पूंजीवाद के अंत की आशंका के बीच पश्चिम एशिया और भारत

ट्रंप के चुनाव से खाड़ी देशों को लग सकता है कि भूमंडलकीरण का अंत हो गया है। भारत के आर्थिक व क्षेत्रीय हितों पर इसका बहुत ज्यादा प्रभाव पड़ेगा।

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एक नई श्रृंखला में यह विश्लेषण किया जा रहा है कि डोनाल्ड ट्रंप के अमेरिका के राष्ट्रपति पद के लिए चुने जाने को विश्व कैसे देख रहा है और इस नजरिए का भारत की विदेश नीति पर क्या प्रभाव पड़ेगा। यह श्रृंखला एक पखवाड़े तक चलेगी और इसमें पश्चिम एशिया, पूर्वी एशिया और यूरोप से विश्लेषक अपने विचार सांझा करेंगे।

दुबई: विश्व आर्थिक फोरम की ‘फ्यूचर काउंसिल्स’ की सालाना बैठक में यहां वकील, अर्थशास्त्री और उद्यमी ने केवल पूंजीवाद की तारीफ करने के लिए एकत्र हुए हैं बल्कि वे उसे दफनाने को भी तैयार हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव में डोनाल्ड ट्रंप की जीत और ब्रिटेन के यूरोपीय संघ को अलविदा कहने के बाद दुनिया के चुनिंदा एलीट वर्ग में अब यह सोच काफी मजबूत हो गई है कि उदार अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था अपनी आखिरी सांसें गिन रही है। इस सोच का आधार, जो शायद सही नहीं है, यह अवधारणा है कि व्यापार, लोगों और जानकारी के निर्बाध प्रवाह को संभव बनाने वाली अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्थाओं का उद्गम सिर्फ पश्चिम से ही हो सकता है। यूएई और खाड़ी के कई अन्य देशों के लिए भूमंडलीकरण के अंत यानी ‘डी — ग्लोबलाइजेशन’ का यह माहौल वाशिंगटन को गले लगाने की उनकी सोची समझी नीति को अस्त — व्यस्त कर रहा है।

बीते रविवार को अमीरात के एक प्रमुख दैनिक अंग्रेजी समाचार पत्र ‘गल्फ न्यूज़’ ने एक संपादकीय में ट्रंप प्रशासन से कहा कि वह जलवायु परिवर्तन अथवा अत्यंत निर्णायक साबित हुए पेरिस समझौते की उपेक्षा न करें। यह दिलचस्प बात है कि खाड़ी में राजतंत्र आधारित एक देश जो उर्जा के गैर नवीकरण स्त्रोतों पर लम्बे समय से निर्भर है अब अमेरिका को उसकी बहुपक्षीय और एक हद तक नैतिक जिम्मेदारियों की याद दिलाने की जरूरत महसूस कर रहा है, इससे इस क्षेत्र में मौजूद देशों की चिंताओं का अंदाजा भी लगता है। वाशिंगटन में बनने वाली नीतियों से अगर कोई क्षेत्र तुरंत सबसे अधिक प्रभावित होता है तो वह पश्चिम एशिया ही है। राष्ट्रपति जार्ज डब्ल्यू. बुश का इराक पर आक्रमण का फैंसला और उनके उत्तराधिकारियों द्वारा ईरान से संबंध सुधारने के प्रयासों ने इस क्षेत्र की सुरक्षा के आयाम ही बदल दिए हैं। इसीलिए यह संभ्रांत यानी एलीट वर्ग ट्रंप की जीत के बाद आशंकित है। विश्व आर्थिक फोरम में यूएई के मंत्री मोहम्मद अल गरगावी ने यह बताया कि उनका देश उद्योग जगत में टेक्नालोजी से जुड़े व्यवधानों से निपटने के लिए ‘ग्लोबल गवर्नेंस फ्रेमवर्क’ विकसित करने में मदद करेगा। संकेत साफ है कि जहां पश्चिम में ‘एकला चलो’ की प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है वहीं इससे बिल्कुल उलट एशिया में सबको साथ लेकर चलने के प्रयास किए जा रहे हैं।

अमेरिका के नए राष्ट्रपति का जोर रोजगार पैदा करने और इन अवसरों को बनाए रखने पर है। खाड़ी देशों के राजपरिवार भी यही सोच रखते हैं। पर साथ वे यह भी सोच रहे होंगे कि क्या हरित प्रौद्योगिकी का इस्तेमाल और स्वचालित उद्योग श्रृंखलाएं उनके शासन के खिलाफ नाराजगी पैदा करेंगी। ट्रंप के नेतृत्व में अमेरिकी विदेश नीति का पूर्वानुमान नहीं लगाया जा सकता है पर उनकी चुनावी जीत अपने आप में पश्चिम एशियाई देशों को इस बात का पर्याप्त संकेत है कि व आधुनिकीकरण की योजनाओं की गति थोड़ी धीमी कर दी जाए। आने वाले महीनों में आर्गेनाइजेशन आॅफ पेट्रोलियम एक्सपोर्टिंग कंट्रीज़ (ओपेक) द्वारा लिए गए निर्णय संकेत देंगे कि राजनैतिक माहौल कैसा है और हवा किस ओर बह रही है।

इसके अलावा मसला ट्रंप की मध्य पूर्व नीति (मिडल ईस्ट पॉलिसी) को लेकर भी है। अगर चुनाव अभियान में उनके बयानों को गंभीरता से लिया जाए तो आने वाले दिनों अमेरिका इस क्षेत्र की सुरक्षा से अपना हाथ काफी हद तक खींच लेगा। इससे जीसीसी के सदस्य सभी देशों का रक्षा खर्च बढ़ सकता है। किसी मध्यस्थ की अनुपस्थिति में ईरान और सउदी अरब में प्रतिस्पर्धा भी हो सकती है। घटते अमेरिका प्रभाव के चलते हो सकता है सउदी अरब परमाणु हथियार रखने के बारे में सोचे। इसका नाटकीय असर पूरे क्षेत्र के शक्ति संतुलन पर होगा। इस प्रकार ट्रंप के राष्ट्रपति बनने से इस क्षेत्र में कई ऐसीे संस्थाओं को जीवनदान मिलेगा जिनकी उपयोगिता और वैधता ‘अरब स्प्रिंग’ के बाद समाप्त मान ली गई थी। क्षेत्रीय सहयोग स्थापित करने के लिए अब इन संस्थाओं की जरूरत पड़ेगी। इस संदर्भ में अरब लीग का उल्लेख करना उचित होगा। नए अमेरिकी राष्ट्रपति रूस के साथ कैसा व्यवहार करते हैं यह आने वाला वक्त बनाएगा लेकिन इस्लामिक स्टेट व अन्य आतंकवादी संगठनों से निपटने के लिए क्षेत्रीय प्रयासों के संदर्भ में इन दोनों के द्विपक्षीय संबंधों की महत्वपूर्ण भूमिका होगी।

ट्रंप की विदेश नीति को लेकिन पश्चिम एशिया की प्रतिक्रिया से भारत के आर्थिक व सुरक्षा हित भी जुड़े हैं। अगर हाल ही के चुनावों से पश्चिम एशियाई देशों ने यह निष्कर्ष निकाला कि अप्रवासन यानी इमीग्रेशन के कारण सरी राजनीतिक बाजी पलटी है तो हो सकता है कि वे ऐसी नीतियां बनाएं जिनसे इस क्षेत्र में भारतीयों के लिए अवसर सीमित रह जाएंगे। खाड़ी में काम करने वाले ज्यादातर भारतीय अर्ध — प्रशिक्षित हैं पर आने वाले दिनों में यह स्थिति बदल सकती है क्योंकि संपन्न वर्गों से अब विधिक, शैक्षिक और वित्तीय सेवाओं की मांग बढ़ रही है। यह तो तय लगता है कि पश्चिम एशिया में भी ‘डी — ग्लोबलाइजेशन’ की बयार बहेगी। इसके नीतिगत असर को रोकने के लिए भारत को इस क्षेत्र के राजनैतिक नेतृत्व से लगातार खुद को जोड़े रखना होगा। इस घटनाचक्र की समीक्षा के लिए भारत के पास अच्छा मौका होगा जब सउदी अरब के शहजादे, जो भविष्य में सर्वोच्च सिंहासन संभालेंगे, मोहम्मद बिन जाएद अगले साल गणतंत्र दिवसर के अवसर पर मुख्य अतिथि होंगे।

हरित प्रौद्योगिकियों को विकसित करने में यूएूई भारत को महत्वपूर्ण भागीदार है। अमीरात लगातार अपनी निर्भरता गैर नवीकरण उर्जा के स्त्रोतों पर कम करने का प्रयास कर रहा है। सउदी अरब ने तो अभी हाल ही में अपने आर्थिक उत्पादन में विविधता लाने के प्रयास आरंभ किए हैं। जबकि यूएई ने ज्यादा उपभोग वाले सेक्टरों में अपने यहां कार्बन उत्सर्जन कम करने के लिए लंबे समय से बड़े पैमाने पर निवेश किया है। अमेरिकी उपेक्षा के चलते पेरिस समझौता लड़खड़ाएगा और भारत को भी प्रौद्योगिक बदलने के लिए वित्त नहीं मिलेगा।  अपने यहां जलवायु परिवर्तन के लिए संसाधन जुटाने के लिए अमेरिकी चुनावी परिणामों के मद्देनजर भारत को भी एशियाई शक्तियों जैसे यूएई, जापान तथा सिंगापुर की ओर हाथ बढ़ाना चाहिए।

अंत में यह कहना होगा कि ट्रंप का राष्टप्रति पद पर आना भारत द्वारा लगातार पश्चित एशिया से संवाद बनाए रखने के प्रयासों के महत्व पर मुहर लगाता है। लंबे समय तक अलग थलग रहने के बाद अंतत: परमाधु समझौते के चलते ईरान अब अपने खोल से बाहर आ रहा है। अमेरिका की अपने को अलग थलग करने की नीति के चलते तेहरान इस क्षेत्र में अपना प्रभाव कायम करने का प्रयास कर सकता है। मोदी सरकार की प्रशंसा की जानी चाहिए कि उसने ईरान और सउदी अरब दोनों से संबंध और मजबूत किए हैं। अगर यमन में हाल ही में हुण् घटनाक्रम को देखा जाए तो लगता है कि पश्चिम एशिया में कमजोर अमेरिकी उपस्थिति से सउरदी अरब इस क्षेत्र में प्रभाव कायम करने का प्रयास करने में रूचि दिखाएगा। उधर अगर रियाद ने परमाणु हथियारों की दौड़ में कदम रखा तो इससे सउदी अरब और पाकिस्तान के संबंधों में तनाव कम होगा क्योंकि सउदी को पाकिस्तान से हथियार कार्यक्रम में मदद चाहिए होगी। सारे संकेत यही बता रहे हैं कि आने वाले चार सालों में इस क्षेत्र में कुछ प्रमुख क्षेत्रीय शक्तियां अपनी पकड़ और मजबूत करने का प्रयास करेंगे जिससे उनमें टकराव की संभावना बढ़ सकती है। भारत को इन परिस्थितियों से निपटने के लिए तैयार रहना चाहिए। सनद रहे कि इराक और सीरिया में खराब हालातों से न केवल अप्रवासियों को मिलने वाले आर्थिक अवसरों को नुकसान पहुंचना है बल्कि इससे दक्षिण एशिया के कई हिस्सों में कट्टरवाद को बढ़ावा देने वाले अभियान और आंदोलन भी फल — फल रहे हैं।

ये लेखक के निजी विचार हैं।

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