झगड़ालू पाक पर अंकुश और ट्रंप

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डोनाल्ड ट्रंप का 30 नवंबर को नवाज शरीफ को किया गया असाधारण फोन कॉल इस बात का उदाहरण है कि अमेरिकी राष्ट्रपति के रूप में ट्रंप का कार्यकाल कितना अप्रत्याशित हो सकता है। इस बातचीत को जैसा पाकिस्तान सरकार ने पेश किया है वह भाषा तो बेहद सजावटी और सम्मान से भरी थी। इसमें राष्ट्रपति-निर्वाचित ट्रंप की ओर से कही गई और बातों के साथ ही ‘जबर्दस्त’ शरीफ को उनके देश में किए उनके ‘शानदार काम’ के लिए बधाई देना और पाकिस्तान को ‘असीमित संभावनाओं’ वाला देश बताना भी शामिल है। ट्रंप का यह बयान जितना उदार था, उसे देखते हुए दोनों नेताओं के पहले संवाद के बारे में दो ही नतीजे निकाले जा सकते हैं। एक तो यह कि पाकिस्तान ने अपनी प्रेस रिलीज़ में इस बातचीत को बहुत अलंकृत कर और बढ़ा-चढ़ा कर पेश किया। दूसरा मतलब यह हो सकता है कि डोनाल्ड ट्रंप पाकिस्तान की जमीनी हकीकत से अनजान हैं और अमेरिका-पाकिस्तान के रिश्तों के बारे में उनकी जानकारी बहुत कम है। दोनों ही संभावनाओं पर विचार किया जा सकता है, लेकिन दूसरी संभावना तो बहुत ज्यादा ही डरावनी है। डोनाल्ड ट्रंप को जल्दी ही पता चलेगा कि संयुक्त राज्य अमेरिका और पाकिस्तान के बीच सब कुछ ‘शानदार’ नहीं है। अमेरिका के लिए सबसे गंभीर चुनौतियां दक्षिण एशिया में ही बसती हैं और इन्हें सुलझाने में पाकिस्तान अहम है।

आतंकवाद के खिलाफ अपने अंतरराष्ट्रीय युद्ध के तहत 2001 में अफगानिस्तान पर हमले के बाद से पाकिस्तान अमेरिका के लिए पहली पंक्ति का सहयोगी बन कर उभरा है। अफगानिस्तान में अंतरराष्ट्रीय सैन्य शक्तियों और सामान के प्रवेश के लिए यह जरिया बनता है। इस सहयोग के बदले इस्लामाबाद को गठबंधन समर्थन कोष (सीएसएफ) के तौर पर अर्थव्यवस्था और सैन्य सहायता के रूप में मोटी मदद मिलती रही है। हालांकि अमेरिका की आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में सार्वजनिक तौर पर जारी सहयोग के साथ ही पाकिस्तान ने उन आतंकवादी सरगानाओं को सुरक्षित अभयारण्य मुहैया करवाना जारी रखा है जिनके हाथ अमेरिकी खून से सने हैं। 2011 में ऐबटाबाद में किए गए हमले में ओसामा बिन लादेन को मारे जाने और 2015 के ड्रोन हमले में क्वेटा के पास तालीबानी नेता मुल्ला मंसूर को निशाना बनाए जाने के बाद ऐसे संरक्षण से पाकिस्तान के इंकार के खेल का पर्दाफाश हो चुका है। पाकिस्तानी सेना ने अफगान-पाक सीमा पर सक्रिय पाकिस्तानी तालीबान जैसे आतंकवादी संगठनों के खिलाफ तो सक्रियता दिखाई है, मगर हक्कानी नेटवर्क जैसे संगठनों को ले कर पूरी तरह आंखें बंद रखी हैं। जबकि यह अफगानिस्तान में तालीबान को सभी तरह के सहयोग उपलब्ध करवाता है। यह अमेरिका के भौगोलिक-राजनीतिक सहयोगी भारत के खिलाफ सक्रिय जैश-ए-मोहम्मद और लश्कर-ए-तैयबा जैसे आतंकवादी संगठनों के खिलाफ भी कुछ करने में नाकाम रहा है।

चुनाव प्रचार के दौरान ट्रंप ने माना था कि पाकिस्तान ने अमेरिका के साथ ‘दोहरा रवैया’ अपनाया था और यह ‘अर्ध अस्थायी’ है। उनकी अपनी पार्टी में भी कई लोग हैं जो पाकिस्तान को अविश्वसनीय सहयोगी के तौर पर देखते हैं। टेड पोए और डाना रोहराबेचर ने अमेरिकी कांग्रेस में विधेयक पेश किया था जिसमें पाकिस्तान को आतंकवाद का प्रायोजक देश का दर्जा देने की व्यवस्था थी। एक अन्य रिपब्लिक नेता और सीनेटर बॉर कॉर्कर ने इस बात पर खास जोर दिया था कि ओबामा प्रशासन की ओर से पाकिस्तान को सब्सिडी वाली दर पर एफ-16 तब तक नहीं बेचे जाएं जब तक वह हक्कानी नेटवर्क के खिलाफ कार्रवाई नहीं कर दिखाए। कैपिटॉल हिल में पाकिस्तान को ले कर जिस तरह आशंका बढ़ रही है, अगर ट्रंप पाकिस्तान से सख्ती से निपटने का फैसला करते हैं तो उन्हें दोनों तरफ से सहयोग मिलने में कोई परेशानी नहीं होनी चाहिए। पाकिस्तान को सीएसएफ के तहत 900 मिलियन डॉलर तक की स्वीकृति देने वाले नेशनल डिफेंस ऑथराइजेशन कानून 2017 ने 400 मिलियन डॉलर की रकम को जारी करने के लिए शर्त रख दी है कि यह तभी मुमकिन होगा जबकि विदेश मंत्री यह प्रमाणपत्र दें कि पाकिस्तानी सरकार हक्कानी नेटवर्क के खिलाफ गंभीर कदम उठा रही है। इस साल ऐश कार्टर की ओर से यह प्रमाणपत्र देने से मना कर दिए जाने के बाद पाकिस्तान की 300 मिलियन डॉलर से ज्यादा की रकम रोक ली गई थी।

ट्रंप को विदेश नीति और प्रशासन के अनुभव की कमी की वजह से यह कहना मुश्किल है कि उनकी विदेश नीति किस दिशा में आगे बढ़ेगी। पहले वे यह भी मान चुके हैं कि पाकिस्तान की परमाणु शक्ति की वजह से वाशिंगटन एक सीमा तक ही इसे प्रभावित कर सकता है और यह संकेत भी दिेए हैं कि पाकिस्तान के परमाणु जखीरे को सुरिक्षत करने के लिए अमेरिका भारत की मदद ले सकता है। साथ ही उन्होंने यह भी कहा है कि वे भारत और पाकिस्तान को ‘साथ चलने में’ मदद कर के ‘गौरवान्वित’ महसूस करेंगे। उप-राष्ट्रपति-निर्वाचित माइक पेंस ने एक इंटरव्यू के दौरान यही भाव जाहिर किए थे। इस दौरान उन्होंने कश्मीर पर पूछे गए एक सवाल के जवाब में कहा था कि ट्रंप ‘समझौते करवाने के असाधारण कौशल’ का इस्तेमाल दुनिया में फैले तनाव को घटाने में कर सकते हैं। यह बहुत चिंताजनक है, खास कर इसलिए कि उन्होंने शरीफ को फोन पर कथित तौर पर यह प्रस्ताव किया था कि ‘आप जैसा चाहें, मैं वह भूमिका अपनाने को तैयार हूं’।

ट्रंप को यह पता होना चाहिए कि पाकिस्तान से काम लेना या ‘आप जैसा चाहें, वह भूमिका अपनाने को तैयार’ होना खतरनाक हो सकता है। सैन्य और आर्थिक मदद के तौर पर बड़ी रकम खर्च करने से ले कर चेतावनी और धमकी देने तक के बावजूद पाकिस्तानी सैन्य प्रतिष्ठान अफगानी तालिबान और हक्कानी नेटवर्क को सहयोग देने की अपनी रणनीति में बदलाव लाने को तैयार नहीं हुआ है। कई राष्ट्रपतियों ने यह कोशिश कर के देख ली कि पाकिस्तान को इस बात के लिए तैयार कर लें कि वह आतंकवाद को देश की नीति का हिस्सा बनाने से बाज आए, लेकिन सभी नाकाम रहे हैं। इसलिए अब ट्रंप प्रशासन को कोई भी कदम उठाते समय बहुत सावधान रहना होगा। पाकिस्तान ने आतंकवाद को अपनी राष्ट्रीय नीति के एक हिस्से के तौर पर इस्तेमाल किया है और खुद को परमाणु कवच की सुरक्षा में छुपाने की कोशिश की है। ट्रंप प्रशासन की चुनौती यही है कि वे इस पहली को कैसे सुलझाएं और पाकिस्तान के लिए आतंकवाद को सहयोग जारी रखना महंगा साबित कर दें ताकि वह इसे अपनी विदेश नीति के औजार के रूप में चलाने से हमेशा के लिए तौबा कर ले। इसे खास तौर पर इस बात पर जोर देना होगा कि यह सभी आतंकवादी संगठनों को मदद करना बंद कर दे तभी यह अंतरराष्ट्रीय समुदाय से अपनी मांगों पर विचार करने की उम्मीद रखे।

पूरे चुनाव के दौरान ट्रंप ने इस्लामी आतंकवाद को काबू करने की जरूरत को अपने मंच का मुख्य बिंदु बनाया। उन्होंने वादा किया था कि जिन देशों का ‘अमेरिका के खिलाफ आतंकवाद का प्रमाणित इतिहास’ है, उन देशोंं सेे मुसलमानों का अपने देश में प्रवेश प्रतिबंधित कर देंगे। इस वादे को लागू करने से अमेरिका और पाकिस्तान के बीच रिश्तों को झटका लगेगा। माइकल फ्लिन को राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार नियुक्त कर ट्रंप ने यह संकेत दे दिया है कि वे इस्लामी आतंकवाद के बारे में अपने वादे को ले कर गंभीर हैं। कट्टरपंथी इस्लाम के खिलाफ फ्लिन भी अपने सख्त तेवर के लिए जाने जाते हैं और पाकिस्तान को दी जाने वाली मदद में कटौती की पुरजोर वकालत करते रहे हैं। फ्लिन, ट्रंप के जितना करीब हैं, उसे देखते हुए माना जा सकता है कि आने वाले समय में अमेरिका की विदेश नीति को वे काफी प्रभावित कर सकते हैं। राष्ट्रपति-निर्वाचित को पाकिस्तान के तुष्टिकरण और उसे फटकार लगाने के बीच बहुत सावधानी से संतुलन बनाना होगा ताकि यह कट्टरपंथियों, उग्रवादियों और आतंकवादियों के बीच अमेरिका-विरोधी माहौल को और हवा नहीं दे।

ट्रंप- शरीफ के बीच हुई फोन पर बातचीत बेहद हैरानी पैदा करने वाली है तो इसकी एकमात्र वजह है प्रेस रिलीज में विशेषणों की भरमार। जहां इस्लामाबाद में इस फोन वार्ता को ट्रंप-शरीफ के बेहतर संबंधों की शुरुआत के तौर पर देखा गया, नई दिल्ली ने ट्रंप के कथित शब्दों के पीछे मौजूद विचार और तर्कों पर सवाल उठाया है। अगर अमेरिका ने पाकिस्तान को ‘मुफ्त का आनंद’ देते रहने और ओबामा प्रशासन जैसी ही नीतियों को जारी रखने का फैसला किया तो यह नई दिल्ली को रास आने वाला नहीं है। पिछले दशक के दौरान वाशिंगटन और नई दिल्ली ने राजनीतिक, आर्थिक और सुरक्षा संबंधी मामलों में काफी मजबूत रिश्ते कायम किए हैं। अमेरिका और भारत के बीच यह करीबी आई है तो इसकी वजह दोनों देशों के सामरिक हितों में समानता है, जबकि पाकिस्तान के साथ अमेरिका के हितों में ऐसी समानता नहीं है। दक्षिण एशिया में अमेरिका का मजबूत साझेदार पाकिस्तान नहीं बल्कि भारत रहा है, जिसने काबुल को अपने लोकतंत्र को मजबूत करने और युद्ध से तबाह इस देश को दुबारा ढांचागत विकास के लिए मदद उपलब्ध करवाने में मदद की है।

कश्मीर पर मध्यस्थता के ट्रंप के प्रस्ताव से अमेरिका और भारत के बीच कूटनीतिक मदभेद पैदा हो सकते हैं। भारत 1948 से ही मानता आया है कि कश्मीर एक दोतरफा मामला है और इसमें अंतरराष्ट्रीय समुदाय की दखल की कोई जरूरत नहीं है। दूसरी तरफ पाकिस्तान है जो भारत पर हमला करने वाले आतंकवादियों की मदद कर रहा है ताकि दूसरे देश इस विवाद के समाधान के लिए आगे आएं। इस्लामाबाद ने कश्मीर पर बीस विशेष दूत नियुक्त कर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पाकिस्तानी पक्ष रखने की कोशिश की है ताकि उसकी कश्मीर संबंधी मांग को तवज्जो मिल सके। इसलिए राष्ट्रपति-निर्वाचित ट्रंप को सिर्फ खोखले वादे करते रहने की बजाय ऐतिहासिक विवाद के बारे में जानकारी हासिल करनी चाहिए। उन्हें इस विवाद के दोतरफा समाधान को बढ़ावा देना चाहिए और साथ ही पाकिस्तान पर यह दबाव भी बनाना चाहिए कि वह कश्मीर पर राज्य समर्थित आतंकवाद को प्रश्रय देना बंद करे। यह देखते हुए कि पाकिस्तान से पैदा होने वाले आतंकवादी हमलों से भारत और अमेरिका दोनों को ही जूझना पड़ा है, उन्हें अपने दोस्तों और दुश्मनों में साफ तौर पर अंतर करना सीख लेना चाहिए और इस्लामी आतंकवाद को काबू करने के अपने वादे पर टिके रहना चाहिए। इस लिहाज से शुरुआत के लिए पाकिस्तान एक सही जगह हो सकती है। यह भारत और अफगानिस्तान के लिए ही बेहतर नहीं होगा, बल्कि दक्षिण एशिया में भी अपेक्षाकृत शांति और स्थायित्व लाने में मददगार साबित होगा।

डोनाल्ड ट्रंप को जल्दी ही इस बात का एहसास हो जाएगा कि पाकिस्तान भले ही विश्वसनीय दोस्त न साबित हुआ हो, लेकिन इसमें अमेरिका के विश्वस्त दुश्मन बनने की क्षमता है। पाकिस्तान के खिलाफ किसी उग्र कदम से इसका सैन्य-खुफिया तंत्र विचलित हो सकता है और ऐसे में यह अफगानिस्तान या भारत में इसकी प्रतिक्रिया करने को तत्पर हो सकता है। दूसरे शब्दों में कहें तो पाकिस्तान की मदद को रोके जाने या वापस लेने से यह अफगानिस्तान और भारत में हमले करने वाले आतंकवादी समूहों को मदद बढ़ा सकता है। इससे ना सिर्फ अमेरिका के हितों को चोट पहुंचेगी, बल्कि पाकिस्तान अमेरिकी पकड़ से भी और दूर हो जाएगा। ट्रंप को इस कड़वी सच्चाई को भी समझ लेना चाहिए कि अब तक पाकिस्तान के खिलाफ किसी भी चीज का असर नहीं दिखा है। इसलिए जब तक वाशिंगटन के पास नया ट्रंप कार्ड (तुरूप का पत्ता) न हो यह ध्यान रखना चाहिए कि लंबे समय से पत्ते पाकिस्तान के पक्ष में ही पाए जा रहे हैं।

ये लेखक के निजी विचार हैं।

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