आक्रामकता कितनी हो यह अब भारत तय करेगा

एलओसी के पार भारतीय सेना की कार्रवाई से कैसे बदला भारत—पाक शक्ति संतुलन

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भारत द्वारा नियंत्रण रेखा यानी 'एलओसी'को पार कर सैनिक कार्रवाई करने के साथ ही दोनों देशों के बीच शक्ति संतुलन नाटकीय ढंग से बदल गया है। भारत द्वारा की गई कार्रवाई अपने आप में खासी आक्रामक थी और इससे यह भी तय हो गया कि दोनो देशों के बीच संबंधों में आक्रामकता किस हद तक पहुंचे यह तय करने की शक्ति भारत के पास कहीं ज्यादा है। अब तक पाकिस्तान की इस मामले में ज्यादा चल रही थी लेकिन ताजा सैनिक कार्रवाई से स्थितियां उलट गई हैं और भारत का पलड़ा भारी हो गया है।

ऐसा नहीं है कि पाकिस्तान इस बदलाव को चुनौती नहीं देगा। पाकिस्तानी सेना से उम्मीद की जा सकती है कि वो भारत की इस नई आक्रामकता और प्रभुत्व की ठोक — बजा कर जांच पड़ताल करेगी। इसलिए भारत को भी इसका जवाब देने के लिए और भी ज्यादा मजबूती दिखानी होगी खासकर पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर यानी 'पीओके' में।

वैसे यह अपने आप में रहस्य ही है कि सैन्य शक्ति में अपने से कहीं कमजोर पाकिस्तान को भारत ने आपसी संबंधों की दिशा तय करने की छूट कैसे दे दी। कहा जा सकता है कि इसका एक कारण यह था कि इस क्षेत्र में अभी तक शक्ति संतुलन तथा आपसी संबंधों में बढ़ती असहजता को लेकर आम राय का फोकस पाकिस्तान से कहीं ज्यादा भारत की मजबूरियों पर था। यह इस बात का परिणाम था कि पाकिस्तान परमाणु विकल्प की धमकी देता रहता था  और इधर भारतीय नीति—निर्धारकों को यह लगता था कि पाकिस्तान अनियंत्रित हो सकता है और वहां तर्क का कोई काम नहीं, इसलिए उसकी इस धमकी को गंभीरता से लेना चाहिए क्योंकि वह इस पर अमल भी कर सकता है। इस भाव को इस बात से भी बल मिला कि भारत खुद को इस क्षेत्र में पाकिस्तान की तुलना में कहीं ज्यादा 'जिम्मेदार' देश के तौर पर दुनिया के सामने  पेश करने में प्रयासरत था। इसी के चलते भारतीय नेतृत्व ने संभवत: बल के प्रयोग संबंधी विकल्प का इस्तेमाल करने के बारे में नहीं सोचा।

पाकिस्तान की परमाणु विकल्प संबंधी धमकियों से जुड़ा तर्क समझ में आता है लेकिन गौरतलब है कि जब तक पाकिस्तान का अस्तित्व खतरे में नहीं होगा तब तक उसके द्वारा परमाणु हमले का विकल्प इस्तेमाल करने  का कोई तार्किक आधार नहीं है। न तो भारत सरकार और न ही इस विषय पर काम कर रहे भारतीय विश्लेषकों ने इस ओर ध्यान दिया कि इस धमकी पर अमल करने को लेकर पाकिस्तान की अपनी सीमाएं हैं और इससे इस धमकी की विश्वसनीयता पर ही प्रश्नचिन्ह लग जाता है।

यह कल्पना करना  मुश्किल है कि पाकिस्तान अगर अपनी जमीन का कुछ हिस्सा खो देता है यां उसे किसी और तरहं से सजा मिलती है मसलन उसकी सेना के एक हिस्से का नष्ट हो जाना, तो ऐसे में कोई पाकिस्तानी सैन्य नेता परमाणु हथियारों के इस्तेमाल का आदेश दे देगा। पाकिस्तान को सजा देने के लिए उसका कितना हिस्सा भारत को लेना है और कितना हिस्सा उसे तब लेना है जब कि वह पाकिस्तान के अस्तित्व को खतरे में डालना चाहता है, दोनों में काफी बड़ा अंतर है। इसका मतलब है कि बिना परमाणु हथियारों के हमले के खतरे के भारत पाकिस्तान को काफी सख्त सजा दे सकता है बस उसे वहां तक नहीं पहुंचना जहां पाकिस्तान के अस्तित्व को ही खतरा हो जाए। पाकिस्तान की संघर्ष को तेज करने की धमकी तो और भी ज्यादा अविश्वसनीय साबित होती अगर भारत ने पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर यानी पीओके पर ध्यान दिया होता। इस बात की संभावना कम ही लगती है कि इस विवादास्पद क्षेत्र पर कब्जा बनाए रखने के लिए पाकिस्तान उन्हीें लोगों के खिलाफ परमाणु विकल्प इस्तेमाल करनेगा जिनका प्रतिनिधित्व करने का वह दावा करता है। इससे स्पष्ट होता है कि पाकिस्तान की परमाणु विकल्पों के उपयोगी की धमकी केवल गीदड़ भभकी थी। पर भारतीय नेतृत्व इसे भी गंभीरता से ले रहा था इसलिए पाकिस्तान इसका फायदा उठाकर भारत को डराता रहा।

लेकिन जिस तरहं भारत ने नियंत्रण रेखा को पार कर की गई सैनिक कार्रवाई को खुलकर प्रचारित किया है; सार्वजनिक घोषणा की है कि पाकिस्तान के साथ संघर्ष तेज होने की संभावनाओं को लेकर वह तैयार है तथा पीओके पर पाकिस्तान के नियंत्रण को लेकर सवाल उठाए हैं, उससे संकेत मिलता है कि भारत अब पाकिस्तान को परमाणु विकल्पों का हौवा खड़ा कर शक्ति संतुलन में हावी नहीं होने देगा। इससे पहले भी भारत आक्रामक रूख अपना चुका है। कारगिल में भारत ने ही वायुसेना का इस्तेमाल कर आक्रामकता का परिचय दिया था। उस समय पाकिस्तान को अपनी सीमाओं का अहसास हुआ था क्योंकि वह इस मामले में कुछ नहीं कर पाया और भारतीय हवाई हमलों ने पाकिस्तानी सेना के घुसपैठियों का विनाश कर दिया था। पर यह एक अपवाद की तरहं था क्योंकि पाकिस्तान ने इसके बाद भारत को आक्रामकता दिखाने के मौके नहीं दिए। कारगिल युद्ध के समय नियंत्रण रेखा को पार करने में भारत की हिचकिचाहट के चलते इस युद्ध के बाद दोबारा पाकिस्तान हावी हो गया।

बताया जाता है कि इससे पहले भी भारत ने नियंत्रण रेखा पार कर इस प्रकार की सैनिक कार्रवाइयां की हैं पर ये गुप्त रूप से की गई थीं। यह स्पष्ट नहीं कि इन अभियानों को नई दिल्ली से आदेश के बाद अंजाम दिया गया था यां ये केवल स्थानीय कमांडरों द्वारा बदले की मंशा से की गई जवाबी कार्रवाई थी, खासकर तब जब कि पाकिस्तान ने भारतीय जवानों के सर काटने जैसी वीभत्स हरकतें कीं।  हाल ही में की गई भारतीय सैन्य कार्रवाई इस मायने में मूलभूत रूप से अब तक की गई कार्रवाइयों से अलग है कि इसको प्रचारित किया गया। इसका उद्देश्य था पाकिस्तान को संकेत भेजना कि यां तो वह अपनी हरकतों से बाज आए अन्यथा अब भारत भी हर स्थिति का जवाब देने के लिए तैयार है।

पाकिस्तान के पास अभी भी स्थिति को और बिगड़ने देने का विकल्प है और हो सकता है कि वह इसका उपयोग भी करे। परंपरागत तर्क तो यही है कि भारत ने और ज्यादा आक्रामक रूख अपनाया की तो जवाब में पाकिस्तानी आक्रामकता भी बढ़ेगी। पर पाकिस्तान द्वारा हाल में भारत द्वारा की गई सैनिक कार्रवाई को नकार दिया गया। यह दोनों देशों के बीच चल रही तनातनी में इजाफा नहीं बल्कि कमी लाने वाला कदम था। यह भी हो सकता है कि पाकिस्तानी रूख सिर्फ दिखावे भर के लिए हो और अंदखाने वह जवाब देने की तैयारी कर रहा हो। क्या होगा अंतत: वक्त ही बताएगा। लेकिन इतना तो तय है कि फिलहाल एक के कारण दूसरे की आक्रामकता बढ़ने वाला पुराना तर्क इस बार जमीन पर लागू होते नहीं दिख रहा है।

और अब सबसे महत्वपूर्ण बात: भारत आक्रामक रवैया अख्तियार कर चुका है इस बात के मद्देनजर अब पाकिस्तान सेना का नेतृत्व इस बात को लेकर निश्चिंत नहीं हो सकता कि अगर पाकिस्तान ने कोई हरकत की तो भारत कोई प्रतिक्रिया नहीं करेगा। वास्तव में भारतीय राजनीतिक व सैन्य नेतृत्व द्वारा दिए जा रहे बयान जिनके अनुसार अब भारत भी पाकिस्तान के साथ संघर्ष की आंच तेज करने के लिए तैयार है, इससे दोनो देशों के बीच बदले हुए शक्ति संतुलन पर एक बार फिर मुहर लग गई है। पूर्व में भारत सरकार इस उम्मीद में पाकिस्तानी कब्जे वाले कश्मीर को लेकर सवाल उठाने से परहेज करती रही है कि शायद पाकिस्तान,  नियंत्रण रेखा को ही व्यवहारिक दृष्टि से अंतर्राष्ट्रीय सीमा के तौर स्वीकार कर ले। लेकिन मोदी सरकार ने इस नीति को पलटा है  और पाक के कब्जे वाले कश्मीर पर जोर — शोर से सवाल उठाए हैं। इससे पाकिस्तान को यह संकेत दे दिया गया है कि उसने कश्मीर के एक हिस्से को चुपचाप ऐसे ही नहीं निगलने दिया जाएगा।

लेकिन इसका ये भी अर्थ नहीं कि पाकिस्तान स्थिति को और तनावपूर्ण बनाने का प्रयास नहीं करेगा। पाकिस्तान की एक सोच यह भी हो सकती है कि अब तक जब भी भारत को चुनौती दी गई है उसने सुरक्षात्मक रूख अपनाया है और हाल ही में आया बदलाव एक अस्थायी अपवाद मात्र है और पाकिस्तान अगर आक्रामक रूख अपनाएगा तो वह फिर भारत पर हावी हो सकता है।

दुर्भाग्यवश भारतीय कार्रवाई में कुछ मिश्रित संकेत गए हैं। भारत ने इस बात को स्पष्ट करने का पूरा प्रयास किया है कि उसकी सेना ने पाकिस्तानी सेना पर आक्रमण नहीं किया और उसने  अपनी कार्रवाई की अवधि व दायरा सीमित रखा।  भारतीय रूख  को इस दृष्टि से समझा जा सकता है कि इस तरहं की आक्रामकता का इस्तेमाल भारत ने पहली बार किया है। पर फूंक फूंक कर कदम रखने की भारतीय रणनीति  से पाकिस्तानी हुक्मरानों की  भारत के बारे में गलत अवधारणा बन सकती है।

इसका मतलब साफ है कि पाकिस्तान अगर भारत की मंशा जांचना चाहता है तो भारत सरकार को और ज्यादा आक्रामक रूख अपनाने के लिए तैयार रहना चाहिए। भारत अगर पाकिस्तान के परमाणु विकल्पों के हौवे से बाहर निकल आए तो परंपरागत सैन्य क्षमता में वह पाकिस्तान से कहीं आगे है और इसलिए वह चाहे तो और आक्रामक हो सकता है। अगर पाकिस्तान भारत को फिर कसौटी पर कसने का प्रयास करे तो उसे पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर को जवाब देने के लिए चुनना चाहिए। क्योंकि पाकिस्तान इस क्षेत्र में परमाणु हथियारों के इस्तेमाल से बचेगा। इस नजरिए से भारत चाहे तो पाकिस्तानी कब्जे वाले कश्मीर में और भीतर जाकर उसकी सेना छापामार कार्रवाई कर सकता है या फिर संभवत:  हाजी पीर दर्रे जैसे रणनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण इलाके  को भारत अपने अधिकार क्षेत्र में ले सकता है। इस संदर्भ में भारत के सामने असली चुनौती परमाणु विकल्पों के इस्तेमाल को रोकने की नहीं बल्कि अपनी सेनाओं को चाक — चौबंद रखने और हथियारों से ठीक तरहं से लैस करने की है क्योंकि हम सभी जानते हैं कि पिछले कुछ सालों में रक्षा साजो—सामान की खरीद का हाल कितना खराब है।

भारत अब शक्ति संतुलन को नियंत्रित कर रहा है। इस की प्रतिक्रिया में पाकिस्तान निचले स्तर पर हिंसा को समर्थन जारी रखने पर ज्यादा ध्यान दे सकता है। इससे भारत का नियंत्रण कुछ हद तक ढीला पड़ सकता है पर इसका लाभ यह भी होगा कि पाकिस्तान प्रायोजित हिंसा कम होगी। इससे कश्मीर घाटी की स्थानीय समस्या तो नहीं सुलझेगी लेकिन भारत सरकार को समाधान ढूंढने के लिए ज्यादा बेहतर हालात और अवसर जरूर मिलेंगे।

नियंत्रण रेखा के पार भारत द्वारा की गई सैन्य कार्रवाई से उसे लाभ तो मिला है लेकिन यह अस्थायी लाभ है। अब भारत सरकार को यह सुनिश्चित करना होगा कि वह अपने प्रभुत्व को बनाए रखे और इसके लिए अगर पाकिस्तान परीक्षा लेने का प्रयास करता है तो भारत भी उसे आक्रामक जवाब दे।

ये लेखक के निजी विचार हैं।

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