• May 25 2017

भारत में इलाज और मूल्य नियंत्रण की हकीकत

दिल को रक्त की आपूर्ति दुरुस्त करने वाले कार्डिएक स्टेंट की कीमत तय करने वाले राष्ट्रीय औषधि मूल्य प्राधिकरण (एनपीपीए) के फरवरी, 2017 के आदेश ने भारत में स्वास्थ्य के कारोबार को प्रभावित करने वाले तथ्यों को फिर से चर्चा में ला दिया है। देश में स्टेंट लगाने की सुविधा और इसके बढ़ते उपयोग को देखते हुए यह आलेख खास तौर पर इन बिंदुओं पर चर्चा करता है — (अ) स्वास्थ्य सुविधाओं की कीमत सीमित करने में मूल्य नियंत्रण की भूमिका; (ब) स्वास्थ्य सुविधाओं की कीमत में आर्थिक नियमन और संबंधित बाजार शक्तियों की भूमिका; (स) स्वास्थ्य सुविधाओं की कीमत तय करने में मूल्य निर्धारण व्यवस्था और नतीजे आधारित उपायों की भूमिका; (द) स्वास्थ्य सुविधाओं की कीमत तय करने में साक्ष्य-आधारित नीति की भूमिका। यह शोधपत्र इस बात की वकालत करता है कि भारत को मूल्य निर्धारण व्यवस्था और नतीजे आधारित उपायों में ज्यादा पारदर्शिता लानी होगी और साथ ही साक्ष्य आधारित नीति तैयार करने की व्यवस्था तो बेहद जरूरी है ही।

परिचय

भारत में हृदय रोग मृत्यु का एक प्रमुख कारण बन चुका है। वर्ष 2015 के दौरान बीमारियों से हुई मौतों में एक चौथाई की वजह यही थी। ‘ग्लोबल बर्डेन ऑफ डिजीज’ (जीबीडी) 2015 नाम के अध्ययन के मुताबिक भारत के लिए इन वजह से होने वाली आयु-मानकीकृत मृत्यु दर प्रति लाख 272 है। हालांकि ताजा बड़े भविष्योन्मुखी अध्ययनों में इसकी आयु-मानकीकृत मृत्यु दर और अधिक बताई गई है। पुरुषों में यह 225 से 525 प्रति लाख और महिलाओं में 225 से 299 प्रति लाख मानी गई है। [i] इस बीमारी का इतना ज्यादा बोझ होने के बावजूद बहुत कम मामलों में ही इसकी पहचान हो पाती है। हालांकि यह भी सच है कि बिना सर्जरी के होने वाले पर्कुटैनुअस कोरोनरी इंटरवेंशन (पीसीआई) की संख्या [ii] हर साल बढ़ती जा रही है। ‘कार्डियोलॉजी सोसाइटी ऑफ इंडिया’ (सीएसआई) की रजिस्ट्री ‘नेशनल इंटरवेंशन काउंसिल’ (एनआईसी) के आंकड़े बताते हैं कि देश में कैथेटराइजेशन लैब की संख्या [iii] वर्ष 2010 के 251 से बढ़ कर वर्ष 2015 में 630 पर पहुंच गई है। इसी तरह 2014 और 2015 के दौरान ऐसे इलाजों में कुल 51 फीसदी की बढ़ोतरी आई। वर्ष 2015 में 3,75,000 मरीजों के लिए 4,75,000 स्टेंट का उपयोग किया गया यानी, औसतन 1.27 प्रति मामले (टेबल-1)।

टेबल 1: कैथ लैब, कोरोनरी ऑपरेशन और स्टेंट, 2010 से 2015

201020112012201320142015
कैथ लैब केंद्र251332369404396630
कोरोनरी ऑपरेशन117420152332177240216817248152375000
प्रति केंद्र कोरोनरी ऑपरेशन468459480537627595
कुल स्टेंट146719193728215662262349248152475000
प्रति ऑपरेशन स्टेंट1.251.271.221.211.001.27

स्रोत: नेशनल इंटरवेंशन काउंसिल की ओर से पिछले वर्षों के दौरान दिए गए विभिन्न प्रजेंटेशन और रिपोर्टों से लेखकों की ओर से तैयार किया गया आकलन[iv]

राष्ट्रीय औषधि मूल्य नियंत्रण प्राधिकरण (एनपीपीए) के ताजा आदेश एफ. नं. 19(837)/ 2016/ डिवी.II/डीपी/एनपीपीए, तारीख दो फरवरी, 2017 ने कार्डिएक स्टेंट की कीमत निर्धारित कर दी। यह आदेश जारी करते हुए एनपीपीए ने कहा कि इसमें मुनाफा बहुत अधिक और अतार्किक हो गया है। इसकी आपूर्ति के विभिन्न पायदानों पर भारी मुनाफाखोरी हो रही है जिसमें निजी अस्पताल और क्लीनिक भी शामिल हैं। एनपीपीए ने कहा कि यह स्थिति स्वास्थ्य वित्त व्यवस्था में विभिन्न आर्थिक और नैतिक मुद्दे खड़े करती है। यह आदेश यह भी कहता है कि जिस तरह की मुनाफाखोरी हो रही है वह “नाकाम बाजार व्यवस्था” की ओर इशारा करती है और जहां सूचना की अनुपलब्धता ने अनैतिक तौर-तरीकों को बढ़ावा दिया है। [v]

दिसंबर, 2014 में वकील बिरेंद्र सांगवान ने यह लड़ाई शुरू की थी। उन्होंने सूचना का अधिकार कानून के तहत आवेदन दाखिल कर स्टेंट के बेतहाशा महंगे होने का मामला उठाया। सांगवान को जब एनपीपीए ने जवाब दिया तो उन्होंने उसेे भी चुनौती दी। उन्होंने अपने दोस्त के पिता से फरीदाबाद के एक निजी अस्पताल में स्टेंट के लिए 1.2 लाख रुपये वसूले जाने का सबूत पेश किया। इसके बाद एनपीपीए ने जवाब दिया कि स्टेंट को औषधि और सौंदर्य प्रसाधन कानून के तहत ‘दवा’ के तौर पर अधिसूचित तो किया गया है, लेकिन अनिवार्य औषधि की राष्ट्रीय सूची (एनएलईएम) में शामिल नहीं किया गया है इसलिए इस पर ‘मूल्य सीमा’ लागू नहीं की गई है।

सांगवान इतने पर भी नहीं रुके। उन्होंने 2015 में जनहित याचिका दायर कर दी। शुरुआत में स्टेंट को एनएलईएम में शामिल कर इसके मूल्य को नियंत्रित करने के हाई कोर्ट के आदेश पर सरकार ने कोई सक्रियता नहीं दिखाई। लेकिन जुलाई, 2016 में इस पर जब अवमानना याचिका दायर की गई तब जा कर सरकार जागी और दिसंबर में औषधि मूल्य नियंत्रण आदेश की पहली अनुसूची में स्टेंट को शामिल किया। आखिरकार फरवरी, 2017 को स्टेंट की कीमत को बेयर मेटल स्टेंट (बीएमएस) के लिए 7,260 और ड्रग एल्यूटिंग स्टेंट (डीईएस) के लिए 29,600 रुपये तय कर दिए। [vi] उससे पहले बेयर मेटल स्टेंट का मूल्य औसतन 45,000 रुपये था और ड्रग एल्यूटिंग स्टेंट औसतन 1.2 लाख रुपये में मिल रहा था। इस तरह इस पर 270 प्रतिशत से ले कर 1,000 प्रतिशत तक का भारी मुनाफा कमाया जा रहा था। [vii] इसके बाद सरकार ने स्टेंट की कीमतों में आई गिरावट के लिए श्रेय लेना भी शुरू कर दिया। [viii]

ध्यान देने की बात है कि स्टेंट के कुल प्रयोग में डीईएस का उपयोग लगातार बढ़ता जा रहा है। वर्ष 2002 से 2015 के दौरान इसका सीएजीआर 22.86 प्रतिशत से बढ़ कर 53.52 प्रतिशत पर पहुंच गया (तालिका -1)। हाल के शोधों ने बताया है कि बीएमएस के मुकाबले डीईएस के प्रभाव में कोई गंभीर अंतर नहीं हैै। कुछ खास तरह की समस्या वाले मरीजों में ही इसे कीमत के अनुरूप उपयोगी पाया गया है। 2016 में 9,013 मरीजों पर किए गए एक याद्रिच्छिक नियंत्रित शोध (रैंडमाइज्ड कंट्रोल्ड ट्रायल) में पाया गया कि जिन मरीजों का ऑपरेशन हुआ उनमें छह साल के बाद बेयर मेटल स्टेंट लगवाने वालों और ड्रग एल्यूटिंग स्टेंट लगाने वालों में किसी भी कारण से या कुछ खास तरह के संक्रमण की वजह से मृत्यु के लिहाज से कोई अंतर नहीं पाया गया। [ix] जहां तक कीमत का सवाल है, 2012 में दोनों तरह के स्टेंट के बीच एक व्यवस्थित समीक्षा की गई जिसमें कीमत के अनुकूल इसकी उपयोगिता पर विचार किया गया। इसमें पाया गया कि ड्रग एल्यूटिंग स्टेंट सिर्फ उन्हीं मामलों में किफायती हैं, जिनमें मरीज को रेस्टेनोसिस या मल्टीपल वेसल डिजीज का ज्यादा खतरा हो। [x] इस तरह की चर्चा इसलिए भी ज्यादा उपयोगी हो जाती है, क्योंकि भारत में दिल से जुड़े ऑपरेशनों में 43.9 प्रतिशत का खर्च मरीज अपनी जेब से उठाते हैं (देखें- तालिका 2)। एनएसएसओ के 71वें दौर के सर्वे के मुताबिक हृदय संबंधी समस्या को ले कर अस्पताल में भर्ती होने के हर पांच में से एक मामले में अस्पताल के खर्च का भुगतान करने के लिए मरीज के परिवार वालों को कर्ज लेना होता है या फिर अपनी संपत्ति बेचनी पड़ती है। इसी सर्वे में पाया गया है कि 53 प्रतिशत आबादी को अचानक आ जाने वाले स्वास्थ्य संबंधी खर्च की मार झेलनी पड़ती है। [xi]

तालिका 1: भारत में स्टेंट और ड्रग एल्यूटिंग स्टेंट स्टेंट के उपयोग का स्वरूप [xii]

तालिका 2: हृदय संबंधी ऑपरेशनों के खर्च का स्रोत (2014)[xiii]

उधर, अस्पतालों के संगठनों का दावा है कि जो मुनाफा वसूला जा रहा था, वह जायज था, क्योंकि अपने अस्पताल को सुचारू रुप से चलाते रहने और लोगों को सेवा देने के लिए उन्हें बड़ी मात्रा में पूंजीगत संपत्तियों (कैपिटल एसेट्स) में निवेश करना होता है। जबकि एनपीपीए का तर्क है कि अस्पताल इस सेवा में अपनी तरफ से कोई मूल्य संवर्धन नहीं करते और इसलिए उन्हें इसमें अपना मुनाफा बनाना बंद कर देना चाहिए।

विश्लेषण और सुझाव

एनपीपीए के आदेश ने स्वास्थ्य पर व्यापार के प्रभाव और भारत में स्वास्थ्य संबंधी खर्च पर नैतिकता से जुड़े सवालों को प्रासंगिक बना दिया है। इस बहस में जो सवाल शामिल हैं, उनमें मुख्य हैं- (अ) स्वास्थ्य सुविधाओं की कीमत सीमित करने में मूल्य नियंत्रण की भूमिका; (ब) स्वास्थ्य सुविधाओं की कीमत में आर्थिक नियमन और संबंधित बाजार शक्तियों की भूमिका; (स) स्वास्थ्य सुविधाओं की कीमत तय करने में मूल्य निर्धारण व्यवस्था और नतीजे आधारित उपायों की भूमिका; (द) स्वास्थ्य सुविधाओं की कीमत तय करने में साक्ष्य-आधारित नीति की भूमिका।

स्वास्थ्य सुविधाओं की कीमत सीमित करने में मूल्य नियंत्रण की भूमिका

फोटो: जैसन बेचतेल/फ्लि‍कर

स्वास्थ्य संबंधी खर्च को ले कर भारत की तरह कई देश आर्थिक और नैतिक सवालों का सामना कर रहे हैं। इन असमंजस से निपटने के लिए अक्सर जुर्माना, दंड और मूल्य नियंत्रण आदि उपाय अपनाए जा रहे हैं। ऐसा करते समय मान लिया जाता है कि इससे दवा कारोबार के लोगों के व्यवहार में और उनके फैसलों में इसका भय भी शामिल रहेगा। जबकि दी गई परिस्थितियों में अन्य चीजों को पूरी तरह वैसा ही छोड़ दिया जाता है। ऐसे में ये उपाय विभिन्न संबंधित पक्षों के कार्यों और फैसलों के लिहाज से बहुत लाभकारी नहीं हो पाते। एनपीपीए के आदेश के बाद मूल्य नियंत्रण और ऐसे दूसरे उपायों के प्रभाव को ले कर भी सवाल खड़े होते हैं।

अनिवार्य सेवा कानून, 1955 और औषधि (मूल्य नियंत्रण) आदेश, 2013 के तहत एनपीपीए के मूल्य नियंत्रण संबंधी आदेश को लागू करने में अगर कोई भी निर्माता, संस्थान या व्यक्ति नाकाम रहता है तो उसे ज्यादा वसूली गई राशि और उस पर लगने वाला ब्याज एनपीपीए में जमा करना होगा। नियमानुसार एनपीपीए की ओर से तय की गई अधिकतम मूल्य की सीमा एक साल तक लागू रहेगी, बशर्ते कि उसे नई गजट घोषणा के जरिए आगे नहीं बढ़ा दिया जाए। हालांकि यह बहस का विषय है कि ये जुर्माने स्टेंट के निर्माताओं या विक्रेताओं के व्यवहार को किस तरह बदलने में कामयाब होंगे।

किसी आर्थिक व्यवस्था में मुख्य पक्षों के व्यवहार को वांछित दिशा में प्रभावित करने को ले कर अनेक विश्लेषण हुए हैं। मौलिक सोच यह है कि जब नियामक किसी खास व्यवहार पर नकारात्मक नतीजे या जुर्माने का प्रावधान करता है तो उसके व्यवहार पर तत्काल प्रभाव पड़ता है और वह उस आदेश का सख्ती से पालन करता है। लेकिन जब आप इसे ध्यान से देखते हैं तो पता चलता है कि ऐसे जुर्माने लगाने या नकारात्मक नतीजे वाले उपायों का असर बहुत लंबे समय तक नहीं रहता और थोड़े समय ही यह उसके व्यवहार को संचालित कर पाता है। एक तर्क यह भी दिया जाता है कि अवांछित व्यवहार को रोकने के लिए अगर कोई जुर्माने या दंड का प्रावधान किया जाए और उसे अमल में लाने के लिए आपके पास प्रभावी साधन नहीं हों तो उससे भविष्य के व्यवहार में बदलाव सुनिश्चित नहीं होता।

स्वास्थ्य सुविधाओं की कीमत में आर्थिक नियमन की भूमिका

मूल्य नियंत्रण सहित आर्थिक नियमन के प्रभाव के विश्लेषण के लिए बाजार की ताकतों से जुड़े विस्तृत और पूर्ण ब्योरे होने जरूरी हैं। मेडिकल बाजार में मांग और आपूर्ति की ताकतें काम कर रही हैं, सूचना की स्पष्टता नहीं होती, फैसला लेने में कई सारे पक्ष काम कर रहे होते हैं। बाजार में मूल्य नियंत्रण आखिरकार नई कीमत होगा। जुर्माना कितना लग रहा है यह उसके व्यवहार को तय करने के लिए बहुत अहम होगा। भय के तत्व के अलावा उसे लंबे समय तक प्रभावी बनाए रखने के लिए हर प्रयास के साथ जरूरी माहौल भी बनाए जाने की जरूरत है ताकि उसका प्रभाव हो सके क्योंकि कई सारी शक्तियां एक साथ काम कर रही होती हैं। नियमन नैतिक तरीकों के लिए माहौल बनाने की बजाय मुनाफाखोरी से ज्यादा जुड़ा है।

मूल्य नियंत्रण लागू किए जाने से लोगों का उस माहौल को ले कर नजरिया बदल जाता है, जिसमें वे काम कर रहे होते हैं। आदेश में तय किया गया जुर्माना मरीज की सोच को अलग तरह से प्रभावित कर सकता है। जिस तरह मरीजों को स्टेंट के बारे में सूचना दी जाती है और यह दावा किया जाता है कि महंगे स्टेंट बेहतर होंगे, मरीज यह मान सकता है कि उसे जो दिया जा रहा है वह वास्तव में सही है। प्रदाता और मरीज के बीच का सामाजिक संपर्क और इस संबंध के आस-पास मौजूद मानक में कई सारी सीमाएं हैं और वांछित व्यवहार हासिल करने के लिए यह प्रभावी नहीं भी हो सकते हैं। प्रदाता की तरफ से देखें तो अस्पताल एक खास तरह की सोच के तहत कीमत वसूल रहे थे, अब भविष्य में वे उसी तरह काम कर सकते हैं, मगर रकम वसूलने के लिए अलग उपाय अपना सकते हैं जिसमें सेवाओं का भुगतान अलग-अलग कर के लेना शामिल है। प्रदाताओं के लिए बदले हुए माहौल में छवि खराब होने और साख कम होने का नुकसान हुआ है। संभावना के आधार पर देखें तो ये प्रदाता अब इस कीमत को भी अपने रिस्क प्रबंधन रणनीति में शामिल कर लेंगे जैसा कि वे दूसरी आशंकाओं को पहले से इसमें शामिल कर के चलते हैं।

मूल्य नियंत्रण में मौलिक समस्या को लक्ष्य नहीं किया गया है। मूल बात है कि क्या इससे उपयुक्त रास्ता और प्रक्रिया तैयार होती है। क्योंकि इसे बहुत हल्के-फुल्के अंदाज में परिभाषित किया जाता है, इसलिए वास्तविक व्यवहार को किसी भी तरह से बदला जा सकता है। जिस सेवा की जरूरत नहीं है, उसे खरीदने को ले कर किसी शर्म या अपराधबोध को शामिल नहीं किया जा सकता। खरीद का व्यवहार आपकी अपनी इच्छा के मुताबिक होता है। चूंकि फैसले के विभिन्न मानक बिना बदले छोड़ दिए गए हैं, इसके प्रभाव को ले कर भी विश्वास से कुछ नहीं कहा जा सकता। पूरा नहीं करने पर लगने वाला जुर्माना पूरी प्रक्रिया का सिर्फ एक हिस्सा है और वह निर्णय समस्या के सिर्फ एक पक्ष को प्रभावित करता है जो इस मामले में अस्पताल हैं। ऐसे में उनके पसंदीदा बदलाव के स्तर को कम करने के लिए कोई इस खेल के दूसरे पैमानों को बदलने के लिए स्वतंत्र होगा। ऐसे में अंतिम नतीजा ठीक वैसा नहीं होगा, जैसा कि सोचा गया था।

स्वास्थ्य सुविधाओं की कीमत तय करने में मूल्य निर्धारण व्यवस्था और नतीजे आधारित उपायों की भूमिका

व्यापक व्यवस्था में अस्पताल की अपनी चुनौतियां हैं और मूल्य नियंत्रण पर हो रही चर्चा की पृष्ठभूमि के लिए इस बाजार की विशेषताओं को समझना महत्वपूर्ण है। एक अहम कारक प्रतिस्पर्धा का माहौल (कंटेस्टेबलिटी) भी है, जहां नई फर्म को बाजार में प्रवेश करने और छोड़ने में बहुत आसानी हो। ऐसे बाजार में प्रवेश और निकास के लिए कोई अड़चन नहीं होती। ऐसे बाजार में अगर कीमत औसत मूल्य स्तर से बहुत ज्यादा बढ़ जाती है और प्रदाता अत्यधिक मुनाफा वसूलने लगते हैं, तो ऐसे में संभावित प्रतिद्वंद्वी बाजार में इस स्थिति का फायदा उठाने के लिए प्रवेश करेंगे। ऐसे में पहले से कार्यरत इकाइयां भी कीमत को को घटा कर अपना मुनाफा सामान्य करने को मजबूर होगी। प्रतिद्वंद्वी बाजार की अगर आदर्श व्यवस्था हो तो बाजार में एक अकेला खिलाड़ी भी होगा तो वह प्रतिद्वंद्वी व्यवहार करेगा।

अस्पताल का बाजार पूरी तरह से प्रतिद्वंद्वी नहीं कहा जा सकता, क्योंकि डूबने की आशंका की वजह से इसमें प्रवेश और निकास को ले कर अड़चनें हैं। इसके साथ एक और तथ्य यह भी जुड़ा है कि एक खास तरह का साधन उपयोग में लाने का फैसला मरीज की ओर से नहीं बल्कि डॉक्टर की ओर से प्रभावित हो रहा है जिसमें मरीज और डॉक्टरों के बीच सूचना का सही तंत्र नहीं है। अक्सर ऐसी स्थिति अनावश्यक मांग की समस्या की ओर ले जाती है। अस्पतालों की ओर से होने वाले बहुत से अनैतिक आचरण और हैरानी में डालने वाले नतीजों की जड़ में वजह यही हैं। इसमें बहुत सी चीजें शामिल हैं जैसे अस्पताल की ओर से सेवा के शुल्क में बढ़ोतरी या अनावश्यक क्लीनिकल प्रक्रियाओं को किया जाना। अगर प्रतिद्वंद्विता का वास्तविक माहौल नहीं है तो बाजार में चाहे बहुत बड़ी संख्या में भी खिलाड़ी मौजूद होंगे तब भी आपको सही और प्रभावी तौर-तरीके देखने को नहीं मिलेंगे। निजी स्वास्थ्य सेवाओं के मामले में लोगों की भुगतान की क्षमता जरूरत पर हावी हो जाती है। अस्पताल की मूल्य नीति स्वस्थ्य की बजाय व्यापार हितों को प्रमुखता देती है। भारत को अभी यह नियम बनाना बाकी है कि डॉक्टरों की पर्ची पर जेनरिक दवाओं के ही नाम लिखे जाएंगे ना कि महंगे ब्रांड के जिनके बेहतर प्रभाव का कोई दावा नहीं कर सकता। ऐसी स्थिति में बाजार के आयामों को देखते हुए नियामक की ऐसी प्रतिक्रिया स्वभाविक ही है। नियामक की ओर से ऐसे में आम तौर पर एक ही प्रतिक्रिया होती है कि संदिग्ध मूल्य को गैरकानूनी करार देने का आदेश दिया जाए। ऐसे में मेडिकल सेवा बाजार में वित्तीय संसाधन उपलब्ध करवा कर वास्तविक प्रतिद्वंद्विता का माहौल कायम करने की ओर ध्यान ही नहीं जाता।

इसी तरह, देश के मौजूदा स्वास्थ्य आंकड़े लोगों के सूचना के आधार पर फैसला लेने के लिए अपर्याप्त हैं। भारत में मूल्य निर्धारण व्यवस्था इतनी अच्छी नहीं है कि इसमें इलाज के दौरान आने वाली लागत, गतिविधियों या प्रक्रिया और नतीजे के बीच संबंध को समझ कर फैसला लिया जा सके। ऐसी प्रक्रिया के लागत आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं। जब अस्पताल संघ यह दावा करते हैं कि कार्डिएक स्टेंट को शरीर में लगाने के लिए एक व्यवस्था की जरूरत होती है और उस व्यवस्था और पूरे तंत्र को सुचारू रुप से चलाने के लिए पूंजीगत निवेश की जरूरत होती है इसलिए उनका स्टेंट पर मुनाफा कमाना गलत नहीं है तो यह सवाल खड़ा होता ही है कि आखिर इन लागत को स्टेंट पर क्यों जोड़ा जाना जरूरी है। इस स्थिति का जवाब अस्पताल की विस्तृत गतिविधि आधारित लागत को पता करने वाली व्यवस्था में मिल सकता है। मौजूदा स्थिति यह संकेत करती है कि विभिन्न गतिविधियों की लागत का संबंधित पक्षों को वास्तव में पता नहीं है। लागत सूचना के तौर पर इस समय सिर्फ वेतन, दवा और मरहम-पट्टी आदि की कीमत का ही पता है। अगर आप उदाहरण के तौर पर किसी खास मामले में अस्पताल में भर्ती होने की लागत का आकलन करना चाहें तो वह संभव नहीं हो पाएगा।

यह तर्क देना की स्टेंट की कीमत अन्य सामानों और ऑपरेशन के साथ जोड़ कर ली जाती है, अपने आप में ही हास्यास्पद है और दिखाता है कि बेहद प्रतिष्ठित अस्पतालों के पास भी लागत आकलन की ठीक व्यवस्था नहीं है। इन संस्थानों के लिए यही समय है जब वे वित्तीय प्रबंधन के मौलिक ढांचे में निवेश करें और अपनी लागत को समझें और उस मुताबिक अपना तर्क पेश करें। हाल के समय में बहुत से निजी और कारपोरेट अस्पतालों ने अपने मरीजों की देख-भाल, खर्च, बिलिंग, मेडिकल रिकार्ड और बीमा आदि के लिए अस्पताल प्रबंधन सूचना व्यवस्था (एचएमआईएस) में निवेश करना शुरू किया है। यह देख कर हैरानी होती है कि सूचना तकनीक में इतनी प्रगति के बावजूद ये अस्पताल इलाज की लागत का आकलन करने के आंकड़े जुटाने की व्यवस्था में नाकाम हैं।

कुछ लोगों का तर्क है कि बीमा कंपनियां इन ऑपरेशनों का भुगतान करती हैं और वे ही नियमित तौर पर मूल्य संबंधी आंकड़े तैयार करती हैं। लेकिन यह समझना होगा कि बीमा कंपनियों के मूल्य संबंधी आंकड़े उन दरों पर आधारित होते हैं, जिनको वे मोल-जोल के आधार पर तय करती हैं इसलिए वास्तविक लागत का इससे बहुत संबंध नहीं होता। बीमा मूल्य आंकड़े कई बार एक साथ कई चीजों के जोड़े गए मूल्य होते हैं और इसमें लोगों को विभिन्न अलग-अलग सेवाओं और कारकों की लागत नहीं पता चल पाती। एक और चुनौती है कि विभिन्न ऑपरेशनों और इलाजों का वास्तविक नतीजा लोगों को पता नहीं है और इस दिशा में आंकड़े जुटाने के कोई गंभीर प्रयास भी नहीं हो रही। अक्सर नतीजों की जगह प्रक्रिया पर ही जोर होता है, जैसे कि स्टेंट कौन सा इस्तेमाल होगा, इस पर जोर दे दिया जाता है, जबकि उस ऑपरेशन का वास्तविक नतीजा गौण हो जाता है। यह शोधपत्र जोर देता है कि यह सही तरीका नहीं है।

नतीजों का आकलन मरीज के जीवन की अवधि और गुणवत्ता को बढ़ाने के आधार पर होना चाहिए या फिर एक मेडिकल ढांचे में तैयार किए गए नतीजे के आधार पर। [xiv] निजी अस्पतालों में यह सूचना हासिल करने को ले कर बिल्कुल भी जोर नहीं है। यहां तक कि अगर दुबारा भर्ती होने के मामलों का भी हिसाब रखा जाए तो यह गुणवत्ता के लिहाज से एक अहम आंकड़ा होगा। एक और बिंदू पर ध्यान दिए जाने की जरूरत है। देश के विभिन्न अस्पतालों में क्लीनिकल गतिविधियों और उनकी लागत में भारी फर्क दिखाई देता है। जो लोग स्वास्थ्य क्षेत्र में कार्यरत हैं, वे इस तथ्य को अच्छी तरह जानते हैं। इसके बावजूद इस बात पर कोई सहमति नहीं है कि बेहतरीन तरीका क्या हो। कई मौकों पर डॉक्टरों के पास प्रयास और नतीजे के संबंध को ले कर उपयोगी सूचना होती है। खास तौर पर यह देखने के लिए कि क्या वांछित है और क्या नहीं। इसके बावजूद वे इस जानकारी को अक्सर उपेक्षित कर देते हैं, क्योंकि ऐसा करना उन्हें लाभकारी लगता है। बहुत से अस्पतालों में डॉक्टर ‘राजस्व लक्ष्य’ के आधार पर काम करते हैं। निजी या कारपोरेट अस्पताल के सांगठनिक दबाव या तीसरे पक्ष की ओर से भुगतान या लाभ का लक्ष्य होने की वजह से नैतिकता अक्सर ताक पर चली जाती है। अस्पतालों को बाजार की बेहद बंटी हुए व्यवस्था में काम करना होता है और उनकी खरीद के मामले में भी ऐसा ही होता है। ऐसी व्यवस्था की वजह से उसकी लागत बढ़ जाती है और बड़ी मात्रा के बावजूद उसकी लागत कम नहीं हो पाती।

स्वास्थ्य सुविधाओं की कीमत तय करने में साक्ष्य-आधारित नीति की भूमिका

भारतीय संविधान स्वास्थ्य और स्वास्थ्य सुविधा हासिल करने को अधिकार का दर्जा नहीं देता। [xv] स्वास्थ्य सेवा हासिल करने के लिए नागरिकों को न्यायिक सक्रियता का सहारा लेना पड़ा है जैसे कि संविधान की धारा 21 या विभिन्न नीति निर्देशक तत्व या फिर अंतरराष्ट्रीय समझौतों में किए गए प्रावधान। [xvi] न्यायिक सक्रियता के मामलों को किनारे करने का एक तरीका यह हो सकता है कि हम साक्ष्य आधारित नीति निर्माण शुरू करें। कार्डिएक स्टेंट का मूल्य निर्धारण इसका बेहतरीन उदाहरण है। एनपीपीए का फैसला तब आया जब किसी व्यक्ति ने इस पर जनहित याचिका दायर की और कई वर्षों तक संघर्ष करता रहा। भारत को एक मेडिकल तकनीक मूल्यांकण बोर्ड (एमटीएबी) गठित करने पर ध्यान देना चाहिए, जैसा कि युनाइटेड किंगडम में ‘नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हेल्थ एंड क्लीनिकल एक्सेलेंस’ (एनआईसीई) है या फिर थाईलैंड में ‘हेल्थ इंटरवेंशन एंड टेक्नालॉजी एसेसमेंट प्रोग्राम’ (एचआईटीएपी) है, ताकि हर नई दवा, मेडिकल उपकरण या तकनीक का क्लीनिकल प्रभाव, सुरक्षा और लागत के अनुरूप प्रभाव के पैमाने पर आकलन किया जा सके। इससे न्यायिक सक्रियता को कम करने में मदद मिलेगी, आवश्यक स्वास्थ्य सुविधाओं को हासिल करने के लिए मजबूरन आम लोगों को जिसकी शरण लेनी होती है।

निष्कर्ष

भारत का 65,000 करोड़ रुपये का मेडिकल उपकरण का बाजार लगभग 70 प्रतिशत आयात पर निर्भर है। इस समय स्थान, उपयोग और रख-रखाव के लिहाज से मेडिकल उपकरण बाजार का 99 प्रतिशत सरकार की ओर से होने वाले नियमन से बाहर है। औषधि और सौंदर्य प्रसाधन कानून 1940 के तहत कार्डिएक स्टेंट सहित सिर्फ 20 उपकरणों को अधिसूचित किया गया है। भारत सरकार के स्वास्थ्य शोध विभाग की ओर से मेडिकल तकनीक मूल्यांकण बोर्ड (एमटीएबी) की स्थापना का प्रस्ताव पहली बार 2012 में ही किया गया था। लेकिन अब तक यह हकीकत के धरातल पर नहीं आ सका है। एक बार बोर्ड स्थापित हो जाए तो यह जन स्वास्थ्य (दवा, उपकरण और इलाज के नए तरीके आदि) में नई तकनीक का उनके प्रभाव, औचित्य और लागत आदि के आधार पर आकलन कर सिफारिश करेगा। इस तरह एमटीएबी भी डीएचआर में खड़े किए जा रहे व्यापक नियामक ढांचे का हिस्सा होगा। देश में सही मूल्य पर स्वास्थ्य सेवा सुनिश्चित करने के लिए “न्यायिक सक्रियता” का सहारा लेने की बजाय साक्ष्य आधारित नीति प्रक्रिया को सुनिश्चित करने के लिए तत्काल एमटीएबी स्थापित करना बेहद अनिवार्य है।

पिछले कुछ वर्षों में स्वास्थ्य बीमा कंपनियां स्वास्थ्य सेवा के क्षेत्र में काफी सक्रिय अवतार में नजर आई हैं। इलाज की बढ़ती कीमत के साथ ही अस्पतालों पर प्रतिद्वंद्वी दर पर सेवा उपलब्ध करवाने का दबाव भी बढ़ता जा रहा है। अस्पतालों के लिए  मूल्य नियंत्रण व्यवस्था अपनाना बहुत जरूरी हो जाता है। हालांकि नतीजों की परवाह किए बिना लागत घटाना ‘नकली बचत’ होगी और इस तरह अपने उद्देश्य में यह नाकाम रहेगी। इसकी बजाय अस्पतालों को एचएमआईएस का उपयोग विभिन्न सेवाओं की लागत निर्धारित करने के लिए करना चाहिए। इस काम में उपयोग के बाद के आंकड़े और क्षमताओं के उपयोग की गंभीरता से की गई व्याख्या का सहारा लिया जा सकता है। एचएमआईएस में ही लागत और उपयोग के मानदंड, उपयोग के प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष खर्च की पहचान की व्यवस्था भी करनी होगी। इसमें राजस्व और गैर-राजस्व दोनों ही केंद्रों को शामिल करना होगा और लागत के हर तत्व की सही व्याख्या कर उसके उपयुक्त मानक लागू करने होंगे। इन प्रयासों की मदद से सेवा और सर्जरी आदि के मूल्य निर्धारण के लिए जरूरी सहयोग मिल सकेगा और अस्पतालों को प्रति इकाई सेवा पर आने वाली लागत और राजस्व का आकलन भी मिल सकेगा। इस तरह सेवा के स्तर पर राजस्व और खर्च की सूचना हासिल हो सकेगी। इन सब के साथ ही एक ऐसी व्यवस्था खड़ी करनी होगी जो मरीजों को उनके धन का पूरा मूल्य मुहैया करवाए। यहां आकलन प्रति रुपये मिलने वाले स्वास्थ्य लाभ के रूप में किया जाए ना कि सिर्फ कीमत घटाने या खर्च रोकने के उपाय को काफी मान लिया जाए और उसके प्रभाव को उपेक्षित कर दिया जाए।

देश में कार्डिएक स्टेंट के कारोबार में एबट वसकुलर, बोस्टन साइंटिफिक और मेडट्रोनिक जैसी विदेशी कंपिनयां भी शामिल हैं जिनके शोध और विकास (आर एंड डी) के बजट ने कार्डिएक स्टेंट की सामग्री और स्वरूप में बदलाव लाया है। देश में गैर संक्रामक रोगों के बढ़ते खतरे के साथ ही सभी लोगों को गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवा पहुंचाना जरूरी हो गया है। गैर संक्रामक रोगों के प्रबंधन के लिहाज से मेडिकल उपकरणों को लोगों की पहुंच में लाना भी बहुत महत्वपूर्ण है। लेकिन सच्चाई यह है कि इस समय मेडिकल उपकरण के बाजार के नियमन की कोई कारगर व्यवस्था नहीं ना ही सेवा की गुणवत्ता की निगरानी की कोई औपचारिक व्यवस्था है। ऐसे में मूल्य नियंत्रण का नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है और घटिया क्वालिटी और पुराने पड़ चुके उत्पादों के बाजार में लाए जाने का खतरा पैदा कर सकता है। एनएलईएम में स्टेंट को शामिल किया जाना और इसके मूल्य निर्धारण पर बात करते समय हमें यह भी देखना होगा कि ऐसे फैसले नए शोध, गुणवत्ता और मरीज की सुरक्षा जैसी मौलिक जरूरतों को पूरा करते हैं या नहीं। मूल्य निर्धारण की इस घोषणा के बाद से ऐसे कई मामले सामने आए हैं जिनमें अस्पतालों ने अपनी प्रक्रिया और एंजियोप्लास्टी पैकेज की कीमत बढ़ा दी है। [xvii] हालांकि पिछले कुछ वर्षों में कार्डिएक स्टेंट की कीमत में कमी आई थी, लेकिन ‘मेडिकल डिवाइसेज इन इंडिया- एक्सेसिबलिटी, क्वालिटी एंड प्राइसिंग’ रिपोर्ट के मुताबिक, एंजियोप्लास्टी की कीमत कम नहीं हुई और उतनी ही रही। [xviii] यह जरूरी है कि सरकार ऐसे फैसले लेते समय सबकी सलाह लेने के रवैये को अपनाए और सभी पक्षों को इस प्रक्रिया में शामिल करे जिसमें डॉक्टर, स्टेंट निर्माता, मरीजों के समूह, वकील और शोधकर्ता आदि भी शामिल हों। इससे सही प्रक्रिया और प्रावधान का निर्माण सुनिश्चित हो सकेगा।

भारत में स्वास्थ्य व्यवस्था में कई समस्याएं हावी हैं और अगर देश को अपने नागरिकों के स्वास्थ्य में व्यापक सुधार लाना है तो इन गंभीर मुद्दों पर ध्यान देना होगा। जब तक ऐसी आर्थिक व्यवस्था नहीं खड़ी की जाएगी जिसमें विभिन्न सरकारी और निजी संचालकों को स्वास्थ्य सेवा के क्षेत्र में काम करने का माहौल मिले, पारदर्शी तरीके से लागत तय हो, नतीजे-आधारित आकलन व्यवस्था हो और साक्ष्यों के आधार पर नीतियां तय हों तब तक स्वास्थ्य सेवा तक पहुंच की समस्या बनी रहेगी और ‘न्यायिक सक्रियता’ ही हावी होती रहेगी।

यह शोधपत्र साक्ष्य आधारित स्वास्थ्य नीति की प्रक्रिया स्थापित करने को जरूरी मानता है और इसके लिए मेडिकल तकनीक आकलन बोर्ड (एमटीएबी) का गठन बहुत जरूरी है। साथ ही अस्पतालों में सेवा और ऑपरेशनों की लागत तय करने व नतीजों का आकलन करने के लिए व्यापक व्यवस्था करनी होगी ताकि स्वास्थ्य सेवाओं की कीमत तय की जा सके। स्वास्थ्य सेवा के क्षेत्र में एक वित्त नीति विकसित कर उसे लागू करना होगा जिससे स्वास्थ्य सेवा बाजार में वास्तविक प्रतिद्वंद्विता का माहौल बन सके। वास्तव में देखा जाे तो सबसे पहली समस्या है नजरिये का अभाव। कार्डिएक स्टेंट का मूल्य निर्धारण इस बात का स्पष्ट उदाहरण है कि हम दीर्घकालिक समाधान ढूंढ़ने से कितना दूर हैं। भारतीय नीति निर्माताओं को इससे सबक लेना चाहिए।


लेखकों के बारे में

रमेश भट आईआईएम अहमदाबाद में पूर्व प्रोफेसर हैं और इंडियन हेल्थ इकनोमिक्स एंड पॉलिसी एसोसिएशन के अध्यक्ष हैं।

डैनी जॉन कैंपबेल कोलेबरेशन, नई दिल्ली में एविडेंस सिंथेसिस के विशेषज्ञ हैं।


संदर्भ

[i] Dorairaj, Prabhakaran, Panniyammakal, Jeemon and Roy, Ambuj. Cardiovascular disease in India: Current epidemiology and future directions. Circulation 133 (2016): 1605-1620

[ii] Percutaneous Coronary Intervention (PCI) is a non-surgical procedure that uses a catheter (a thin flexible tube) to place a small structure called a stent to open up blood vessels in the heart that have been narrowed by plaque buildup, a condition known as atherosclerosis.

[iii] A catheterisation laboratory (or cath-lab) is where tests and procedures including ablation, angiogram, angioplasty and implantation of pacemakers / ICDs are carried out. A cath lab is staffed by a team of different specialists, usually led by a cardiologist. A cath lab should not be confused with an operating theatre, where surgeries such as a heart bypass operation, under a general anaesthetic, are conducted.

[iv] 2010-2013 data from presentation made by Dr. Praveen Chandra, Chariman, National Intervention Council, Interventional Council of India Midterm Annual Meeting 2014- Kochi available here: https://www.slideshare.net/saketsinghi/nic-2013-registry-coronary-data-presentation-dr-praveen-chandra; 2014-15 data from newspaper reports available here: http://health.economictimes.indiatimes.com/news/industry/2014-nic-registry-reveals-68-rise-in-patients-requiring-acute-coronary-interventions/46850631

[v] Published in Part II, Section 3, Sub Section (ii) of the Gazette of India Extraordinary, 13th February 2017. Government of India, Ministry of Chemicals and Fertilizers, Department of Pharmaceuticals, National Pharmaceuticals Pricing Authority, New Delhi

[vi] Rhythma Kaul, ‘Lawyer with a heart: Birendra Sangwan’s fight to cap price of coronary stents’, Hindustan Times, Feb 20, 2017.

[vii] Rema Nagarajan, ‘Profit on stents ranges from 270% to 1000%’, Times News Network, Jan 17, 2017.

[viii] NH Political Bureau, ‘A lawyer calls the Prime Minister’s bluff on cardiac stents’, National Herald, Feb 23, 2017.

[ix] K.H. Bønaa, J. Mannsverk, R. Wiseth, L. Aaberge, Y. Myreng, O. Nygård, D.W. Nilsen, N.-E. Kløw, M. Uchto, T. Trovik, B. Bendz, S. Stavnes, R. Bjørnerheim, A.-I. Larsen, M. Slette, T. Steigen, O.J. Jakobsen, Ø. Bleie, Fossum, T.A. Hanssen, Ø. Dahl‑Eriksen, I. Njølstad, K. Rasmussen, T. Wilsgaard, and J.E. Nordrehaug, for the NORSTENT Investigators. Drug eluting stents or bare metal stents for coronary artery disease.

[x] Dianna C Carrillo Gomez, Maria C Ortiz Sierra, Magda C Cepeda Gil, Cesar A. Guevera Cuellar. Cost effectiveness of drug eluting stents versus bare metal sents in coronary artery disease: A systematic literature review. Rev Argent Caridiol 80 (2012); 366-375

[xi] J. P. Tripathy,B. M. Prasad, H. D. Shewade, A. M. V. Kumar, R. Zachariah, S. Chadha, J. Tonsing, and A. D. Harries. Cost of hospitalisation for non-communicable diseases in India: are we pro-poor? Tropical Medicine and International Health 21 (2016) 8: 1019-1028

[xii] Ramakrishnan S, Mishra S, Chakraborty R, Chandra SK, and Mardikar (2013). The report on the Indian coronary intervention data for the year 2011 – National Interventional Council. Indian Heart Journal 65 (2013) 5: 518–521. ; Cardiovascular diseases in India, Max Neeman Contract Research. http://www.neeman-medical.com/sites/default/files/files/Cardiovascular%20Diseases%20in%20India_0.pdf

[xiii] http://health.economictimes.indiatimes.com/news/industry/2014-nic-registry-reveals-68-rise-in-patients-requiring-acute-coronary-interventions/46850631

[xiv] Michael Porter, S Larsson, and Lee Thomas.Standardizing Patient Outcomes Measurement. N Engl J Med 374 (2016) : 504-506. doi: 10.1056/NEJMp1511701

[xv] M Desai and K Mahabal. Desai, M & Mahabal, KM (2007). Health care case law in India: A reader. CEHAT & ICHRL (2007). Mumbai: India

[xvi] Nariman SF, ‘Judicial overreach: It’s the order of the day’. Hindustan Times (2017), Aug 20

[xvii] Snigdha Basu, ‘Price cap on stents hailed by all, but serious concerns remain’, NDTV Health, Feb 22, 2017

[xviii] IMS Health, Medical Devices in India—Accessibility, Quality and Pricing, 2016

ये लेखक के निजी विचार हैं।

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