कश्मीर में संभावनाएं तलाशने की अमेरिकी कोशिश

किस तरहं कश्मीर में अमेरिका ने अपने रणनीतिक हित साधने के प्रयास किए

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Jawaharlal Nehru, Kashmir, UNCIP, Sheikh Abdullah, Jammu and Kashmirभारत को हमेशा विश्वास रहा है कि कश्मीर के मामले पर अमेरिका उसके साथ खड़ा है। अमेरिका ने राज्यों की प्रभुसत्ता के अपने सिद्धांत (वेस्टफेलियन सोवरेनिटी) की वजह से घोषित रूप से शुरू से इस मामले में भारत के निर्विवाद समर्थन का फैसला किया हुआ है। हालांकि यह भी सच है कि वास्तव में हमेशा ऐसा हुआ नहीं। एक समय भारत की आजादी के तुरंत बाद अमेरिकी सरकार अपने विदेश मंत्रालय के जरिए नेशनल कांफ्रेंस के प्रमुख और जम्मू-कश्मीर के प्रधानमंत्री शेख अब्दुल्ला के साथ बहुत सक्रिय तालमेल बना रही थी जिसका मकसद इस भौगोलिक इलाके में अपना रणनीतिक प्रभुत्व कायम करना था। यह रिपोर्ट उन घटनाओं से पर्दा हटाती है जिनमें अमेरिका और उसके भारत के राजदूत लॉय एंडरसन व उनकी पत्नी एलिस, अब्दुल्ला से सीधी बातचीत कर रहे थे। लेखक इसी विषय र ‘नेहरू और कश्मीर’ शीर्षक से एक किताब भी लिख रहे हैं। यह किताब गोपनीय दस्तावेजों के साथ ही उस दौरान हुई घटनाओं से जुड़े लोगों के खास सिलाहसालारों की याद और व्यक्तिगत पत्राचार पर आधारित है। लेखक के दादा भूतपूर्व प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू के लगभग 20 साल तक विशेष कार्य अधिकारी (ओएसडी) रहे और ये कागजात लेखक को उन्होंने ही विरासत के तौर पर सौंपे।

जब कश्मीर की उलझन में अमेरिका ने अपना भी पेंच डाला

यह मध्य अगस्त की बात है। मीडिया में पाकिस्तान के अधिकारियों के हवाले से छपा था कि ‘ऑर्गनाइजेशन ऑफ इस्लामिक कंट्रीज’ (ओआईसी) ने कश्मीर में मानवाधिकारों के उल्लंघन पर चिंता जताई है। दुनिया भर में इस्लामी चरमपंथियों की ओऱ से हो रहे मानवाधिकारों के उल्लंघन को रोक नहीं पाने की वजह से ओआईसी खुद ही अपनी विश्वसनीयता गंवा चुका है फिर भी इसने ‘इंसानियत पर खतरे’ का मामला उठाने के लिए कश्मीर को चुना। इसे तार्किकता को पूरी तरह तिलांजलि देने के सिवा और क्या कहा जा सकता है? अपने अंदर झांकने और अरब में हो रहे इस्लाम के कट्टरपंथी उभार की समीक्षा करने की बजाय यह कश्मीर में अपनी टांग अड़ा रहा है और यहां के लोगों की आत्म निर्णय के अधिकार को अपना समर्थन दुहरा रहा है।

आश्चर्यजनक रूप से ओआईसी के महासचिव इयाद अमीन मदनी, जिनकी हाल ही में 19 अगस्त से शुरू हुई तीन दिन की यात्रा के दौरान पाकिस्तान ने मेजबानी की थी, उन्होंने कश्मीर के आत्म निर्णय के मुद्दे को उठाने का फैसला किया। लेकिन पाकिस्तान और लीबिया व सीरिया में लड़ रहे आईएस के लड़ाकों ने इस तरह का हक लोगों को देने के बारे में तो कभी सोचा तक नहीं होगा। कहा जा सकता है कि अपने विशिष्ट धर्मशास्त्र, विचारधारा और दर्शन के साथ आईएस आज के समय में दुनिया की सुरक्षा को सबसे बड़ा खतरा है। सिरते, लीबिया में चल रही लड़ाई इतनी अहम है कि अमेरिका की ‘अदृष्य’ स्पेशल ऑपरेशन टीम को भी लीबियन फौज के साथ मिल कर लड़ने को कहा गया है। मोसुल, इराक में भी ऐसा ही देखा जा रहा है। ये देश इस संघर्ष की वजह से टुकड़े- टुकड़े हो रहे हैं लेकिन इनमें लोगों के अधिकारों का जो हनन हो रहा है उसको ले कर कोई वास्तविक निंदा अब तक नहीं आई है।

कश्मीर में अधिकारों के उल्लंघन को ले कर आए ओआईसी के ताजा बयान से साबित होता है कि पाकिस्तान का इस पर जो भी बचा-खुचा प्रभाव है, वह भी इसे निर्देशित करने के लिए काफी है। जबकि यह भारत का आंतरिक मामला है क्योंकि इस पर भारत का कानूनी, नैतिक और संवैधानिक अधिकार है।

भारत के आजाद होने के तत्काल बाद के समय को याद करें तो स्थितियों के बदलने के बावजूद विश्व की प्रमुख शक्तियों की कश्मीर की भौगोलिक-रणनीतिक और भौगोलिक-राजनीतिक अहमियत में दिलचस्पी कम नहीं हुई थी। फासीवाद से छुटकारा मिलने के बाद वे यूरोपीय सीमाओं के पुनर्निर्धारण को ले कर एक-दूसरे के खांटी दुश्मन बन गए थे। हालांकि कश्मीर उनसे बेहद दूर स्थित था, लेकिन कूटनीतिज्ञ और विशेषज्ञ इसकी विशिष्ट अहमियत से अच्छी तरह वाकिफ थे। यह भारत के मस्तक पर जगमगाता मुकुट ही नहीं,इसकी सीमा कई देशों को छूती है। अमेरिका की मौजूदा रणनीति भी उसके इस पुराने रुख से बहुत अलग नहीं हो सकती। जुलाई के मध्य में अमेरिकी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता जॉन किर्बी ने भारत के आंतरिक मामले में सीधा हस्तक्षेप करने की किसी संभावना से इंकार किया, उन्होंने साफ तौर पर यह एलान किया कि जम्मू-कश्मीर भारत का ‘आंतरिक मामला’ है।

लगभग 60 वर्ष पहले अमेरिका ने कश्मीर को ले कर बिल्कुल अलग नजरिया अपनाया था। 1950 के दशक की शुरुआत में ही अमेरिका को लगने लगा था कि कश्मीर पर इसका अपना प्रभाव होना चाहिए। आम तौर पर भले ही यह माना जाता हो कि कश्मीर सिर्फ भारत-पाकिस्तान का मामला है, लेकिन वास्तविकता यह है कि इस पर सिर्फ ऑल इंडिया मुस्लिम लीग के नेता और पाकिस्तान के संस्थापक मुहम्मद अली जिन्ना ही नहीं बहुतों की नजर थी। यह स्पष्ट होने लगा था कि शीत युद्ध तेज हो रहा है, सोवियत संघ भी अपने नजदीक के इलाकों में अपनी मौजूदगी बढ़ाता जा रहा था। कश्मीर के इतिहास और इसकी राजनीतिक अस्थिरता को देखते हुए इसे एक महत्वपूर्ण लक्ष्य के तौर पर देखा जा रहा था। अमेरिका को चिंता थी कि अजरबैजान में जिस तरह रूस अपना शक्ति प्रदर्शन कर रहा है,कश्मीर में मौजूद राजनीतिक शून्य की वजह से इसका अगला ठिकाना यह हो सकता है।  अमेरिका और प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू दोनों को ही लग रहा था कि घाटी में साम्यवाद का प्रभाव बढ़ सकता है और इससे वे चिंतित थे। यही वह मौका था, जब कश्मीर में अमेरिका की भूमिका की निगरानी शुरू हो गई।

खुफिया रिपोर्ट कश्मीर में अमेरिकी भूमिका का खुलासा करती है

वर्ष 1951 की गर्मियों के मौसम के दौरान फाईल की गई अमेरिका की एक खुफिया रिपोर्ट में पता चलता है कि कश्मीर मामले पर अमेरिका के शीर्ष अधिकारी किस तरह संलग्न थे। नीचे उस रिपोर्ट के कुछ अंश प्रस्तुत हैं-

“मैं पिछली रात विदेश मंत्रालय के फ्रैंक कॉलिंस से मिला। सुरक्षा परिषद में जब भी कश्मीर के मामले पर चर्चा होनी होती थी, विदेश मंत्रालय से कॉलिंस और होवार्ड मेयर्स न्यूयॉर्क आते थे। अमेरिकी प्रतिनिधि मंडल के सुरक्षा परिषद मामलों के सलाहकार श्री मैफेट के साथ वे उनकी तरफ हमारे संपर्क थे। कॉलिंस और मैफैट कश्मीर के मुद्दे पर लगभग एक सा रवैया रखते थे। दोनों ही पाकिस्तान, मुसलमान और ब्रिटिश के पक्ष में और भारत के विरोधी थे। मफेट तो कॉलिंस से भी ज्यादा उग्र विचार रखते थे। दोनों ही बस लकीर के फकीर थे और अपने अलावा किसी और की राय समझने की न तो कोशिश करते थे और न ही उनकी क्षमता ऐसी थी, न ही उन्होंने कश्मीर संबंधी कागजातों को ठीक से पढ़ा था।इससे उलट मेयर्स संयुक्त राष्ट्र के राजनीतिक और सुरक्षा संबंधी मामलों के कार्यालय के अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा संबंधी मामलों के विशेषज्ञ थे और उनके ज्ञान, फैसलों और रवैये में एक हद तक समझदारी दिखाई देती थी। पांच जुलाई को कॉलिंस अचानक नई दिल्ली पहुंच गए। उसी सुबह वे विमान से कोलकाता के लिए निकल गए जहां वे कुछ दिन बिताने वाले थे और वहां से उन्हें मद्रास होते हुए मुंबई पहुंचना था और वहां से फिर अमेरिका की फ्लाइट पकड़नी थी। उनसे मुलाकात की मेरी योजना पर यूएसआईएस के श्री बर्न्स की ओर से दिए गए रात्रिभोज ने पानी फेर दिया। उन्होंने जोर दिया था कि इसमें हम दोनों आएं। इसिलए मैं साफ तौर पर इस बात का पता नहीं कर पाया कि आखिर वे भारत किस वजह से आए थे। उनके यहां आने की एक वजह यह हो सकती है कि वे पता करना चाहते थे कि यहां यूएसआईएस भारत में किस तरह काम कर रहा है और उसे यहां कितनी कामयाबी मिल रही है।

यह ध्यान में रखते हुए कि वे जब भारत आए थे, उस दौरान डॉ. फ्रैंक ग्रैहम भी यहां मौजूद थे। ग्रैहम अमेरिकी सिनेटर थे और उन्हें संयुक्त राष्ट्र ने कश्मीर पर मध्यस्थ नियुक्त किया था, मुझे लग रहा था कि उनकी यात्रा का कश्मीर से भी कोई वास्ता जरूर था। मैंने यह टिप्पणी सुरक्षा परिषद के बैठक बुलाने के अचानक लिए फैसले की वजह से की है। इसमें पाकिस्तानी विदेश मंत्री के पत्र पर विचार करने का कोई वक्त नहीं दिया गया था। इस पत्र में उन्होंने कश्मीर में संविधान सभा के गठन को ले कर अपनी चिंता दर्ज की थी। इसी सुरक्षा परिषद ने पाकिस्तान पर लगातार युद्ध भड़काने के हमारे आरोपों को उपेक्षित किया था।”

इस पूरे मामले को सही संदर्भ में देखने के लिए यह जानना जरूरी है कि होवार्ड मेयर्स ने संयुक्त राष्ट्र के राजनीतिक और सुरक्षा संबंधी मामलों के कार्यालय के निदेशक को तीन जनवरी, १९५१ को एक गोपनीय नोट लिखा-

“विषय- कश्मीर विवाद – अमेरिका और यूके की ओर से संभावित कदम – मैंने कश्मीर की मौजूदा स्थिति के विषय पर प्रैंक कॉलिंस (एसओए) के साथ चर्चा की है। इसमें खास तौर पर हमने इस बात पर भी चर्चा की है कि अगर पाकिस्तान के प्रधानमंत्री लियाकत अली खान लंदन में होने वाले कॉमनवेल्थ देशों के प्रधान मंत्रियों के सम्मेलन में हिस्सा नहीं लेते हैं तो क्या करना चाहिए। हम निम्न बिंदुओं पर सहमत हुए हैं-

मेरा और कॉलिंस दोनों का मानना है कि इससे ज्यादा कुछ करने से अमेरिका कश्मीर मुद्दे पर खुद कुछ प्रयास शुरू कर देगा जबकि हमारी सहमति इस बात पर है कि ब्रिटिश ही यह पहल करेंगे। हम नहीं मानते कि इस पहल को ले कर हमने पहले जो सोचा हुआ था वह मौजूद स्थिति में सही होगा। लियाकत का पूरा जोर इस बात पर है कि वह अपने घर में अपनी और अपनी सरकार की स्थिति मजबूत करे। अगर सुरक्षा परिषद में कश्मीर के मुद्दे पर विचार किए जाने और किसी तार्किक समाधान की ओर बढ़ने में नाकमी पर पाकिस्तान की मौजूदा पश्चिम-उन्मुख सरकार को सत्ता से हटाए जाने का खतरा पैदा होता है तो विभाग को स्थिति की समीक्षा करनी चाहिए। तब यह सोचा जाना चाहिए कि क्या दोनों पक्षों को समाधान के लिए तैयार करने की पहल अमेरिका को यूके से अपने हाथ में ले लेनी चाहिए। अगर यूके इस प्रस्ताव को प्रायोजित या सह-प्रायोजित करने से इंकार करता है तो हमें सुरक्षा परिषद में दूसरे सह-प्रायोजक की तलाश करनी चाहिए।

मुमकिन है कि इसके बावजूद दोनों पक्षों की प्रतिबद्धता को आंकने और इस प्रतिबद्धता को अमल में लाने की कोशिशों को आंकने के लिए विशेष तिनिधि की नियुक्ति के प्रस्ताव पर यूके सह-प्रस्तावक बनने को तैयार हो जाए। मैं और फ्रैंक दोनों मानते हैं कि सुरक्षा परिषद को कश्मीर के समाधान में किसी एकतरफा जबरन कोशिश को स्वीकार करने से लिखित रूप में मना कर देना चाहिए। इसमें भारत नियंत्रित कश्मीर के नेशनल कांफ्रेंस की कार्यवाही भी शामिल है। हमें नई दिल्ली से ऐसे संकेत मिले हैं कि अगर संयुक्त राष्ट्र की ओर से सख्त रुख अपनाया गया तो वे कश्मीर पर अपने ऐसे किसी कदम से पीछे हट सकते हैं।”

संविधान सभा पर जम्मू-कश्मीर नेशनल कांफ्रेंस का प्रस्ताव

इस दौरान घटनाक्रम बहुत तेजी से बदल रहा था। 27 अक्तूबर, 1950 को ऑल जम्मू एंड  कश्मीर नेशनल कांफ्रेंस की आम सभा ने प्रस्ताव पारित किया कि जम्मू-कश्मीर राज्य के भविष्य और संबद्धता के बारे में फैसला करने के लिए संविधान सभा का गठन किया जाए। जिस इलाके से इस संविधान सभा का गठन किया जाना था वह राज्य का सिर्फ एक हिस्सा था। 14 दिसंबर, 1950 को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के अध्यक्ष को लिखे पत्र में पाकिस्तान के विदेश और कॉमनवेल्थ मंत्री सर मोहम्मद जफरुल्ला खान ने भारतीय मीडिया की उन रिपोर्ट का हवाला दिया था जिनमें कहा गया था कि प्रधानमंत्री नेहरू ने संविधान सभा के गठन के प्रस्ताव का स्वागत किया है और कहा है कि इससे भारत का प्रभुत्व औपचारिक तौर पर साबित हो जाएगा।

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अन्य रिपोर्ट में यह भी कहा गया था कि जम्मू-कश्मीर रियासत के महराजा हरि सिंह की सरकार की ओर से चुनाव की औपचारिक अधिसूचना जल्दी ही की जानी है। जफरुल्ला का आरोप था कि यह कदम 13 अगस्त, 1948 और पांच जनवरी, 1949 के यूएनसीआईपी प्रस्ताव में निहित भारत और पाकिस्तान के बीच समझौते का उल्लंघन था। उन्होंने यह अपील की थी कि कश्मीर मुद्दे पर विचार के लिए संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की तत्काल बैठक बुलाई जाए और इसकी ओर से भारत को यह कहा जाए कि वह ना तो संविधान सभा के गठन के प्रस्ताव को आगे बढ़ाए और ना ही ऐसा कोई कदम उठाए जिससे राज्य में स्वतंत्र और निष्पक्ष जनमत संग्रह में बाधा पहुंच सके।

जनमत संग्रह का दबाव

अमेरिका की कश्मीर पर छल भरी कूटनीति के बारे में प्रधानमंत्री नेहरू को सौंपी गई उसी खुफिया रिपोर्ट से अमेरिका की संलिप्तता के बारे में और भी कई बातों का पता चलता है। विदेश मंत्रालय के कॉलिंस ने कहा था कि एक ओर पाकिस्तान का दबाव है, तो दूसरी ओर माना जा रहा है कि जल्दी बैठक बुलाने को ले कर भारत भी तैयार नहीं होगा। ऐसे में सुरक्षा परिषद ने कश्मीर मुद्दे को सितंबर, 1950 से ले कर फरवरी, 1951 तक लटकाए रखा। जहां तक पाकिस्तान के अंदर कश्मीर में जेहाद को ले कर जो बातें चल रही थीं, उनके बारे में कॉलिंस का कहना है कि अमेरिकी सरकार ने अपने कूटनीतिक साधनों से पाकिस्तान पर  तना मुमकिन हो सका दबाव बनाए रखा ताकि वह संयम बनाए रखे।

कॉलिंस ने यह भी कहा है कि अमेरिका अब भी ऐसे समाधान की उम्मीद लगाए था जो दोनों पक्षों को स्वीकृत हो लेकिन साथ ही यह भी सच है कि अमेरिका इसका समाधान इन दोनों पक्षों के भरोसे नहीं छोड़ना चाहता था। उन्होंने यूएन की ओर से मध्यस्थ के तौर पर नियुक्त सेन ग्राहम की चर्चा करते हुए कहा कि वे बेहद गंभीर और ईमानदार व्यक्ति हैं जो भारत और पाकिस्तान के सहयोग से जल्द जनमत संग्रह करवाने में बेहद मददगार साबित होंगे। खुफिया रिपोर्ट में यह भी कहा गया-

“जनमत संग्रह करवाना इतनी मुश्किल बात नहीं है। बशर्ते अमेरिका और यूके मिल कर पाकिस्तान को अपने आदिवासियों, नागरिकों और फौजियों को वहां से हटने के लिए कहें और आजाद कश्मीर फोर्स को समाप्त कर उसके हथियार वापस लेने के लिए कहें साथ ही सुरक्षा परिषद जम्मू-कश्मीर की संप्रभुता के संबंध में और इस राज्य की रक्षा की भारत की जिम्मेवारी के संबंध में भारत को दिए गए आश्वासन को पूरा करवाने का इच्छुक हो।

कॉलिंस ने कहा कि पाकिस्तान के नागरिक और कबायलियों के वापस होने और उसकी फौज की वापसी शुरू होने के बाद के 13 अगस्त के  स्ताव के मुताबिक भारत को भी अपनी अधिकांश फौज को वापस लेना शुरू करना था और आजाद कश्मीर फोर्स को समाप्त करने व इसके हथियार वापस लेने के बारे में बातचीत युद्धविराम के दौरान ही हो सकती थी। मैंने जवाब दिया कि यह 13 अगस्त, 1948 और पांच जनवरी, 1949 के प्रस्तावों की भावना के मुताबिक सही नहीं है। क्योंकि यूएनसीआईपी ने अपनी रिपोर्ट में खुद माना है कि अगर इसे पता होता कि उस दौरान की अवधि का उपयोग पाकिस्तान आजाद कश्मीर फोर्स की 32 बटालियन खड़ी करने में करेगा तो वह इस समस्या से शुरुआती चरण में ही निपट चुका होता।

चूंकि मामला यह था, मैंने उस मूल सिद्धांत को ध्यान में रखा जिस पर 13 अगस्त का प्रस्ताव आधारित था। यह सिद्धांत था राज्य से  किस्तानी फौज, नागरिकों और कबायलियों की पूरी तरह से वापसी। कहा जा सकता था कि प्रस्ताव का भाव यह था कि भारत को उसकी फौज हटाने के लिए कहने से पहले जरूरी है कि पाकिस्तान आजाद कश्मीर फोर्स को समाप्त करे और इसके हथियार वापस ले। कॉलिंस पांच जनवरी, 1949 के प्रस्ताव में भारत और राज्य की फौज के ‘विन्यास’ का हवाला देते हैं, जबकि मैंने कहा कि भारत को दिए गए आश्वासन को देखते हुए ‘विन्यास’ शब्द का एक ही मतलब हो सकता है और वह है इन फौज का राज्य के अंदर विन्यास। यहां आ कर बातचीत में बाधा पड़ गई और हमें फिर से इसे शुरू करने का मौका नहीं मिला।

हालांकि इससे पहले कॉलिंस ने भारत सरकार के एक अधिकारी (यहां खुफिया रिपोर्ट केएन बमजई का हवाला दे रही हैं जो प्रधानमंत्री नेहरू के कश्मीर मामले पर ओएसडी थे) से संपर्क कर यूएसआईएस के भारत में काम-काज पर प्रतिक्रिया जानने की कोशिश की थी। अपनी बात रखते हुए भारतीय अधिकारी ने बताया कि ब्रिटेन ने पहले किस तरह पब्लिसिटी के प्रत्यक्ष तरीकों को अपनाया लेकिन जल्दी ही उन्हें इन तरीकों को छोड़ने को मजबूर होना पड़ा

क्योंकि ये तरीके भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (आईएनसी) को और मजबूत होने से रोक नहीं पा रहे थे। इस मौके पर वहीं मौजूद अमेरिकी  तावास के प्रथम सचिव विलकिंस, कॉलिंस की ओर मुखातिब हुए और कहा कि प्रत्यक्ष तरीके अमेरिकी नीति के सीधे खिलाफ हैं और वे भारत या कहीं और इनका इस्तेमाल करने की सोच भी नहीं सकते।” इन रिपोर्ट से सिर्फ कश्मीर में चल रहे तनाव का ही पता नहीं चलता, बल्कि साथ ही यह भी पता चलता है कि अमेरिका चाहे कितना भी दूर हो, इस मामले में बेहद दिलचस्पी ले रहा था। दूसरे विश्व युद्ध के बाद अमेरिका जैसी पश्चिमी शक्तियां कश्मीर को अंतरराष्ट्रीय षड़यंत्रों और साजिशों का अगला सबसे बड़ा केंद्र बनता देख रही थीं क्योंकि इसे मध्य और दक्षिण एशिया के मंच पर साम्यवाद-विरोध का अंतिम अध्याय माना जा रहा था।

बख्शी कैसे बने भारत का आधारइन

वधारणाओं का संचालन करने वाले शख्स थे जम्मू- कश्मीर के प्रधानमंत्री के दूसरे सबसे खास आदमी- बख्शी गुलाम मोहम्मद, जो जरूरत पड़ने पर साथ आते थे। बख्शी न सिर्फ प्रधानमंत्री नेहरू के दूतों के जरिए नई दिल्ली के लगातार संपर्क में बने रहते थे, बल्कि कश्मीर की जमीनी हकीकत को ले कर अहम जानकारी भी देते थे। संयुक्त राष्ट्र के पर्यवेक्षकों को ले कर भारत की शंका का अनुमान उप प्रधानमंत्री की ओर से 25 जून, 1951 को लिखी चिट्ठी से लगाया जा सकता है। यह पत्र सेन और फ्रेंक ग्राहम की यात्रा से कुछ दिन पहले ही लिखा गया था। यह नोट पर्यवेक्षकों की भूमिका के बारे में विस्तार से बताता है-

“यह स्पष्ट है कि संयुक्त राष्ट्र के पर्यवेक्षक संघर्ष विराम के उल्लंघन पर नजर रखने की अपनी तय भूमिका तक सीमित नहीं रहते बल्कि पाकिस्तान के एजेंट के तौर पर दिखाई देते  हैं। साफ है कि वे यूएनओ के अधिकारी होने के अपने प्रभाव का दुरुपयोग कर रहे हैं और एक तरह से राज्य की जासूसी कर रहे हैं। यह पाया गया है कि पर्यवेक्षक मुख्य रूप से राज्य के लोगों का इस सरकार को ले कर और भारत में राज्य के विलय को ले कर प्रतिक्रिया का आकलन करने में जुटे होते हैं ताकि राज्य के लोगों की वास्तविक राजनीतिक आकांक्षा के बारे में जान सकें। ” फिर वह धमाका हुआ जिसने उस समय कश्मीर में अमेरिका की सक्रियता से ली जा रही

दिलस्चपी का पर्दाफाश कर दिया – ”भारत में अमेरिका के राजदूत की पत्नी श्रीमती लॉय हैंडरसन की गतिविधियों की चर्चा करना भी जरूरी है जो लंबे समय से कश्मीर में थीं। घोषित तौर पर वे जलवायु की वजह से वहां थीं लेकिन पाया गया कि इस दौरान उनके संपर्क जिन लोगों से थे, उनमें मुस्लिम नेता सबसे ज्यादा थे। मतलब बिल्कुल जाहिर था। खास बात है कि श्रीमती हैंडरसन ने अपने कश्मीर प्रवास के दौरान शेख अब्दुल्ला से भी मुलाकात की थी।”

अब्दुल्ला और हैंडरसन की गुप्त मुलाकात

इससे पहले शेख अब्दुल्ला की अमेरिकी राजदूत लॉय हैंडरसन से श्रीनगर में गुप्त मुलाकात हुई थी। इसकी सूचना अमेरिका के विदेश मंत्रालय को 29 सितंबर, 1950 को दी गई। अब्दुल्ला ने बहुत जोर दे कर कहा था कि उनकी “राय में कश्मीर को स्वतंत्र होना चाहिए और राज्य की जनता बहुत बड़े बहुमत के साथ स्वतंत्रता के पक्ष में खड़ी है… कश्मीर के लोगों की भाषा और संस्कृति की अपनी पृष्ठभूमि अलग है। यहां के हिंदू अपने रीति-रिवाजों और परंपराओं में भारत के हिंदुओं से अलग हैं। यहां के मुसलमान पाकिस्तान के मुसलमानों से काफी अलग हैं। कश्मीर में हिंदू अल्पसंख्यकों की मौजूदगी के बावजूद यहां के ज्यादातर लोग एक ही प्रकार के हैं।” लेकिन “स्वतंत्र कश्मीर तभी बना रह सकता है जब इसकी भारत और पाकिस्तान दोनों से मित्रता रहे… साथ ही इन दोनों देशों की भी आपस में मित्रता रहे।” उन्होंने हैंडरसन से यह भी कहा था कि आजाद कश्मीर के कई नेता भी कश्मीर के इस दर्जे के पक्ष में हैं। फिर इसके बाद मई, 1953 में श्रीनगर में अब्दुल्ला ने अमेरिकी डेमोक्रेटिक नेता एडले स्टीवेंसन के सामने भी यही बात कही। अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव में हार के बाद स्टीवेंसन दुनिया भर के दौरे पर थे। आखिर में जब अब्दुल्ला को सत्ता से हटा कर गिरफ्तार किया गया तो उन पर विदेशी सम्राज्यवादी ताकतों के साथ हाथ मिलाने का भी आरोप लगा था। इसमें इशारा यह था कि वे अमेरिका के साथ मिल कर कश्मीर को भारत के नियंत्रण से बाहर कर स्वतंत्र करना चाहते थे। लेकिन प्रधानमंत्री नेहरू ने अपनी बहन और राजनयिक विजयलक्ष्मी पंडित को तीन अक्तूबर, 1953 को लिखे पत्र में इससे भी इंकार किया था। उन्होंने लिखा था, “जहां तक एडले स्टीवेंसन की बात है मुझे नहीं लगता कि उन पर किसी भी रूप में दोषारोपण किया जा सकता है।”हालांकि पांच जुलाई, 1953 को न्यूयॉर्क टाइम्स ने एक मानचित्र छापा जिसमें कश्मीर के स्वतंत्र होने का संकेत दिया गया था। लेकिन यह हवा-हवाई बातों का दौर था। हकीकत सिर्फ इतनी थी कि उसी वर्ष बाद में अब्दुल्ला  गिरफ्तार हुए।

जैसे कि इतनी टिप्पणियां ही काफी नहीं थीं, बख्शी ने यूएनओ मुख्यालय, श्रीनगर के कमांडर जॉन कैडवाल्डर की ओर से अमेरिका के पेनसिल्वैनिया स्थित डॉ. फ्रैंसिस फिशर हार्ट को भेजे संदेश की प्रति भेजी जो बेहद विस्फोटक था-“भारत और पाकिस्तान के बीच फिर से युद्ध शुरू नहीं हो जाए यह सुनिश्चित करने का काम बहुत तनावपूर्ण है। अब तक तो यह पूरा हो रहा है लेकिन भारत सरकार और नेहरू के  ख्त रवैये को देखते हुए मैं कह नहीं सकता कि हम इसमें कब तक कामयाब होंते रहेंगे। घटनाएं लगातार हो रही हैं। जब तक हम जीप या घोड़े से या फिर पैदल पहुंचते हैं और दूसरे की ओर से प्रतिक्रिया शुरू होने से पहले जिम्मेदारी तय करने की कोशिश करते हैं, तब तक दूसरी घटना हो जाती है। कई बार तो यह सिलसिला बहुत तेज हो जाता है। बख्शी ने नेहरू को एक सूची भी भेजी कि किस तरह संयुक्त राष्ट्र  र्यवेक्षक महारा पुल या झेलम की तस्वीर लेने जैसी गतिविधियों में शामिल हो रहे हैं। अब्दुल्ला को प्रधानमंत्री पद से हटा कर बंदी बना लिए जाने के बाद नेहरू ने पाकिस्तान के प्रधानमंत्री मोहम्मद अली बोगरा से दिल्ली में मुलाकात की। इस दौरान भी उन्होंने कश्मीर में जनमत संग्रह करवाने का प्रस्ताव रखा। उनकी सिर्फ एक शर्त थी कि संयुक्त राष्ट्र में अमेरिका के दूत एडमिरल निमित्ज को जनमत संग्रह का मुख्य प्रशासक नहीं बनाया जाए, क्योंकि वह ‘सुपर पॉवर’ वाली मानसिकता की वजह से हमेशा अविश्वास के भाव से भरे होते हैं। लेकिन  किस्तान इस पर जोर देता रहा और नेहरू ने इंकार कर दिया। ”

कश्मीर विधानसभा ने 15 फरवरी, 1954 को बख्शी के नेतृत्व में भारत में विलय के प्रस्ताव को पारित किया। नेहरू ने इस आधार पर घोषणा कर दी कि अब जनमत संग्रह की जरूरत नहीं है, क्योंकि जनता के प्रतिनिधियों ने बोल दिया है।

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जम्मू-कश्मीर विधानसभा का निर्णायक

दम जम्मू-कश्मीर संविधान सभा का फैसला बेहद साहसी था, क्योंकि इसने साफ तौर पर तब की संयुक्त राष्ट्र की सर्वशक्तिमान सुरक्षा परिषद के फैसले का उल्लंघन किया था। लगभग 61 महीने पहले धूर्त ब्रिटेन ने सुरक्षा परिषद को बरगला कर यह प्रस्ताव पारित करवा लिया था कि जम्मू-कश्मीर के भारत या पाकिस्तान में विलय का फैसला जनमत संग्रह से ही होगा। जबकि ब्रिटेन के भारतीय स्वतंत्रता  नून 1947 के तहत राज्य ने इंस्ट्रूमेंट ऑफ एक्सेशन के जरिए कानूनी और नैतिक रूप से अपना विलय भारत में कर लिया था। यहां ध्यान देने की बात है कि भारत यूएन में अपनी बात राज्य में घुसपैठ के संदर्भ में रखता था न कि राज्य के विलय की वैधानिकता के संदर्भ में। शेख अब्दुल्ला ने पांच फरवरी, 1948 को हुई सुरक्षा परिषद की 241वीं बैठक में खुद कहा है कि “कश्मीर का विलय भारत में विधिपूर्वक हुआ है या नहीं, यह बहस का विषय नहीं है।

उन्होंने अपील की थी कि “सुरक्षा परिषद मुद्दे को ले कर भ्रमित नहीं हो।” उन्होंने सुरक्षा परिषद को यह भी याद दिलाया कि जम्मू-कश्मीर के विलय को स्वीकार करते हुए भारत के प्रधानमंत्री ने यह भरोसा भी दिलाया था कि एक बार देश हमलावरों, उपद्रवियों और लुटेरों से खाली करवा लिया जाए तो इस विलय को ले कर जनता की राय ली जाएगी।

लोगों की मंजूरी लेने के लिए जरूरी था कि संविधान तैयार किया जाए और वह किसी महाराजा की ओर से नहीं (जैसा कि 1939 में जम्मू-कश्मीर संविधान कानून के जरिए किया गया था), बल्कि लोगों द्वारा, लोगों का और लोगों के लिए हो। और चूंकि 1947 के इंस्ट्रूमेंट ऑफ एक्सेशन की धारा सात जम्मू-कश्मीर के लोगों के तब नई दिल्ली में तैयार हो रहे भारतीय संविधान से संचालित होने का वादा नहीं करती थी, इसलिए जम्मू-कश्मीर संविधान सभा का लोकतांत्रिक तरीके से चयन हुआ। इसे अंतरराष्ट्रीय पर्यवेक्षकों की निगरानी में और वयस्क मताधिकार के सिद्धांत के तहत आयोजित किया गया। अब यह बात और है कि इसमें सिर्फ शेख अब्दुल्ला की नेशनल कांफ्रेंस अकेली ही मुकाबले में थी और इसकी अप्रासंगिक प्रतिद्वंद्वी प्रजा परिषद ने मुकाबले से बाहर रहने का फैसला किया था।

नेहरू यूं तो हमेशा राष्ट्रवादी अब्दुल्ला के साथ खड़े रहे और यहां तक कि महाराजा हरि सिंह को राज्य से बेदखल कर दिया ताकि अब्दुल्ला को राज्य का शासन चलाने में पूरी स्वतंत्रता मिल सके। लेकिन सख्त रवैये वाले नेहरू को आखिरकार एहसास हो गया कि शेर-ए-कश्मीर अब्दुल्ला महज एक स्थानीय नेता हैं जो कश्मीर घाटी के दायरे से बाहर नहीं देख सकते। उन पर जम्मू का भी भार था, जिसे वे संभाल नहीं पा रहे थे, ऐसे में उन्होंने दूसरा आसान रास्ता अख्तियार करते हुए सुपर पॉवर अमेरिका के साथ हाथ मिला लिया ताकि आजाद कश्मीर का उनका सपना पूरा हो सके। ऐसा कश्मीर जो भारत के मस्तक पर चमचमाता मुकुट था और जिसकी सीमा पांच देशों से लगती थी। ऐसी मनोदशा में अब्दुल्ला के लिए जम्मू- कश्मीर का भारत में पूरी तरह एकीकरण अनुकूल नहीं था।

ये लेखक के निजी विचार हैं।

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