाय है और इससे राजनीतिक दल प्रसन्‍न प्रतीत होते हैं, लेकिन इसके बावजूद वित्त मंत्री ने कर छूट को आयकर प्रावधानों के समयानुकूल अनुपालन से जोड़ करके राजनीतिक दलों के खाता-बही पर फंदा कसने का सही कदम उठाया है। अब से, सभी राजनीतिक दलों को आयकर अधिनियम के अनुसार ही रिटर्न दाखिल करने होंगे और राजनीतिक दलों को आयकर से कर छूट केवल तभी मिलेगी जब वे आयकर अधिनियम का बाकायदा अनुपालन करेंगे। यदि इसके पश्‍चात राजस्व सचिव हसमुख अधिया द्वारा की गई घोषणा पर यकीन किया जाए, तो सरकार राजनीतिक दलों के लिए हर साल दिसंबर तक टैक्स रिटर्न दाखिल करना अनिवार्य करने जा रही है।

आम बजट में किया गया यह प्रावधान कुछ इस तरह का है जिसके लिए पिछले कई वर्षों से भारतीय निर्वाचन आयोग (ईसीआई) केंद्र में सत्‍तारूढ़ होने वाली एक के बाद एक सभी सरकारों पर दबाव बनाता रहा है। इससे राजनीतिक दल निश्चित रूप से कर अधिकारियों एवं भारतीय निर्वाचन आयोग की जांच के दायरे में आ जाएंगे और इससे राजनीतिक दलों के बीच अधिक पारदर्शिता एवं जवाबदेही सुनिश्चित होने का संकेत मिलता है। दरअसल, मौजूदा आयकर अधिनियम में राजनीतिक दलों द्वारा अपने खातों का विवरण दिए जाने और आयकर रिटर्न दाखिल करने के लिए कड़ाई से कोई समय सीमा तय नहीं की गई है। इसी ढिलाई की वजह से 51 क्षेत्रीय दलों में से बेहद अधिक 45 दलों ने पिछले वित्त वर्ष में भारतीय निर्वाचन आयोग के समक्ष खुद को मिले चंदे का ब्‍यौरा प्रस्तुत नहीं किया था। लोकतांत्रिक सुधार संघ (एडीआर) के अनुसार, कम से कम 12 क्षेत्रीय दलों ने खुद को मिले चंदे का ब्‍यौरा कभी भी नहीं दिया है। ऐसे में राजनीतिक दलों के लिए आयकर रिटर्न दाखिल किए जाने को अनिवार्य कर देने से वे अपने खाता-बही और चंदे के स्रोतों के बारे में चिंता करने पर विवश हो जाएंगे।

चुनाव बांड मार्ग प्रशस्‍त करेगा!

बजट में सर्वाधिक आश्चर्यजनक सुधार प्रस्‍ताव ‘चुनाव बांड’ जारी किए जाने सं संबंधित है। संभवत: यह एक गेम चेंजर साबित हो सकता है क्‍योंकि इससे राजनीतिक दलों को ‘सफेद’ या वैध तरीके से चंदा सुलभ कराने का एक और विकल्‍प मिल जाएगा। वर्ष 2008 में जमीनी स्तर पर फंड जुटाने के लिए बराक ओबामा द्वारा शुरू किए गए प्रेरणादायक अभियान (जिसके तहत पहले से ही स्थापित सार्वजनिक वित्‍त पोषण प्रणाली से काफी हद तक बचा गया) से सबक लेते हुए वित्त मंत्री ने राजनीतिक दलों के लिए बांड जारी करने का एक प्रस्‍ताव किया है, ताकि उन्हें खुले बाजार से सफेद या वैध धन जुटाने में मदद मिल सके। इस प्रस्ताव के अनुसार, संभावित दानदाता केंद्रीय बैंक से बांड खरीद सकते हैं और फि‍र इसे किसी राजनीतिक दल को बतौर चंदा दे सकते हैं। इस राजनीतिक दल को निर्धारित समय के भीतर ही इन बांडों को भुनाना होगा। एक महत्वपूर्ण बात यह है कि इन बांडों को चेक या डिजिटल भुगतान के जरिए ही खरीदा जा सकता है। इससे धनराशि जुटाने के उन गैर कानूनी तरीकों को हतोत्साहित किया जा सकता है जो राजनीतिक दलों और प्रत्‍याशियों द्वारा चुनाव लड़ने के लिए आम तौर पर अपनाया जाता रहा है। एक महत्वपूर्ण बात यह भी है कि इस बांड योजना से राजनीतिक स्टार्ट अप प्रेरित होंगे और लोकप्रिय राजनीतिक दल एवं करिश्माई नेता वैध व पारदर्शी तरीके से आवश्यक फंड जुटाने के लिए इस अवसर का उपयोग कर सकते हैं। इस बांड प्रस्ताव की एक बड़ी कमी यह है कि इसमें चंदा देने वालों की पहचान करना संभव नहीं है। इस वजह से चुनाव अभियान के वित्तपोषण की प्रणाली के तहत चंदा देने वालों की पहचान का खुलासा किए जाने और पारदर्शिता के उद्देश्‍य की पूर्ति काफी हद तक नहीं हो सकेगी। फिर भी, चंदा देने वालों के नामों का खुलासा न करने से जुड़ी यह बांड योजना मौजूदा ‘गुमनाम नकद चंदा व्‍यवस्‍था’ से काफी बेहतर है। चूंकि नई व्‍यवस्‍था में बांडों को केवल चेक और डिजिटल भुगतान के जरिए ही खरीदा जा सकता है, इसलिए गुमनाम चंदा या दान दाताओं के लिए इसमें कोई भी गुंजाइश नहीं रह जाएगी।

और भी ज्‍यादा कारगर उपायों को अपनाने का वक्‍त

वैसे तो आलोचकों ने चुनाव सुधारों पर उपर्युक्‍त बजटीय घोषणाओं के खिलाफ मोर्चा खोल रखा है और कुछ आलोचक तो इन्‍हें ‘आधा-अधूरा उपाय’ और ‘राजनीतिक चालबाजियां’ भी करार दे रहे हैं, लेकिन इसके बावजूद इन उपायों का मूल्यांकन उनकी समग्रता में करना होगा। हो सकता है कि ये चुनाव सुधार अपने-आप में अत्‍यंत साहसिक एवं क्रांतिकारी न हों, लेकिन ये निश्चित रूप से सकारात्मक कदम हैं और इन्‍हें ध्‍यान में रखते हुए भविष्य में इस दिशा में और भी अधिक पहल की जा सकती है। याद रखें, भारत में पिछले 68 वर्षों से बजट तैयार किया जा रहा है, लेकिन यह पहला ऐसा केंद्रीय या आम बजट है जिसके एक अंश को विशेष रूप से चुनाव सुधारों को समर्पित किया गया है। हमें इस तथ्य को कतई नहीं भूलना चाहिए कि चुनावों में अपराधियों और अवैध धन की बढ़ती भूमिका पर अंकुश लगाने के लिए एक दशक से भी अधिक समय से अथक प्रयास किए जाने, सैकड़ों सिविल सोसायटी संगठनों एवं चुनावों पर करीबी नजर रखने वालों द्वारा पुरजोर संघर्ष किए जाने और दर्जनों जन हित याचिकाएं दाखिल किए जाने और न्यायपालिका द्वारा काफी सक्रि‍यता दिखाए जाने के बाद ही अब जाकर कुछ चुनाव सुधारों की घोषणा करना संभव हो पाया है।

कई वर्षों की अथ‍क सक्रियता, अनुनय और निरंतर मुकदमेबाजी के बाद ही राजनीतिक दल अंतत: वर्ष 2003 में ‘चुनाव और अन्य संबंधित कानून विधेयक’ को कानून का रूप देने पर सहमत हुए थे। यह बहुत पहले की बात नहीं है कि वामदलों सहित सभी राजनीतिक दलों ने सूचना का अधिकार अधिनियम के दायरे से पार्टियों को बाहर रखने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगा दिया था। दूसरे शब्दों में, क्रांतिकारी सुधारों की बात तो छोड़ ही दें, यह संभवत: किसी भी सुधार को लागू करने के लिहाज से सबसे कठिन दौर है। अत: कुछ सुधारों की घोषणा करके आज की सरकार ने कठिन मार्ग पर चलने की ठान ली है, भले ही ये सुधार ‘आधे-अधूरे’ ही क्‍यों न हों। अब समय आ गया है कि और भी ज्‍यादा कारगर उपायों को अपनाया जाए, विशेष रूप से चंदा देने वालों के नामों का खुलासा करने के लिए कठोर कानून बनाया जाए और एक नियामक संस्था को अस्तित्‍व में लाया जाए, जो देश में राजनीतिक कार्यालयों के संचालन के लिए राजनीतिक दलों एवं प्रत्‍याशियों द्वारा जुटाए जाने वाले एक-एक पैसे का हिसाब ले।

ये लेखक के निजी विचार हैं।

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