• Feb 21 2017

कश्मीर में ‘सॉफ्ट बॉर्डर’ का विकल्प महत्वपूर्ण

कश्मीर में सॉफ्ट बॉर्डर नियंत्रण रेखा के दोनों तरफ के कश्मीरियों को बिना किसी बाधा के आने-जाने की आजादी देगा।

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ग्वादर तट का विहंगम दृष्य

Source: Wikipedia

वन बेल्ट वन रोड (ओबीओआर) के सबसे अहम तत्वों में शामिल चीन पाकिस्तान आर्थिक गलियारे (सीपीईसी) को ले कर बहुत तेजी से प्रगति हो रही है। चीन ने इसके लिए ढांचागत संसाधनों की बड़ी खेप ग्वादर बंदरगाह पहुंचा दी है और पाकिस्तान सरकार की ओर से खास तौर पर इस परियोजना से जुड़े चीनी श्रमिकों की सुरक्षा के लिए एक विशेष बल तैयार करने का फैसला कर लिया गया है। इस विशेष बल में पाकिस्तानी सेना के लोग होंगे। इससे स्पष्ट होता है कि पाकिस्तान और चीन के लिए चीजें सही पटरी पर चल रही हैं। हालांकि इसको ले कर भारत की प्रतिक्रिया अब भी बहुत ठंडी और अनिश्चितता भरी है। इस परियोजना को ले कर भारत की चिंताओं को दूर करने के लिए कुछ खास तो नहीं किया गया है, लेकिन सीपीईसी में शामिल होने का विकल्प भारत के लिए अब भी खुला है। भारत इस गलियारे का इसलिए विरोध करता रहा है, क्योंकि यह गिलगित-बाल्टिस्तान (पाक अधिकृत कश्मीर) के विवादित क्षेत्र से हो कर गुजरता है। यह इलाका पूर्ववर्ती जम्मू-कश्मीर राज के तहत पड़ता था और भारत इसे अपना मानता है। इसलिए जब तक इस मुद्दे का समाधान नहीं हो जाए, भारत की इसमें भागीदारी होने की संभावना नहीं है और ऐसे में कश्मीर की स्थिति भी उलझी हुई रहेगी।

पाकिस्तान जिस तरह कश्मीर में आतंकवाद को प्रायोजित करता है वह भी सीपीईसी में भारत के शामिल होने की दिशा में बड़ी अड़चन है। इस लिहाज से अगर कश्मीर में खुली सीमा (सॉफ्ट बॉर्डर) की धारणा को अपना लिया जाए तो कुछ रास्ता निकल सकता है।

सॉफ्ट बॉर्डर का मतलब है कि सीमा से सैन्य बलों को हटा लिया जाए और दोनों तरफ के लोग व सामान आसानी से एक तरफ से दूसरी तरफ आजा सकें। ऐसे में नियंत्रण रेखा (एलओसी) पर विभिन्न जगहों पर कई प्रवेश बिंदु बनाए जा सकते हैं। इससे कश्मीर के दोनों तरफ के स्थानीय लोगों को आने-जाने में सुविधा हो जाएगी। अगर कश्मीर में सीमा के अंतिम निर्धारण के बजाय सॉफ्ट बॉर्डर पर नए सिरे से जोर दिया जाए तो इससे भारत के सीपीईसी में शामिल होने का रास्ता खुल सकता है।

इस पहल से दो तरह के फायदे होंगे: पहला, भारत को सीपीईसी में निवेश करने का आर्थिक लाभ मिलेगा जिससे इसे विकास और रोजगार हासिल हो सकेगा। दूसरा, कश्मीर समस्या का भले ही स्थायी नहीं, लेकिन एक तात्कालिक समाधान हासिल हो सकेगा। नियंत्रण रेखा को सॉफ्ट बॉर्डर में बदले जाने से कश्मीर में जारी दशकों पुरानी हिंसा को समाप्त किया जा सकेगा। सीपीईसी को ले कर नई दिल्ली का जो प्रारंभिक एतराज है, उसे दूर करने का यह एक ऐसा हल हो सकता है जो दोनों पक्षों को मंजूर होगा। भारत के संप्रभु क्षेत्र में दखलंदाजी का तात्कालिक हल तो निकलेगा ही, साथ ही इससे कश्मीर के आर्थिक विकास में भी मदद मिलेगी।

कश्मीर में सॉफ्ट बॉर्डर कोई नया प्रस्ताव नहीं है। पहली बार इस पर गंभीर चर्चा तब हुई थी, जब मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री थे। यह कांग्रेस नेतृत्व वाली संप्रग सरकार के पहले कार्यकाल के दौरान भारत-पाकिस्तान साझा बातचीत का एक अहम हिस्सा था। इस पर नियंत्रण रेखा के दोनों ओर के पक्षों ने अपनी मुहर लगाई थी। भारत में इसको ज्यादा स्वीकृति मिली, क्योंकि यह कश्मीर में मौजूदा स्थिति को मंजूर करने और समस्या का स्थायी समाधान निकालने को ले कर ज्यादा गंभीर है। कश्मीर में सॉफ्ट बॉर्डर निश्चित रूप से इसका एक समाधान हो सकता है। यह जम्मू-कश्मीर लिबरेशन फ्रंट (जेकेएलएफ) और घाटी के उन सभी अलगाववादी संगठनों की मांग के अनुरूप है, जो चाहते हैं कि कश्मीर पाकिस्तान में नहीं जाए, बल्कि दोनों ओर के कश्मीर एक साथ आ जाएं। कश्मीर में सॉफ्ट बॉर्डर नियंत्रण रेखा के दोनों तरफ के कश्मीरियों को बिना किसी बाधा के आने-जाने की आजादी देगा और इसे कश्मीर के अलगाववादी संगठनों के साथ ही आम लोगों का भी समर्थन होगा।

कश्मीर में सॉफ्ट बॉर्डर कोई नया प्रस्ताव नहीं है। पहली बार इस पर गंभीर चर्चा तब हुई थी, जब मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री थे।

अगर कश्मीर में सोफ्ट बोर्डर हो जाए तो सीपीईसी कश्मीर को एक व्यापक क्षेत्रीय परिवहन नेटवर्क का हिस्सा बना सकेगा जिसमें श्रीनगर एक अहम केंद्र होगा। इस तरह यह कश्मीर की आर्थिक क्षमता का खुल कर इस्तेमाल कर पाएगा। बीती शताब्दियों में कश्मीर दक्षिण-पूर्व एशिया को मध्य एशिया से जोड़ने वाले  सिल्क रूट का अहम हिस्सा हुआ करता था। इस रूट को फिर से जिंदा कर इस क्षेत्र की अर्थव्यवस्था को भी बेहतर किया जा सकता है। इससे कश्मीर में आतंकवादी घटनाओं में कमी आ सकेगी और इसका भारतीय संघ में एकीकरण और मजबूत हो सकेगा। यह चीन के साथ आर्थिक सहयोग को समृद्ध करेगा और भारत-चीन कारोबार में असंतुलन को भी दूर करेगा। कश्मीर से हो कर चीन को होने वाले भारतीय निर्यात में परिवहन के खर्च में काफी कमी लाई जा सकेगी। यह भारतीय सामानों को चीनी बाजार में मुकाबले में आगे रख सकेगा। इससे भारत को ज्यादा निर्यात करने और अपनी अर्थव्यवस्था को मजबूत करने का अवसर मिलेगा।

बीती शताब्दियों में कश्मीर दक्षिण-पूर्व एशिया को मध्य एशिया से जोड़ने वाले सिल्क रूट का अहम हिस्सा हुआ करता था। इस रूट को फिर से जिंदा कर इस क्षेत्र की अर्थव्यवस्था को भी बेहतर किया जा सकता है।

भारत समुद्र में यात्रा करने की स्वतंत्रता का हमेशा से कट्टर समर्थक रहा है। जब परमानेंट कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन (पीसीए) ने चीन के खिलाफ इसी लाइन पर आधारित अपना फैसला दिया था तो भारत ने इसकी तुरंत तारीफ की थी। लेकिन समुद्री परिवहन की स्वतंत्रता को समर्थन का भारत का रवैया जमीन के जरिए होने वाले मुक्त कारोबार को ले कर भी दिखाई देना चाहिए। भारत को सिल्क रूट को फिर से जिंदा किए जाने का स्वागत करना चाहिए क्योंकि इससे भारत को ज्यादा विकल्प मिलेंगे और अमेरिका के नियंत्रण वाले व्यापारिक रास्तों पर निर्भरता घटेगी। साथ ही यह भारत और पाकिस्तान के रिश्तों में काफी बेहतरी भी लाएगा। कश्मीर में शांति भारत और पाकिस्तान दोनों के लिए ही फायदेमंद होगी। दोनों देश इस मंच का उपयोग सर क्रिक, सिंधु जल और सियाचिन आदि को ले कर चल रहे विवादों को दूर करने के लिए भी कर सकते हैं।

अंत में, इन सब को सुनिश्चित करने के लिए यह बेहद जरूरी है कि कश्मीर में पाकिस्तान की ओर से दिया जा रहा आतंकवाद को समर्थन पूरी तरह बंद हो। भारत पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर से अपना दावा तभी छोड़ सकता है, जब बदले में पाकिस्तान भी ऐसा ही कदम उठाते हुए कश्मीर में राज्य प्रायोजित आतंकवाद को छोड़ दे और भारतीय शासन वाले कश्मीर से इस्लामाबाद भी अपना दावा छोड़ दे। आतंकवाद के जारी रहते विकास नहीं हो सकता। यह पाकिस्तान के ऊपर है कि वह अपने प्रशासन वाले कश्मीर से चल रहे आतंकवादी नेटवर्क को पूरी तरह ध्वस्त करे जिससे भारत को सॉफ्ट बॉर्डर को मुमकिन बनाने के लिए जरूरी उत्साह और विश्वास मिल सके। सीपीईसी के कश्मीर और भारत में सफल होने के लिए पहली शर्त यही है कि जैश-ए-मोहम्मद, हिज्ब-उल-मुजाहिदीन और लश्कर-ए-तैयबा जैसे संगठनों पर पाकिस्तान पूरी तरह अंकुश लगाए। ऐसा हुआ तो भारत, चीन और पाकिस्तान आपसी सहयोग कर क्षेत्र में शांति और विकास को सुनिश्चित कर सकते हैं।

लेखक आब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन में इंटर्न हैं।

ये लेखक के निजी विचार हैं।

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