• Apr 07 2017

पैराडिप्‍लोमैसी एवं तीस्‍ता नदी विवाद: राष्‍ट्रहित बनाम क्षेत्रवाद

तीस्‍ता नदी विवाद मूलत: भारत की वैदेशिक नीति का बिन्‍दु है, एवं पैराडिप्‍लोमैसी (स्‍थानिक कूटनीति) उसका एक महत्‍वपूर्ण आयाम है।

पैराडिप्‍लोमैसी, नरेंद्र मोदी, शेख हसीना
स्रोत: नरेंद्र मोदी/फ्लिकर

बांग्‍लादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना का अप्रैल के पहले पखवाड़े में भारत की यात्रा पर रहने की सम्‍भावना है। उनकी भारत यात्रा दो कारणों से विशेष महत्‍व रखती है। पहला, शेख हसीना की दिसम्‍बर 2016 एवं फरवरी 2017 की यात्रा कतिपय कारणों से टल चुकी है। दूसरे प्रधानमंत्री मोदी के लगभग तीन वर्ष के कार्यकाल पर विधान सभाई चुनावों की भारी जीत ने जन-स्‍वीकार्यता की मुहर भी लगा रखी है। मोदी सरकार के समक्ष नोटबंदी के संभावित परिणामों का असमंजस भी नहीं है तथा जी0एस0टी0 कानून का जुलाई 2017 से लागू होना लगभग तय है। शेख हसीना की यात्रा को लेकर तीस्‍ता नदी विवाद फिर सुर्खियों में है। तीस्‍ता नदी विवाद मूलत: भारत की वैदेशिक नीति का बिन्‍दु है, एवं पैराडिप्‍लोमैसी (स्‍थानिक कूटनीति) उसका एक महत्‍वपूर्ण आयाम है।

तीस्‍ता नदी का उद्गम भारत के उत्‍तरपूर्व राज्‍य सिक्किम से होता है तथा यह नदी पश्चिमी बंगाल से गुजरती हुई बांग्‍लादेश में प्रवेश करती है। तीस्‍ता बांग्‍लादेश की गंगा, ब्रहमपुत्र एवं मेघना नदियों के बाद चौथी सबसे बड़ी ट्रान्‍सबाउन्‍डरी नदी है। बांग्‍लादेश ब्‍यूरो ऑफ स्‍टैटिस्टिक्‍स 2011 एवं 2012 के आंकड़ों के मुताबिक 21 मिलियन बांग्‍लादेशी प्रत्‍यक्ष या परोक्ष रूप से जीविका हेतु तीस्‍ता पर आश्रित हैं। [i] तीस्‍ता नदी जल बंटवारे हेतु प्रयास आजादी के बाद 5वें एवं 6ठें दशक से ही प्रचलित है। उस समय भारत एवं तत्‍कालीन पूर्वी पा‍किस्‍तान में विचार-विमर्श तीस्‍ता नदी पर स्‍थापित होने वाले विभिन्‍न प्रोजेक्‍टस को लेकर था। वर्ष 1971 में बांग्‍लादेश के अस्तित्‍व में आने के साथ भारत-बांग्‍लादेश ज्‍वांइट रिवर कमीशन का गठन हुआ। 1983 में तीस्‍ता जल बंटवारे को लेकर भारत-बांग्‍लादेश के मध्‍य एक तदर्थ समझौता हुआ जिसके तहत भारत को 39 प्रतिशत एवं बांग्‍लादेश को को 36 प्रतिशत तीस्‍ता का जल आवंटित किया गया। शेष 25 प्रतिशत का निर्णय भविष्‍य में होने वाले अध्‍ययन के उपरान्‍त होना था। [ii]

वर्ष 1997 से लेकर वर्ष 2005 तक ज्‍वाइंट कमेटी आफ एक्‍सपर्ट तथा ज्‍वाईंट टेक्निकल ग्रुप के प्रयासों की हताशा का अन्‍दाज़ा इसी से लगाया जा सकता है कि ग्रुप ने भी यही संस्‍तुति दी कि शुष्‍क मौसम (लीन सीज़न) में जल का बंटवारा मूलत: परस्‍पर त्‍याग का बंटवारा है।[iii] तीस्‍ता जल बंटवारा विवाद तब निर्णायक मुकाम पर पहुंचा था, जब सितम्‍बर 2011 में तत्‍कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की बांग्‍लादेश यात्रा के दौरान तीस्‍ता जल का बंटवारा 50-50 प्रतिशत फार्मूले के आधार पर समझौता होना निश्चित हुआ था। ऐन मौके पर पश्चिमी बंगाल की मुख्‍यमंत्री ममता बनर्जी ने उस समझौते को इस आधार पर खारिज़ कर दिया कि उसमें पश्चिम बंगाल के हितों की अनदेखी हुई है तथा समझौते के जिस मसौदे पर उनसे सहमति ली गयी थी, उससे प्रस्‍तावित मसौदा भिन्‍न है। ममता यहीं नहीं रूकी, उन्‍होने प्रधानमंत्री के साथ बांग्‍लादेश की यात्रा से भी इनकार कर दिया।

तत्‍कालीन मनमोहन नीत यू0पी0ए0 सरकार की जग हंसाई जो हुई सो हुई, बांग्‍लादेश ऐसे पड़ोसी मित्र देश के साथ सीमा विवाद एवं नदी जल विवाद सुलझाने के प्रयासों को भी खासा झटका पहुंचा । प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की इस बात पर अविश्‍वास करने का कोई आधार नहीं है कि उनके द्वारा तीस्‍ता जल बंटवारे की प्रस्‍तावित संधि के मसौदे के विषय में राष्‍ट्रीय सुरक्षा सलाहकार शिवशंकर मेनन के माध्‍यम से एक माह पूर्व ही ममता बनर्जी को अवगत करा दिया गया था। यहॉ तक कि कैबिनेट की पोलिटिकल एफेयर कमेटी में त़ृणमूल कांग्रेस की आपत्तियों के निराकरण के संबंध में पुन: श्री मेनन को कोलकता भेजकर स्थिति स्‍पष्‍ट करायी गयी थी।[iv]

ममता के तेवर जस के तस हैं। हालांकि इंडो-बांग्‍ला कल्‍चरल अड्डा के तत्‍वाधान में आयोजित बांग्‍लादेश के बुद्धजीवियों की एक बैठक को सम्‍बोधित करते हुए ममता ने बड़ी गर्मजोशी से भरोसा दिलाया था कि लोग उन पर भरोसा कर सकते हैं तथा वे एवं प्रधानमंत्री हसीना मिलकर एक ऐसा ऐसा फार्मूला ढूंढ निकालेंगीं जो दोनों देशों के हित में होगा। तीस्‍ता जल बंटवारे को लेकर समस्‍याएं पश्चिम बंगाल एवं बांग्‍लादेश्‍ा दोनों में है तथा इसका समाधान भी मिलकर ढूंढ़ना होगा।[v]

ममता की सदिच्‍छा एवं पश्चिम बंगाल के हितों के प्रति उनकी चिन्‍ता के विषय में शायद ही कोई विवाद हो। असली चिन्‍ता मोदी की केन्‍द्र सरकार एवं ममता बनर्जी की पश्चिम बंगाल सरकार के रिश्‍तों में आयी खटास को लेकर है। नोटबन्‍दी को लेकर ममता के हाहाकारी विरोध के मद्देनजर प्रधानमंत्री शेख हसीना की दिसम्‍बर 2016 की यात्रा टालकर विदेश मंत्रालय ने बुद्धिमानी का ही परिचय दिया था। अप्रैल 2017 के प्रारम्‍भ में हसीना की सम्‍भावित यात्रा को दोनों ही देशों में बहुत उम्‍मीदों से देखा जा रहा है। भारत के प्रति अति मैत्री प्रदर्शित करने के लिए हसीना को बांग्‍लादेश के मुख्‍य विपक्षी दल बी0एन0पी0 की कटु आलोचना सहनी पड़ती है। अत: बांग्‍लादेश के लिए तीस्‍ता नदी जल बंटवारे का एक न्‍यायोचित समाधान आर्थिक एवं राजनैतिक द़ृष्टि से भी अपरिहार्य है। भारत के लिए भी यह विवाद सुलझाना अत्‍यन्‍त आवश्‍यक है। बांग्‍लादेश-भारत के बीच 53 अन्‍य नदियों का भी विवाद है। अत: तीस्‍ता समझौता जहां अन्‍य विवादों को सुलझाने में नज़ीर बनेगी, वहीं भारत को चीन से निकलने वाली नदियों के जल बंटवारे में भी सहूलियत रहेगी।

केन्‍द्र राज्‍य सम्‍बन्‍धों पर ममता बनर्जी के अपने ही तर्क हैं। वे जी0एस0टी0, लैण्‍ड बाउन्‍डरी एग्रीमेंट तथा एन्‍कलेव स्‍थानान्‍तरण में पश्चिम बंगाल के सहयोगात्‍मक रवैये को गिनाने से नहीं चूकती हैं। 1993 में महाराष्‍ट्र सरकार द्वारा टेक्‍सॉस की एनर्जी जाइन्‍ट एनरॉन के साथ समझौता भारत में पैराडिप्‍लोमैसी का सूत्रपात समझा जा सकता है। परन्‍तु पैराडिप्‍लोमैसी को भारतीय विदेश नीति के केन्‍द्र बिन्‍दु में लाने का श्रेय प्रधानमंत्री नरेन्‍द्र मोदी को जाता है। गुजरात के मुख्‍यमंत्री रहते हुए मोदी ने बाइब्रेन्‍ट गुजरात जैसे आयोजनों के माध्‍यम से जहॉ गुजरात में लाखों-करोड़ का विदेशी निवेश सुनिश्चित किया, वहीं अनेक पश्चिमी देशों में गुज़राती डायसपोरा के माध्‍यम से भारत के विदेशी देशों से सांस्‍कृतिक, राजनैतिक एवं आर्थिक सम्‍बन्‍ध भी सुदृढ़ किए।

मोदी का पैराडिप्‍लोमैसी के प्रति रूझान स्‍वाभाविक है। उनके मुख्‍यमंत्रित्‍व काल में गुजरात की समृद्धि एवं खुशहाली में सुशासन के अलावा प्रत्‍यक्ष विदेशी निवेश का विशेष योगदान रहा है। परन्‍तु पैराडिप्‍लोमैसी की गाड़ी तब हिचकोले लेने लगती है जब राज्‍यों के संकीर्ण राजनैतिक हित भारत की परराष्‍ट्र नीति में भी संघीय हितों के बरखिलाफ खड़े हो जाते हैं। पर राष्‍ट्रनीति एक संवेदनशील मुद्दा है एवं किसी भी राष्‍ट्र की परराष्‍ट्र (वैदेशिक) नीति लम्‍बे समय के अनुभव, सन्धियों तथा वैश्विक भू-राजनैतिक परिस्थितियों पर निर्भर करती है। विदेश मंत्रालय वैदेशिक नीति निर्धारण में विशेषज्ञ भूमिका निभाती है। राष्‍ट्राध्‍यक्ष के व्‍यक्तित्‍व एवं व्‍यक्तिगत सम्‍बन्‍धों की भी इसमें महती भूमिका रहती है। भाम्‍भरी ने सही ही कहा है कि यदि क्षेत्रीय(राज्‍यों) के दबाव में आकर भारत की वैदेशिक नीति को फुटबाल मैच में तब्‍दील कर दिया जायेगा तो भारत को इसकी भारी की‍मत चुकानी पड़ सकती है। [vi]भारत की वैदेशिक नीति की असहायता का सबसे बड़ा उदाहरण भारत की श्रीलंका के प्रति 2012-13 की विदेश नीति में देखा जा सकता है जब भारत को अपनी घोषित विदेश नीति के विरूद्ध जाकर यू0एन0एच0आर0सी0 में अमेरिका द्वारा प्रायोजित प्रस्‍ताव के पक्ष में यू0पी0ए0 के सहयोगी तमिल पार्टी डी0एम0के0 के दबाव में वोट करना पड़ा। मनमोहन की यू0पी0ए0 II सरकार सहयोगी दलों पर इतना आश्रित थी कि वैदेशिक नीति जैसे अत्‍यन्‍त संवेदनशील मुद्दे पर भी उसे राष्‍ट्रहित के विरूद्ध जाकर नीति परिवर्तन करना पड़ा।

तीस्‍ता जल बंटवारे के विवाद में दो और बिन्‍दु महत्‍वपूर्ण हो जाते है। पहला, प्रधानमंत्री मोदी की पहल पर विदेश मंत्रालय द्वारा संघ के राज्‍यों को विदेश नीति निर्धारण में पहले की अपेक्षा अधिक तवज्‍ज़ो देना। दूसरा भारत की लुक ईस्‍ट पॉलिसी के मद्दे नज़र भारत के दक्षिण पूर्व के देशों से संबंध बढ़ाने के मद्देनज़र प्रमुख बिन्‍दुओं का निर्धारण। [vii] संघ सरकार इस तथ्‍य से बखूबी भिज्ञ है कि पड़ोसी राज्‍यों के साथ वैदेशिक नीति नियमन हेतु संघ के संबंधित सीमावर्ती राज्‍यों की सहमति आवश्‍यक है। आसाम, मेघालय, मिजोरम, त्रिपुरा तथा पश्चिम बंगाल राज्‍यों पर भारत-बांग्‍लादेश संबंधों का प्रभाव पड़ना लाजि़मी है।[viii]

अत: जब ममता यह आरोप लगाती हैं कि केन्‍द्र सरकार उन्‍हें तीस्‍ता जल बंटवारे पर विश्‍वास में नहीं ले रही है, तो चिन्तित होना स्‍वाभाविक है। ममता अभी भी पश्चिम बंगाल के हितों की अनदेखी का आरोप लगा रहीं है। तीस्‍ता विवाद का सकारात्‍मक निराकरण बांग्‍लादेशभारत संबंधों को और मज़बूती प्रदान करेगा। ममता केन्‍द्र सरकार पर भारत के संघीय ढॉचे को नष्‍ट करने का आरोप लगाती है। विदेश मंत्रालय के प्रवक्‍ता गोपाल बागले तीस्‍ता जल बंटवारे के समाधान में सहयोगात्‍मक संघवाद की बात करते हैं। मोदी पैराडिप्‍लोमैसी के हिमायती रहे हैं। परन्‍तु समस्‍त सदाशयता के बावजूद विदेश नीति पर अन्तिम निर्णय केन्‍द्र सरकार को लेना है। राष्‍ट्रहित सर्वोपरि है। बांग्‍लादेश भारत का एक बहुमूल्‍य पड़ोसी देश है। पश्चिम बंगाल के हित राष्‍ट्रहित के अधीन है। आखिरकार पैराडिप्‍लोमैसी की भी अपनी सीमाएं हैं।


सन्‍दर्भ

[i] प्रसाई, सागर एवं मंदाकिनी डी0सूरी 2013: पोलिटिकल इकोनॉमी एनालिसिस ऑफ द तीस्‍ता रिवर बेसिन, नई दिल्‍ली : द एशिया फाउन्‍डेशन।

[ii] मीरचन्‍दानी, माया, द तीस्‍ता वाटर डिसप्‍यूट: जियो पॉलिटिक्‍स, मिथ एण्‍ड इकोनॉमी, ORF इश्‍यू ब्रीफ्स एवं स्‍पेशल रिपोर्टस, 21 सितम्‍बर 2016

[iii] वाटर वियोन्‍ड बार्डरस्, 2012 “शेयर्ड रिवरस एण्‍ड शेयर्ड सैक्रिफाइसेस : रिवर तीस्‍ता” डिस्‍कसन पेपर नं0 1 (अप्रकाशित) प्रसाई, सागर एवं मन्‍दाकिनी डी0सूरी 2013 में उद्धृत।

[iv] स्‍वामी, प्रवीन, 8 सितम्‍बर 2011, मनमोहन सेज़ ममता एसेन्‍टेड टू तीस्‍ता डील, द हिन्‍दू

[v] दास, मधुपर्णा, 21 फरवरी 2015 “हसीना एण्‍ड आई विल फाइन्‍ड तीस्‍ता सोल्‍यूशन, हैव फेथ : ममता बनर्जी”, प्रे0ट्र0 आफ इंडिया, द इंडियन एक्‍सप्रेस

[vi] भाम्‍भरी, सी0पी0 2012, इंडियन फॉरेन पॉलिसी: फॉरेन आर प्राविन्सियलॽ द इकोनॉमिक टाइम्‍स, 31 मार्च।

[vii] बागले, गोपाल, 23 फरवरी 2015, आई0सी0डब्‍ल्‍यू0ए0 सेमिनार ऑन “इन्‍ट्रीगेटिंग नार्थ ईस्‍ट इन इंडियाज एक्‍ट ईस्‍ट पॉलिसी”।

[vii] जैकब, हैप्‍पीमान, 2016, पुटिंग द पेरिफेरी एट द सेन्‍टर: इंडियन स्‍टेट्स रोल इन फॉरेन पॉलिसी : कॉरनेगी इंडिया।

ये लेखक के निजी विचार हैं।

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