• Jan 30 2017

इन्वर्टेड ड्यूटी स्ट्रक्चर की विसंगतियों पर गौर करने की जरूरत

भारत सरकार को देश की विनिर्माण कंपनियों की प्रतिस्पर्धी क्षमता बढ़ाने के लिए क्या इन्वर्टेड शुल्क (टैरिफ) ढांचे (आईडीएस) में सुधार की जरूरत है?

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Courtesy: William Cho/CC BY-NC-SA 2.0

आम तौर पर यही माना जाता है कि इन्वर्टेड शुल्क ढांचे (आईडीएस) की स्थिति तब बनती है जब किसी कच्‍चे माल पर देय शुल्‍क उसी कच्‍चे माल से तैयार उत्‍पाद पर देय शुल्‍क से कहीं ज्‍यादा होता है। यही नहीं, जब भी शुल्‍क ढांचा इन्वर्टेड होता है तो वैसी स्थिति में संबंधित उत्‍पाद का उत्पादन देश में ही करने के बजाय उसके आयात को तरजीह दी जाने लगती है। हालांकि, इस रिपोर्ट में यह दलील दी गई है कि उत्पादन की प्रक्रिया, विशेष रूप से उत्पाद इनपुट मिश्रण और किसी तैयार उत्पाद की एक इकाई के उत्पादन में लगने वाले कच्‍चे माल की वास्‍तविक मात्रा पर समुचित विचार किए बगैर ही महज आउटपुट (तैयार उत्‍पाद) के मुकाबले इनपुट (कच्‍चे माल) पर देय शुल्‍क दरों (टैरिफ) की तुलना करने से आईडीएस की पहचान में गुमराह होने का खतरा बन सकता है। टैरिफ की तुलना को भी मूल सीमा शुल्क से परे जाने की जरूरत है। यह पेपर नीति निर्माताओं, व्यवसायियों, उद्योग जगत के प्रतिनिधियों, बहुपक्षीय संगठनों, और शिक्षाविदों को एक ऐसा महत्वपूर्ण मंच (प्‍लेटफॉर्म) प्रदान करता है जहां आईडीएस एवं इससे जुड़ी विसंगतियों पर चर्चा की सुविधा सुलभ है और इसके साथ ही यह साक्ष्‍य पर आधारित नीति तैयार करने के लिए प्रोत्साहित करता है।

परिचय

भारत सरकार को देश की विनिर्माण कंपनियों की प्रतिस्पर्धी क्षमता बढ़ाने के लिए क्या करना चाहिए? इन्वर्टेड शुल्क (टैरिफ) ढांचे (आईडीएस) में सुधार किया जाना भी विभिन्न सुझावों में शामिल है जिसे सर्वाधिक प्राथमिकता दी जा रही है।

सवाल यह है, ‘इन्वर्टेड शुल्क ढांचा’ क्या है? विश्व बैंक ने ‘साउथ एशियाज टर्न: पॉलिसीज टू बूस्‍ट कंपीटिटिवनेस एंड क्रि‍एट द नेक्‍स्‍ट एक्‍सपोर्ट पावरहाउस’ नामक शीर्षक वाली पुस्‍तक में सिफारिश की है, ‘ऐसे मामलों में मध्यवर्ती वस्तुओं पर देय शुल्‍क दरों को कम कर दिया जाना चाहिए जिनमें वे अंतिम अथवा तैयार वस्‍तुओं पर देय शुल्‍क से ज्‍यादा होती हैं और जिस वजह से इन्वर्टेड शुल्क ढांचे जैसी स्थिति बन जाती है और फि‍र उसके चलते घरेलू उत्पादन हतोत्साहित होता है।’ [i] वैसे तो यह निष्कर्ष निकालना बेहद आसान हो सकता है कि जब भी कच्‍चे माल पर देय शुल्‍क उससे तैयार उत्‍पाद पर देय शुल्‍क से ज्‍यादा होता है तो इन्वर्टेड शुल्क ढांचे की वजह से संबंधित उत्‍पाद प्रभावित होता है, लेकिन इस रिपोर्ट में यह तर्क पेश किया गया है कि हमेशा ही ऐसा नहीं होता है और यहां तक कि जब कच्‍चे माल पर देय शुल्‍क उससे तैयार उत्‍पाद पर देय शुल्‍क से ज्‍यादा होता है तो भी यह जरूरी नहीं है कि इन्वर्टेड शुल्क ढांचे जैसी स्थिति बन ही जाए। [ii]

इन्‍वर्टेड शुल्‍क: सतही पूर्वधारणाओं से परे

यह जानने के लिए कि इन्वर्टेड शुल्क ढांचे से कोई उत्‍पाद प्रभावित होता है या नहीं, यह आवश्यक है कि कच्‍चे माल के मिश्रण सहित किसी दिए गए उत्पाद के उत्पादन की प्रक्रि‍याओं को समझा जाए। विशेष रूप से, किसी तैयार उत्पाद की एक इकाई के उत्पादन में लगने वाले समस्‍त कच्‍चे माल एवं उनकी वास्‍तविक मात्रा को जानना आवश्‍यक है। इसके साथ ही किसी तैयार उत्पाद की एक इकाई के उत्पादन में इस्‍तेमाल किए जाने वाले समस्‍त कच्‍चे माल की घरेलू और आयातित खरीद के बारे में जानकारी होना भी आवश्‍यक है। एक बार जब उत्पादन प्रक्रिया के बारे में पूरी जानकारी हासिल हो जाए, तो अगला कदम समस्‍त कच्‍चे माल और तैयार उत्‍पाद पर देय शुल्‍क के बारे में पता लगाना होगा। शुल्‍क ढांचे में मूल सीमा शुल्क के साथ-साथ अन्‍य शुल्‍कों जैसे कि विशेष अतिरिक्त शुल्क (एसएडी), काउंटरवेलिंग ड्यूटी (सीवीडी), शिक्षा उपकर और माध्यमिक उच्च शिक्षा उपकर (ईसी व एचएसईसी) इत्‍यादि के बारे में भी जानकारी शामिल है। इसके अलावा, चूंकि भारत ने विभिन्‍न व्‍यापार समझौतों पर हस्ताक्षर कर रखे हैं जिनके तहत सदस्य देशों को ऐसी तरजीही शुल्‍क दरों की पेशकश करनी पड़ती है जो सर्वाधिक अनुकूल राष्ट्र (एमएफएन) के दर्जे के तहत देय शुल्‍क दरों से कम होती हैं और जिन्‍हें हस्ताक्षरकर्ता देशों द्वारा विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) में प्रयुक्‍त किया जाता है, इसलिए ऐसे में उस टैरिफ स्थिति अर्थात कच्‍चे माल एवं तैयार उत्‍पाद पर देय आयात शुल्‍क को भी जानना आवश्‍यक है जिसे हस्‍ताक्षरित व्यापार समझौतों में निर्दिष्ट किया गया है। कुछ शुल्‍क चूंकि सेनवैट योग्‍य हैं, इसलिए शुल्क ढांचा तय करते समय प्रभावी शुल्‍क दर को निर्धारित किया जाना चाहिए। [iii]

उत्पादन प्रक्रिया और शुल्क ढांचे के विवरण को समझ लेने से इन्वर्टेड शुल्क ढांचे के एक सर्वाधिक महत्वपूर्ण पहलू का मूल्यांकन करने में काफी मदद मिलती है, जो असल में यह है कि तैयार उत्पाद की प्रति इकाई के घरेलू उत्‍पादन की लागत के साथ-साथ तैयार उत्पाद की प्रति इकाई की आयात लागत का निर्धारण आखिरकार कैसे होता है। इससे अन्य जानकारियां भी एकत्र करने में मदद मिलती है जैसे कि कच्‍चे माल की कुल लागत में आयातित एवं स्वदेशी कच्‍चे माल की हिस्सेदारी क्‍या है और आयातित कच्‍चे माल के उपयोग से उत्पन्न होने वाले शुल्‍क ढांचे का लागत संबंधी असर क्‍या होता है। तैयार उत्पाद की प्रति इकाई के घरेलू उत्‍पादन की लागत यदि तैयार उत्पाद की प्रति इकाई की आयात लागत से अधिक होती है, तो शुल्क ढांचा इस तरह के लागत संबंधी अंतर के कारकों पर पर्याप्‍त रोशनी डाल सकता है। उदाहरण के लिए, लागत संबंधी अंतर का कारण संभवत: यह है कि तैयार उत्‍पाद पर देय सीवीडी के मुकाबले कच्‍चे माल पर देय सीवीडी कहीं ज्‍यादा है।

उपर्युक्‍त परिचर्चा को तालिका 1 में दिए गए उदाहरण के जरिए समझाया जा सकता है, जो यह दर्शाता है कि उत्पाद एचएस84771000 का उत्पादन करने के लिए कई तरह के कच्‍चे माल की आवश्यक पड़ती है। शुल्‍क ढांचे से यह पता चलता है: क. कच्‍चे माल पर देय मूल सीमा शुल्क तैयार उत्पाद पर देय मूल सीमा शुल्क से या तो अधिक है या उसके बराबर है; ख. समस्‍त कच्‍चे माल एवं तैयार उत्‍पाद पर चार प्रतिशत विशेष अतिरिक्त शुल्क (एसएडी) और 12.5 प्रतिशत काउंटरवेलिंग ड्यूटी (सीवीडी) लागू है; और ग. भारत के व्यापार समझौतों के तहत तैयार उत्पाद को तरजीही ड्यूटी पर आयात किया जा सकता है, जबकि केवल कुछ कच्‍चे माल पर ही तरजीही ड्यूटी लगती है। चूंकि कुछ कच्‍चे माल पर देय मूल सीमा शुल्क तैयार उत्‍पाद पर देय मूल सीमा शुल्क से अधिक है, इसलिए यह निष्कर्ष बेहद आसानी से निकाला जा सकता है कि एचएस84771000 के मामले में शुल्क ढांचा वाकई प्रतिलोमित (इन्वर्टेड) है।

तालिका 1. एचएस8771000 के उत्‍पादन के लिए इनपुट मिश्रण और शुल्क ढांचा

 एचएस कोड मूल सीमा शुल्‍कएसएडी (विशेष अतिरिक्त शुल्क) सीवीडी (काउंटरवेलिंग ड्यूटी)एक व्यापार समझौते के तहत तरजीही ड्यूटी पर भारत में आयात किया गया?
(1)(2)(3)(4)
तैयार उत्‍पाद (आउटपुट)
847710005%4.0%12.5%हां
कच्‍चे माल (इनपुट)
8537200010.0%4.0%12.5%नहीं
85013310 & 850152905.0%4.0%12.5%नहीं
841229907.5.0%4.0%12.5%हां
841350905.0%4.0%12.5%नहीं
848180905.0%4.0%12.5%नहीं
8481200010.0%4.0%12.5%हां
848340005.0%4.0%12.5%नहीं
90319000 & 902690005.0%4.0%12.5%हां
8413309010.0%4.0%12.5%नहीं
84136010 & 841360905.0%4.0%12.5%हां
स्रोत: तैयार उत्पाद की एक इकाई का उत्पादन करने के लिए आवश्यक इनपुट फिक्की (2016) से प्राप्‍त किया गया है। [iv] स्तंभ 2, 3, 4 और 5 के आंकड़े [i]केवल इस आलेख में की गई परिचर्चा को उदाहरण देकर स्पष्ट करने के लिए दिए गए हैं और ये मौजूदा स्थिति को प्रतिबिंबित नहीं करते हैं।

हालांकि, कई कारणों से यह जरूरी नहीं है कि हमेशा ऐसी ही स्थिति हो। उदाहरण के लिए, शुल्‍क ढांचा संभवत: वैसी स्थिति में इन्‍वर्टेड नहीं होगा जब कच्‍चे माल की कुल लागत में कच्‍चे माल की हिस्‍सेदारी (तैयार उत्‍पाद के मुकाबले कच्‍चे माल पर शुल्‍क ज्‍यादा होने की स्थिति) ही सर्वाधिक नहीं होती है और जिस वजह से तैयार उत्पाद की आयात लागत तब भी देश में तैयार उत्‍पाद का उत्‍पादन करने के लिए विदेश से मंगाए जाने वाले समस्‍त कच्‍चे माल की आयात लागत से ज्‍यादा ही रहती है। इसके अलावा, शुल्‍क ढांचा संभवत: वैसी स्थिति में भी इन्‍वर्टेड नहीं होगा जब कच्‍चे माल की कुल लागत में कच्‍चे माल की हिस्‍सेदारी (तैयार उत्‍पाद के मुकाबले कच्‍चे माल पर शुल्‍क ज्‍यादा होने की स्थिति) ही सर्वाधिक होती है और फि‍र भी शायद उत्पाद की किस्में ही कच्‍चे माल की सर्वाधिक हिस्‍सेदारी के कारण बने संभावित इन्‍वर्टेड शुल्‍क ढांचे पर भारी पड़ती हैं। उदाहरण के लिए, मान लीजिए कि तैयार उत्‍पाद एचएस 84771000 का एक प्रमुख कच्‍चा माल एचएस 84133090 है। हालांकि, तैयार उत्‍पाद एचएस 84771000-ए (जो एक किस्म है) का एक प्रमुख कच्‍चा माल एचएस 84133090 नहीं है। अब, मान लीजिए कि एचएस 84771000-ए का शुल्‍क ढांचा वही है जो एचएस 84771000 का है। [v] इस तरह की स्थिति में एचएस 84133090 पर अपेक्षाकृत ज्‍यादा इनपुट शुल्‍क होने के बावजूद यह जरूरी नहीं है कि तैयार उत्‍पाद एचएस 84771000-ए इन्‍वर्टेड शुल्‍क ढांचे से प्रभावित ही हो।

इस बात को ध्यान में रखा जाना चाहिए कि जब तक विभिन्‍न किस्मों का इनपुट ढांचा नहीं बदलता है, अर्थात एचएस 84771000 और एचएस 84771000-ए के उत्‍पादन के लिए समान कच्‍चे माल की ही आवश्‍यकता पड़ती है तब तक एचएस 84771000 और एचएस 84771000-ए का शुल्‍क ढांचा नहीं बदलेगा। हालांकि, इनपुट मिश्रण की रचना में फेरबदल होने पर शुल्‍क संबंधी दायित्व कुछ इस तरह से बदल सकते हें कि कच्‍चे माल पर अपेक्षाकृत ज्‍यादा शुल्‍क होने के कारण इन्‍वर्टेड शुल्‍क ढांचे की स्थिति बन भी सकती है या नहीं भी बन सकती है। य‍दि ऐसी स्थिति हो कि कच्‍चे माल अथवा उनके विकल्‍प देश में उपलब्ध ही नहीं हों और ऐसे में इस तरह के कच्‍चे माल का आयात ही एकमात्र विकल्प रहता है तथा इसके साथ ही इन कच्‍चे माल पर देय शुल्‍क तैयार उत्‍पाद पर देय शुल्‍क से ज्‍यादा रहता है, तो इस तरह की स्थितियों में कच्‍चे माल की प्रमुखता के कारण इन्‍वर्टेड शुल्‍क ढांचे की स्थिति अपरिहार्य हो सकती है। हालांकि, कच्‍चे माल की प्रमुखता के अनुसार ही इन्‍वर्टेड शुल्‍क ढांचे का असर भी अलग-अलग हो सकता है।

उपर्युक्‍त उदाहरण से यह पता चलता है कि: (ए) तैयार उत्‍पाद के मुकाबले कच्‍चे माल पर देय शुल्‍क के ज्‍यादा रहने की स्थिति में भी शुल्‍क से संबंधित उत्‍पाद का प्रभावित होना आवश्‍यक नहीं है और (बी) यह जरूरी नहीं है कि किसी उत्‍पाद का शुल्‍क ढांचा उसकी समस्‍त किस्‍मों के लिए इन्‍वर्टेड ही रहे। इसके अलावा, यह भी संभव है कि किसी उद्योग के अंतर्गत आने वाले समस्‍त उत्पाद इन्‍वर्टेड शुल्‍क ढांचे से प्रभावित न हों। उदाहरण के लिए, भारत में अमेरिकी वाणिज्य मंडल ने कहा है कि समस्‍त चिकित्सा उपकरणों के लिए शुल्‍क ढांचा इन्‍वर्टेड नहीं है और इसने यह जानकारी दी है कि अत्‍यंत महत्वपूर्ण माने जाने वाले ज्‍यादातर जीवन रक्षक चिकित्सा उपकरणों के लिए ही शुल्‍क ढांचा इन्‍वर्टेड है। [vi]

उपर्युक्‍त उदाहरण से यह साफ जाहिर है कि इन्‍वर्टेड शुल्‍क ढांचे की पहचान करना काफी जटिल कार्य है। ऐसे में यह सवाल उठता है कि क्या किसी ऐसे सतही दृष्टिकोण के आधार पर शुल्‍क ढांचे के इन्‍वर्टेड होने का निष्‍कर्ष निकालना उपयुक्‍त है जिसके तहत यह तो बेहद आसानी से मान लिया जाता है कि तैयार उत्‍पाद के मुकाबले कच्‍चे माल पर ज्‍यादा शुल्‍क देय होने की स्थिति में शुल्‍क ढांचा इन्‍वर्टेड हो जाता है, जबकि अन्य पहलुओं जैसे कि उत्पाद किस्मों, उत्पाद इनपुट मिश्रण की हिस्‍सेदारी और उत्पादन प्रक्रियाओं, इत्‍यादि की अनदेखी कर दी जाती है। क्‍या विभिन्‍न शाखाओं में विविधता होने के बावजूद समूचे पेड़ के लिए ही शुल्‍क ढांचे को इन्‍वर्टेड मान लेना उचित है?

विश्व बैंक ने ऊपर उद्धृत पुस्तक में यह निष्कर्ष निकाला है कि भारत में चिकित्सा उपकरण उद्योग को इन्‍वर्टेड शुल्‍क ढांचे से जूझना पड़ रहा है क्‍योंकि चिकित्सा उपकरणों से जुड़ी सामग्री पर 7.5 प्रतिशत शुल्‍क अदा करना पड़ता है, जबकि अंतिम अथवा तैयार उत्‍पादों पर 5 प्रतिशत शुल्‍क का ही भुगतान करना पड़ता है। हम यह मान लेते हैं कि तैयार उत्‍पाद के मुकाबले कच्‍चे माल पर देय शुल्‍क दरों की सामान्‍य तुलना से कुछ परे जाकर चिकित्सा उपकरण उद्योग में शुल्‍क ढांचे के इन्‍वर्टेड होने का निष्‍कर्ष निकाला गया है, तो भी तथ्य यही है कि समस्‍त चिकित्सा उपकरणों के लिए शुल्‍क ढांचा इन्‍वर्टेड नहीं है, जैसा कि इससे पहले विचार-विमर्श किया जा चुका है। इसके अलावा, कुछ चिकित्सा उपकरणों के मामले में इन्‍वर्टेड शुल्‍क ढांचे को सही कर दिया गया है, [vii] जो एक ऐसा कदम है जिसके लिए उद्योग से भी समर्थन हासिल हो गया है। [viii]

इसके अलावा, उपर्युक्‍त चर्चा से इन्‍वर्टेड शुल्‍क ढांचे का पता लगाने में काफी जटिलताएं होने की पुष्टि हुई है जिनसे यह समझने में मदद मिलती है कि इन्‍वर्टेड शुल्‍क ढांचे को दुरुस्‍त कर देने से उत्पादकता पर पड़ने वाले आकस्मिक असर से जुड़े किस अनुभवजन्य साक्ष्य की अनदेखी की जा रही है।

निष्कर्ष

इन्‍वर्टेड शुल्‍क ढांचे के रहस्य पर से पर्दा उठाने के लिए शुल्‍क दरों की तुलना से परे जाना आवश्यक है। उत्पाद संबंधी विविधता (या तो एक उत्पाद की कोई किस्‍म या एक उद्योग के भीतर विभिन्न उत्पाद) को देखते हुए किसी भी उत्पादन प्रक्रिया के कई पहलुओं जैसे कि इनपुट मिश्रण के बारे में जानकारी, इस इनपुट मिश्रण के घरेलू और आयातित घटकों, समस्‍त कच्‍चे माल एवं तैयार उत्‍पाद के शुल्‍क ढांचे, इत्‍यादि पर ध्‍यान देना ही होगा। इस तरह की जानकारी से देश में तैयार उत्‍पाद की प्रति इकाई की उत्‍पादन लागत के साथ-साथ तैयार उत्‍पाद की प्रति इकाई की आयात लागत को भी निर्धारित करने में मदद मिलेगी, जिनसे इन्‍वर्टेड शुल्‍क ढांचे की मौजूदगी के बारे में स्‍पष्‍ट संकेत मिलेगा। किसी तय अवधि के डेटा का संग्रह करने से भी शोधकर्ताओं को इस तरह की अनुभवजन्य जांच करने में मदद मिलेगी कि इन्‍वर्टेड शुल्‍क ढांचे को दुरुस्‍त कर देने से उत्पादकता पर क्‍या आकस्मिक असर पड़ता है। अनुभवजन्य साक्ष्य से न केवल इस दावे का समर्थन करने में मदद मिलेगी कि इन्‍वर्टेड शुल्‍क ढांचे से देश में उत्‍पादन वाकई हतोत्साहित होता है अथवा इन्‍वर्टेड शुल्‍क ढांचे को दुरुस्‍त कर देने से काफी फायदा होगा, बल्कि साक्ष्‍य आधारित नीति निर्माण का मार्ग भी प्रशस्‍त होगा।


एंडनोट्स

[i] Lopez-Acevedo, Gladys; Medvedev, Denis; Palmade, Vincent. 2016. South Asia's Turn: Policies to Boost Competitiveness and Create the Next Export Powerhouse. South Asia Development Matters; Washington, DC: World Bank. (Accessible at https://openknowledge.worldbank.org/handle/10986/25094) License: CC BY 3.0 IGO.

[ii] The analysis in this report is based on the understanding that for a given level of technology at time , does the production of output for given inputs , suffer from IDS?

[iii] See Cenvat Credit Rules, 2004 (Central Board of Excise and Customs, Department of Revenue, Ministry of Finance, Government of India) for more details. The same can be accessed at http://www.cbec.gov.in/htdocs-cbec/excise/cxrules/new-cenvat-rules.

[iv]Federation of Indian Chambers of Commerce and Industry (FICCI). 2016. FICCI Survey on Inverted Duty Structure in Indian Manufacturing Sector. Technical Report.(Accessible at http://ficci.in/SEDocument/20375/FICCI-INVERTED-DUTY-Report-2016.pdf)

[v] For simplicity, assume that WTOs MFN import tariff holds for both the inputs and output under India’s trade agreements with partner countries.

[vi] American Chamber of Commerce in India (AMCHAM, India). 2015. Letter to Shri. ArunJaitley, the Honorable Minister of Finance. Accessible at http://www.amchamindia.com/wp-content/uploads/2015/04/Shri-Arun-Jaitley.pdf.

[vii] (1) Tariff Commission. 2016. Outcomes of Tariff Commission Study Reports. Accessible at http://tc.nic.in/outcomes%20of%20TC/Outcomes%20as%20on%2012%20May%202016.pdf. (2) Government of India, Ministry of Finance (Department of Revenue) Notification No. 5/2016-Customs, 19th January 2016, New Delhi, India. Accessible at http://www.cbec.gov.in/htdocs-cbec/customs/cs-act/notifications/notfns-2016/cs-tarr2016/cs05-2016. (3) Government of India, Ministry of Finance (Department of Revenue) Notification No. 4/2016-Customs, 19th January 2016, New Delhi, India. Accessible at http://www.cbec.gov.in/htdocs-cbec/customs/cs-act/notifications/notfns-2016/cs-tarr2016/cs04-2016.

[viii] ‘AIMED: Correction of Inverted Duty Structure and Quality Assurance – Talisman to Boost Confidence in Local Manufacturers’, 14th May, 2016, E-Health (The Enterprise of Healthcare). Accessible at http://ehealth.eletsonline.com/2016/05/aimed-correction-of-inverted-duty-structure-quality-assurance-talisman-to-boost-confidence-in-local-manufacturers/.

ये लेखक के निजी विचार हैं।

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