• Dec 16 2016

‘अफ्रीका का द्वार’ बनना द. अफ्रीका के लिए चुनौती

2012 में, एसएए ने लंदन एवं केपटाउन के बीच अपनी सीधी उड़ान खत्म कर दी और इसके लिए कथित रूप से वैश्विक आर्थिक संकट के बाद दोनों नगरों के बीच ट्रैफिक के कम हो जाने का हवाला दिया।

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Photo: Sharon

दक्षिण अफ्रीका लंबे समय से 'अफ्रीका का द्वार' होने का दावा करता रहा है। वास्तव में, जब मजबूत जिंस कीमतों के दम पर ‘अफ्रीका उदय‘ का नारा बुलंदियों पर था, इस उपनाम की बदौलत दक्षिण अफ्रीका ने अफ्रीका के शेष उप-सहारा देशों की प्रभावशाली विकास दर के करीब आने की भरपूर कोशिश की थी। दक्षिण अफ्रीका की सतत कोशिशें रंग लाईं और 2010 में दक्षिण अफ्रीका को ब्रिक्स देशों के समूह के पांचवें सदस्य के रूप में तथा इस ब्लाॅक में अफ्रीका के प्रतिनिधि के रूप में आमंत्रित किया गया।

बहरहाल, इस तथ्य के बावजूद कि दक्षिण अफ्रीका का प्रांत गौटेंग, जहां दक्षिण अफ्रीका की आर्थिक राजधानी स्थित है और जिसकी आर्थिक विकास दर पूरे महाद्वीप का 10 प्रतिशत है, अफ्रीका के सबसे दक्षिणी हिस्से में स्थित देश दक्षिण अफ्रीका के लिए आगे आने वाले दिनों में साखपूर्ण तरीके से अपने सुरक्षित द्वार के दर्जे को बनाये रखना काफी मुश्किल भरा साबित हो सकता है। किसी महाद्वीपीय धुरी की महत्ता को विकसित करने एवं उसे बरकरार रखने के लिए सबसे मूलभूत पूर्व-आवश्यकता पहुंच को सुगम बनाने से संबंधित होती है। दक्षिण अफ्रीका कभी भी पूरे महाद्वीप में वित्तीय सूचना चैनलों पर अपने एकाधिकार का दावा करने में सक्षम नहीं हो पाया है, लेकिन बंदरगाहों के जरिये भौतिक द्वार बनने या उससे भी ज्यादा महत्वपूर्ण यह कि एयर ट्रैफिक के कमांड एवं कंट्रोल के माध्यम से अभी तक उसने कुछ कामयाबी हासिल करने में जरुर सफल रहा है।

किसी पूर्ण रूप से विकसित एवं फ्लाइट रूटिंग की रणनीतिक शक्ति को समझने के लिए आपको दुबई से आगे देखने की जरुरत नहीं है। एक दूरदृष्टि एवं प्रचुर मात्रा में पेट्रोडाॅलरों से संपन्न शेख मोहम्मद बिन रशीद अल मकतुअम ने दीर्घकालिक रूप से अपनी संपत्ति के भारी निवेश के जरिये रेगिस्तान में दुनिया के सबसे बड़े वाणिज्यिक केंद्रों में से एक की स्थापना के सपनों को साकार कर दिया जिसमें बड़ी भूमिका एमिरेट्स एयरलाईन की स्थापना के जरिये मिलने वाली बड़ी सहायता की रही है।

वाणिज्यक उड्डयन उद्योग की भू-आर्थिक रणनीति आसानी से उपलब्ध स्टार्ट अप पूंजी के साथ कम संपन्न देशों के लिए भी उतनी ही सच्ची है। इथोपिया ने अफ्रीकी संघ का सदस्य होने और सरकारी अधिकारियों तथा निर्वासित एनजीओ कार्यकर्ताओं के लिए वास्तविक मक्का समझे जाने का रणनीतिक लाभ उठाया है। इथोपियन एयरलाइंस के अफ्रीका के सबसे निर्धन देशों से संबंधित होने के बावजूद उसने अफ्रीका के अन्य सभी देशों के एयरलाईंस के कुल लाभों की तुलना में लगभग दोगुना अधिक लाभ अर्जित किया है। इथोपियन एयरलाइंस देश की सरकार के लिए भारी मात्रा में हार्ड करेंसी की कमाई करने वाली (यानी वहां की लाइफलाइन) एयरलाईंस बन चुकी है।

महाद्वीप के सबसे दक्षिणी हिस्से में स्थित दक्षिण अफ्रीका को शेष विश्व से अफ्रीका को जोड़ने का ‘प्राकृतिक धुरी‘ नहीं माना जा सकता। नाईजीरिया, अंगोला एवं इससे भी अधिक रवांडा जैसे ज्यादा मध्य क्षेत्र में केंद्रित देशों ने महाद्वीप के लिए यात्रा धुरी यानी ट्रैवल हब बन जाने एवं अन्य सहायक फायदों को हासिल करने की योजनाएं बनाई हैं। इसलिए, दक्षिण अफ्रीका के लिए यह बेहद जरुरी है कि मंडेला के बाद के युग में अपनी राजनीतिक महत्ता को बनाये रखने के लिए अफ्रीकी एयरस्पेस में एक मजबूत देश की अपनी स्थिति बनाये रखे।

बदकिस्मती से, दक्षिण अफ्रीका की सरकारी एयरलाईंस साउथ अफ्रीकन एयरवेज (एसएए) जिसे दक्षिण अफ्रीका की भू-रणनीतिक स्थिति (जियो पोजिशनिंग) को मजबूत बनाने के कार्य में अग्रणी होनी चाहिए थी, लेकिन ऐसा लगता है कि इस सरकारी एयरलाईंस के अधिकारी इन परेशानियों से पूरी तरह बेपरवाह हैं।

ऐसा लगता है मानों एसएए दो पाटों के बीच में फंस गया है। एक सरकारी उपक्रम होने के नाते उस पर दक्षिण अफ्रीकी सरकार के राजनीतिक उद्देश्यों को आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी है जिसके लिए जरुरी नहीं कि यह हमेशा एक मजबूत गेम प्लान के अनुरूप ही हो। दक्षिण अफ्रीका के ब्रिक्स की सदस्यता प्राप्त कर लेने के बाद, 2012 में एयरलाईंस ने बीजिंग के लिए सीधी उड़ान शुरु की और मुंबई के लिए अतिरिक्त रूट लांच किए। बाद में, 2015 में इन दोनों उड़ानों को स्थगित कर दिया गया। परिचालन के अपने तीन वर्षों के दौरान एयरलाईंस के केवल जोहान्सबर्ग-बीजिंग रूट में लगभग 1 बिलियन (71 मिलियन डाॅलर) का घाटा हो चुका है। बहरहाल, एसएए राजनीतिक कारणों के लिए नुकसान वाले रूटों की स्थापना करने वाली एकमात्र एयरलाईंस नहीं है। इनमें अंतर यह है कि सुप्रबंधित एयरलाईंस अपनी आकर्षक रूटों का उपयोग अपनी भू रणनीतिक पहुंच से संबंधित रूटों को सब्सिडी प्रदान के लिए करती हैं। बदकिस्मती से, यूरो से जुड़ी निराशावादिता के आवेग में एसएए ने अपने रूट स्थगित कर दिए।

2012 में, एसएए ने लंदन एवं केपटाउन के बीच अपनी सीधी उड़ान खत्म कर दी और इसके लिए कथित रूप से वैश्विक आर्थिक संकट के बाद दोनों नगरों के बीच ट्रैफिक के कम हो जाने का हवाला दिया। यह आश्चर्यजनक बात है, खासकर, यह देखते हुए कि एक वर्ष पहले ही ट्रिप एडवायजर ने दक्षिण अफ्रीकी के शहर को दुनिया में सर्वश्रेष्ठ यात्रा गंतव्य घोषित किया था। इसके अतिरिक्त, 2010 में दक्षिण अफ्रीका द्वारा विश्व कप फुटबाॅल प्रतियोगिता की मेजबानी किए जाने के बाद दुनिया की अग्रणी अंतरराष्ट्रीय पर्यटन पत्रिकाओं में भी (विशेष रूप से, ब्रिट्रेन की पत्रिकाओं में) एयरलाईंस ने एक और ऐसा कारनामा करते हुए महज 21 मिलियन डॉलर में अपनी सर्वश्रेष्ठ भौतिक परिसंपत्ति, 6 बजे सुबह की लैंडिंग के राइट्स (बिजनेस पर्यटकों की टाइमिंग वरीयता के लिए पसंदीदा समय) बेच डाले। विडंबना यह है कि यह सारा कुछ एयरलाईन की ‘आॅप्टेमाइजेशन स्ट्रेटजी‘ के एक हिस्से के रूप में किया गया जबकि एसएए एयरलाईन ने तभी से कोई भी लाभ अर्जित नहीं किया है।

सितंबर 2016 तक, एसएए एयरलाईन ने अपनी दो वित्तीय अवधियों के लिए अंतिम वित्तीय विवरण प्रस्तुत नहीं किए हैं। आखिरकार, उस महीने के अंत में दक्षिण अफ्रीका के संसद में जब एसएए एयरलाईन के वित्तीय प्रदर्शन को प्रस्तुत किया गया तो पता चला कि एयरलाईन ने 2014—2015 के वित वर्ष के दौरान 5.6 बिलियन रैंड (398 मिलियन डाॅलर) का नुकसान उठाया है। लेकिन इसमें चिंता की कोई बात नहीं है क्योंकि इसके बाद की अवधि के लिए जिस भारी सुधार का वादा किया है, उसके अनुरूप राजकोषीय नुकसान मामूली (106 मिलियन डाॅलर) और संतोषजनक दायरे में है। एसएए को सरकारी गारंटियों के रूप में अभी तक 19 बिलियन रैंड (1.3 बिलियन डाॅलर) प्राप्त हुए हैं जो दरअसल एयरलाईन के डिफाॅल्ट करने की सूरत में करदाताओं से बेलआउट यानी जमानत पाने के वादे हैं। इसमें से 5 बिलियन रैंड (354 मिलियन डाॅलर) शुद्ध रूप से कंपनी को एक चिंता के विषय के रूप में देखे जाने की अनुमति दिए जाने की गारंटी है। सच्चाई यह है कि दक्षिण अफ्रीका के वित्त विभाग ने एक नए बोर्ड के गठन को बेलआउट की एक शर्त बना दिया, लेकिन बोर्ड की विवादित अध्यक्षा डुडु माइयेनी, जिन्होंने सीईओ एवं सीएफओ समेत पुराने बोर्ड के कई सदस्यों को उनसे उलझने के दंडस्वरूप निलंबित कर दिया था, अपने पद पर काबिज रहीं।

माइयेनी ने इन आशंकाओं को दूर करने का कोई गंभीर प्रयास नहीं किया है कि एयरलाइन बदहाली के दौर से गुजर रही है। एक पूर्व स्कूली शिक्षिका रह चुकी माइयेनी ने कई अवसरों पर जांच को आमंत्रित किया है। 2009 में उनकी नियुक्ति और देश के राष्ट्रपति पद पर जैकोब जुमा की ताजपोशी एक ही समय हुई जिनके साथ उनके व्यक्तिगत एवं वित्तीय संबंध भी बताये जाते हैं। माइयेनी ने जैकोब जुमा फाउंउेशन की स्थापना की है और वह उसकी प्रमुख भी हैं। हालांकि इन दोनों ने किसी भी प्रकार की पक्षधरता से इंकार किया है। उल्लेखनीय है कि माइयेनी एसएए के कुप्रबंधन को लेकर लोक उपक्रम मंत्री एवं वित मंत्री दोनों के साथ ही झगड़ चुकने के बावजूद अपने पद को बनाये रखने में सफल रही हैं। तकनीकी रूप से दोनों ही मंत्रियों के पास माइयेनी को उनके पद से हटाने का अधिकार है, लेकिन इसकी जगह इन दोनों मंत्रियों को ही राष्ट्रपति से फटकार सुनने को मिली।

अपने नुकसान की भरपाई करने के लिए दक्षिण अफ्रीका ने देर से ही सही, पूरे अफ्रीकी महाद्वीप में नई रूटों के एक बेड़े की स्थापना से अपनी उम्मीदें संजो रखी हैं। उड़ानों को क्षेत्र के दूसरी श्रेणी के शहरों से जोड़ने के जरिये नेटवर्कों को विस्तारित करने की योजना के साथ नाईजीरिया की राजनीतिक राजधानी अबुजा के लिए उड़ान जनवरी 2016 में आरंभ की गई। यह एक महत्वाकांक्षी एवं सराहनीय कदम है, लेकिन शायद अब बहुत देर हो चुकी है। क्षेत्रीय एकीकरण से लाभ अर्जित करने एवं उसे बढ़ाने के लिए किसी कार्यनीति का निर्माण एक विचार शानदार आइडिया हो सकता है लेकिन इसका परिणाम फौरी तौर पर नहीं होगा जिसकी एसएए को अपनी उड़ानों को बनाये रखने के लिए सख्त जरुरत है। इसे समर्थन देने के लिए एक दीर्घकालिक रणनीति एवं एक उल्लेखनीय वित्तीय समर्थन की आवश्यकता होगी। साथ ही, व्यवसायिक संपर्कों को बनाने एवं उन पर नियंत्रण करने की भी जरुरत होगी। निराशा की एक और बात यह भी है कि अफ्रीकी देशों की आर्थिक विकास दर भी पिछले कुछ समय से बहुत सकारात्मक नहीं प्रतीत हो रही है जो सीमा से अधिक आरक्षित अर्थात ओवरबुक्ड उड़ानों के लिए अच्छी कही जाने वाली स्थिति नहीं है।

मूलभूत रूप से, दक्षिण अफ्रीका की सरकार उन सामरिक सरकारी परिसंपत्तियों को खोना गवारा नहीं कर सकती जिन्हें देश की भू-रणनीतिक स्थिति का प्रमुख हिस्सा होना चाहिए और जिन्हें वर्तमान में तुच्छ स्थानीय राजनीति के हाथों का मोहरा बना दिया गया है। वर्तमान में, दक्षिण अफ्रीका लगातार अफ्रीकी द्वार के रूप में अपने वास्तविक वजन की तुलना में कहीं ज्यादा मजबूत दावा पेश करने की कोशिश कर रहा है लेकिन उसकी इस स्थिति को अंतरराष्ट्रीय रूप से ज्यादा गंभीरता से नहीं लिया जा रहा और दक्षिण अफ्रीका का इसे गवां देना लगभग तय है। हो सकता है प्रिटोरिया इसे पूरी महसूस न कर सके कि दांव पर क्या लगा है और बहुत देर हो जाए तथा मामला उनके नियंत्रण से बाहर चला जाए।

ये लेखक के निजी विचार हैं।

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