• Mar 09 2017

‘ठेके पर खेती’ को भारतीय किसानों के लिए उपयुक्त बनाना संभव

ठेके पर खेती समस्ते तरह की पैदावार के बजाय केवल विशेष प्रकार की फसलों के लिए ही सर्वाधिक उपयुक्त है।

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भारत के निरीह किसानों की समस्‍त समस्‍याओं के निदान के लिए ठेके पर खेती (अनुबंध पर खेती) एक रामबाण की तरह प्रतीत होती है। नीति आयोग ठेके पर खेती के बारे में एक मॉडल कानून का मसौदा तैयार कर रहा है जिसमें अद्यतन कानून शामिल होंगे, ताकि ठेके पर खेती को बड़े पैमाने पर मूर्त रूप देने का मार्ग प्रशस्‍त किया जा सके। मनमोहन सिंह की सरकार की भांति ही नरेंद्र मोदी की सरकार भी कृषि के निगमीकरण (कॉरपोरेटेड) को बढ़ावा देने के पक्ष में प्रतीत होती है जिसके तहत बड़ी कंपनियां (घरेलू और विदेशी) वैसी उपज के लिए छोटे एवं मझोले किसानों के साथ अनुबंध करती हैं जिनकी जरूरत उन्‍हें अपने खाद्य पदार्थ एवं कृषि आधारित उद्योगों में प्रसंस्करण के लिए पड़ती है।

भारत में साठ के दशक से ही ठेके पर खेती का चलन रहा है और पिछले दशक में राज्यों के स्तरों पर एपीएमसी अधिनियम में किए गए संशोधन ने इसे कानूनी स्‍वरूप प्रदान कर दिया है। इसे विभिन्न फसलों, क्षेत्रों और कंपनियों में व्यापक रूप से अपनाया गया था।

वर्ष 2003 में बाजार सुधारों को लागू करने के उद्देश्‍य से केंद्र सरकार द्वारा एक मॉडल कृषि उत्पाद विपणन (नियमन) अधिनियम को राज्यों के बीच प्रसारित किया गया था। इसमें एपीएमसी के यहां अनुबंध खेती के प्रायोजकों के पंजीकरण के साथ-साथ ठेके पर खेती से जुड़े समझौतों को दर्ज किए जाने, इस तरह के अनुबंधों के तहत भूमि पर किसानों के हक (टाइटिल) या अधिकारों की रक्षा करने, विवाद निपटान की व्‍यवस्‍था करने और विभिन्न नियमों एवं शर्तों के बारे में सुझाव देने वाले एक मॉडल मसौदा समझौते के लिए प्रावधान हैं। कई राज्य सरकारों ने ठेके पर खेती को कानूनी स्‍वरूप प्रदान करने के लिए अपने एपीएमसी अधिनियमों में प्रावधान किए हैं।

वर्ष 2003 में बाजार सुधारों को लागू करने के उद्देश्‍य से केंद्र सरकार द्वारा एक मॉडल कृषि उत्पाद विपणन (नियमन) अधिनियम को राज्यों के बीच प्रसारित किया गया था।

नीति आयोग का यह मानना है कि ठेके पर खेती की प्रणाली को सुव्‍यवस्थित करने तथा इसे समस्‍त राज्यों में और ज्‍यादा एकसमान बनाने के लिए एक मॉडल कानून की सख्‍त आवश्‍यकता है। वर्तमान में, 22 राज्यों ने ठेके पर खेती को सह-विकल्‍प के रूप में अपनाया है। हालांकि, इसके दायरे में आ सकने वाली उपज के प्रकार के साथ-साथ उन शर्तों के बारे में भी कोई एकरूपता या समरूपता नहीं है जिनके तहत ठेके पर खेती की अनुमति दी जानी चाहिए। नीति आयोग के अनुसार, 'जो भी कानून बनाया जाएगा वह सभी जिंसों के लिए सामान्य सा होगा और उसका लक्ष्‍य ऐसे एकसमान नियम-शर्तें तय करना होगा जिनसे टकरावों में काफी कमी आएगी। यह बिल्‍कुल स्पष्ट है कि इस तरह का कानून सकारात्मक और अच्छा कदम साबित होगा।' मॉडल अधिनियम के पीछे मुख्‍य उद्देश्‍य फलों और सब्जियों का उत्पादन करने वाले किसानों को कृषि प्रसंस्करण इकाइयों से सीधे तौर पर (बिचौलियों के बिना) एकीकृत करना है, ताकि उन्‍हें बेहतर मूल्य मिल सकें और इसके साथ ही फसल की कटाई के बाद होने वाले नुकसान को कम भी किया जा सके।

वर्तमान में, 22 राज्यों ने ठेके पर खेती को सह-विकल्‍प के रूप में अपनाया है। हालांकि, इसके दायरे में आ सकने वाली उपज के प्रकार के साथ-साथ उन शर्तों के बारे में भी कोई एकरूपता या समरूपता नहीं है जिनके तहत ठेके पर खेती की अनुमति दी जानी चाहिए।

अनुबंध पर खेती के तहत किसानों को बीज, ऋण, उर्वरक, मशीनरी और तकनीकी सलाह सुलभ कराई जा सकती है, ताकि उनकी उपज कंपनियों की आवश्यकताओं के ही बिल्‍कुल अनुरूप हो सके। इसमें कोई भी बिचौलिया शामिल नहीं होगा और किसानों को कंपनियों की ओर से पूर्व निर्धारित बिक्री मूल्य मिलेंगे। इस तरह की खेती बढि़या एवं सरल प्रतीत होती है और किसानों को मंडियों के चक्‍कर नहीं लगाने पड़ते हैं और न ही उन्‍हें खेती-बाड़ी से जुड़े कार्यों के लिए बीज तथा ऋण जुटाने की कोई चिंता करनी पड़ती है। इस तरह के अनुबंध से किसानों के लिए बाजार में उनकी उपज की मांग एवं इसके मूल्यों में उतार-चढ़ाव का जोखिम कम हो जाता है और इसी तरह कंपनियों के लिए कच्चे माल की अनुपलब्धता का जोखिम घट जाता है।

ठेके पर खेती के जरिए कम पड़ते निवेश का इंतजाम किया जा सकता है और इसके साथ ही उच्‍च गुणवत्‍ता वाले कच्‍चे माल की आपूर्ति सुनिश्चित करके, तकनीकी मार्गदर्शन एवं प्रबंधन कौशल प्रदान करके भूमि सुधार के कार्य को पूरा किया जा सकता है।

पंजाब में पिछले 15 वर्षों से भी अधिक समय से कॉरपोरेट खेती हो रही है और सफलता की कहानियां टमाटर, आलू, मूंगफली एवं मिर्च के मामले में पेप्सिको इंडिया से, मध्य प्रदेश में कुसुम, आंध्र प्रदेश में पाम तेल एवं संकर बीज कंपनियों के लिए बीज उत्पादन के अनुबंधों से जुड़ी हुई हैं जिससे उत्पादकों को अपनी उपज के लिए बेहतर रिटर्न प्राप्‍त होने में मदद मिली।

यदि ठेके पर खेती वास्तव में किसानों के लिए इस हद तक न्‍यायसंगत और बढि़या विकल्प है तो इस पर कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए। चीन सहित कई देशों ने कॉरपोरेट खेती को सफलतापूर्वक अपनाया है। ऐसे में बड़े पैमाने पर इसे अपनाने पर पुनर्विचार क्‍यों नहीं किया जाना चाहिए?

समस्याएं दरअसल बहुत छोटे और सीमांत किसानों के मामले में उत्पन्न होती हैं। इस तरह की खेती के लिए संभवत: इन किसानों से अनुबंध नहीं किया जा सकता क्‍योंकि कंपनियां फसल की एक विशेष मात्रा उपलब्‍ध कराने की मांग कर सकती हैं, जिसका उत्‍पादन छोटे किसान अपनी जमीन के छोटे आकार के कारण नहीं कर सकते हैं। जाहिर है, ऐसे में सबसे कमजोर माने जाने वाले किसानों को कॉरपोरेट खेती का लाभ कतई नहीं मिल पाएगा।

ठेके पर खेती को समावेशी बनाने के लिए कृषि समूहों जैसे कि सहकारी समितियों को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। हालांकि, कभी-कभी, छोटे किसानों को भी इकट्ठा किया जाता है, क्‍योंकि कम उत्पादन लागत का लाभ मिलता है। ऐसा इसलिए संभव हो पाता है क्‍योंकि इन किसानों को सस्ते पारिवारिक श्रमिक सुलभ हो जाते हैं जो दैनिक मजदूरी पर काम करने वाले श्रमि‍कों की तुलना में कहीं ज्‍यादा मन लगाकर काम भी करते हैं।

दूसरा, मझोले किसान अक्‍सर इतने पढ़े-लिखे नहीं होते हैं कि वे अनुबंध और सभी धाराओं की बारीकियों को सही ढंग से समझ सकें। ऐसे में यदि उपज कंपनी के मानकों के अनुरूप नहीं होती है, तो उसे समूची फसल को अस्वीकृत किए जाने की स्थिति का सामना करना पड़ सकता है। तो वैसी स्थिति में उसकी नियति क्या होगी? वह अपनी उपज कहां बेच सकता है? यह निर्यात को रद्द करने जैसा होगा जिसे पूरे भारत में फैली दुकानों में उपलब्‍ध कराया जा सकता है, लेकिन खराब उपज को बेचना उतना आसान भी नहीं होता है।

तीसरा, किसान को लगातार कई वर्षों तक केवल टमाटर या प्याज का ही उत्पादन करने के लिए विवश किया जा सकता है जिससे 'मोनोकल्चर' की स्थिति बन जाएगी और उसके पास कोई भी विकल्प शेष नहीं रह जाएगा, भले ही क्‍यों न वह फसलों के किसी विशेष मिश्रण का उत्पादन करना अपने खेत के लिए अच्छा मानता हो। नि:संदेह उसकी आजादी या मनमर्जी खतरे में पड़ जाएगी और यह किसानों की व्‍यक्तिगत आजादी एवं उनके अधिकारों के लिए एक गंभीर झटका है।

चौथा, पूर्व निर्धारित कीमतों में खाद्य संबंधी महंगाई का ख्याल नहीं रखा जाता है और अगर उपज का मूल्य बढ़ जाए, तो किसान उसका फायदा नहीं उठा सकते हैं और अप्रत्याशित लाभ नहीं कमा सकते हैं क्योंकि वह अनुबंध के तहत पहले से ही सहमत हुए दाम पर बेचने के लिए विवश रहते हैं।

पांचवां, औसत किसान के गरीब और कम पढ़े-लिखे होने के चलते वह बड़ी कंपनियों से कोई खास सौदेबाजी नहीं कर पाता है और ऐसे में उसे अपनी उपज का उचित मूल्य मिलने की संभावना बड़ी ही क्षीण रहती है।

छठा, क्‍या हमें कॉरपोरेट जगत को अपनी खेती-बाड़ी का अधिग्रहण करने के लिए छोड़ देना चाहिए? क्या इससे देश की खाद्य सुरक्षा प्रभावित नहीं होगी? कारण यह है कि इसका बीज उत्पादन बहुराष्ट्रीय कंपनियों द्वारा ही बड़े पैमाने पर नियंत्रित होता है।

और अंत में, ठेके पर खेती समस्‍त तरह की पैदावार के बजाय केवल विशेष प्रकार की फसलों के लिए ही सर्वाधिक उपयुक्त है। चीन में, अनुबंध पर खेती के दायरे में केवल विशिष्ट कृषि उपज को ही रखा गया है।

सामान्य तौर पर, मॉडल कानून का प्रारूप तैयार करते समय 'ठेके पर खेती' के सर्वाधिक सफल मामलों से जुड़ी बेहतरीन कार्यप्रणाली को ही ध्यान में रखा जाना चाहिए। कृषि विपणन की ढेर सारी कमियों को वास्तव में दूर करके उनसे छुटकारा पाया जा सकता है क्योंकि किसान अपनी उपज के भंडारण या अंधाधुंध बिक्री की समस्याओं और बिचौलियों के जरिए सौदा करने से परेशान नहीं हैं। दरअसल, किसी भी सूरत में कृषि या खेती-बाड़ी को कॉरपोरेट जगत के बजाय किसानों के ही हाथों में रखा जाना चाहिए। इसके साथ ही बड़ी कंपनियों और छोटे एवं मझोले किसानों के बीच त्वरित एवं न्‍यायसंगत विवाद निपटान के लिए प्रावधान होने चाहिए।

इसके साथ ही, कंपनियों और राज्यों को स्थानीय गैर सरकारी संगठनों (एनजीओ) और अन्य संगठनों एवं संस्थानों की मध्यस्थता के साथ किसी समूह से ही अनुबंध करने को बढ़ावा देना चाहिए, ताकि अनुबंध संबंधी संबंध अधिक टिकाऊ और निष्पक्ष हो सकें। इसी तरह ठेके पर काम करने वाले किसानों के हितों की रक्षा के लिए बीमा की सुविधा उपलब्‍ध कराना अत्‍यंत आवश्यक है। अत: सहकारी प्रक्रिया के जरिए सामूहिक रूप से अमल करने की सख्‍त जरूरत है, ताकि बेहतर कीमतों पर ही खरीद-बिक्री करना संभव हो सके। एक ऐसी प्रणाली होनी चाहिए जो अनुबंधों पर करीबी नजर रखे, जिससे कि छोटे किसानों के हितों के मद्देनजर इन पर सुचारू रूप से अमल हो सके। यदि इस तरह के समस्‍त कदम उठाए जाएं तो अनुबंध या ठेके पर खेती का पूरे भारत में तेजी से फैलना मुमकिन हो सकता है।

ये लेखक के निजी विचार हैं।

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