• Apr 05 2017

क्यों है कोको द्वीपसमूह पर नजर रखने की जरूरत

अंडमान के उत्तर में स्थित कोको द्वीपसमूह भारत और म्यांमार दोनों के लिए रणनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है। पिछले चार दशकों से चीन इस द्वीप में गहरी दिलचस्पी ले रहा है।

रणनीति, भारत, महत्वपूर्ण, कोको द्वीप, द्वीप समूह, अंडमान, म्यांमार
स्रोत: फ़्लिकर उपयोगकर्ता अमरे

बंगाल की खाड़ी और अंडमान सागर म्यामांर के लिए भी भारत जितने ही महत्वपूर्ण हैं। ज्यादातर समुद्री संचार श्रृंखलाएं (एसएलओसी) इन दोनों सागरों से होकर गुजरती हैं। अंडमान के उत्तर में स्थित कोको द्वीपसमूह भारत और म्यांमार दोनों के लिए रणनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है। पिछले चार दशकों से चीन इस द्वीप में गहरी दिलचस्पी ले रहा है। उसके पास बंगाल की खाड़ी और हिंद महासागर में भारतीय मिसाइल प्रक्षेपणों पर नजर रखने के लिए संभवतः एसआईजीआईएनटी सुविधा है। हवाई पट्टी को भी चीन का निर्माण समझा जाता है। म्यांमार की तटीय रेखा को हिंद महासागर क्षेत्र (आईओआर) में बहुत से लोगों द्वारा चीन का दूसरा तट कहा जाता है।

हाल ही में कोको द्वीपसमूह पर होने वाली गतिविधियों में तेजी देखी गई है। आईओआर में चीन की महत्वाकांक्षाओं और उसके निरतंर विस्तारवाद के मद्देनजर, आईओआर विशेषकर कोको द्वीपसूमह में हो रही सभी गतिविधियों की निगरानी करने की भीषण आवश्यकता है। हमने गूगल अर्थ (जीई) सेटेलाइट इमेजरी के माध्यम से म्यांमार की पिछले एक साल की गतिविधियों की टोह लेने का प्रयास किया है।

भूमिसुधार

म्यांमार ने हवाई पट्टी के संभावित विस्तार के लिए 400 मीटर गुना 900 मीटर के क्षेत्र को सक्रियता के साथ उपयोगी बनाया है। क्षेत्र को उपयोगी बनाने के लिए सीमेंट के ब्लॅाक्स के निर्माण, साथ ही साथ खम्बों के निर्माण और विस्तार के लिए (अगले अनुच्छेद में चर्चा की गई है) एक विशाल सीमेंट मिक्सिंग प्लांट लगाया गया है। तटीय रेखा को और ज्यादा मजबूत बनाने के लिए बहुत बड़ी मात्रा में टेट्रा-पोड्स को वहां डाला गया है। हवाई पट्टी के उत्तरी छोर में 470 मीटर लम्बी और 7 मीटर मोटाई वाली रिटेनिंग वॉल का निर्माण किया गया है।

map-1

हवाई पट्टी का विस्तार

कोको द्वीप समूह की हवाई पट्टी में पिछले दशक भर में 1,300 मीटर से 1,800 मीटर से 2,000 मीटर से मौजूदा 2,300 मीटर तक विस्तार किया गया है। उपयोग में लाने लायक भूमि से लगता है कि इसे दोनों सिरों की तरफ 200 मीटर बढ़ाकर 2500 मीटर तक बढ़ाया जा सकता है। दक्षिणी छोर से सटी एक पहाड़ी को काटकर अतिरिक्त 1000 मीटर क्षेत्र तैयार किया गया है। खुदाई से निकली मिट्टी का उपयोग संभवत: क्षेत्र को उपयोगी बनाने के उपायों में किया जा सकता है। वर्ष 2006-13 के बीच एप्रॅन का निर्माण किया गया। इसका आकार अब बढ़कर 125 मीटर गुना 180 मीटर हो चुका है। रिसैप्शन बिल्डिंग के साथ कंट्रोल टॉवर बनाया गया है।

map-2

map-3

नया नौसैनिक सेतुबंध

कोको द्वीप के पूर्वोत्तटर छोर पर एक विशाल नौसैनिक सेतुबंध (100 मीटर गुना 55 मीटर) का निर्माण किया जा रहा है। ऐसा आकलन किया गया है कि इस सेतुबंध का उपयोग इंफ्रास्ट्रक्चर से संबंधित सामग्री को उतारने में किया जाएगा। देर-सवेर इस सेतुबंध की दोनों ओर संभवतः दो क्रेनें होंगी।

map-4

पिछले साल फरवरी में भारत के साथ द्विपक्षीय नौसैनिक अभ्यास ‘सी शील्ड 2016’ के दौरान यहां बड़े पैमाने पर नौसैनिक मौजूदगी देखी गई। 26 फरवरी, 2016 को नए सेतुबंध पर पांच युद्ध पोत, एक स्टेल्थ शिप, एक एफएसी मिसाइल और एक हॉस्पिटल शिप प्रदर्शित किए गए। चार पोत, स्टेल्थ शिप और हॉस्पिटल शिप यांगून नेवल कंस्ट्रक्शन यार्ड में स्वदेशी तरीके से तैयार किए गए। इस निर्माण में, विशेषकर इन पोतों पर सी-802 मिसाइले लगाने के काम में मोटे तौर पर चीन ने सहायता दी। यह नौसैनिक अभ्यास भारत की ‘एक्ट ईस्ट’ पॉलिसी का भाग समझी जाती है, जिसमें मौजूदा सरकार ने नार्कोन्डेम द्वीप में राडार स्टेशन को भी मंजूरी दी है।

map-5

 राडार स्टेशन     

कोको द्वीप के शीर्षतम स्थान, समुद्र तल से 91 मीटर ऊपर एक नए राडार स्टेशन का निर्माण किया गया है। इस स्टेशन में 11.5 मीटर व्यास का रेडोम है, जिसमें संभवतः मुख्य राडार है। इसमें राडार व्हीकल्स को खड़ा करने के लिए दो व्हीकल शैड्स (11मीटर गुना 6.5 मीटर) भी है। राडार व्हीकल्स को तैनात करने के लिए राडोम के पश्चिम में एक प्लेटफॉर्म (15 मीटर गुना 15 मीटर आकार) है। इस राडार स्टेशन पर कम से कम तीन एसएचओआरडी गन्स देखी गई हैं। इस राडार स्टेशन का निर्माण 2014 में प्रारंभ हुआ था। डिजाइन से लगता है कि यह चीनी मूल/सहायता का है।

map-6

चिंताजनक घटनाक्रम

कोको द्वीपसमूह में नई ढांचागत सुविधाओं का विकास और मौजूदा ढांचागत सुविधाओं का विस्तार/मरम्मत चिंताजनक घटनाक्रम है। विशाल हवाई पट्टी पर सैन्य विमान उतर सकते हैं और राडार स्टेशन से श्रीलंका और मलक्का जलडमरूमध्य से प्रत्येक भारतीय गतिविधि पर नजर रखी जा सकती है, ऐसे में भारतीय हित यदि खतरे में न भी हो, तो भी सतर्क निगरानी में तो हैं ही।

इसके विपरीत, इन घटनाक्रमों के प्रति भारत की प्रतिक्रियाएं कम से कम सुस्त तो कही जा ही सकती है। नार्कोडेम द्वीपसमूह पर राडार स्टेशन के निर्माण को सरकार और पर्यावरण की दृष्टि से ढाई साल पहले से मंजूरी मिल जाने के बावजूद आज तक कोई गतिविधि नहीं हुई है।

map-7

भारत को अंडमान सागर का रणनीतिक महत्व समझने की आवश्यकता है और अंडमान में ढांचागत सुविधाओं का विकास करने की जरूरत है, ताकि उसे आईआरआर में सशक्त सैन्य और आर्थिक केंद्र बनाया जा सके। नार्कोडेम द्वीप समूह के राडार स्टेशन को भी उचित स्तरों पर ले जाने की आवश्यकता है।

ये लेखक के निजी विचार हैं।

Comments

avatar
wpDiscuz