• Dec 17 2016

जलवायु परिवर्तन और मानवाधिकार

भारत समग्र रूप से ऊर्जा का दुनिया का चौथा सबसे बड़ा उपभोक्ता है, साथ ही दुनिया का तीसरा बड़ा कार्बन उत्सर्जक देश भी।

जलवायु परिवर्तन मानव अधिकारों पर प्रत्यक्ष और परोक्ष दोनों ही तरह के खतरे पेश कर रहा है। इनमें भोजन का अधिकार, पानी और स्वच्छता का अधिकार, सस्ती व्यावसायिक ऊर्जा हासिल करने का अधिकार और इसे विस्तार देते हुए विकास का अधिकार भी शामिल है। मजबूरी में किए गए व्यापक स्तर पर पलायन, जलवायु से जुड़ी संघर्ष की स्थितियों के खतरे, स्वास्थ्य और स्वास्थ्य व्यवस्था को सीधे और परोक्ष खतरे तथा जमीन और जीविका पर होने वाले प्रभाव, ये मुद्दे दर्शाते हैं कि जलवायु परिवर्तन और मानव अधिकार संबंधी चिंताएं बहुत नजदीक से एक-दूसरे से संबद्ध हैं। सम्मान पूर्वक जीने का अधिकार ही नहीं बल्कि जीवन का अधिकार भी दाव पर है।

जलवायु परिवर्तन की समस्या के मूल में एक अनोखी विडंबना है — जो देश इस समस्या के लिए सबसे कम उत्तरदायी रहे हैं, वे ही इससे सबसे ज्यादा प्रभावित होने वाले हैं। ग्रीनहाउस गैसें विकसित देशों की आर्थिक गतिविधियों की वजह से पैदा हो रही हैं, लेकिन जलवायु परिवर्तन का सबसे ज्यादा बदलाव देखने को मिलेगा गरीब देशों पर। विषम परिस्थिति का सामना करने की बेहतर क्षमता रखने वाले लोगों के मुकाबले वे लोग ज्यादा प्रभावित होंगे जो पहले से समस्याग्रस्त और वंचित हैं। जलवायु परिवर्तन का प्रभाव तो सभी देशों पर होगा, लेकिन यह सबको एक समान प्रभावित नहीं करेगा।

मौजूदा समय में, हर वर्ष होने वाली इंसानी मृत्यु में लगभग एक तिहाई के पीछे गरीबी से जुड़ी वजहें होती हैं। जलवायु परिवर्तन के बढ़ते प्रभाव को देखते हुए यह स्थिति भविष्य में और खराब ही होगी। गरीबों में भी महिलाओं और लड़कियों का अनुपात ज्यादा है जिसकी वजह से वे समस्या की चपेट में और ज्यादा आती हैं। उदाहरण के तौर पर ग्रामीण भारत में, खास तौर पर महिलाओं पर ही यह जिम्मेवारी होती है कि वे खाना और पानी उपलब्ध करवाएं। इसलिए जमीन की पैदावार पर पड़ने वाले जलवायु परिवर्तन के असर, जल की उपलब्धता और खाद्य सुरक्षा का बहुत सीधा असर महिलाओं पर पड़ता है। इसी तरह वर्ष 2004 में आए भूकंप और सुनामी ने दिखाया है कि आपदा के दौरान भारतीय महिलाएं कैसे ज्यादा प्रभावित होती हैं। इस दौरान प्रभावित इलाकों में महिलाएं पुरुषों के मुकाबले चार गुना ज्यादा संख्या में मारी गईं। यह एक उदाहरण है कि जलवायु परिवर्तन किस तरह मौजूदा विषमताओं को और बढ़ाता है। यह भारत के लिए जानलेवा हो सकता है, जहां लैंगिक के साथ ही जातीय और वर्ग संबंधी विषमताएं भी तय करती हैं कि किसी नागरिक को कितने मानवाधिकार हासिल होंगे।

जलवायु पर हो रही अंतरराष्ट्रीय बातचीत में जहां पर्यावरण की रक्षा और आने वाली पीढ़ियों के लिए प्राकृतिक संसाधनों को सहेजने पर जोर होना ही चाहिए, यह भी जरूरी है कि वे दुनिया भर की खतरे की जद में रहने वाली आबादी की तात्कालिक विकास की चुनौती को कतई दाव पर नहीं लगाएं। इसके लिए जरूरी है कि जलवायु परिवर्तन पर हो रही बहस समानता, ऊर्जा तक पहुंच और साझेदारी पर केंद्रित हो। विकास सिर्फ आर्थिक और सामाजिक जरूरत नहीं, यह जलवायु परिवर्तन को ले कर अपनाया गया बेहतरीन उपाय भी है। खतरे की जद में जीने वाली आबादी के जीवन, स्वास्थ्य और जीविका के मौलिक मानवाधिकारों को सुरक्षित रखने के लिए यह जरूरी है कि हम ऐसे विकास को बढ़ावा दें जो चुनौतियों का सामना करने की ऐसे विशेष वर्ग की क्षमता और उनकी संपत्ति को बढ़ा सके और साथ ही जलवायु परिवर्तन के उपायों को भी कामयाबी से लागू कर सके।

दुनिया की सर्वाधिक गरीब 1.2 अरब आबादी के अनुमानित 33% लोगों का ठिकाना भारत है। इस जैसी उभरती अर्थव्यवस्था के लिए खास तौर पर यह बहुत प्रासंगिक है। विकास के अधिकार की रक्षा करना यहां बहुत अहम है क्योंकि यहां यह तथ्य जीवन के अधिकार से जुड़ा है। इस लिहाज से सफल नजरिया वह होगा जिसमें पर्यावरण रक्षा और गरीबी उन्मूलन को पूरी तरह से अलग-अलग लक्ष्य के तौर पर नहीं देखा जाता हो। आप ऐसे ब्रह्मांड की रक्षा किस नैतिकता के आधार पर करेंगे जिसमें एक तिहाई मनुष्य जीवन के चार दशक से ज्यादा नहीं देख पाते, जबकि आबादी का सातवां हिस्सा आठ दशक से ज्यादा का जीवन जीता है।

जलवायु परिवर्तन संबंधी वार्ता में ऊर्जा उत्सर्जन को विकास से अलग रखने के सिद्धांत पर जिस तिव्रता से बात की जा रही है उसमें इस बात का भी खतरा है कि विकासशील देशों में मानवाधिकारों के हनन की आशंका और बढ़ जाए। उत्सर्जन को आर्थिक विकास से ‘पूरी तरह अलग रखने’ की प्रचलित कथ्य की संभावनाओं पर अर्थशास्त्री टिम जैक्सन ने विचार किया है। उनका निष्कर्ष है कि अर्थव्यवस्था के अनुपात में उत्सर्जन की बढ़ोतरी की रफ्तार को थामा तो जा सकता है, लेकिन जब अर्थव्यवस्था विस्तार ले रही हो, उसी दौरान उत्सर्जन को थामना या नकारात्मक विकास की ओर मोड़ना अकल्पनीय है, भले ही कार्बन-बचत तकनीक उपलब्ध हो गई हों।

भारत को अभी अपनी ऊर्जा खपत के चरम पर पहुंचना बाकी है और यह अभी भी प्रति व्यक्ति 2000 वॉट की न्यूनतम जीवनरेखा ऊर्जा उपलब्ध करवाने में संघर्ष कर रहा है। पहली दुनिया के नागरिक वर्ष 2050 में बिना अपने मौजूदा जीवन स्तर को घटाए प्रति व्यक्ति इतनी ही ऊर्जा की खपत कर रहे होंगे (1998 के फेडरल इंस्टीट्यूट ऑफ टेकनालॉजी, ज्यूरिक के अध्ययन के मुताबिक)। शोध बताते हैं कि विकासशील देशों में गरीबी उन्मूलन और जीविका के साधन उपलब्ध करवाने के लिए ऊर्जा तक पहुंच को सुनिश्चित करना आवश्यक है। हालांकि भारत में प्रति व्यक्ति ऊर्जा का उपयोग चीन, अमेरिका या यूरोपीय संघ के मुकाबले बहुत कम है, लेकिन भारत समग्र रूप से ऊर्जा का दुनिया का चौथा सबसे बड़ा उपभोक्ता है और साथ ही दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा कार्बन उत्सर्जक देश भी। भारत को स्वच्छ ऊर्जा के एजेंडे पर चलते हुए जलवायु परिवर्तन पर जारी वार्ता में दोहरे लक्ष्य को हासिल करने के नजरिये पर चलना है जिसमें आर्थिक विकास और मानव विकास के लिए ऊर्जा तक पहुंच दोनों शामिल हैं।

विकसित दुनिया के अधिकांश हिस्से को इस बात की चिंता है कि जहां उन्होंने आम तौर पर अपने कोयला उपयोग को हाल के समय (वित्तीय संकट के बाद) में घटाया है, भारत ने इसी दौरान इसके उपयोग को बढ़ाया है। हालांकि विश्लेषण से पता चलता है कि उपयोग में इस बढ़ोतरी को जलवायु के प्रति किसी देश की जवाबदेही से जोड़ कर नहीं देखा जाना चाहिए। बल्कि इस बात पर जोर दिया जाना चाहिए कि प्रति व्यक्ति आधार पर कोयले के दहन में भारत का योगदान अमेरिका के मुकाबले पांचवां हिस्सा भी नहीं। यूरोपीय संघ के मुकाबले यह एक तिहाई है। हम 2050 तक, जब पृथ्वी की अनुमानित आबादी नौ अरब होगी, प्रति व्यक्ति उत्सर्जन को दो टन सीओ2 तक सीमित करना चाहते हैं, ऐसे में हमें व्यक्तिगत ऊर्जा उपलब्धता, कार्बन छूट, इंधन विकल्प और जीवनशैली उत्सर्जन इन सब को सम्मिलित रूप में देखना शुरू करना होगा। यहां हमें जीवनरेखा ऊर्जा और जीवनशैली ऊर्जा के बीच के अंतर पर खास तौर से जोर देना होगा। जीवनरेखा ऊर्जा वह न्यूतन ऊर्जा जरूरत है जिसके आधार पर हम मूल मानवीय जरूरतों को पूरा करते हैं। इसका आकलन जीडीपी विकास दर लक्ष्य और एचडीआई स्तर के साथ ही पूर्व निर्धारित विकास लक्ष्यों को हासिल करने के लिए आवश्यक ऊर्जा की जरूरतों के अनुमान के आधार पर किया जा सकता है। जीवन-रेखा ऊर्जा विकसित देशों के नागरिकों की न्यूनतम जीवनशैली संबंधी जरूरतों को पूरा करने के लिए पर्याप्त होती हैं, उससे ज्यादा ऊर्जा को जीवनशैली ऊर्जा की श्रेणी में रखना होगा। इसलिए भारत भले ही स्वच्छ ऊर्जा की ओर बढ़ने के लिए पुरजोर संघर्ष कर रहा हो, लेकिन अपने औद्योगिक आधार को और अर्थव्यवस्था को बढ़ाने के लिए इसकी कोयले के उपयोग पर निर्भरता लाजमी है। विकास और गरीबी उन्मूलन के बिना भारत नवीकरणीय ऊर्जा या जलवायु परिवर्तन के लिहाज से जरूरी चीजों में निवेश नहीं कर पाएगा। संक्षेप में कहें तो, ‘अगर भारत को सफलतापूर्वक हरित ऊर्जा के लक्ष्य को हासिल करना है तो इसे अपनी कोयला क्षमता को बढ़ाना होगा।’ कार्बन का मौजूदा असमान बंटवारा जलवायु न्याय और हिस्से को ले कर चल रही चर्चा से हमें दूर करता है।

इस साल दिसंबर के दौरान कांफ्रेंस ऑफ पार्टीज (सीओपी) की 21वीं बैठक के दौरान, 193 देश स्वैच्छिक और स्व-निर्धारित राष्ट्रीय लक्ष्य तय कर एक वैश्विक जलवायु समझौता तैयार करने की कोशिश करेंगे। पैरिस में होने वाले समझौते में यह जरूर सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि भावी पीढ़ियों के अधिकारों की रक्षा पर इतना ज्यादा ध्यान केंद्रित न हो कि यह विकासशील देशों की खतरे की जद और संकट में रह रही आबादी के जीवन को ही खतरे में डाल दे।

भले ही जलवायु का प्रभाव धीरे-धीरे हमारे लिए सामान्य होता जा रहा हो, लेकिन जलवायु परिवर्तन से होने वाली प्राकृतिक आपदाएं और आत्यांतिक मौसम की घटनाएं पहले से ही उन आबादी पर कहर ढा रही हैं और आने वाले समय में ये और बढ़ने वाली हैं।

इस संदर्भ में अधिकार-आधारित नजरिये के जरिये ‘जिम्मेदारियों, असमानताओं और खतरों का विश्लेषण’ किया जा सकता है और ‘भेद-भाव तथा ऊर्जा के असमान बंटवारे का समाधान’ कर सकती है जैसा कि संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार आयोग ने निर्धारित किया है। यह सुनिश्चित किया जा सकता है कि ऐसी जिम्मेदारियां राज्यों के लक्ष्य और वादे पर लागू हों और इसलिए भविष्य में जलवायु परिवर्तन संबंधी व्यवस्थाएं जलवायु परिवर्तन की वजह से प्रभावित हो सकने वाली आबादी के अधिकारों की रक्षा पर ध्यान दे। यूएनएफसीसीसी की ओर से घोषित विकास के अधिकार की घोषणा में इन मानवाधिकार सिद्धांतों पर जोर दिया गया है और राज्यों की ओर से इन मुद्दों के समाधान पर जोर देता है। इस दौरान उन्हें साझा लेकिन भिन्न-भिन्न जवाबदेहियों और संबंधित क्षमता का ध्यान भी रखना होगा ताकि मौजूदा और भविष्य दोनों की ही पीढ़ियों को लाभ मिल सके।

अब तक बनी हुई भारी असमानता वाली मौजूदा दुनिया में सभी देशों के लिए कम कार्बन वाले, जलवायु-सक्षम और सतत विकास के लक्ष्य को हासिल करना तब तक संभव नहीं है जब तक कि वित्त, तकनीक और क्षमता निर्माण में अंतरराष्ट्रीय सहयोग नहीं हो। इस बात पर भी ध्यान दिए जाने की जरूरत है कि जलवायु परिवर्तन के शमन की तब तक कल्पना नहीं की जा सकती जब तक गरीबी उन्मूलन पर ध्यान नहीं दिया जाए और राष्ट्रों के बीच और उनके अपने अंदर जलवायु न्याय को सुनिश्चित नहीं किया जाए। मानवाधिकारों को जलवायु संबंधी कदमों के साथ जोड़ कर और विकासशील देशों में महिलाओं और बच्चों जैसे सबसे ज्यादा खतरे में रहने वाली आबादी को अधिकार संपन्न बना कर उन्हें जलवायु अनुकूलन और शमन की प्रक्रिया में भूमिका निभाने लायक बनाने से प्रभावों को दूर करने की यह प्रक्रिया काफी तेज हो सकती है। ऊर्जा तक पहुंच सुनिश्चित करना लैंगिक समानता, महिला अधिकार और सबको समाहित करने वाले विकास के लिहाज से भी सहायक होगी।

पेरिस सम्मेलन से पहले भारतीय प्रधानमंत्री ने वैश्विक समुदाय से अपील की है कि वे जलवायु परिवर्तन पर ‘जलवायु न्याय’ को तरजीह दें। गरीबों का कम-उपभोग अमीरों के अधिक-उपभोग के लिए सब्सिडी उपलब्ध नहीं करवा सकता, यह बात देशों के अंदर और विभिन्न देशों के बीच भी एक समान लागू होती है। भविष्य के समझौतों के टिकाऊ और सफल होने के लिए यह जरूरी है कि राज्य बयानबाजी और शक्ति प्रदर्शन से ऊपर उठ कर पर्यावरण संरक्षण के साथ ही जीवन और विकास (बराबर न हो तो समतामूलक ही सही) के अधिकार को भी आगे बढ़ाने की दोहरी जवाबदेही को उठाने को तैयार हों।

यह लेख प्रकाशन ग्लोबल पॉलिसी जर्नल से लिया गया है।

ये लेखक के निजी विचार हैं।

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