• Apr 11 2017

भारत में डिजिटल दबदबा कायम करना चाहती हैं चीनी कंपनियां

डिजिटल प्लेटफॉर्मों पर 'पूर्ण (टॉप-टू-बॉटम)' वर्चस्व के लिए चीनी कंपनियों की बेताबी भारत के लिए आखिरकार क्‍या मायने रखती है?

यह श्रृंखला (सीरीज) में आठवां भाग है  The China Chronicles.

प्रथम सात भाग पढ़ें यहां


विश्‍व स्‍तर पर ई-कॉमर्स में दिग्‍गज माने जाने वाले अलीबाबा समूह की सहयोगी फिनटेक कंपनी एंट फाइनेंशियल ने दुनिया की अग्रणी मनी ट्रांसफर कंपनियों में से एक 'मनीग्राम' के अधिग्रहण के लिए जो अथक प्रयास किए उससे 21वीं सदी के प्रौद्योगिकी परितंत्रों को अपने नियंत्रण में रखने संबंधी चीन की उत्‍कट महत्वाकांक्षा जगजाहिर हो गई है।

चीन की दिग्‍गज कंपनियों ने तरह-तरह के जिन उत्‍पादों एवं सेवाओं पर अपनी नजरें जमा रखी हैं (कईयों का तो उन्‍होंने अधिग्रहण भी कर लिया है) वह निश्चित तौर पर विस्मयकारी है। लेखन के दौरान इस लेखक को यह जानकारी मिली कि शेन्‍झेन स्थित मैसेजिंग प्‍लेटफॉर्म टेन्‍सेंट ने टेस्ला की पांच फीसदी हिस्सेदारी खरीद ली है, जिससे कई लोगों ने तुरंत ही सेल्‍फ-ड्राइविंग कार बाजार के लिए उसकी योजनाओं के बारे में अटकलें लगानी शुरू कर दीं। पिछले साल चीन की उपकरण निर्माता कंपनी मिडिया ने कूका का अधिग्रहण करने की घोषणा की थी जो एक जर्मन रोबोटिक्स कंपनी है और जिसे यूरोप के डिजिटल आयुक्त 'यूरोपीय उद्योग के डिजिटल भविष्य के लिहाज से अत्‍यंत महत्वपूर्ण' मानते रहे हैं। इसी तरह वर्ष 2014 की शुरुआत में ब्राजील की सबसे सफल 'ऑनलाइन-डिस्‍काउंट' कंपनी पीक्स उर्बानो को चीन के दिग्‍गज सर्च इंजन बैदू ने खरीद लिया था। उधर, वर्ष 2015 में भारत की अपनी पेटीएम ने चीन की सबसे बड़ी ई-कॉमर्स कंपनी अलीबाबा को 40 फीसदी हिस्सेदारी सौंप दी।

उपर्युक्‍त उदाहरण पिछले पांच वर्षों में चाइनीज कंपनियों द्वारा किए गए वैश्विक विलय और अधिग्रहण (एमएंडए) सौदों के एक छोटे से अंश को दर्शाते हैं और इसके साथ ही इनसे प्रौद्योगिकियों के रणनीतिक अधिग्रहण की प्रवृत्ति का पता चलता है। यह इस दिशा में सीधे तौर पर सामंजस्‍य स्‍थापित करने के साथ-साथ डिजिटल प्लेटफॉर्मों पर नियंत्रण हेतु किए गए प्रयासों को दर्शाता है। उदाहरण के लिए, एक ई-कॉमर्स कंपनी (अलीबाबा), एक पेमेंट गेटवे (अलीपे/पेटीएम) और एक मनी ट्रांसफर प्लेटफॉर्म (मनीग्राम) का स्‍वामित्‍व हासिल करके अथवा प्रमुख हितधारक बनकर एंट फाइनेंशियल एक ऐसी अंतर-संचालित प्रणाली स्‍थापित करना चाहती है जो एक उपभोक्ता द्वारा अपने ई-वॉलेट में पैसा प्राप्त करने के साथ शुरू होती है और फि‍र उसके द्वारा दुनिया में कहीं भी उत्पादों पर इसे खर्च करने के साथ समाप्त होती है। एक अग्रणी रोबोटिक्स कंपनी (कूका) में मिडिया के निवेश से पता चलता है कि यह कंपनी प्रबुद्ध एवं 'आपस में जुड़े उपकरणों की प्रणाली (इंटरनेट ऑफ थिंग्‍स)' द्वारा संचालित ऐसे परिदृश्‍य पर दांव लगा रही है जिसमें 'पारंपरिक' उपकरणों को सुसंगत तरीके से सेंसरों से जोड़ दिया जाता है और जो उनके मालिकों की आवश्यकताओं को पूरा करते हैं। यदि उपभोक्ता की जरूरतों का अनुमान मानवीय सहयोग या हस्तक्षेप के बिना ही लगाया जा सकता है, तो रोबोट द्वारा भी यह कार्य संपन्‍न किया जा सकता है, जो साफ-सफाई या खाना पकाने जैसे दैनिक कार्यों को स्वचालित बना देता है। चीन की दिग्गज इंटरनेट कंपनियों और कम्युनिस्ट पार्टी के बीच घनिष्ठ संबंधों को देखते हुए इन विलय एवं अधिग्रहण (एमएंडए) प्रस्‍तावों को संभवत: चीन के राजनीतिक नेतृत्व से हरी झंडी मिल चुकी थी।

डिजिटल प्लेटफॉर्मों पर 'पूर्ण (टॉप-टू-बॉटम)' वर्चस्व के लिए चीनी कंपनियों की बेताबी भारत के लिए आखिरकार क्‍या मायने रखती है? एक चरम परिदृश्य यह हो सकता है कि चीन के विभिन्‍न एप्‍लीकेशंस और उपकरण न केवल भारतीय उपयोगकर्ताओं (यूजर्स) के डेटा के संरक्षक (कस्‍टोडियन) बन जाएंगे, बल्कि वे उपभोक्ताओं के तौर-तरीकों को नया स्‍वरूप देते हुए सुरक्षा इंतजामों के नियंत्रणकर्ता (गेटकीपर) भी बन जाएंगे। एक हद तक तो यह स्थिति अभी ही नजर आने लगी है क्‍योंकि चीन के चार शीर्ष स्मार्टफोन मॉडल (बाजार हिस्सेदारी के लिहाज से) भारत में अपने पांव जमा चुके हैं। चाइनीज प्रौद्योगिकियों का बढ़ता प्रभाव दरअसल भारत के लिए व्‍यापक भू-राजनीतिक महत्व वाली एक विचारणीय घटना है। चीन यदि डिजिटल बाजारों पर अपना प्रभुत्‍व कायम कर लेता है तो वैसी स्थिति में दोनों देशों के बीच आर्थिक संबंध के दूसरे चरण का आगाज होगा। हालांकि, यह एक ऐसा अनचाहा चरण होगा जिसमें चाइनीज उत्पादों का बाजार मांग के बजाय आवश्यकता के आधार पर फलने-फूलने लगेगा। इससे साफ जाहिर है कि वैसी स्थिति में भारत की विदेश नीति के योजनाकारों के सामरिक और सैन्य विकल्प काफी कम हो जाएंगे।

चीनी प्रौद्योगिकियों का बढ़ता प्रभाव दरअसल भारत के लिए व्‍यापक भू-राजनीतिक महत्व वाली एक विचारणीय घटना है।

ऐसे आसार भी नजर आ रहे हैं कि भारत एवं चीन विशेषकर भारतीय बाजार के लिए उत्पादों और सेवाओं को तैयार करने हेतु आपस में सहयोग करने लगेंगे। वर्तमान घटनाक्रम से यह प्रतीत होता है कि दोनों ही पक्ष इस तरह के प्रयासों को आगे बढ़ाने के इच्‍छुक हैं। अक्टूबर 2016 में आयोजित किए गए चौथे भारत-चीन रणनीतिक आर्थिक वार्तालाप के दौरान "अर्थव्यवस्था के सभी क्षेत्रों में डिजिटलीकरण से लाभ उठाने के लिए आपसी सहयोग को मजबूत करने पर विशेष जोर देने के साथ-साथ [...] संयुक्त रूप से विनिर्माण प्रौद्योगिकी को बढ़ावा देने और उच्च प्रदर्शन वाली कंप्यूटिंग, स्मार्ट शहरों [इत्‍यादि] के क्षेत्र में दोनों देशों के बीच उद्यमों की साझेदारी के जरिए सहयोग को [बढ़ावा देने] की जरूरत को रेखांकित किया गया।"

विज्ञप्ति में यह सुझाव भी दिया गया है: "आईसीटी क्षेत्र में भारत एवं चीन की पूरक ताकतों, विशेष रूप से चीन के कंप्यूटर हार्डवेयर और भारत के कंप्‍यूटर सॉफ्टवेयर का लाभ प्रतिस्पर्धी और आर्थिक बढ़त हासिल करने के लिए उठाया जाना चाहिए।"

चीन के प्लेटफॉर्मों के लिए भारतीय तकनीकी समाधान (सोल्‍यूशंस) विकसित करने का लक्ष्य अभी कई वर्ष दूर है। हालांकि, इसमें कोई शक नहीं है कि चीन यदि भारत की प्लेटफॉर्म अर्थव्यवस्था के लिए आगे भी अपनी सेवाएं सुलभ कराना चाहता है तो चीन को भारत के साथ मिलकर काम करना होगा। उदाहरण के लिए, चीन के दूरसंचार उपकरणों के साथ-साथ विभिन्‍न एप्‍लीकेशंस का सुरक्षा परीक्षण एक ऐसा मसला है जिसे दोनों ही पक्षों को वार्ता के प्रारंभिक चरण में ही सुलझाना होगा।

इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि आखिरकार कौनसा परिदृश्य उभर कर सामने आता है। दरअसल, तकनीकी सहयोग सुनिश्चित होने की स्थिति में लंबे समय से चली आ रही वे धारणाएं पूरी तरह से समाप्‍त हो जाएंगी जिन्‍हें ध्‍यान में रखते हुए ही भारत ने फि‍लहाल चीन के प्रति विशेष दृष्टिकोण अपना रखा है।

  • सियासी रिश्‍ते को आर्थिक कारकों (फैक्‍टर) से जोड़ा जाएगा और ऐसे में डिजिटल अर्थव्यवस्था को सुरक्षित रखने के लिए भारतीय नियामक अपने चीनी समकक्षों के साथ काम करने के लिए प्रेरित होंगे। नतीजतन, एनएसजी की सदस्यता या संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में सुधार जैसे बड़े एवं दु:साध्‍य मुद्दे संभवत: ठंडे बस्‍ते में डाल दिए जाएंगे। कहने का मतलब यह नहीं है कि ऐसे मुद्दे भारत की विदेश नीति के मोर्चे पर कम मायने रखेंगे, बल्कि भारत-चीन रिश्‍तों को बिगाड़ने में इनकी भूमिका संभवत: घट जाएगी।
  • चीन का निजी क्षेत्र द्विपक्षीय संबंधों में एक प्रभावशाली कारक (फैक्‍टर) के रूप में उभर कर सामने आएगा। वैसे तो यह सच है कि चीन के व्यवसायीगण बीजिंग स्थित राजनीतिक महकमे या नेतृत्‍व से जुड़े रहते हैं, लेकिन वे अपनी-अपनी कंपनियों के मुनाफे एवं बाजार हिस्‍सेदारी को लेकर भी फि‍क्रमंद रहते हैं। जब भारत में चीन की कंपनियों के परिचालन का विस्‍तार होगा, तो वैसी स्थिति में वे सीपीसी पर काफी दबाव डालेंगी और संभवतः यहां तक कि आपसी रिश्ते को नई दिशा भी प्रदान करेंगी।
  • भारत और चीन संभवत: एशिया में विभिन्‍न उपकरणों एवं डिजिटल प्लेटफॉर्मों की पारस्परिकता के लिए तकनीकी मानक और प्रोटोकॉल विकसित करने हेतु आपस में मिलकर काम करेंगे। एशिया के डिजिटल परितंत्र फि‍लहाल विखंडित हैं क्‍योंकि किसी भी कंपनी का अपने बुनियादी ढांचे पर एकाधिकार नहीं है।
  • चूंकि चीनी उपकरणों और एप्‍लीकेशंस की पैठ भारतीय बाजार में बढ़ती जा रही है, इसलिए उन्हें ऐसी प्रौद्योगिकियों को भी विकसित करना होगा जो सुरक्षा को लेकर भारत की इन घरेलू चिंताओं को दूर कर दे: सस्ती, हैंडहेल्ड डिवाइस का असुरक्षित होना, भारत की विशिष्‍ट पहचान वाले डेटाबेस से मोबाइल फोन को जोड़ना, संचार प्लेटफॉर्मों के लिए कूटलेखन (एन्क्रिप्शन) मानक, इत्‍यादि। दक्षिण-पूर्वी और मध्य एशिया में डिजिटल अर्थव्यवस्थाएं जिस तरह से फल-फूल रही हैं उसे देखते हुए प्रौद्योगिकी आधारित सहयोग आगे चलकर मानक स्थापित करने के उद्देश्‍य से क्षेत्रीय सहयोग के रूप में भी फैल सकता है।
  • चीनी प्लेटफॉर्मों और उनमें निहित भारतीय डेटा के बीच के जटिल संबंधों को देखते हुए भारत एवं चीन तकनीकी मानकों से परे जाकर डेटा संरक्षण से जुड़ी राष्ट्रीय नीतियों के बीच समन्वय स्‍थापित करने के लिए भी प्रेरित हो सकते हैं (या कम से कम सर्वोत्‍तम तरीके से उनके बीच तालमेल के लिए संबंधित नोट्स की तुलना कर सकते हैं)। जिन नीतिगत सवालों का समाधान किया गया उनमें ये शामिल किए जा सकते हैं: किस डेटा को भारतीय सीमाओं में ही बने रहना चाहिए? विदेश में संग्रहीत भारतीय नागरिकों के आंकड़ों पर कौन-कौन से सुरक्षा उपाय लागू होंगे? साइबर अपराधों से निपटने के लिए दोनों पक्ष आखिरकार कैसे भारतीय और चीनी कानून प्रवर्तन एजेंसियों के बीच सूचना साझा करने के चैनल बना सकते हैं? नीतियों के बीच समन्वय स्वाभाविक रूप से एक सियासी कवायद है, जिसके लिए उच्चस्तरीय प्रतिनिधित्व की आवश्यकता होगी ताकि वर्तमान द्विपक्षीय चर्चाओं में इसकी कमी पूरी की जा सके।
  • निरंतर बढ़ते चीनी प्रभाव से चिंतित होकर अमेरिकी और यूरोपीय प्रौद्योगिकी निर्मातागण एवं प्लेटफॉर्म भारतीय बाजार को लुभाएंगे, जिसके तहत वे भारत को एक ऐसी रियायत की पेशकश कर सकते हैं जिसका इस्‍तेमाल राजनीतिक उद्देश्यों की पूर्ति‍ के लिए किया जा सकता है। वर्तमान में चाइनीज एप कई बाजारों में अपने पश्चिमी समकक्षों के साथ प्रतिस्पर्धा में नहीं टिक पाते हैं। हालांकि, इस परिदृश्‍य में बदलाव आना तय है क्‍योंकि चीन की कंपनियां अब अंग्रेजी भाषा वाले प्लेटफॉर्मों को विकसित करने में जुट गई हैं।

एशिया के साथ-साथ उससे परे भी स्‍थापित डिजिटल परितंत्रों को अपने नियंत्रण में करने के लिए चीनी कंपनियों द्वारा किए जा रहे प्रयासों के चिंताजनक परिणामों से भारत के नीति निर्माताओं की आंखें अवश्‍य ही खुल जानी चाहिए।

डिजिटल प्लेटफॉर्मों के बीच समन्‍वय को देखते हुए यदि भारत ने साइबर स्पेस में गवर्नेंस के नियमों को निर्धारित करने का अधिकार अपने पूर्वी पड़ोसी को सौंप दिया, तो यह नासमझी भरा कदम साबित होगा। इसके साथ ही जिन आर्थिक और कारोबारी अनिवार्यताओं को ध्‍यान में रखते हुए चाइनीज कंपनियां भारत में पदार्पण कर रही हैं उससे चीन को बातचीत की मेज पर लाने का सुअवसर भारत को प्राप्‍त हुआ है। चीन भले ही नई प्रौद्योगिकियों के विकास में भारी-भरकम धनराशि और संसाधन लगाने में सक्षम हो, लेकिन उनकी उपयोगिता और पारस्परिकता का निर्धारण भारत जैसे उभरते बाजारों के उपभोक्ताओं द्वारा ही किया जाएगा। चीन के खिलाड़ियों या कंपनियों को प्रतिस्‍पर्धा से बाहर रखने के उद्देश्‍य से तैयार किए गए विनियामक मानदंडों या प्रौद्योगिकी मानकों से चीन की आर्थिक संभावनाओं को तगड़ा झटका लग सकता है। यह एक ऐसी चाल है जिसे चलने से भारत को कतई संकोच नहीं करना चाहिए। इसके बाद बातचीत की जो प्रक्रिया शुरू होगी उससे अंतत: वह राजनीतिक गतिरोध समाप्‍त हो सकता है जो आपसी रिश्‍ते को फि‍लहाल मजबूती की डोर में बंधने नहीं दे रहा है।


लेखक के बारे में

अरुण मोहन सुकुमार ORF की साइबर सुरक्षा एवं इंटरनेट गवर्नेंस पहल के प्रमुख हैं। वह ‘सीवाईएफवाई: साइबर सुरक्षा और इंटरनेट गवर्नेंस पर भारतीय सम्मेलन’ के सह-अध्यक्ष हैं। वह एशिया-प्रशांत क्षेत्रीय इंटरनेट गवर्नेंस फ़ोरम के निर्वाचित उपाध्यक्ष है। संयुक्त राष्ट्र निरस्त्रीकरण अनुसंधान संस्थान (यूएनआईडीआईआर) के निमंत्रण पर अरुण ने हाल ही में संयुक्त राष्ट्र जीजीई में एक स्वतंत्र कानूनी विशेषज्ञ के रूप में अपनी सेवाएं प्रदान की थीं, जो एक अंतर सरकारी फोरम है और जिसे साइबर मानकों की परिकल्‍पना करने की जिम्‍मेदारी सौंपी गई है।

अरुण 'डिजिटल अर्थव्यवस्था और समाज' पर विश्व आर्थिक फोरम की वैश्विक भविष्य परिषद के एक सदस्य हैं।

ये लेखक के निजी विचार हैं।

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