• Mar 10 2017

चीन के ऊर्जा सुरक्षा लक्ष्यों को फि‍र से तय करने की कोशिश

ऊर्जा सुरक्षा के प्रति चीन के भू-राजनीतिक दृष्टिकोण और उसके प्राथमिक ऊर्जा मिश्रण में गैर-जीवाश्म ईंधनों की हिस्सेदारी बढ़ाने के लिए उसके प्रयासों के सह-अस्तित्व से ही चीन की अर्थव्यवस्था को कार्बन मुक्‍त करने के उसके इरादे की परीक्षा होगी।

यह लेख श्रृंखला The China Chronicles का तीसरा भाग है। 

पहला भाग ► चीन के लिए आसान नहीं क्षेत्रीय वर्चस्व की डगर

दूसरा भाग  ► वैश्वीकरण के गेम में चीन का चैंपियन बनना खतरनाक


विश्व ऊर्जा की बीपी सांख्यिकीय समीक्षा 2016 (बीपी आंकड़े 2016) के अनुसार, वैश्विक ऊर्जा खपत में अपनी 23 फीसदी हिस्‍सेदारी के साथ चीन दुनिया का सबसे बड़ा ऊर्जा उपभोक्ता है। इसके साथ ही यह दुनिया में ऊर्जा का सबसे बड़ा शुद्ध आयातक भी है। चीन की कुल ऊर्जा जरूरतों के 16 फीसदी की पूर्ति आयात से ही होती है। इसकी पूर्ति मुख्‍यत: तेल और प्राकृतिक गैस के आयात से होती है जिनकी हिस्‍सेदारी क्रमश: 61 फीसदी और 30 फीसदी है।

यही नहीं, बीपी एनर्जी आउटलुक 2035 (बीपी आउटलुक) में यह अनुमान व्‍यक्‍त किया गया है कि चीन के तेल एवं गैस आयात की हिस्सेदारी वर्ष 2035 में क्रमश: 79 फीसदी और 40 फीसदी बढ़ जाएगी, जो उसकी अक्षुण्‍ण ‘गोइंग आउट रणनीति’ को दर्शाती है। यह बड़ी अच्छी तरह से चीन की ऊर्जा सुरक्षा में एकीकृत है। विदेश में अपने निवेश को बढ़ावा देने के लिए चीनी सरकार द्वारा वर्ष 1999 में शुरू की गई इस रणनीति से चीन को आक्रामक तरीके से विदेश में तेल और गैस की तलाश करने में निरंतर काफी मदद मिल रही है।

हालांकि, बीपी आउटलुक से यह पता चलता है कि चीन ‘अप्रिय’ जीवाश्म ईंधनों जैसे कि कोयला और तेल की खपत में कमी करके कम कार्बन की मात्रा वाले ईंधनों की दिशा में अपने कदम निरंतर बढ़ाता जा रहा है। उदाहरण के लिए, चीन के ऊर्जा मिश्रण में कोयले की हिस्सेदारी वर्ष 2015 के 64 फीसदी से घट‍कर वर्ष 2035 में 42 फीसदी के स्‍तर पर आ जाएगी। वहीं, तेल के मामले में इसकी हिस्‍सेदारी इसी अवधि में 18 फीसदी से मामूली बढ़कर 20 फीसदी के स्‍तर पर पहुंच जाने का अनुमान है। दिलचस्प बात यह है कि इस लक्षित अवधि के दौरान स्वच्छ ऊर्जा ईंधनों एवं नवीकरणीय ऊर्जा की मांग में भारी वृद्धि होने का अनुमान है और ऐसा होने पर चीन की मौजूदा ऊर्जा रणनीति में काफी बदलाव आना तथा कार्बन उत्सर्जन पर काफी हद तक अंकुश लगना तय है। मांग में सर्वाधिक वृद्धि का अनुमान प्राकृतिक गैस (186%), नवीकरणीय या अक्षय ऊर्जा (695%) और परमाणु ऊर्जा (644%) में लगाया गया है।

चूंकि वर्ष 2007 में अमेरिका को भी पीछे छोड़ने के बाद से ही चीन अब भी कार्बन डाइऑक्साइड का सबसे बड़ा उत्सर्जक है, इसलिए यह उसकी जिम्‍मेदारी है कि वह कम कार्बन उत्‍सर्जन वाले पथ पर ही चले।

कम कार्बन उत्‍सर्जन वाली अर्थव्यवस्था की दिशा में हाल ही में उन्‍मुख होने के पीछे सबसे बड़ा कारक पेरिस समझौता है, जिसे जलवायु वार्ताओं में मील का पत्थर माना जाता है। चीन सहित विश्‍व भर के देशों ने राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित अपने योगदान (एनडीसी) को पेश करते हुए दिसंबर 2015 में पेरिस में आयोजित जलवायु परिवर्तन पर संयुक्त राष्ट्र फ्रेमवर्क कन्वेंशन (यूएनएफसीसीसी) से जुड़ी कांफ्रेंस ऑफ द पार्टीज (सीओपी21) में अंतरराष्ट्रीय जलवायु समझौते का बाकायदा अनुमोदन कर दिया। चीन के एनडीसी के तहत वर्ष 2030 के आसपास या उससे पहले ही चरम कार्बन उत्सर्जन को प्राप्त कर लेने; जीडीपी की प्रति इकाई कार्बन डाइऑक्साइड के उत्सर्जन में वर्ष 2005 के स्तर के मुकाबले 60 फीसदी से लेकर 65 फीसदी तक की कमी करने और प्राथमिक ऊर्जा मिश्रण में गैर जीवाश्म ईंधनों की हिस्सेदारी को बढ़ाकर लगभग 20 फीसदी करने का लक्ष्‍य रखा गया है।

कोयले के उपयोग को नियंत्रित करने और पवन एवं सौर ऊर्जा की क्षमता में वृद्धि करने के लक्ष्य को लागू करने और इसके साथ ही प्राकृतिक गैस की हिस्सेदारी बढ़ाने के लिए किए जा रहे प्रयास बीपी आंकड़े 2016 में पहले से ही स्पष्ट हैं। प्राथमिक ऊर्जा मिश्रण में गैर जीवाश्म ईंधनों की खपत में उल्‍लेखनीय वृद्धि हुई है। आंकड़े इस बात के गवाह हैं। दरअसल, वर्ष 2015 में सालाना आधार पर परमाणु एवं नवीकरणीय ऊर्जा में क्रमश: 28.9 फीसदी और 20.9 फीसदी की वृद्धि दर्ज की गई। प्राकृतिक गैस की खपत की हिस्सेदारी में भी बढ़त का रुख देखा गया है। वर्ष 2010 से लेकर अब तक इसमें 77 फीसदी से भी अधिक की वृद्धि दर्ज की गई है।

निवेश और विनिर्माण पर आधारित चीन के पुराने आर्थिक मॉडल की बदौलत यह देश पिछले तीन दशकों के दौरान आर्थिक विकास दर को दहाई अंकों में बनाए रखने में कामयाब रहा। यही नहीं, इसके परिणामस्‍वरूप चीन में ऊर्जा की मांग पिछले 20 वर्षों में प्रति वर्ष 6 फीसदी की दर से बढ़ी है। हालांकि, पुराने आर्थिक मॉडल का पुनर्गठन करने के लिए हाल ही में किए गए प्रयासों और ज्‍यादा स्‍वच्‍छ एवं कम कार्बन ईंधन यानी कम ऊर्जा खपत और उत्सर्जन वाली अर्थव्‍यवस्‍था को अपनाने की नीतिगत प्रतिबद्धता से चीन को अपने पुराने विकास मॉडल को एक ‘नए सामान्‍य’ मॉडल में उन्नयन करने में मदद मिली है।

निवेश और विनिर्माण पर आधारित चीन के पुराने आर्थिक मॉडल की बदौलत यह देश पिछले तीन दशकों के दौरान आर्थिक विकास दर को दहाई अंकों में बनाए रखने में कामयाब रहा।

अत: अभिनव उपायों के जरिए कच्‍चे माल (इनपुट) की मात्रा के बजाय इनपुट की दक्षता पर आधारित एक नए विकास मॉडल को अपनाने के लिए किए जा रहे हालिया प्रयासों से चीन को अपनी ऊर्जा मांग पर अंकुश लगाकर इसे मौजूदा 6 फीसदी वार्षिक से घटाकर महज 2 फीसदी वार्षिक के स्‍तर पर लाने में मदद मिल सकती है, जैसा कि बीपी आउटलुक में उल्‍लेख किया गया है।

 हालांकि, चीन को अपनी मौजूदा तेल संबंधी महत्वाकांक्षाओं और कम कार्बन उत्‍सर्जन पर आधारित विकास की दिशा में तेजी से कार्य करने की आवश्यकता को ध्‍यान में रखते हुए बड़ी ही सावधानी के साथ कदम उठाने पड़ेंगे। तेल के मौजूदा कम मूल्‍य और इसके रणनीतिक भंडार के लिए तेल एकत्रित करने की आवश्यकता को देखते हुए ज्‍यादा ऊर्जा और उत्सर्जन पर आधारित विकास से छुटकारा पाने की उसकी इच्‍छा पूरी नहीं हो पाएगी।

राष्ट्रीय विकास एवं सुधार आयोग (एनडीआरसी) और राष्ट्रीय ऊर्जा प्रशासन (एनईए) द्वारा जनवरी 2017 में जारी की गई संदिग्ध ऊर्जा योजनाओं के जरिए तेल आयात पर अपनी निर्भरता बढ़ाकर चीन अब भी आग के साथ खेल रहा है। तदनुसार, वर्ष 2020 के लिए निर्धारित किया गया चीन का तेल उत्पादन लक्ष्‍य चार मिलियन बैरल प्रतिदिन (एमबीपीडी) है, जो वर्ष 2015 की तुलना में 6.8 फीसदी कम है। वहीं, इसी अवधि के दौरान शुद्ध तेल आयात में 17 फीसदी की वृद्धि होने का अनुमान है। दूसरे शब्दों में, अगले पांच वर्षों की अवधि के दौरान चीन में तेल खपत की पूर्ति लगभग पूरी तरह तेल आयात से ही होगी। मध्य-पूर्व और अफ्रीका में राजनीतिक दृष्टि से कमजोर देशों पर उसकी बढ़ती निर्भरता को देखते हुए इन घटनाक्रमों से न केवल चीन के ऊर्जा सुरक्षा लक्ष्य, बल्कि कम ऊर्जा खपत वाले तरीकों के जरिए आर्थिक बदलाव सुनिश्चित करने की प्रक्रिया भी खतरे में पड़ती जा रही है।

अत: ऊर्जा सुरक्षा के प्रति चीन के भू-राजनीतिक दृष्टिकोण और उसके प्राथमिक ऊर्जा मिश्रण में गैर-जीवाश्म ईंधनों की हिस्सेदारी बढ़ाने के लिए उसके प्रयासों के सह-अस्तित्व से ही चीन की अर्थव्यवस्था को कार्बन मुक्‍त करने के उसके इरादे की परीक्षा होगी। इस रणनीति की शुरुआत वर्ष 1990 के दशक के उत्‍तरार्द्ध में हुई थी। उस समय तेल की कीमतों में भारी उछाल की परवाह किए बगैर ही इस रणनीति पर अमल किया जा रहा था। वर्ष 2003 में सत्तारूढ़ चीनी कम्युनिस्ट पार्टी (सीसीपी) के तत्कालीन अध्यक्ष और महासचिव हू जिंताओ ने ‘मलक्का दुविधा’ शब्‍द के जरिए चीन की ऊर्जा सुरक्षा संबंधी चिंताओं को व्यक्त किया था। तथ्य यह है कि चीन की ऊर्जा के 80 फीसदी का प्रवाह मलक्का जलडमरूमध्य के जलमार्ग के जरिए होता है, अत: ऐसे में इसके थम जाने का भारी खतरा है, जो चीन की ऊर्जा सुरक्षा संबंधी चुनौती को दर्शाता है।

अपनी ऊर्जा आपूर्ति को लेकर चीन की असुरक्षा उसकी नई ‘वन बेल्‍ट वन रोड’ (ओबीओआर) पहल में भी प्रतिबिंबित होती है।

हालांकि, अपने डर को दूर करने के लिए चीन को कई वैश्विक ऊर्जा संस्थानों जैसे कि अंतर्राष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी के साथ अपने सहयोग को गहन करना चाहिए और वैश्विक ऊर्जा बाजार के साथ एकीकृत करके इसके साथ अपनी हालिया सहभागिता से लाभ उठाना चाहिए। इससे चीन को न केवल बाह्य आपूर्ति और मूल्‍य संबंधी झटकों से खुद को बचाने में मदद मिलेगी, बल्कि इससे चीन को ऊर्जा उत्पादकों एवं खरीदारों तक अपनी पहुंच बढ़ाने में भी सहायता मिलेगी। उदाहरण के लिए, ऊर्जा खरीदारों के साथ तालमेल बढ़ाने से ऊर्जा जैसे कि तरलीकृत प्राकृतिक गैस (एलएनजी) की खरीद लागत को काफी कम करने में मदद मिल सकती है और इसके साथ ही वह स्‍वच्‍छ जीवाश्म ईंधन ‘प्राकृतिक गैस’ का अधिक से अधिक उपयोग करके अपने स्वच्छ ऊर्जा लक्ष्यों को बरकरार भी रख सकता है।

इसके अलावा, चीन ऊर्जा प्रौद्योगिकी नवाचार से जुड़ी अपनी मुख्य ताकत पर अच्छी तरह से काम करेगा जिसकी बदौलत चीन पहले ही दुनिया के सबसे बड़े पवन ऊर्जा बाजार में तब्‍दील हो चुका है और इसके साथ ही वह सोलर फोटोवोल्टिक बैटरियों एवं पनबिजली का सबसे बड़ा उत्पादक भी बन गया है। इन दिशाओं में किए गए प्रयासों से चीन को छोटी सी अवधि में ही किसी भी अन्य देश की तुलना में अपने यहां अधिक लोगों को बिजली सुलभ कराने में मदद मिली है। यही नहीं, चीन की इन शानदार उपलब्धियों से पूरी दुनिया का लाभान्वित होना भी तय है।

चीन ने अपने नए ऊर्जा विजन के तहत इस दिशा में एक कदम आगे बढ़ाया है। यह विजन चीन के पूर्व राष्ट्रपति हू जिंताओ ने वर्ष 2006 में सेंट पीटर्सबर्ग में आयोजित जी-8 शिखर सम्मेलन के दौरान पेश किया था। जिंताओ ने ऊर्जा का निर्यात करने वाले और ऊर्जा की खपत करने वाले देशों के बीच तेल और गैस की आपूर्ति पर अधिक से अधिक अंतरराष्ट्रीय सहयोग सुनिश्चित करने का आह्वान किया और इसके साथ ही उन्‍होंने ऊर्जा सुरक्षा के कम राजनीतिकरण के जरिए सुरक्षित ऊर्जा परिवहन मार्गों को सुनिश्चित करने पर भी विशेष जोर दिया। आईईए के साथ संबद्ध होने के अलावा चीन विभिन्‍न प्लेटफार्मों जैसे कि बीस देशों के समूह (जी20), अंतर्राष्ट्रीय ऊर्जा फोरम, संयुक्त तेल डेटा पहल (जोड़ी), ऊर्जा चार्टर संधि संगठन और शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) का उपयोग करके अपने खुद के टिकाऊ स्वच्छ ऊर्जा एजेंडे को नया स्‍वरूप प्रदान करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है, जो यद्यपि दरअसल कोई एनर्जी गवर्नेंस प्‍लेटफॉर्म नहीं है, लेकिन एशिया में ऊर्जा संबंधी सहयोग के लिए इसमें व्‍यापक गुंजाइश है।

इससे चीन को ऊर्जा सुरक्षा के प्रति अपने पुराने भू-राजनीतिक दृष्टिकोण से खुद का पीछा छुड़ाने तथा इसके साथ ही वैश्विक ऊर्जा मूल्य श्रृंखला में अपने एकीकरण के लिए और ज्‍यादा गुंजाइश की पेशकश करने में भी मदद मिलेगी।

ये लेखक के निजी विचार हैं।

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