• Dec 06 2016

क्या मोदी विमुद्रीकरण से राजनीति में धनशक्ति की नकेल कसेंगे?

काले धन पर घातक प्रहार करने का यह सुनहरा मौका है। इसके लिए चुनाव अभियानों की फंडिंग को पारदर्शी करना होगा।

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₹500 और ₹1,000 के नोट बदलने के लिए एक बैंक के बाहर कतार।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विमुद्रीकरण यानी नोटबंदी के मास्टर स्ट्रोक का लक्ष्य काले धन के नकद प्रवाह पर रोक लगाना है जिसके कई सकारात्मक परिणाम हो सकते हैं

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विमुद्रीकरण यानी नोटबंदी के मास्टर स्ट्रोक का लक्ष्य काले धन के नकद प्रवाह पर रोक लगाना है जिसके कई सकारात्मक परिणाम हो सकते हैं । सरकार का दावा है कि विमुद्रीकरण से आतंकवादी और भूमिगत नक्सल गतिविधियों के लिए की जाने वाली फंडिंग पर रोक लगेगी। इस बात का भी 'जोर—शोर' से दावा किया जा रहा है कि 500 और 1,000 रुपए के नोट बंद किए जाने से राजनीतिक पार्टियों को मिलने वाले तथा चुनाव में खर्च होने वाले काले धन पर भी रोक लगेगी। राजनीतिक फंडिंग पर नजर रखने वाले विश्लेषकों को मानना है कि चूंकि भारत में चुनावों में धन की सबसे अहम भूमिका रहती है इसलिए विमुद्रीकरण के इस अभियान का नकद प्रवाह पर कुछ असर पड़ेगा। इस दावे की सबसे जोरदार पैरवी स्वयं देश के वित्त मंत्री श्री अरूण जेटली ने की है। बकौल जेटली, ''विमुद्रीकरण का राजनीतिक प्रभाव होगा, भाजपा सहित सभी राजनीतिक दलों को मिलने वाला राजनीतिक चंदा अब पारदर्शी हो जाएगा....'' प्रधानमंत्री ने विपक्षी दलों से आग्रह किया है कि वे इस बात पर विचार करें कि राजनीतिक पार्टियों को सरकार द्वारा फंडिंग का विकल्प कितना युक्तिसंगत है।

उनके इस आग्रह के चलते ही अब तक उपेक्षित लेकिन देश में लोकतंत्र की सेहत के लिए महत्वपूर्ण सार्वजनिक नीति से जुड़ा यह मुद्दा एक बार फिर सार्वजनिक बहस के केंद्र में है।

क्या विमुद्रीकरण से राजनीतिक पार्टियों और उम्मीदवारों को मिलने वाले काले धन की नकेल कसी जा सकेगी? क्या चुनाव अभियानों में पैसे को लेकर पारदर्शिता के अभाव जैसे विषय का समाधान निकल पाएगा जो हमारे लोकतंत्र को विकृत कर रहा है ? यह निश्चित है कि निकट भविष्य में 500 और 1,000 रुपए के नोट बंद होने से चुनाव के दौरान पैसे के खेल (पार्टी को मिलने वाले पैसे पर उतना नहीं) पर कुछ प्रभाव पड़ेगा। जिन पांच राज्यों में अगले साल की शुरूआत में चुनाव होने हैं वहां उच्च मूल्य वाले नोट बंद होने से नकदी की किल्लत हो सकती है। गौरतलब है कि ये नोट कुल करंसी का 86 प्रतिशत हैं और आने वाले कई महीनों तक उनकी आपूर्ति पर्याप्त मात्रा में नहीं होगी। चुनाव में काम करने वाले कार्यकर्ताओं और वेंडर्स को भुगतान करने के लिए नकदी को लेकर मारा—मारी रहेगी। अब इस बात के पुख्ता दस्तावेजी प्रमाण हैं (जो गाहे—बगाहे ही एकत्र हुए) कि भारत में चुनावों में विशाल मात्रा में धनराशि (पिछले आम चुनावों में 6 अरब डॉलर तक) खर्च की जाती है। वर्ष 2014 में तमिलनाडु के विधानसभा चुनावों में 300 करोड़ रुपए की नकदी चुनाव आयोग ने जब्त की थी। इससे पता चलता है कि भारत में चुनावों में पैसा निर्णायक भूमिका निभाता है। इसलिए इस बात में शक नहीं कि उच्च मूल्य वाले नोट बंद करने का प्रभाव आगामी चुनावों में काले धन के इस्तेमाल पर होगा।

लेकिन दीर्घकाल में काले धन पर अधारित चुनाव अभियानों को शायद विमुद्रीकरण से ज्यादा फर्क नहीं पड़ेगा। चुनाव अभियानों से जुड़े साहित्य पर करीबी नजर डाली जाए तो पता चलता है कि सभी लोकत़ांत्रिक देशों में राजनीतिक पार्टियां नियम कायदों को धता बताने का जुगाड़ ढूंढ लेती हैं। राजनीतिक पार्टियों का आर्थिक व बिज़नेस क्षेत्रों पर काफी प्रभाव रहता है और उद्योगपतियों तथा राजनतेओं के बीच के गठबंधन को हम सभी जानते हैं (क्योंकि सरकारों के पास प्रशासनिक और नियमन संबंधी निर्णयों को लेकर अधिकतम अधिकार होते हैं)। इस तरहं पार्टियां विभिन्न माध्यमों से फायदा लेने की स्थिति में रहती हैं। उदाहरण के तौर पर चुनावी खर्च की सीमा से निपटने के लिए उम्मीदवार यह दिखा सकते हैं उनकी प्रचार सामग्री और कार्यकर्ताओं के खर्च का भुगतान व्यवसायी समूहों और उनके समर्थकों ने किया। मतलब यह कि नकदी की कमी के बावजूद अपनी मर्जी से चुनाव अभियान चलाने के कई विकल्प पार्टियों व उम्मीदवारों के पास मौजूद हैं। महत्वपूर्ण बात यह है कि 500 और 2000 रुपए के नए नोट राजनीतिक पार्टियों और उम्मीदवारों का खजाना भरने के लिए फिर से उसी नकदी प्रवाह को कायम कर देंगे। इसलिए हम कह सकते हैं कि निकट भविष्य में काले धन के प्रवाह पर विमुद्रीकरण का असर नाम—मात्र का ही होगा।

चुनाव अभियानों में साफ सुथरे धन का शार्ट—कट नहीं

अगर काले अथवा बेहिसाब धन पर निर्भरता से लोकतंत्र को निजात दिलानी है तो भारत को अपने दकियानूसी वित्त कानूनों और गैर पारदर्शी संस्थागत व्यवस्था में परिवर्तन करने होंगे। पारदर्शिता और जवाबदेही को बढ़ावा देने के लिए जबरदस्त फेरबदल की जरूरत है। एक प्रमुख लोकतंत्र के रूप में भारत में चुनावी अभियान के वित्तीय पक्ष का नियमन करने वाले कानून—कायदे बहुत कमजोर हैं। न ही भारत के पास ऐसी सक्षम संस्थाएं हैं जो इस खेल के नियमों पर कड़ाई से अमल करवा सकें। चुनाव अभियानों के लिए जरूरी खर्च से जुड़ी व्यवस्था में आमूल चूल परिवर्तन इतनी आसानी और जल्दी होने वाला काम नहीं है, पर मौजूदा सरकार फौरी तौर पर कुछ ऐसे कदम उठा सकती है जिससे भ्रष्टाचार और काले धन के खिलाफ जंग का दायरा बढ़ाया जा सकता है। यह कहा जा सकता है कि चुनाव अभियानों में धन की भूमिका को लेकर पारदर्शिता और जवाबदेही का अभाव कालेधन का सबसे बड़ा स्त्रोत है।

शुरूआत करने के लिए मोदी सरकार आयकर अधिनियम, 1961 की धारा 13 ए (प्रावधान बी) को समाप्त कर सकती है। इस धारा को 2003 में (चुनाव व अन्य संबंधित कानून अधिनियम, 2003 लाने के लिए समझौते के तौर पर) जोड़ा गया था। यह प्रावधान विकृत ढंग से राजनीतिक दलों द्वारा बिना स्त्रोत बताए 20,000 रुपए से कम की धनराशि की उगाही की अनुमति देता है। ज्यादातर राजनीतिक दलों के पास 75 फीसदी से ज्यादा राशि इसी रास्ते से पहुंचती है। नियमों में इस कमी का इस्तेमाल लगभग सारी अवैध धनराशि को अपनी मंजिल तक पहुंचाने के लिए किया जाता है। कानूनन देखा जाए तो राजनीतिक दलों को मिलने वाली हर दानराशि के स्त्रोत की जानकारी उपलब्ध होनी चाहिए। यह जानकारी सार्वजनिक तौर पर उपलब्ध होनी चाहिए ताकि व्यवस्था के प्रहरी और विरोधी इसे किसी भी कसौटी पर कस सकें।

साथ ही उम्मीदवारों के चुनावी खर्च की मौजूदा अधिकतम सीमा की भी तुरंत दोबारा समीक्षा करना जरूरी है। मनमर्जी से तय की गई सीमा जिसका चुनावी खर्च से जमीनी वास्ता नहीं है अंतत: राजनीतिक उम्मीदवारों द्वारा किए जाने वाले अघोषित खर्च का सबसे बड़ा कारण है। पूर्व प्रधानमंत्री श्री अटलबिहारी वाजपेयी ने कहा था, ''हर चुना हुआ उम्मीदवार अपने करियर की शुरूआत ही चुनावी खर्च की गलत जानकारी देकर करता है।'' चुनावों में उम्मीदवार को कितना भी पैसा खर्च करने की छूट होनी चाहिए बशर्ते वो अपने खर्च के स्त्रोत बताने के लिए राजी है।

इन शुरूआती कदमों के अलावा मोदी सरकार को श्रृंखलाबद्ध ढांचागत सुधार लाने के लिए कई कदम उठाने की जरूरत है जिससे व्यवसाय और राजनीति के गठजोड़ को तोड़ा जा सके। ऐसा बहुत सा साहित्य है जो आर्थिक सुधारों के दौर में व्यवसाय औ राजनीति के बीच व्यापक स्तर पर''इस हाथ ले, उस हाथ दे'' के सिद्धांत पर आधारित संबंधों का खुलासा करता है। एक ओर 'ब्रीफकेस' राजनीति है जिसके तहत हमने चुनिंदा व्यवसाय समूहों को कुछ खास नेताओं को दिल खोलकर मदद करते हुए देखते हैं, इसके बदले में ये राजनेता उनकी मदद करते हैं। दूसरी ओर हमने पूरे राजनीति अभियानों को फंडिंग(मसलन कर्नाटक में रेड्डी बंधुओं द्वारा) करते हुए देखा है। इस प्रकार उद्योग जगत यां बिज़नेस की दुनिया से राजनीतिज्ञों व पार्टियों को मिलने वाला धन भारतीय लोकतंत्र के लिए सबसे बड़ी चुनौती के रूप में उभरा है। हमने राडिया टेप कांड और 2जी तथ कोलगेट जैसे चर्चित मामलों में देखा है कि किस प्रकार स्पेक्ट्रम से लेकर प्रमुख मंत्री पद तक सब कीमत मिलने पर बिकने के लिए तैयार थे। ऐसे में हैरानी नहीं होनी चाहिए कि राजनीतिक दलों के कोष का एक बड़ हिस्सा, लगभग 87 प्रतिशत, निजी व्यवसायियों से आता है। कम्पनी अधिनियम 2013 में हाल ही में कुछ संशोधन इस दिशा में एक अच्छा प्रयास है। अब निजी कंपनियां राजनीतिक चंदा पारदर्शी ढंग से दे सकती हैं और उन्हें कर में इससे लाभ भी मिलता है। लेकिन सरकार के पास अभी भी आर्थिक मामलों को लेकर इतने ज्यादा अधिकार है कि व्यवसायी राजनीतिक पार्टियों के साथ 'मेज के नीेचे' वाली सौदेबाजी करने को मजबूर हो जाते हैं।

सवाल ये है कि क्या सरकार आर्थिक क्षेत्र के पक्ष में अपनी अतिशय प्रशासनिक व नियमन संबंधी शक्तियां त्यागने को तैयार है?

चुनाव अभियानों को पैसे की ताकत से मुक्ति दिलाने की भारतीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी समस्या का एक समाधान समस्त राजनीतिक गतिविधियों के लिए (केवल चुनाव अभियानों तक सीमित नहीं) सार्वजनिक धन मुहैया करवाना है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को इस बात का श्रेय देना होगा कि उन्होंने राजनीतिक दलों से इस महत्वपूर्ण चुनावी सुधार पर चर्चा करने का आह्वान किया लेकिन राजनीतिक दलों को राज्य के धन से चलाना अत्यंत जटिल नीतिगत क्षेत्र है। राज्य द्वारा धनराशि उपलब्ध करवाए जाने के पक्ष में 1998 में आई इंद्रजीत गुप्ता समिति की रिपोर्ट ने कई तर्क दिए हैं मसलन इससे सभी राजनीतिक दलों को 'लेवल—प्लेइंग फील्ड' मिलेगा, खासकर उन दलों को जिनका वित्तीय आधार छोटा है;चुनाव में गैरकानूनी/पराधिक पैसे निर्भरता घटेगी,नियमों का पालन ज्यादा बेहतर होगा और पारदर्शिता बढ़ेगी। राज्य द्वारा धनराशि उपलब्ध करवाए जाने के कई लाभ हैं पर साथ ही इससे कई दिक्कतें भी हो सकती हैं, खासकर इससे राजनीति दलों में लापवरवाही काफी बढ़ सकती है, पार्टियों और दानकर्ताओं(सदस्यों) में संबंधहीनता की स्थिति बन सकती है। इसके अलावा स्वतंत्र व छोटी पार्टियों को यह सहायता उपलब्ध करवाने और पार्टियों की संख्या में तेजी से वृद्धि जैसे मसले भी हैं। लंकिन इसके बावजूद यह एक महत्वपूर्ण विचार है और इस पर काम होना चाहिए हालांकि जैसा कि मुख्य चुनाव आयुक्त नसीम जैदी ने कहा है कि राज्य द्वारा फंडिंग पर तब तक विचार नहीं होना चाहिए जब तक कि इसके साथ ही पार्टियों के अंदरूनी काम—काज में सुधार, राजनीति में अपराधीकरण से मुक्ति, सही जानकारी देने संबंधी मजबूत कानून तथा चुनाव नियमों पर अमल के लिए एक सख्त कानूनी व्यवस्था पर अमल नहीं होता है।

नियमन करने वाली संस्थाओं का अभाव

अंत में, चुनावी कानूनों पर सख्ती से अमल हो इसके लिए भारत को यां तो चुनाव आयोग का मूलभूत सशक्तिकरण करना होगा यां फिर अन्य कई परिपक्व लोकतंत्रों की तर्ज पर एक स्वतंत्र नियामक की स्थापना करनी होगी। मौजूदा स्वरूप में भारत के चुनाव आयोग के पास चुनाव अभियानों में वित्तीय नियमों को लागू करवाने के लिए न तो उचित क्षमता है और न पर्याप्त शक्तियां। इसका सबसे बड़ा उदाहरण यह है कि हाल—फिलहाल में चुनाव आयोग एक भी उम्मीदवार को इस आरोप में अयोग्य नहीं घोषित कर पाया है कि उसने चुनावी नियमों के पालन में धोखाधड़ी की यां खर्च की सीमा का उल्लंघन किया।

यहां तक कि राजनीतिक पार्टियों द्वारा अपने खर्च का ब्यौरा दाखिल न करने यां पैसे के इस्तेमाल में गड़बड़ी जैसे छोटे—मोटे मसलों को लेकर भी चुनाव आयोग को न्यायपालिका का दरवाजा खटखटाना पड़ता है। इस प्रकार 45 मान्यता प्राप्त पार्टियों में से 29 ने 30 नवंबर, 2014 की अंतिम तिथि तक राजनीतिक चंदे की अपनी रिपोर्ट आयोग के पास दाखिल नहीं की थी। पर इसके बाद चुनाव आयोग उन्हें इस बारे में केवल बार बार याद दिलाता रहा और कुछ नहीं कर सका। एक संवैधानिक संस्था को जन प्रतिनिधि कानून के छोटे से छोटे उल्ल्ंघन से निपटने के लिए सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाना पड़ता है। ऐसे में इस संस्था की क्षमता और चुनावों में धन के दुरूपयोग पर अंकुश लगाने को रोकने के प्रति इसके उत्साह का अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं है। इसलिए भारत को बिना और देर किए एक संघीय चुनाव आयोग की जरूरत है—एक ऐसी एजेंसी जिसका काम खर्च संबंधी दी गई गई जानकारी और की गई विभिन्न घोषणाओं का सत्यापन करना, नियमों को उल्लंघन करने वालों को दंडित करना और राजनीतिक पार्टियों क्षरा किए गए खर्च पर लगातार नजर रखना है।

अब मोदी सरकार के पास सुनहरा मौका है कि अब तक चले आ रहे ढर्रे को बदल दे और राजनीतिक दलों के अंदर भी साफ—सफाई के लिए लीक से हटकर कदम उठाए जिससे विमुद्रीकरण के प्रभाव को और बढ़ाया जा सके। अगर किसी सरकार में विमुद्रीकरण जैसे साहसिक और राजनीतिक दृष्टि से खतरे से भरपूर कदम उठाने का दम—खम है तो चुनाव अभियान में धन की भूमिका दुरूस्त करना इससे कहीं ज्यादा आसान है। इस दिशा में सबसे स्पष्ट संकेत यही होगा कि सरकार केंद्रीय सूचना आयोग के 2012 के उस निर्णय को आगे ले जाए जिसमें सभी राजनीतिक पार्टियों को सूचना का अधिकार अधिनियम के अंतर्गत लाने की बात कही गई थी। देश की राजनीतिक व्यवस्था को बुरी तरहं से प्रभावित करने वाले भ्रष्टाचार और काले धन से लड़ने की दिशा में यह कदम बाजी पलटने वाला साबित हो सकता है।


For an exhaustive read on corporate funding of elections, see ORF Issue Brief, Corporate Funding of Elections: The Strengths and Flaws, by Samya Chatterjee and Niranjan Sahoo.

 

ये लेखक के निजी विचार हैं।

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