• Feb 21 2017

परिधान और चमड़ा क्षेत्रों में रोजगार अपार

चमड़ा उद्योग में 3 मिलियन लोग कार्यरत हैं जिनमें से 30 फीसदी महिलाएं हैं। अत: इस उद्योग को निश्चित रूप से विकसित करने की जरूरत है।

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Source: Wikipedia

रोजगार सृजन मोदी सरकार की सबसे बड़ी चुनौती है और इसे ध्‍यान में रखते हुए जिन दो क्षेत्रों (सेक्‍टर) पर लक्ष्‍य साधा जा रहा है वे हैं परिधान और चमड़ा क्षेत्र। आर्थिक सर्वेक्षण 2016-17 में बताया गया है कि ये दोनों ही क्षेत्र श्रम बहुल हैं यानी इनमें बड़ी संख्‍या में कामगारों की जरूरत पड़ती है। यही नहीं, ये दोनों ही क्षेत्र काफी तेजी से विकास पथ पर अग्रसर हैं। ये क्षेत्र मुख्‍यत: सूक्ष्म, लघु और मझोले उद्यमों (एमएसएमई) के अंतर्गत आते हैं। आम बजट 2017 में ऐसे एमएसएमई पर नजरें इनायत की गई हैं जिनका वार्षिक टर्नओवर 50 करोड़ रुपये से कम है। दरअसल, इन एमएसएमई के लिए टैक्‍स दर को 30 प्रतिशत से घटाकर 25 प्रतिशत कर दिया गया है। वित्त मंत्री अरुण जेटली के अनुसार, इससे भारत में टैक्स रिटर्न दाखिल करने वाली कुल कंपनियों में से 96 प्रतिशत इसके दायरे में आ जाएंगी।

एमएसएमई क्षेत्र में वास्तव में रोजगार सृजन की असीम क्षमता है। ज्यादातर एमएसएमई श्रम गहन या बहुल उत्पाद बनाते हैं और वे महिलाओं को भी रोजगार देते हैं। हर साल 15 मिलियन लोग नौकरी की तलाश करते हैं। ऐसे में ये इकाइयां (यूनिट) उम्‍मीद की किरण लेकर आई हैं क्‍योंकि वे काम के अवसरों की पेशकश करने यानी रोजगार देने में सक्षम प्रतीत होती हैं। हालांकि, गंभीर चिंता की बात यह है कि इनमें से ज्‍यादातर इकाइयां ढेर सारी समस्‍याओं से जूझ रही हैं जिस वजह से उनका मुनाफा मार्जिन काफी कम हो जाता है। यही नहीं, ऐसे में अक्‍सर वे अपना कारोबार समेटने या बंद करने पर विवश हो जाती हें। सबसे पहली समस्‍या तो बड़े उद्योगों से कड़ी प्रतिस्पर्धा है जिस वजह से वे कीमत के मामले में सदैव प्रतिस्‍पर्धी रहने पर मजबूर हो जाती हैं। इन इकाइयों को अपेक्षाकृत अधिक न्यूनतम मजदूरी का भुगतान करना पड़ता है और इसके साथ ही अनिवार्य ओवरटाइम की अदायगी की मार भी उन पर पड़ती है। इसके अलावा, इन इकाइयों द्वारा बनाए जाने वाले उत्‍पादों को चीन से भी कड़ी प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ता है। अपने उत्पादन के लिए सही कच्चे माल को तलाशना भी इनके लिए एक बड़ी समस्‍या है। इसी तरह ऐसे प्रशिक्षित कामगारों का मिलना भी अत्‍यंत आवश्‍यक है जो नियमित रूप से काम पर आने से पीछे न हटें। बुनियादी ढांचागत समस्याएं जैसे कि नियमित रूप से बिजली की आपूर्ति न होना और पानी की उपलब्धता की कमी भी इन इकाइयों के विकास मार्ग में महत्वपूर्ण बाधाएं हैं।

सबसे महत्वपूर्ण समस्‍या ऋण की उपलब्धता से जुड़ी हुई है, जो छोटी इकाइयों को कहीं का नहीं छोड़ती है। इन इकाइयों को ऋण मिलने में आसानी के लिए अनेक योजनाएं शुरू की गई हैं, लेकिन अगर इनके मालिकों से बात करें, तो वे हमेशा ही औपचारिक स्रोतों से ऋण प्राप्त करने में कठिनाइयां गिनाना शुरू कर देते हैं। विपणन और विज्ञापन अन्य समस्याएं हैं जिनके मामले में बड़ी कंपनियां हमेशा ही उनसे बाजी मार ले जाती हैं। फिर भी, अनगिनत समस्याओं से जूझने के बावजूद वे भारत के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में 37.5 प्रतिशत योगदान कर रही हैं और इसके साथ ही इन इकाइयों ने 8.05 करोड़ लोगों को रोजगार भी दे रखा है।

परिधान/वस्‍त्र उद्योग का कारोबार अंतरराष्ट्रीय बाजारों में बांग्लादेश, वियतनाम और इथियोपिया से कड़ी प्रतिस्पर्धा के कारण काफी प्रभावित होता रहा है, क्‍योंकि यूरोपीय संघ (ईयू) की टैरिफ (शुल्‍क दर) नीतियों की बदौलत उन्‍हें कहीं बेहतर पहुंच सुलभ है।

बांग्लादेश के कपड़ा उद्योग ने विगत कुछ वर्षों के दौरान शानदार ढंग से प्रगति की है, जिसमें ज्यादातर महिलाओं को ही रोजगार मिला हुआ है, जो बेहद सक्षम तो हैं, लेकिन उन्‍हें कम मजदूरी पर काम करने पर विवश किया जाता है। वहां 6,660 कपड़ा कारखाने (फैक्‍टरी) हैं, जिनमें से ज्‍यादातर ढाका के निकट बहु मंजिला इमारतों में अवस्थित हैं और ज‍हां सप्‍ताह में सातों दिन चौबीस घंटे काम होता है। वर्ष 2013 में राणा प्लाजा कपड़ा कारखाने में हुई भयावह त्रासदी में 1,138 श्रमिकों की मौत हो गई थी और जिससे इन कारखानों में काम करने की दयनीय स्थितियां जगजाहिर हुई हैं। दरअसल, वहां श्रमिकों की सुरक्षा पर बहुत कम ध्यान दिया जाता है। लेकिन इन कारखानों से प्रतिस्पर्धा इतनी ज्‍यादा विकट है कि भारतीय अब अपनी परिधान इकाइयों को ढाका में स्थानांतरित करने लगे हैं। यदि भारतीय कपड़ा कारखाने खुद को इस प्रतिस्‍पर्धा के अनुरूप ढालने में नाकाम रहे तो वे इस क्षेत्र की फैक्‍टरियों से मात खाने पर विवश हो जाएंगे।

चमड़ा क्षेत्र भी एक ऐसे अन्य उद्योग के रूप में स्‍थापित है जिसमें रोजगार और निर्यात की असीम संभावनाएं हैं। यह 17.85 अरब अमेरिकी डॉलर के कारोबार वाला उद्योग है। भारत ने प्रति व्यक्ति जूतों की खपत को वर्ष 2020 तक बढ़ाकर चार जोड़े करने का लक्ष्य रखा है। भारत के चमड़ा उद्योग में कार्यरत श्रमबल युवा है और वे चमड़ा उत्पादन के लिए देश भर में फैले विभिन्न केंद्रों में कार्यरत हैं। कानपुर, आगरा, चेन्नई एवं कोलकाता को इस मामले में महत्वपूर्ण केंद्र (हब) माना जाता है। भारत में भी चमड़े की विभिन्‍न वस्‍तुओं जैसे कि हैंडबैग, पर्स, दस्ताने, तैयार चमड़े, जूते-चप्‍पल (फुटवियर) के समस्‍त पुर्जों या घटक (कंपोनेंट) के साथ-साथ साज और काठी या जीनसाजी का उत्पादन होता है।

भारत में मवेशी और बकरे की विशाल आबादी के जरिए कच्ची खाल की आपूर्ति होती है। दुनिया भर की समस्‍त गाय एवं भैंस आबादी का 20 प्रतिशत और बकरी एवं भेड़ की समस्‍त आबादी का 11 प्रतिशत भारत में ही है। भारत में 2.5 अरब वर्ग फुट चमड़े का उत्पादन होता है, जो इसके वैश्विक उत्पादन का 13 प्रतिशत है।

चमड़ा उद्योग में 3 मिलियन लोग कार्यरत हैं जिनमें से 30 फीसदी महिलाएं हैं। अत: इस उद्योग को निश्चित रूप से विकसित करने की जरूरत है। हालांकि, इस उद्योग पर नोटबंदी या विमुद्रीकरण की भारी मार पड़ी क्‍योंकि इस उद्योग में नकदी आधारित कामकाज होता है। नकदी की आपूर्ति की किल्‍लत और दैनिक मजदूरी का भुगतान करने में असमर्थता की वजह से कई बूचड़खानों के साथ-साथ अनेक छोटी इकाइयों को भी बंद कर दिया गया। उम्मीद है कि कच्ची खाल की आपूर्ति अब सामान्य हो जाएगी क्‍योंकि यह एक जाति और समुदाय विशेष के कल्याण से जुड़ी व्‍यावसायिक गतिविधि है जिसमें दलितों और मुसलमान शामिल हैं।

निर्यात को बढ़ावा देने के उद्देश्‍य से कई सुधारों को लागू किया गया है। उदाहरण के लिए, फुटवियर उद्योग को लाइसेंस मुक्‍त करने के साथ-साथ इसमें आरक्षण को हटाते हुए बड़ी कंपनियों को अत्याधुनिक मशीनरी से युक्‍त जूतों का उत्‍पादन करने की इजाजत दे दी गई है। बड़ी कंपनियों को अपनी उत्पादन क्षमता बढ़ाने की भी अनुमति दी गई है। अतीत में ज्‍यादातर निर्यात (वर्ष 2015-16 में 5.85 अरब डॉलर) अमेरिका और यूरोपीय संघ (ईयू) को हुआ है। अमेरिका में संरक्षणवाद बढ़ने के मद्देनजर भारतीय उद्योग को घरेलू बाजार पर अपना ध्यान केंद्रित करना चाहिए जिसमें 12 अरब डॉलर मूल्‍य की चमड़े की वस्तुओं की खपत हो रही है।

अतीत में जब मैंने चमड़े की वस्‍तुओं के निर्यातकों का साक्षात्कार लिया था तो उन्‍होंने चमड़े और उसकी फि‍निशिंग की गुणवत्ता के बारे में शिकायत की थी। अब चर्म एवं खाल और अर्द्ध तथा शोधित चर्म से तैयार फर खाल पर कुछ भी आयात शुल्क नहीं लगता है। हालांकि, लॉजिस्टिक्स, प्रशिक्षित श्रमबल की कमी और ज्‍यादा मजदूरी की समस्‍याएं अब भी बनी हुई हैं। फुटवियर डिजाइन एवं विकास संस्थान के जरिए प्रशिक्षण दिया जा रहा है, जिसने वर्ष 2016-17 में 60,705 युवा कामगारों को प्रशिक्षित किया और इनमें से 80 प्रतिशत कामगार नौकरियां पाने में कामयाब रहे।

इस संदर्भ में क्लस्टर विकास की सख्‍त आवश्‍यकता है। एक क्लस्टर को आंध्र प्रदेश के कोटा मंडल में विकसित किया जा रहा है जिसके लिए केंद्र सरकार से 125 करोड़ रुपये की सहायता मिली है। उत्पादों की गुणवत्ता और बारीकियों जैसे कि एक जैसी/चिकनी सिलाई, फैशन के दौर पर अमल, अलंकरण एवं उच्‍च गुणवत्‍ता वाली जिप या चेन और समय पर डिलीवरी को नियमित रूप से ध्‍यान में रखने की जरूरत है क्‍योंकि यूरोपीय संघ के सदस्‍य देशों जैसे कि पुर्तगाल, स्लोवाकिया एवं रोमानिया में बड़े भारी प्रतिद्वंद्वी हैं और ये पश्चिमी यूरोपीय बाजार के काफी निकट हैं।

‘बाजार तक पहुंच सुनिश्चित करना’ छोटे उत्पादकों की एक बड़ी समस्या है जिसके लिए 765 लाख रुपये की ‘बाजार पहुंच पहल योजना’ और 297.93 लाख रुपये की ‘विपणन विकास सहायता योजना’ है। हालांकि, किसी मालिक के घर के तहखाने (बेसमेंट) से संचालित की जा रही सूक्ष्म इकाइयों के लिए एक बड़ी बाधा ऋण मिलना और इन योजनाओं तक उनकी पहुंच है। वर्ष 2015 में शुरू की गई ‘ब्याज समकरण योजना’ के तहत एमएसएमई इकाइयों और सभी फुटवियर इकाइयों के लिए रुपया निर्यात ऋण पर ब्याज दर को घटाकर 3 प्रतिशत कर दिया गया है।

भारत में इतना ज्यादा चमड़ा (हालांकि, गोहत्या पर प्रतिबंध के जरिए इसे सीमित कर दिया गया है) कारोबारियों की पहुंच में होने के मद्देनजर इस उद्योग की क्षमता काफी अधिक नजर आती है। हालांकि, दुर्भाग्यवश बढि़या डिजाइन के चयन में लापरवाही और बेजान फि‍निशिंग से संबंधित अनगिनत समस्‍याओं ने इस उद्योग की संभावनाओं पर ग्रहण लगा दिया है। यही कारण है कि लोग इटली में तैयार की जाने वाली चमड़े की वस्तुओं अथवा दुनिया में सर्वोत्‍तम माने जाने वाले ‘पेरिस की हर्मिस द्वारा तैयार बर्किन बैग’ को खरीदने के लिए लालायित रहते हैं! भारत चमड़े की वस्तुओं के क्षेत्र में इस तरह का कोई बेहद उत्‍कृष्‍ट जाना-माना नाम या ब्रांड विकसित नहीं कर पाया है। हालांकि, ब्रिटेन में मार्क्स एंड स्पेंसर के हैंडबैगों पर ‘मेड इन इंडिया’ लेबल देखना बड़ा ही अच्‍छा लगता है!

ये लेखक के निजी विचार हैं।

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