• Nov 11 2016

एससीओ बैंक भारत के लिए खतरे की घंटी!

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बीजिंग, नवंबर 2016: शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) के शासनाध्यक्षों की बैठक इसी हफ्ते किर्गिस्तान के बिश्केक में आयोजित की गई, जिसमें चीन ने विकास को नई गति प्रदान करने और ‘वित्तीय सहयोग को बढ़ावा देने’ के लिए एक एससीओ बैंक को अस्तित्व में लाने का प्रस्ताव औपचारिक रूप से रख दिया। छह सदस्यों वाले इस समूह अथवा संगठन द्वारा बाकायदा स्वीकृत किया जा चुका यह प्रस्ताव तीन कारणों से विशेष अहमियत रखता है :

पहला, इस क्षेत्र में वित्तपोषण के लिए चीन की सक्रिय सहभागिता से उठाए गए अन्य कदमों के विपरीत शंघाई सहयोग संगठन दरअसल सुरक्षा पर केंद्रित गठबंधन है। चीन का प्रस्ताव दिलचस्प है क्योंकि एससीओ के तमाम सदस्य देश ही एशियन इन्फ्रास्ट्रक्चर इन्वेस्टमेंट बैंक (एआईआईबी) के भी संस्थापक सदस्य हैं। ऐसे में यह प्रश्न उठना लाजिमी है कि एससीओ बैंक से आख्रिरकार किस और उद्देश्य की पूर्ति होगी। यह संभावना कतई नहीं है कि एससीओ बैंक का प्रबंधन अथवा उधारी दरें लीक से अलग हटकर होंगी। हालांकि, एआईआईबी के विपरीत इस समूह में अपने प्रभुत्व की बदौलत चीन ही यह खुलकर निर्धारित करेगा कि एससीओ को किन-किन परियोजनाओं का वित्तपोषण करना चाहिए। एससीओ बैंक को बाकायदा अस्तित्व में लाने के अपने प्रस्ताव के जरिए चीन यूरेशियाई भूभाग में आर्थिक विकास की अपनी हामीदारी (अंडरराइटिंग) को इस क्षेत्र के लिए तय अपने रणनीतिक लक्ष्यों से जोड़कर अपना हित साधना चाहता है। एससीओ वैसे तो आसियान की भांति नहीं है, लेकिन इस संगठन में काफी हद तक राजनीतिक और सैन्य आम सहमति जरूर है, जो एससीओ बैंक की निर्णय लेने की प्रक्रिया को प्रभावित करेगी।

एससीओ बैंक को बाकायदा अस्तित्व में लाने के अपने प्रस्ताव के जरिए चीन यूरेशियाई भूभाग में आर्थिक विकास की अपनी हामीदारी (अंडरराइटिंग) को इस क्षेत्र के लिए तय अपने रणनीतिक लक्ष्यों से जोड़कर अपना हित साधना चाहता है।

दूसरा, एससीओ बैंक जल्द ही ब्रिक्स के ‘नव विकास बैंक’ के एक प्रतिद्वंद्वी के रूप में उभर कर सामने आ सकता है। रूस के पड़ोस में उसके जो तात्कालिक हित निहित हैं उनसे यह साफ तौर पर जाहिर होता है। वहीं, ब्रिक्स समूह से बाहर का देश पाकिस्तान क्षेत्रीय परियोजनाओं में शामिल होने के अवसर को भांप करके एससीओ के जरिए (उदाहरण के लिए, चीन-पाकिस्तान आर्थिक कॉरिडोर के विस्तारीकरण के माध्यम से) अपने यहां बुनियादी ढांचे के विकास का मार्ग प्रशस्त करने की कोशिश कर सकता है। पाकिस्तान के साथ-साथ भारत भी इस संगठन या समूह में औपचारिक रूप से वर्ष 2017 में शामिल हो जाएगा, लेकिन ब्रिक्स समूह में भारत को हासिल उच्च रूतबे के विपरीत एससीओ परियोजनाओं में भारत की हैसियत अधिक से अधिक एक कनिष्ठ भागीदार की ही होगी।

तीसरा, चीन ने यह स्पष्ट कर दिया है कि बेल्ट एवं सड़क परियोजना (ओबीओआर) और यूरेशियन आर्थिक संघ के बीच बढि़या ‘तालमेल’ है। जाहिर है, ऐसे में एससीओ बैंक उन मध्य एशियाई देशों के लिए एक प्रलोभन साबित हो सकता है जो अब तक ओबीओआर से जुड़ने से परहेज करते रहे हैं। यही नहीं, रूस पहले ही ओबीओआर को ईईयू से औपचारिक रूप से जोड़ने पर सहमत हो चुका है। अत: इस बात की पूरी संभावना है कि एससीओ बैंक ईईयू में संयुक्त रूप से अपनी आर्थिक ताकत दर्शाने के लिए रूस एवं चीन द्वारा किए जा रहे प्रयासों को आगे बढ़ाने में मददगार साबित हो सकता है, जो पश्चिमी देशों के लिए अवश्य ही खतरे की घंटी होगा।

भारत के लिए आखिरकार इसके क्या मायने हैं?

एससीओ बैंक इस मायने में एक और चेतावनी है कि भारत को एशिया में चीन के बढ़ते पूंजी निवेश के दबदबे या खतरों की अनदेखी नहीं करनी चाहिए। द्विपक्षीय निवेश से हासिल होने वाला राजनीतिक प्रभाव तो इसके केवल एक ही असर को दर्शाता है। उदाहरण के लिए, विशाल बुनियादी ढांचागत परियोजनाओं में निवेश करके मालदीव, श्रीलंका और नेपाल में रसूख हासिल करने के लिए चीन द्वारा किए गए हालिया प्रयासों से इस सोची-समझी पहल की सीमा का पता चल गया है। हालांकि, एससीओ बैंक जैसे संस्थानों के अस्तित्व में आ जाने से चीन को परियोजनाओं के वित्त पोषण कार्यक्रम से अपनी सिल्क रूट परियोजना को जोड़ने और अपने मनमाफिक इस क्षेत्र का आर्थिक परिदृश्य बनाने का मौका मिलेगा। भारत के सेवा उन्मुख व्यवसाय आपूर्ति श्रृंखला (सप्लाई चेन) के उच्च पायदान पर जिस तरह से अत्यंत प्रतिस्पर्धी माने जाते हैं, उसके मद्देनजर यह संभवत: भारत के लिए सर्वाधिक चिंता का विषय है। दरअसल, यदि ओबीओआर अथवा एससीओ बैंक जैसी परियोजनाओं के दम पर मध्य और दक्षिण-पूर्व एशिया में चीन के कैप्टिव बाजार बन जाते हैं तो बुनियादी ढांचागत सुविधाओं की स्थापना होते ही चीन की कंपनियों के लिए सप्लाई चेन में उच्च पायदान पर पहुंचना आसान हो जाएगा। वैसी स्थिति में भारतीय कारोबारियों के लिए निवेश संबंधी दिशा-निर्देशों, औद्योगिक मानदंडों या मानकों में अपने हिसाब से फेरबदल कराना मुश्किल हो सकता है, क्योंकि इनका वास्ता मुहैया कराई जाने वाली सेवाओं के स्तर से होता है।

अलीबाबा का उदाहरण

एक अच्छा उदाहरण अलीबाबा है, जो चीन की शीर्ष ई-कॉमर्स कंपनी है। भले ही हुआवेई इस क्षेत्र में दूरसंचार और आईसीटी की बुनियादी ढांचागत सुविधाओं की प्रमुख आपूर्तिकर्ता नजर आती हो, लेकिन अलीबाबा संभवत: इसी दशक में रूस और यूरेशिया में अपना व्यापक विस्तारीकरण बाकायदा कर लेगी। यह माना जा रहा है कि अलीबाबा के पेमेंट पोर्टल ‘अलीपे’ को इंटरनेट पर लेन-देन के एक तेज एवं कुशल साधन के रूप में प्रवर्तित या प्रमोट किया जाएगा। आखिरकार, चीन एक रसद श्रृंखला (लॉजिस्टिक्स चेन) की स्थापना अवश्य ही करेगा और ज्यादातर विक्रेताओं (वेंडर) को चीन के ही किसी पेमेंट गेटवे का इस्तेमाल करने में सहजता महसूस होगी। क्या वैसी स्थिति में भारतीय वेंडर और वित्तीय प्रौद्योगिकी क्षेत्र के अन्वेषक (इनोवेटर) बाजार से बाहर हो जाएंगे? क्या ‘फिनटेक’ प्रणालियों में चीन के प्रभुत्व से यह देश इस क्षेत्र के इन्क्रिप्शन और डेटा संरक्षण मानदंडों में अपने हिसाब से फेरबदल करने में भी सक्षम हो जाएगा? क्या रिटेल आउटसोर्सिंग पर निर्भर भारतीय सेवाओं के लिए एशिया के कुछ बाजारों के द्वार उनके वहां प्रवेश करने से पहले ही बंद हो जाएंगे?

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यह जरूरी नहीं है कि ये भयावह असर अवश्य ही कहर ढाएंगे, लेकिन भारतीय नीति निर्माताओं को रणनीतिक चीनी निवेश के संभावित खतरों की अनदेखी नहीं करनी चाहिए। एससीओ बैंक को भारत की अगुवाई या उसकी सहभागिता वाली पहलों जैसे कि ब्रिक्स बैंक के एक प्रतिद्वंद्वी के रूप में चिह्नित भी किया जाना चाहिए, जो इस क्षेत्र में एक आर्थिक शक्ति के रूप में भारत की भूमिका को कम कर सकता है। यह कहने का मतलब कतई नहीं है कि भारत को एससीओ बैंक से दूर ही रहना चाहिए। कुछ खास वास्तविकताएं अपरिवर्तित ही रहती हैं: निवेश के लिए चीन के पास भरपूर पैसा है; पाकिस्तान यह कहकर चीन को बहलाने का प्रयास करेगा कि वह संभावित निवेश का एक उपयुक्त गंतव्य है; और आने वाले वर्षों में रूस-चीन धुरी और ज्यादा मजबूत होगी। भारत को इस खेल से बाहर रहने पर कुछ भी लाभ नहीं होगा। चीन वैधता एवं आकर्षक बाजार रिटर्न दोनों ही पाने के लिहाज से भारत में निवेश करने के लिए निश्चित रूप से उत्सुक है। क्या इस तरह के निवेश के साथ-साथ बड़ी आर्थिक परियोजनाओं पर चीन-भारत भागीदारी भी सुनिश्चित की जानी चाहिए, इस बारे में दोनों ही देशों को आपस में चर्चा करके निर्णय लेना होगा। भारत को यह वास्तविकता स्वीकार करनी पड़ सकती है कि कुछ विशेष बुनियादी ढांचागत परियोजनाओं की रूपरेखा तैयार करने में उसकी और चीन की भागीदारी बराबरी की नहीं होगी। हालांकि, इसमें सहभागिता का और कोई विकल्प भी नहीं है। चीन की अगुवाई वाली क्षेत्रीय पहलों से खुद को अलग रखने पर भारत एशिया में अपने कारोबारियों एवं परियोजनाओं के भविष्य को सुरक्षित रखने और नि:संदेह इसके साथ ही विकास की डगर तय करने का भी महत्वपूर्ण अवसर गंवा देगा।

यह चीन की विदेश नीति और भारत के लिए इसके उद्भव के क्या–क्या मायने हैं, इस पर तीन भागों की श्रृंखला का अंतिम हिस्सा है।

पहला भाग: भारत के लिए अहम है चीनी योजना ओबीओआर में यूरोपीय दिलचस्पी

दूसरा भाग: फिलीपींस-चीन संबंधों के बदलते आयाम और भारत

ये लेखक के निजी विचार हैं।

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