• Feb 14 2017

कश्मीर से बनानी होगी पाकिस्तान की दूरी

सरकार ने अपनी पाकिस्तान नीति में जो हासिल किया है, उसी को कश्मीर में लागू करने की जरूरत है।

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Photo: Nilesh Ganthade/CC BY-NC-SA 2.0

हाल के महीनों की दो घटनाओं के कारण कश्मीर फिर से भारत में लोगों की चर्चाओं के केंद्र में रहा। पहली घटना थी 8 जुलाई 2016 को बुरहान वानी की मृत्यु और उसके बाद कश्मीर की सड़कों पर हुए विरोध प्रदर्शन। दूसरी घटना थी नियंत्रण रेखा (एलओसी) के पार भारतीय सशस्त्र बलों द्वारा आतंकवादियों के शिविरों को नेस्तनाबूद करने के लिए की गई सर्जिकल स्ट्राइक। लेकिन लोगों की चचाओं या सरकार की जवाबी कार्रवाई के लिए इन दोनों घटनाओं को जोड़ना सही नहीं होगा। सबसे खास बात यह है कि कश्मीर से संबंधित घरेलू वर्णन को भारत-पाकिस्तान संबंधों से अलग रखना महत्वपूर्ण है — घाटी में नागरिक असंतोष का एकमात्र दीर्घकालिक जवाब भारत सरकार की कश्मीरी जनता तक पहुंच है।

बुरहान वानी की मौत के बाद, घाटी के लोग अपना आक्रोश प्रकट करने के लिए सड़कों पर उतर आए। भारत सरकार ने जवाबी कार्रवाई करते हुए 107 दिन तक कर्फ्यू लगाए रखा, जिसमें स्कूल और कॉलेज बंद रहे, संचार तंत्र ठप्प रहा और मीडिया की आजादी को नियंत्रित किया गया। दूसरी ओर, सर्जिकल स्ट्राइक कश्मीर के उरी में सेना के शिविर पर पाकिस्तानी आतंकवादियों द्वारा किए गए आतंकी हमले का जवाब थी। कई दशकों में पहली बार ऐसा हुआ, जब भारत सरकार ने उसी एलओसी के पार जाकर की गई सैन्य कार्रवाई से जनता को अवगत कराया, जिसे वस्तुतः भारत और पाकिस्तान के बीच सरहद समझा जाता है।

प्रथम दृष्टया, इन दोनों घटनाओं में निश्चित तौर पर एक समान कारण — कश्मीर के भू-भाग पर भारत और पाकिस्तान का अपना-अपना दावा है, जिसके लिए पाकिस्तान, भारत में कश्मीरी अलगाववादियों का समर्थन करता है। हालांकि मूलभूत रूप से, ये दो अलग-अलग चुनौतियां हैं, जिनका सामना भारत सरकार को करना पड़ रहा है, इसलिए इनके समाधान भी हर हाल में अलग-अलग होने चाहिए।

इसके अलावा, देश के बाकी भागों को सहज रूप से प्राप्ती आजादी का सुख कश्मीर ने शायद ही कभी भोगा हो।

पहली घटना बुरहान वानी की मृत्यु को ही लीजिए। वानी कश्मीर के एक नामी स्कूल शिक्षक का बेटा था। उसने संभवत: 15 साल की उम्र में आतंकवाद की दुनिया में उस समय कदम रखा, जब उसके भाई को भारतीय सेना ने सामान्य प्रताड़ना के मामले में कथित तौर पर पीट-पीकर मार डाला। बुरहान के भाई की मौत कोई अकेली घटना नहीं है। कश्मीर दुनिया उन इलाकों में से है, जहां सेना की मौजूदगी बहुत ज्यादा तादाद में है, साथ ही भारतीय सशस्त्र बलों को अपने कार्यों के लिए माफी भी प्राप्त है। इस तरह की माफी का आशय भारतीय सशस्त्र बलों द्वारा बार-बार किया जाने वाला मानवाधिकारों का उल्लंघन है, जैसा कि बुरहान वानी के भाई की मौत के मामले में देखा गया। इसके अलावा, देश के बाकी भागों को सहज रूप से प्राप्त् आजादी का सुख कश्मीर ने शायद ही कभी भोगा हो। क्योंकि कर्फ्यू, पुलिस छापेमारी, इंटरनेट तक सीमित पहुंच, स्कूल, कॉलेजों और कारोबारों का बंद होना घाटी में आम बात है। नतीजतन, भारत उस पूरे राज्य की जनता को बेगाना करने में कामयाबी हासिल कर ली है, जिसे वह अपनी राष्ट्रीय पहचान का महत्वपूर्ण अंग समझता है और इस तरह केवल उनकी आजादी की मांग ही और प्रबल हुई है।

इसके विपरीत सर्जिकल स्ट्राइक, पाकिस्तान से उपजने वाले आतंक को सीधा जवाब था। पाकिस्तान की विदेश नीति बुनियादी तौर पर भारत विरोधी है और कश्मीर को अस्थिर करना उसके इसी विशाल लक्ष्य का एक साधन है। इस संदर्भ में, नियंत्रण रेखा के पार आतंकवादियों के शिविरों का सफाया करने के लिए की गई भारत की कार्रवाई लम्बे अर्से से प्रतीक्षित थी। इस तरह की स्ट्राइक होने की घोषणा करना और नई दिल्ली में 25 देशों के राजनयिकों को इस ऑपरेशन की जानकारी देना भी एक बड़ा कूटनीतिक कदम था और इसके एवज में मिला अंतर्राष्ट्रीय समर्थन, खास तौर पर सार्क देशों का समर्थन भारत की कूटनीतिक कामयाबी का सबूत है। इन हमलों ने भारतीय जनता को, पाकिस्तानी सरकार और मोटे तौर पर विश्व समुदाय को दिखा दिया कि भारत अपनी सरजमीं होने वाले इन आतंकी हमलों का जवाब अवश्ये देगा।

दो घटनाओं के बीच अंतर यही है — बुरहान वानी और उसके जैसी घटना भारत सरकार के सख्ती भरे दृष्टिकोण के कारण उत्पन्न हुई और सीमा-पार हमले की जिम्मेदार बाहरी शक्तियां हैं। यह मसला पाकिस्तान की भूमिका के कारण जटिल हुआ है।

यह सच है कि पाकिस्तान, कश्मीर में असंतोष भड़काता है और भारतीय युवाओं को भारत सरकार के खिलाफ उकसाता है। वह भारत से आजादी की मांग करने वाले किसी भी शख्स को वित्तीय और तकनीकी सहायता उपलब्ध कराने के लिए तत्पर रहता है। लेकिन घाटी में नागरिक असंतोष के लिए केवल पाकिस्तान को ही जिम्मेदार ठहराना, इस बात को पूरी तरह समझ पाने में नाकाम रहना है। जब तक इन समस्याओं को अलग-अलग करके नहीं देखा जाएगा, तब तक भले ही भारत-पाकिस्तान संबंधों में आमूल-चूल बदलाव ही क्यों न आ जाए, कश्मीर भी “सामान्य” भारतीय राज्य नहीं रहेगा। महज पाकिस्तान का मसला सुलझा देने से ही किसी औसत कश्मीरी को औसत भारतीय नहीं बनाया जा सकता। भौगोलिक सीमाओं को सफलतापूर्वक हल करने से ही इतिहास नहीं बनेगा।

दरअसल, हाल के महीनों में, भारत ने अपनी पाकिस्तान नीति को कश्मीर से संबंधित ऐतिहासिक विवाद से अलग करने अच्छा प्रयास किया है। जिस तरह भारत-कश्मीर संबंध केवल पाकिस्तान के दृष्टिकोण से निर्दिष्ट नहीं हो रहे, वहीं भारत-पाकिस्तान संबंध भी अब केवल कश्मीर के संदर्भ में नहीं देखे जाने चाहिए। भारत ने प्रभावी रूप से अपनी सीमाएं निर्धारित करते हुए यह स्पष्ट कर दिया है कि दोनों देशों के बीच बातचीत आवश्यक तौर पर आतंकवाद पर केंद्रित रहनी चाहिए तथा हुर्रियत तक पाकिस्तान की पहुंच किसी भी संभावित वार्ता प्रक्रिया को संकट में डालने जैसा होगा। सर्जिकल स्ट्राइक की प्रकृति और उसके बाद ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में पाकिस्तान को आतंकवाद की जननी करार देने और हाल ही में सम्पन्न हार्ट ऑफ एशिया सम्मेलन में पाकिस्तान को और ज्यादा अलग-थलग करने ने कश्मीर को समीकरण से बाहर करने और आतंकवाद को पाकिस्तान से संबंधों की केंद्रीय धुरी बनाने संबंधी भारत की रणनीति में सहायता की है।

आश्चर्यजनक रूप से, मौजूदा सरकार ने अपनी पाकिस्तान नीति में जो हासिल किया है, वही उसे कश्मीर नीति में लागू करने की जरूरत है यानी — कश्मीर को पाकिस्तान से अलग करके देखने की जरूरत है। प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने बिल्कुल सही कदम उठाया था जब उन्होंने कश्मीर के मामले में इंसानियत दिखाने.. की अपील की थी। कश्मीर की जनता को भारतीय संविधान द्वारा प्रदान की गई मौलिक नागरिक स्वतंत्रताओं का जब तक भारत सरकार हनन करती रहेगी, तब तक वे खुद को कभी सही मायनों में भारतीय नहीं समझेंगे। कश्मीर में हर बार चुनाव में अधिकतम मतदान होने की ओर इशारा करना समस्याओं को छुपाने के समान होगा — चुनाव सागर में एक बूंद की तरह हैं। दरअसल असल जरूरत सुशासन की है, ताकि नागरिक अपने निर्वाचित प्रतिनिधियों को रोजमर्रा की चिंताओं से अवगत करा सकें, जरूरत आर्थिक समृद्धि की ऐसी उम्मीद बनाए रखने की है कि स्कूल और कॉलेज में की गई कड़ी मेहनत से आगे चलकर खुशहाल जिंदगी बिताई जा सकेगी। प्रधानमंत्री मोदी इन मसलों को बाकि देश में सुलझाने की कोशिश कर रहे हैं — वास्तव में 2014 के आम चुनाव उन्होंने इन्हीं वादों के बल पर जीते थे — वे घाटी में इन मसलों को अच्छे से सुलझाएंगे।

ये लेखक के निजी विचार हैं।

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